भारतकोश
संग्रह पर लौटें

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पद्यभाग ११: ईक्षितृत्वप्रकरणम्

ईक्षितृत्वप्रकरणम् ईक्षितृत्वं स्वतःसिद्धं जन्तूनां च ततोऽन्यता । अज्ञानादित्यतोऽन्यत्वं सदसीति निवर्त्यते ॥१॥ ईक्षितृत्वमिति—समस्त जीवों का ईक्षितृत्व ( चित्स्वरूपत्व ) स्वभाव से ही सिद्ध है, और उनकी भिन्नता अज्ञानजनित ( उपाधि के कारण ) है । अतः 'तू सत् ( ब्रह्म ) है' इस वाक्य से उनके भेद का निरसन किया गया है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी ब्रह्मात्मैक्यज्ञान से मुक्ति होती है अर्थात् एकमात्र ब्रह्मात्मैक्यज्ञाननिष्ठ व्यक्ति मुक्त होता है, यह जो कहा गया है, वह संगत नहीं हो सकता। क्योंकि ब्रह्म और आत्मा परस्परविरुद्ध स्वभाव के हैं, अतः उन दोनों की एकता होना संभव ही नहीं। मुक्ति तो कर्म से या कर्मसहित ज्ञान से ही हो सकती है। उसी तरह वेदान्त वाक्यों से ही सुनिश्चित (यथार्थ-सम्यक्) ज्ञान हो सकता है—यह कथन भी सन्दिग्ध है, वह ज्ञान तो अनुमानादि प्रमाण से भी हो सकेगा—यदि कोई ऐसी आशंका करे तो उस आशंका के परिहारार्थ इस प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है, और इसके द्वारा 'ज्ञानादेव मुक्तिः' ज्ञान से ही मुक्ति होती है, यह बताया जायगा, और वह ज्ञान, वेदान्त-महावाक्य से ही हो सकेगा, अनुमानादि प्रमाणों से नहीं—यह भी बताया जायेगा । 'त्वं सत् असि' तुम सच्छब्द- लक्षित ब्रह्म ही हो, संसारी नहीं हो—इस वाक्योपदेश से ही सच्छब्दार्थ ब्रह्म और जीव का भेद निवृत्त हो जाता है । तथापि संसारी अशुद्ध जीव में उससे नितान्त विपरीत ब्रह्मत्व की संभावना कैसे कर सकते हैं ? यह आशंका हो सकती है। उस आशंका का निवारण इस प्रकार कर सकते हैं कि समस्त प्राणियों का चिद्रूपत्व ही ईक्षितृत्व है, और वह स्वतः- सिद्ध (स्वाभाविक) है। चिद्रूपत्व की तरह कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि को भी स्वाभाविक नहीं माना जा सकता। अन्यथा स्वरूप में व्यभिचार होगा। क्योंकि कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि चिद्रूप से अन्य ( भिन्न ) है, जो अज्ञानजनित है। एवंच अन्यत्व ( अन्यता ) अज्ञाननिबन्धन ( अज्ञानकारणक ) है, वास्तविक ( पारमार्थिक ) नहीं है; कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि में अज्ञानकल्पितत्व तथा ब्रह्मविपरीतत्व है, और मोक्ष स्वतश्चिन्मात्रस्वभाव ( स्वरूप ) तथा अज्ञान-निवृत्तिलक्षण ( स्वरूप ) है। मोक्ष में केवल तत्त्वज्ञान मात्र की अपेक्षा रहती है, अर्थात् तत्त्वज्ञान की आवश्यकता होती है। अतः 'तत्त्वमसि' महावाक्य के अर्थज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति होने से कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि की भी निवृत्ति हो जाती है। एवञ्च ज्ञान से ही अन्यत्वनिवृत्तिरूप मुक्ति होती है। उसके लिये अन्य साधन खोजने की आवश्यकता नहीं है ॥ १ ॥ एतावद्धचमृतत्वं न किंचिदन्यत्सहायकम् । ज्ञानस्येति ब्रुवच्छास्त्रं सलिङ्गं कर्म बाधते ॥२॥ एतावदिति—यह आत्मज्ञान ही अमृतत्व ( मोक्षप्राप्ति का साधन ) है । इस आत्मज्ञान का कोई और सहायक नहीं है। इस प्रकार कहता हुआ शास्त्र¹ आश्रमोचित यज्ञोपवीतादि लिङ्गों के सहित कर्म का बाध करता है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व कथन के अनुसार यद्यपि ज्ञान से मोक्ष होता है, तथापि वह ज्ञान, कर्मसापेक्ष होकर ही मोक्ष का साधन हो सकता है, कर्मनिरपेक्ष होकर नहीं—ऐसा कुछ लोगों का कहना है, किन्तु वह श्रुति तथा युक्ति के विरुद्ध होने के कारण उचित नहीं है। अतः कर्म को ज्ञान का सहायक मानकर उसे मोक्ष का साधन नहीं माना जा सकता। अद्वैत आत्मज्ञान के होनेपर कर्म के हेतुभूत जात्यादि के अभिमान के अभाव में कर्म की स्थिति ही कहाँ, जो मोक्षफल की प्राप्ति कराने में ज्ञान का सहायक बन सके ? एवंच ज्ञान-कर्मसमुच्चय मोक्षप्राप्ति में कारण नहीं है ॥ २ ॥ १. 'एतावदरे खल्वमृतत्वम्'—( बृ. उ. ४।५।१५ ) अमृतत्व का साधन आत्मज्ञान ही है—इन शब्दों से निश्चयपूर्वक कहनेवाली श्रुति को शास्त्र कहते हैं । ७

५० उपदेशसाहस्री सर्वैषां मनसो वृत्तमविशेषेण पश्यतः । तस्य मे निर्विकारस्य विशेषः स्यात्कथंचन ॥३॥ सर्वेषामिति—सबके अन्तःकरणों की वृत्तियों को सामान्यभाव से देखने वाले उस मुझ निर्विकार आत्मा का कोई विशेषभाव कैसे हो सकता है ? ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकरण के प्रथम श्लोक के द्वारा प्रतिपादित स्वाभाविक चिद्रूपत्व को बताते हुए ज्ञानी के लिये कर्म का होना संगत नहीं हो सकता, यह प्रस्तुत श्लोक के द्वारा बताया जा रहा है। क्योंकि समस्त प्राणियों की मनोवृत्तियों के साक्षी उस आत्मा को जाति आदि का कोई अभिमान नहीं होता है। श्लोक में आये 'विशेष' शब्द का अर्थ कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि तथा शास्त्रविहित कर्म के साधनभूत जात्याद्यभिमान है। 'कथञ्चन' का अर्थ आक्षेप है। अर्थात् किसी प्रकार भी मुझमें विकार नहीं हो सकता, क्योंकि अभिमानशून्य होकर केवल साक्षी बनकर मैं देखता रहता हूँ ॥ ३ ॥ मनोवृत्तं मनश्चैव स्वप्नवज्जाग्रतीक्षितुः । संप्रसादे द्वयासत्त्वाच्चिन्मात्रः सर्वगोऽव्ययः ॥४॥ मन इति—स्वप्न के समान जाग्रत् अवस्था में भी मन और मन की वृत्तियों के साक्षी (ईक्षिता) आत्मा का कोई विशेषभाव कैसे हो सकता है ? किन्तु सुषुप्ति अवस्था में इन दोनों का अभाव होने से सर्वगत, अविनाशी आत्मा चेतनमात्र रह जाता है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह आत्मा सबकी मनोवृत्तियों को समान भाव से (अविशेषेण) किस प्रकार देखता है, यह जिज्ञासा होनेपर दृष्टान्त के साथ उसका उपपादन करते हुए आत्मा की चिदेकरसता को बता रहे हैं। स्वप्नावस्था में बाह्य विषय (पदार्थ) न होने से आत्मा जैसे सवृत्तिक (वृत्तिसहित) मन को ही देखता रहता है, ठीक उसी तरह जाग्रत् अवस्था में भी मनोवृत्ति (मनःप्रचार—मनोवृत्त) और उस वृत्ति के आश्रयभूत मन को आत्मा देखता है, तब उसमें कौनसी विशेषता (विकार) उपलब्ध हो रही है ? अर्थात् कोई नहीं। क्योंकि स्वप्न में जैसे वृत्तिसहित मन के अतिरिक्त आत्मा को कुछ उपलब्ध नहीं होता, वैसे ही जाग्रत् अवस्था में भी उसे विषयाकारवृत्तिविशिष्ट मन के अतिरिक्त कुछ भी उपलब्ध नहीं होता है। यदि कहें कि इस प्रकार का मनोदर्शन ही उस (आत्मा) में स्वाभाविक विशेष (विकार) है, तो यह कथन भी ठीक न होगा, क्योंकि सुषुप्तिदशा में (सम्प्रसाद में) वृत्ति और मन दोनों ही नहीं रहते१, अतः उनका दर्शन भी स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। एवंच आत्मा चिन्मात्र है, सर्वत्र व्याप्त है, अव्यय और अद्वितीय सिद्ध होता है ॥ ४ ॥ स्वप्नः सत्यो यथाऽऽबोधाद्देहात्मत्वं तथैव च । प्रत्यक्षादेः प्रमाणत्वं जाग्रत्स्यादाऽऽत्मवेदनात् ॥५॥ स्वप्न इति—जिस प्रकार जागने तक स्वप्न की सत्यता प्रतीत होती है, उसी प्रकार आत्मज्ञान होने तक ही जाग्रत् अवस्था में देहात्मबुद्धि और प्रत्यक्षादि प्रमाणों का प्रामाण्य समझा जाता है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—पूर्वप्रतिपादन यदि अकाट्य हो तो बाह्याभ्यन्तर द्वैत का अभाव स्वीकार करना ही होगा, किन्तु प्रत्यक्षादि प्रमाणों के साथ विरोध होने से तथा लौकिक-वैदिक समस्त व्यवहारों का लोपप्रसंग प्राप्त होने से पूर्वप्रतिपादन उचित नहीं प्रतीत होता। समा०—जैसे जागने तक स्वप्न सत्य अर्थात् लौकिक-वैदिक व्यवहार के योग्य प्रतीत होता है, उसी तरह जाग्रत् अवस्था में भी देहात्मबुद्धि और प्रत्यक्षादि प्रमाणों का प्रामाण्य सम्पूर्ण व्यवहारों का अंग (साधन-उपाय) माना १. 'न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ।'—(बृ. उ. ४।३।२३)

ईक्षितृत्वप्रकरणम् ५१ जाता है। परन्तु उसकी भी एक अवधि है, जो “आत्मवेदनात्” शब्द से बताई गई है, अर्थात् 'आ-आत्मवेदनात्' तक ही उसकी अवधि है। आत्मतत्त्वसाक्षात्कार के पूर्व तक ही समस्त व्यवहार की सत्ता है, आत्मतत्त्वसाक्षात्कार होनेपर सब व्यवहार समाप्त (अभाव) हो जाते हैं। अर्थात् जाग्रदवस्था में देहादि में मिथ्या आत्माभिमान रहता है, उस समय प्रत्यक्षादिकों को प्रमाण माना जाता है, इसलिये इस अविद्यावस्था में व्यवहार चलते रहते हैं, व्यवहारलोप का प्रसंग नहीं आता। एवंच यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आत्मज्ञान के पूर्व तक ही लौकिक-वैदिक समस्त व्यवहार और उनके लिये प्रमाणों की आवश्यकता होती है, आत्मज्ञान होनेपर 'एक चिन्मात्र आत्मा' के सिवाय कुछ नहीं ॥५॥ व्योमवत्सर्वभूतस्थो भूतदोषैर्विवर्जितः । साक्षी चेताऽगुणः शुद्धो ब्रह्मैवास्मि* स केवलः ॥६॥ व्योमवदिति—मैं आकाश के समान सम्पूर्ण प्राणिवर्गों में स्थित हूँ, तथापि उनके दोषों से रहित हूँ, सबका साक्षी१, चिद्रूप, निर्गुण, शुद्ध और अद्वितीय ब्रह्म ही हूँ ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस श्लोक के द्वारा उसके अव्यवहार्य स्वरूप को बता रहे हैं—विद्यावस्था (आत्मज्ञान की अवस्था) में व्यवहार का अभाव तो अभीष्ट ही है। आत्मा 'चेता' है अर्थात् अपने प्रकाश के द्वारा (आत्मा स्वप्रकाश यानी प्रकाशरूप है) अज्ञान और उसके कार्यों का प्रकाशक (अवभासक) है, इस कारण उसे चेता (चिद्रूप) कहा जाता है। प्राणियों में स्थित रहनेपर भी उनके दोषों से वह संस्पृष्ट नहीं होता, क्योंकि वह केवल साक्षी होकर स्थित रहता है। 'व्योमवत् सर्वभूतस्थः' आकाश के समान समस्त प्राणियों में स्थित है, यह कहने से उसका 'असंगत्व' ज्ञात होता है। आकाश सर्वत्र रहते हुए भी जैसे असंग, उसी तरह आत्मा भी असंग है। आत्मा को सर्वभूतस्थ कहने का तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण प्राणियों (भूतों) में 'अहम्' इत्याकारक वृत्ति की अभिव्यक्ति, उसके बिना रहे नहीं हो सकती२। अज्ञानरहित होने से उसे 'शुद्ध' कहते हैं। 'केवल' कहने से वह तीनों अवस्थाओं से रहित है। एवंच मैं ब्रह्म (पूर्ण) ही हूँ ॥ ६ ॥ नामरूपक्रियाभ्योऽन्यो नित्यमुक्तस्वरूपवान् । अहमात्मा परं ब्रह्म चिन्मात्रोऽहं सदाऽद्वयः ॥७॥ नामेति—मैं नाम, रूप और क्रिया से अन्य (भिन्न) और नित्यमुक्तस्वरूप हूँ, तथा मैं आत्मा ही नित्य [ सदा ] अद्वितीय [ अद्वय ] चिन्मात्र परब्रह्म हूँ ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस श्लोक के द्वारा आत्मा के 'केवलत्व' को बताया गया है। अर्थात् वाच्य-वाचक और तद्व्यापारात्मक प्रपञ्च से शून्य (रहित) आत्मा है ॥ ७ ॥ अहं ब्रह्मास्मि कर्ता च भोक्ता चास्मीति ये विदुः । ते नष्टा ज्ञानकर्मभ्यां नास्तिकाः स्युर्न संशयः ॥८॥ अहमिति—'मैं ब्रह्म हूँ तथा कर्ता भोक्ता भी हूँ' ऐसा जो लोग मानते हैं, वे ज्ञान और कर्म दोनों से ही भ्रष्ट [ पतित ] हैं, और वे नास्तिक ही हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—ज्ञान-कर्मसमुच्चयवादी के भेदाभेदमत के अनुसार यह शंका हो रही है कि आत्मा की अद्वयता (अद्वयत्व) कैसे संगत हो सकती है ? क्योंकि 'अहं ब्रह्मास्मि' के समान 'अहं कर्ताऽस्मि' यह अनुभव भी प्रामाणिक रूप से होता है। १. श्वे. उ. ६।११ २. 'अहं मनुरभवं सूर्यश्च'—(बृ. उ. १।४।१०) इसका तात्पर्य सर्वात्मत्वाभिनय में है।

  • स्मीति के०—पाठान्तरम् ।

५२ उपदेशसाहस्री समा०—शास्त्र कभी विरुद्धार्थ का प्रतिपादन नहीं करता । शास्त्र के अर्थ को जो विरुद्ध समझते हैं, वे वस्तुतः कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्ड से बहिर्मुख ही हैं, इसलिए उन्हें नास्तिक ही समझना चाहिए । वे सभी पुरुषार्थों के अयोग्य हैं ॥ ८ ॥ धर्माधर्मफलैर्योग इष्टोऽदृष्टो यथाऽऽत्मनः । शास्त्राद्ब्रह्मत्वमप्यस्य मोक्षो ज्ञानात्तथेष्यताम् ॥९॥ धर्मेति—किसी अन्य प्रमाण से सिद्ध न होनेपर भी मीमांसा शास्त्र के आधार पर ही आत्मा का धर्माधर्म- रूप फलों [ पुण्य-पाप रूप फलों ] से सम्बन्ध स्वीकार किया जाता है, वैसे ही शास्त्र-प्रमाण [ वेदान्त शास्त्र के आधार पर ] से आत्मा का ब्रह्मत्व और ज्ञान से उसका मोक्ष भी स्वीकार करना चाहिये ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—दूसरों को नास्तिक कह देने मात्र से अद्वैत का सिद्धांत स्थिर नहीं किया जा सकता । अद्वैत की सिद्धि में कोई प्रमाण नहीं है, अतः ‘ब्रह्मैवास्मि’ यह ज्ञान नहीं हो सकता । अद्वैत को सिद्ध करने के लिए जो तादात्म्य- श्रुतियाँ उपस्थित की जाती हैं, वे सब अन्यपरक होने से उपपन्न हो जाती हैं । समा०—शास्त्र के तत्त्वार्थ को जाननेवाले विद्वान् किन्हीं अन्यान्य प्रमाणों (प्रत्यक्षानुमानादि प्रमाणों) से सिद्ध (प्रमित) न होते हुए भी जैसे केवल एकमात्र शास्त्रप्रमाण¹ के आधार पर ही आत्मा का सुख-दुःखादिरूप धर्मा- धर्मफलों के साथ सम्बन्ध मान लेते हैं, उसी तरह वे विद्वान् वेदान्तशास्त्र² के आधार पर आत्मा में ब्रह्मत्व (आत्मा को ब्रह्म) और उसका ज्ञान से ही मोक्ष स्वीकार कर लें । क्योंकि शास्त्रत्वेन दोनों समान रूप से प्रमाण हैं । एवं च भेद और कर्म दोनों निन्दित होने से उन दोनों में शास्त्र का तात्पर्य नहीं है । अतः शास्त्र का अनुसरण करनेवाले विद्वान् यथाशास्त्र ही अर्थ समझने का प्रयास करें । अतः ‘तत्त्वमसि’ वाक्य से आत्मा को ब्रह्म, अर्थात् आत्मा में ब्रह्मत्व के ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति, उससे ब्रह्मरूप में ही उसकी स्थिति और मोक्ष (कैवल्य) समझना चाहिये ॥ ९ ॥ या माहार्जनाद्यास्ता वासनाः स्वप्नदर्शिभिः । अनुभूयन्त एवेह ततोऽन्यः केवलो दृशिः ॥१०॥ या इति—हरिद्रा [ हल्दी ] से रंगे हुए वस्त्रादि के समान जाग्रत् दशा की वासनाएँ होती हैं, उन्हीं का स्वप्न देखने वाले पुरुष उनका अनुभव करते रहते हैं, वास्तव में उनकी सत्ता नहीं रहती । उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में भी शुद्ध साक्षीमात्र आत्मा उस विषयदर्शी जीव से सर्वदा भिन्न रहता है ॥ १० ॥ हृदयस्पर्शिनी समुच्चयवादी कह सकता है कि हमारे शास्त्र ने आत्मा के साथ जो धर्माधर्म का सम्बन्ध माना है, वह किसी प्रमाणान्तर से विरुद्ध न होने के कारण उचित ही है, किन्तु आत्मा का अकर्तृत्व, अभोक्तृत्व आदि उसके प्रत्यक्ष प्रतीत होनेवाले कर्तृत्व-भोक्तृत्व से विरुद्ध हैं, इस कारण वेदान्तियों का कहना ठीक नहीं है । अतः शास्त्र और अनुभव का समन्वय (अविरोध) करने के लिये हमें भेदाभेदवाद का स्वीकार कर लेना चाहिये । किन्तु उसका यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मा में कर्तृत्व आदि का जो प्रतिभास होता है, वह वास्तविक न होकर केवल अध्यास मात्र है । अतः श्रुत्युक्त अद्वैत का प्रतिपक्षी कोई न होने से निर्विरोध अद्वैत सिद्ध हो जाता है । स्वप्नावस्था में लिङ्ग के आश्रित रहनेवाली³ श्रुतिसिद्ध वासनाएँ ही स्वप्नदर्शियों के द्वारा देखी जाती हैं । महारजन (हरिद्रा) से रञ्जित वस्त्रादि को ‘माहारजन’ कहते हैं । स्वप्नावस्था में वात-पित्त-श्लेष्म से दूषित हुए रस से परिपूर्ण हुईं नाड़ियों में अनुगत (प्रविष्ट) हुए जाग्रद्वासनावासित मन की अनेक वासनाएँ अदृष्टादि के द्वारा उद्बुद्ध (जागरित) होती हैं, उस कारण जाग्रत् अवस्था में दृष्ट अर्थ (पदार्थ) के आकार में परिणत हुआ वह १. ‘पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन’— (बृ. उ. ३।२।१३) २. ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’—( मुं. उ. ३।२।९ ), ‘तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’—( श्वे. उ. ३।८, ६।१५) ३. ‘तस्यहैतस्य पुरुषस्य रूपं । यथा माहारजनं वासः’ इत्यारभ्य ‘यथाऽसकृद्विद्युत्तम्’ इत्यन्तेन श्रुत्युक्ता वासनाः । (बृ. उ. २।३।६)

ईक्षितृत्वप्रकरणम् ५३ मन हरिद्रारञ्जित पटादि के रूप के समान भासित होने लगता है और स्वप्नद्रष्टा के द्वारा उसकी उपलब्धि द्रष्टा, दृश्य, दर्शन एवं तत्करणादि के रूप में नित्य हुआ करती है। अतः स्वप्न में दिखाई पड़नेवाली माहारजन (पीतवस्त्र) आदि के समान लिङ्गात्मा (मन-बुद्धि) के सहित वासनाओं की अपेक्षा दृशिस्वरूप द्रष्टा आत्मा विलक्षण ही प्रतीत होता है। उसी तरह जाग्रत् अवस्था में कर्तृत्ववादि भी दृश्य होने के कारण अनात्मधर्म ही हैं, यह निश्चित होता है। अतः कर्तृत्वादि धर्मवाले लिङ्ग (मन-बुद्धि) से दृशिस्वरूप केवल शुद्ध आत्मा कोई अन्य ही है ॥ १० ॥ कोशादिव विनिष्कृष्टः कार्यकारणवर्जितः । यथाऽसिर्दृश्यते स्वप्ने तद्वद्बोद्धा स्वयंप्रभः ॥११॥ कोशादिति—जिस प्रकार कोश से निकाला खड्ग् उस कोश से पृथक् [ भिन्न ] दिखलाई देता है, उसी प्रकार स्वप्नावस्था में स्वयंप्रकाश बोद्धा भी कार्य-कारणाकार मन से पृथक् ही रहता है ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की स्वप्नावस्था में दृश्य की अपेक्षा विलक्षण (पृथक्) प्रतीति होती है। जैसे खड्ग (असि) कोश (म्यान) से अलग करने पर (निकालनेपर) अपने स्वरूप में दिखाई देता है, उसी तरह कार्य-कारणवर्जित अर्थात् कार्य- कारणाकार लिङ्गात्मक मन से पृथक् बोद्धा आत्मा स्वप्न में यथावत् दिखाई देता है। 'दृश्यते' दिखाई देता है—कहने से उसे (आत्मा को) दृश्य विषयों के समान मिथ्या नहीं समझना चाहिये, क्योंकि वह स्वयंप्रभ है। वह अपनी महिमा से ही प्रकाशित रहता है, विषय की तरह प्रकाशित किया नहीं जाता। अथवा¹ श्रुति के द्वारा निर्णीत होने से कार्य- कारणवर्जित आत्मा का स्वप्न में ज्ञान होता है। एवं च कोशनिष्कृष्ट असि की तरह आत्मा भी स्वप्नसंस्काराश्रय सूक्ष्म देह से विलक्षण दिखाई देता है। उपाधि से पृथक् अपने स्वरूप में ही उसका अवभास होता है, इसी अभिप्राय को प्रदर्शित करने में 'असि' का दृष्टान्त दिया गया है ॥ ११ ॥ आपेषात्प्रतिबुद्धस्य ज्ञस्य स्वाभाविकं पदम् । उक्तं नेत्यादिवाक्येन कल्पितस्यापनेतृणा ॥१२॥ आपेषादिति—कल्पित प्रपञ्च का बाध करने वाले 'नेति नेति' आदि वाक्य ने हाथ दबाने से जगे हुए चेतन आत्मा का स्वाभाविक रूप बताया है ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका— आत्मा को जो स्वयंप्रकाश कहा गया है, वह कैसे संभव हो सकता है, क्योंकि वह तो ब्रह्म से विलक्षण (भिन्न) है। समा०— श्रुतिविरोध होने के कारण ऐसी शंका करना ठीक नहीं है। आत्मा में कर्तृत्वादि की जो प्रतीति होती है, वह स्वप्नप्रतीति की तरह मिथ्या होने से आत्मा शुद्ध ही है अर्थात् ब्रह्म ही है, यह शास्त्र बता रहा है, अतः निर्विरोध यह जाना जा सकता है। एवं च भेदाऽभेद की कल्पना कर अपने मन को कलुषित करना उचित नहीं है। ²श्रुति कहती है कि प्राण के अनेक नाम पुकारने पर भी वह आत्मा प्रबुद्ध नहीं हो पाया किन्तु हाथ से दबाते ही वह जाग उठा, इससे स्पष्ट होता है कि प्राण-इन्द्रियस्वरूप लिङ्गसमुदाय से विलक्षण (भिन्न) और स्थूल संघात (समुदाय) से भी विलक्षण (भिन्न) ही आत्मा है। अतएव अर्थात् समस्त जड़ पदार्थों से विलक्षण होने के कारण ही वह (आत्मा) ज्ञानस्वभाव (स्वरूप) है। पाणि (कर—हाथ) स्पर्श से प्रतिबुद्ध हुए त्वंपदार्थ 'ज्ञ' का परब्रह्मरूप स्वाभाविक पद, कल्पित (अध्यस्त) मूर्त-अमूर्त-तद्वासनाश्रयरूप के निषेधक 'नेति' वाक्य से³ कहा गया है। 'नेति नेति' ऐसी वीप्सा (द्विरुक्ति) के द्वारा यह बताया गया है कि समस्त कारण-कार्यात्मक उपाधि का प्रतिषेध कर 'अखण्ड ब्रह्म' में 'नेति' वाक्य का तात्पर्य है। एवं च श्रुतिविरोध होने से आत्मा को ब्रह्म से विलक्षण समझना ठीक नहीं है ॥ १२ ॥ १. 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः'—( बृ. उ. ४।३।९ ) २. 'तं पाणिनाऽऽपेषं बोधयाञ्चकार स होत्तस्थौ' इत्यारभ्य 'स होत्तस्थौ' 'बृहत्पाण्डरवासः सोम राजन्'……( बृ. उ. २।१।१५ ) ३. 'अथात आदेशो नेति नेति' इत्यारभ्य 'सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्'—इत्यन्तेन वाक्येन ।—(बृ. उ. २।३।६)

५४ उपदेशसाहस्री महाराजादयो लोका मयि यद्वत्प्रकल्पिताः । स्वप्ने, तद्वद्द्वयं विद्याद्रूपं वासनया सह ॥१३॥ महाराजेति—जिस प्रकार स्वप्नकाल में राजा-महाराजा आदि लोक मुझमें ही कल्पित होते हैं अर्थात् मैं राजा हूँ, महाराजा हूँ ऐसी कल्पना निद्रादोष के कारण मेरे ही चित्त में होती है, उसी प्रकार वासनाओं के सहित इस द्वैत दृश्य को भी मुझमें ही कल्पित जानो ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी हाथ से दबाने पर१ प्रतिबुद्ध हुआ 'ज्ञ' आत्मा, प्राण आदि से विलक्षण है। इस प्रकार कल्पित संसार के निषेधक वचन से कल्पित संसार, 'आत्मा' पर आरोपित है, यह बताया गया है। अर्थात् 'नेति नेति' इत्यादि शास्त्रवचन से निषिध्यमान संसार कल्पित है, यह श्रुति ने ही बता दिया है। स्वप्नावस्था में महाराजा आदि लोगों की कल्पना मुझ दृगात्मा में जैसे की जाती है, उसी तरह लिङ्ग शरीर के आश्रय से रहनेवाली वासना के साथ मूर्त और अमूर्त दो रूपों की मुझमें कल्पना की गई है२। श्रुति ने भी स्वप्नदृश्य (महाराजत्वादि की आभासता) का निर्देश कर उपसंहार में शरीर के भीतर ही महाराजा आदि के रूप में प्राणशब्दवाच्य लिङ्गरूप उपाधिका ग्रहण कर यह स्वप्नद्रष्टा, व्यवहार करता है—यह प्रदर्शित किया है। अर्थात् स्वप्न में महाराजा आदि निर्दिष्ट लोग भोग्यविशेष होते हुए भी स्वप्नद्रष्टा में कल्पित हैं। अतः स्वप्न में उपलब्ध हुई कोई भी वस्तु वास्तविक नहीं है। एवञ्च वासना के आश्रयभूत लिङ्ग- शरीर के सहित मूर्तामूर्तरूप स्थूल पदार्थ भी दृगात्मा में कल्पित ही हैं, क्योंकि दृगात्मा के द्वारा वह दृश्य हैं ॥ १३ ॥ देहलिङ्गात्मना कार्या वासनारूपिणा क्रियाः । नेति नेत्यात्मरूपत्वान्न मे कार्या क्रिया क्वचित् ॥१४॥ देहेति—वासनाओं [ संस्कारों ] का संचय करनेवाले तथा स्थूल-सूक्ष्म शरीर का अभिमान रखनेवाले आत्मा को ही कर्मानुष्ठान कर्तव्य रहता है। यह स्थूल देह आत्मा नहीं है, यह सूक्ष्म देह आत्मा नहीं है इत्यादि वाक्यों द्वारा लक्षित 'मैं' तो आत्मस्वरूप हूँ। अतः मेरे लिये कभी कोई कर्म कर्तव्य नहीं है ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी स्वप्नप्रपञ्च के समान जाग्रत्प्रपञ्च भी प्रत्यगात्मा में कल्पित है यह सिद्ध ( ज्ञात ) हो जानेपर प्रत्यक्तत्त्व को जाननेवाले ( आत्मज्ञानसम्पन्न ) के लिये कर्म करने की संभावना ही नहीं रहती, क्योंकि कर्म ( क्रिया ) तो उसे करने होते हैं, जो स्थूल-सूक्ष्म देह का अभिमान करता हो, किन्तु जिसे अपने स्थूल-सूक्ष्म शरीर का कोई अभिमान न हो, उसके लिये कर्मानुष्ठान कैसे संभव हो सकता है ? यह स्थूल-सूक्ष्मदेहाभिमानी आत्मा वासनारूपी है अर्थात् संस्कारों ( वासनाओं ) का संचय करते रहने का इसका स्वभाव है। ये संस्कार कर्मप्रवृत्ति कराने में निमित्त ( कारण-हेतु ) होते हैं। अर्थात् कर्म से संस्कार, और संस्कार से पुनः कर्म, पुनः उससे संस्कार, पुनः उससे कर्म इस प्रकार अविच्छिन्न परम्परा चलती रहती है। किन्तु जब 'नेति नेति' श्रुति के द्वारा अपने स्वरूप ( आत्मस्वरूप ) का साक्षात्कार ( ज्ञान ) हो जाता है, तब दोनों देहों का अभिमान न रहने से स्वप्न में या जाग्रत् अवस्था में स्वाभाविक रूप से और विधि के बलपर ही कोई कर्म ( क्रिया ) उसके लिये कर्तव्य नहीं रह जाती है ॥ १४ ॥ न ततोऽमृतताऽऽशास्ति कर्मणोऽज्ञानहेतुतः । मोक्षस्य ज्ञानहेतुत्वान्न तदन्यदपेक्षते ॥१५॥ नेति—कर्म की उत्पत्ति अज्ञान से है, इस कारण उससे अमृतत्व की आशा नहीं की जा सकती। मोक्ष का कारण तो एकमात्र ज्ञान ही है, इसलिये वह किसी अन्य कर्म आदि की अपेक्षा नहीं रखता ॥ १५ ॥ १. “तं पाणिनाऽऽपेषं बोधयाञ्चकार” इत्यारभ्य “स होत्तस्थौ” –( बृ. उ. २।१ ) २. “यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः” इत्युपक्रम्य “स यत्रैतत्स्वप्नया चरति ते हास्य लोकास्तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण उतेवोच्चावचं निगच्छति” इति इवशब्देन स्वप्नदृश्यस्य आभासतां मध्ये निर्दिश्य “एवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते” इत्युपसंहारः । ( बृ. उ. २।१।१८ )

ईक्षितृत्वप्रकरणम् ५५ हृदयस्पर्शिनी अज्ञानविलसित देहाभिमान से ही कर्म होता है, अतः कर्म अज्ञानमूलक है, इस कारण उससे (कर्म से) मोक्ष की आशा रखना व्यर्थ है। ज्ञान और अज्ञान का विवेक न होनेपर ही कर्म करने की ओर प्रवृत्ति होती है। अज्ञान और कर्म दोनों जड़ पदार्थ हैं, अतः उनमें परस्पर कोई विरोध नहीं है। एवं च 'अज्ञाननिवृत्तिरूप मोक्ष' की निष्पत्ति में कर्म की सहायता की आशा करना व्यर्थ है। यदि मोक्ष को 'ब्रह्मात्मना अवस्थान' (ब्रह्मरूप होकर रहना) अर्थात् परमानन्दाविर्भाव रूप मानें तब भी उत्पाद्य, आप्य, विकार्य, संस्कार्य इन चतुर्विध क्रियाफलों से उक्त मोक्ष, विलक्षण होनेसे उसमें भी कर्म की कोई अपेक्षा नहीं है। शंका--कर्म, स्वयं मोक्ष में कारण (हेतु) न होनेपर भी मोक्ष में हेतुभूत जो ज्ञान, उसके सहायक के रूप में कर्म को भी कारण क्यों न माना जाय ? समा०--अज्ञान की निवृत्ति में ज्ञान ही एकमात्र पर्याप्त है, उसे कर्म आदि अन्य किसी की सहायता की अपेक्षा नहीं होती। अन्यत्र भी नहीं, क्योंकि अज्ञान के निवृत्त होनेपर ब्रह्मात्मना अवस्थान अर्थात् परमानन्दाविर्भाव का होना तो स्वयं (स्वतः) सिद्ध है ॥ १५ ॥ अमृतं चाभयं नातं नेतीत्यात्मा प्रियो मम । विपरीतमतोऽन्यद्यत् त्यजेत्तत्सक्रियं ततः ॥१६॥ अमृतमिति- 'नेति नेति' इत्यादि वाक्य से निषेधमुखेन प्रतिपादित आत्मा, अमृत और अभयरूप है। वह नाशवान् नहीं है तथा मेरा प्रिय है। उससे भिन्न जो अनात्मा है, वह इससे विपरीत स्वभाववाला है। अतः उस सक्रिय अनात्मा का त्याग ही करना चाहिये ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका-यदि अमृतत्व (मोक्ष) को कर्मसाध्य माना जाय तो स्वर्गादि फल की तरह तथा कृषि आदि के फल की तरह वह अनित्य और सभय कहलायेगा। समा०-किन्तु अभयरूपत्व श्रुति१ के साथ तथा मोक्ष से भिन्न यच्चयावत् पदार्थों में आर्तत्व कहकर मोक्ष में अनार्तत्व२ बतानेवाली श्रुति के साथ विरोध उपस्थित होने के भय से वैसा नहीं मान सकते। शंका-ब्रह्म यद्यपि अभय, अनार्त है, और कर्मसाध्य नहीं है तथापि भोक्ता जीवके के लिये अमृतत्व तो कर्म से ही साध्य होगा। समा०-जो मेरा प्रिय है, जिसे हम भोक्ता समझ रहे हैं, अर्थात् जाया आदि जो प्रिय (प्रीत्यास्पद) ज्ञात हो रहे हैं, वह सब मेरा ही स्वरूप है३। उसे 'नेति' श्रुति ने अशेष-विशेषरहित बताया है। इसलिये वह सब मद्रूप ही है अर्थात् निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप ही है, उससे भिन्न (अतिरिक्त) नहीं है। अतः उसे भी अमृतत्व, कर्म से प्राप्य नहीं है। अतः उक्त आत्मस्वरूप से भिन्न, जिसे हम भेदबुद्धि से ग्रहण करते हैं (अपने से भिन्न समझते हैं), उस अनात्मभूत (विपरीत) दृश्य का क्रिया सहित त्याग करे अर्थात् उसका अभिमान न करे। क्योंकि हमने अज्ञानवशात् आत्मापर संसार को अध्यस्त कर लिया है। अतः ब्रह्मात्मा से भिन्न जो भी विरुद्धस्वरूप हो, और जो क्रियासहित हो, उस सब का अभिमान छोड़ दे, क्योंकि ब्रह्मात्मज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति हो जाती है। 'क्रियासहित उस अनात्मभूत दृश्य का त्याग करे'-यह आत्मज्ञ के लिये विधान (विधि) नहीं किया गया है, क्योंकि वह आत्मज्ञ तो अविनियोज्य है, किन्तु उसके प्रति यह केवल अनुवादमात्र है। तथापि साधक के लिये विधि का उपयोग हो सकता है, अतः 'त्यजेत्' यह विधिप्रत्यय (नियोग) निर्देश, साधक को दृष्टि में रखकर किया गया है। तस्मात् ब्रह्मात्मा के अज्ञान के कारण होने- वाला यह संसार, केवल ब्रह्मात्मज्ञान से ही निवृत्त हो जाता है, यह ठीक ही कहा गया है ॥ १६ ॥ ॥ इति एकादशमीक्षितृत्वप्रकरणं समाप्तम् ॥ १. (तै. उ. २।७) २. (बृ. उ. ३।४।२) ३. 'अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य'-(छां. उ. ६।३।२)

पद्यभाग १२: प्रकाशप्रकरणम्

प्रकाशप्रकरणम् प्रकाशस्थं यथा देहं सालोकमभिमन्यते । द्रष्ट्राभासं तथा चित्तं द्रष्टाहमितिम॑न्यते ॥१॥ प्रकाशस्थमिति—जिस प्रकार प्रकाश में स्थित स्थूल देह को लोग प्रकाश से युक्त समझते हैं, उसी प्रकार साक्षी [द्रष्टा] आत्मा से प्रकाशित हुए चित्त को ही वे लोग साक्षी समझते हैं, अर्थात् 'चित्त' को ही 'मैं साक्षी हूँ' ऐसा कहते हैं ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—इस भोक्ता आत्मा को यदि 'निर्विशेष' रूप में स्वीकार करते हैं तो उसका उसी रूप में (निर्विशेष) अनुभव क्यों नहीं होता ? अर्थात् यदि 'प्रिय' शब्द से कहा हुआ आत्मा ही ब्रह्म है, तो सब लोग जिस प्रकार आत्मा को अहंरूप से अनुभव करते हैं, उस प्रकार ब्रह्म को क्यों नहीं करते ? समा०—ब्रह्म यद्यपि कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि से शून्य (रहित) है, तथापि लोगों को विवेक न हो पाने से (अविवेक से) उसका वैसा अनुभव नहीं हो पाता । जिस प्रकार प्रकाश सामान्यरूप से सर्वत्र व्याप्त है, परन्तु वह किसी स्थूल शरीर से युक्त होने पर तदाकार लगने लगता है, उसी प्रकार सर्वत्र समानरूप से व्याप्त निर्विशेष चैतन्य, अन्तःकरण में व्याप्त रहने से अन्तःकरणाकार (अन्तःकरणरूप) प्रतीत होने लगता है । और उस चिदाभासविशिष्ट अन्तःकरण को ही लोग 'आत्मा' कहने लगते हैं । एवंच 'अहं' रूप से जिस आत्मा का हम अनुभव करते हैं, वह अविवेक के कारण करते हैं । वास्तव में तो आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है । शंका करनेवाले का अभिप्राय यह था कि यदि भोक्ता, जिसे 'प्रिय' शब्द से कहा जाता है, (वह) निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप ही है, तो सब लोग 'अहं अह॑', इस प्रकार आत्मा का अनुभव तो करते हैं, 'ब्रह्म अहम्' ऐसा अनुभव क्यों नहीं करते ? उक्त शंका का समाधान यही है कि पदार्थतत्त्व-परिशोधनाभावरूप अपराध के कारण ही 'ब्रह्म अहम्' ऐसा अनुभव नहीं कर पाते । अर्थात् साभास अन्तःकरण को न पहिचानने के कारण (साभास अन्तःकरण का विवेक न होने के कारण) यथार्थ रूप से अपनी आत्मा को (आत्मा के यथार्थ रूप को) नहीं जान पाते । अतः इस प्रकरण में मुख्यतया (प्राधान्येन) 'तत्-त्वम्' पदार्थ का शोधन बताया जा रहा है । वास्तव में आत्मा अनवच्छिन्न, प्रकाशरूप है, तथापि अन्तःकरण के सम्पर्क से अन्तःकरणाकाराकारित हुआ भासने लगता है । इस कारण 'अहं कर्ता, अहं भोक्ता' इस प्रकार अन्तःकरणस्वभावविशिष्ट (अन्तःकरणाकाराकारित) को ही 'आत्मा' समझते हैं, शुद्ध आत्मा को नहीं जान पाते ॥ १ ॥ यदेव दृश्यते लोके तेनाभिन्नत्वमात्मनः । प्रपद्यते ततो मूढस्तेनात्मानं न विन्दति ॥२॥ यदेवेति—लोकव्यवहार में [प्राण से लेकर स्थूल देह तक] जो कुछ दिखाई देता है, उसी से आत्मा का तादात्म्य हो जाता है । अतः अज्ञानी व्यक्ति को आत्मा का यथार्थ रूप से ज्ञान नहीं हो पाता ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में यह बताया था कि आत्मा के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान न होने में साभास अन्तःकरण का अविवेक ही कारण है, और उसी के माध्यम से देह तक अविवेक चलता रहता है, जिससे आत्मा के यथार्थ स्वरूप की प्रतिपत्ति (ज्ञान) नहीं हो पाती । अर्थात् लोकव्यवहार में प्राण से लेकर स्थूलदेह तक जो अहंकारास्पद है, वह सब साभासचित्त से अविविक्तरूप में अनुभूत होता है । उस कारण प्राण से देह तक सबकी आत्मरूप में प्रतीति होती है । अर्थात् ये सब आत्मा से अभिन्न (आत्मा ही) प्रतीत होते हैं । तात्पर्य यह है कि देह आदि और आत्मा इनका परस्पर एक दूसरे में अध्यास करते रहने की मूर्खता के कारण यह मूढ मनुष्य आत्मा को ब्रह्मरूप से नहीं जानता ॥ २ ॥

प्रकाशप्रकरणम् ५७ दशमस्य नवात्मत्वप्रतिपत्तिवदात्मनः । दृश्येषु तद्वदेवायं मूढो लोको न चान्यथा ॥३॥ दशमस्येति—दशम आत्मा को नवम समझने के समान यह संसार बुद्धि आदि दृश्य वर्ग में मोहित हो रहा है । इसके विपरीत अनुभव नहीं करता ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी एक बार दस विद्यार्थियों ने नदी के पार पहुँचकर, यह जानने के लिए कि हममें से कोई बह तो नहीं गया, आपस में गिनना आरंभ किया । उनमें से जो भी गिनना आरंभ करता वह अपने को छोड़कर शेष नौ को गिन जाता, इस श्रुतिप्रसिद्धि के समान जिस प्रकार विद्यार्थी दशमरूप अपने को भूलकर अपने को नौ से भिन्न नहीं देख पाते थे, उसी प्रकार बुद्धि आदि दृश्यवर्ग में मोहित हुए लोग अपने को बुद्धि आदि से असंग अनुभव नहीं कर पाते । क्योंकि आचार्योपदेश से हीन होने के कारण दृश्य पदार्थों में आत्मतादात्म्य प्रतिपत्ति बनी रहती है, उस कारण अपनी आत्मा को अन्यथा ही समझते रहते हैं। अर्थात् बुद्ध्यादि दृश्यवर्ग का अपोह (त्याग) करके 'ब्रह्मास्मि' इसप्रकार उसकी यथार्थरूपता (स्वरूपयाथात्म्य) को नहीं जान पाते ॥ ३ ॥ त्वं कुरु त्वं तदेवेति प्रत्ययावैककालिकौ । एकनीडौ कथं स्यातां विरुद्धौ न्यायतो वद ॥४॥ त्वमिति—'तू यज्ञ आदि का अनुष्ठान कर' और 'तू वही [ब्रह्म ही] है' इस प्रकार के दो विरुद्ध ज्ञान एक ही समय एक आश्रय में कैसे रह सकते हैं ? यह युक्ति के द्वारा बतलाओ ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी एक ही चेतन का कर्त्ता-भोक्ता होना तथा कर्ता-भोक्ता न होना अर्थात् शुद्ध ब्रह्मरूप होना संभव नहीं । अतः यह कहना कि प्रत्यक्ष अनुभव और श्रुति के अविरोध के लिए प्रत्यगात्मा को ही कर्त्ता-भोक्ता तथा ब्रह्मरूप मान लिया जाय, अर्थात् प्रत्यगात्मा में ही कर्तृत्वादि धर्मवत्त्व और ब्रह्मरूपत्व रहे, अविवेक की कल्पना कर उसे मूढ़ कहने की क्या आवश्यकता ? अथवा शास्त्रोपदेश या आचार्योपदेश से हीन होने के कारण बुद्ध्यादि दृश्य पदार्थों के विपरीत आत्मयाथात्म्य (आत्मा के यथार्थ रूप) को नहीं जान पाता, अतः पदार्थ (जड़-चेतन) का विवेक न होने से उसका मोक्ष होना संभव नहीं रहता, यह बताया गया था। तब यह आशंका होती है कि पदार्थ- विवेक (जड़-चेतन पदार्थ के भेदज्ञान) की क्या आवश्यकता ? शास्त्र से आत्मा की ब्रह्मरूपता के ज्ञात होनेपर 'ब्रह्माहमस्मि' इस प्रकार प्रसंख्यान (ज्ञान) होने से ही आत्मा के याथात्म्य का आपरोक्ष्य (प्रत्यक्ष) हो जाने के कारण मोक्ष का होना संभव हो सकता है। अतः यह प्रसंख्यानविधि का अवसर है, पदार्थविवेक का नहीं—यह आशंका हो सकती है, किन्तु एक विषय (एक नीडि) में एककालिक दो विरुद्ध प्रत्यय कैसे हो सकते हैं? अतः श्रुति ने जो जीव के लिए अग्निहोत्रादि कर्मों की अवश्यकर्तव्यता का विधान किया है, वह उसके लोकप्रसिद्ध कर्तृत्व को स्वीकार करके केवल अज्ञानावस्था में ही है । ज्ञानवान् तथा जिज्ञासु के लिए तो उसके शुद्ध स्वरूप का ही निरूपण किया गया है। अतः वास्तव में आत्मा के कर्तृत्व आदि का बाध करना ही श्रुति को अभीष्ट है। अर्थात् एक ही आत्मा के लिये 'कुरु, और तदेव त्वम्' = करो और वही तुम हो, इस प्रकार कर्तृत्व और अकर्तृत्व प्रकारक और समसामयिक (एक- कालिक) विरुद्ध ज्ञान का कराना उसी प्रकार होगा, जैसे एक ही पदार्थ में शीत और उष्ण का ज्ञान कराना। अतः परस्पर विरुद्ध दो ज्ञानों में से किसी एक के द्वारा किसी एक का बाध अवश्य करना ही होगा, क्योंकि एक ही वस्तु में दो परस्पर विरुद्ध ज्ञानों को प्रमाण नहीं माना जा सकता ॥ ४ ॥ देहाभिमानिनो दुःखं नादेहस्य स्वभावतः । स्वापवृत्तप्रहाणाय तत्त्वमित्युच्यते दृशेः ॥५॥ देहेति—यदि कहें कि आत्मा का दुःखी होना या सुखी होना आदि का सभी को प्रत्यक्ष अनुभव है, अतः प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर श्रुतिप्रतिपादित निर्दुःखत्व (दुःखशून्यता) का ज्ञान ही बाधित होता है—ऐसा क्यों न कहा ८

५८ उपदेशसाहस्री जाय ? किन्तु ऐसा सोचना ठीक नहीं होगा, क्योंकि दुःख देहाभिमानी को ही होता है, देहाभिमानहीन आत्मा तो स्वभाव से ही निर्दुःख रहता है, जैसा सुषुप्ति में रहता है। अतः उस देहाभिमान की निवृत्ति के लिये भगवती श्रुति ने 'साक्षी आत्मा' को 'तदेव त्वम्' 'तू वही है' यह उपदेश दिया है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी आशंका करनेवाले का अभिप्राय यह था कि आत्मा में दुःखित्वाभिमान तो प्रत्यक्ष अनुभवसिद्ध है, अतः अनुभवात्मक प्रत्यक्षज्ञान से 'तदेव त्वमसि' वही तू है—इस शाब्दज्ञान (श्रुति से होनेवाले ज्ञान) का ही बाध होना चाहिए। यही बताने के लिए यह प्रसंख्यान-विधि हो सकता है। किन्तु समाधान देनेवाले का यह कहना है कि यदि दुःखित्व आदि धर्म आत्मा के स्वाभाविक होते, तो तत्त्वज्ञान का सैकड़ों बार अभ्यास करनेपर भी उससे उन स्वाभाविक धर्मों की निवृत्ति कदापि न होती, क्योंकि 'ज्ञान' ही अज्ञान का विरोधी है। एवं च दुःखित्वाभिमान के प्रत्यक्षज्ञान के स्थिरीकरणार्थ 'तदेव त्वमसि' को प्रसंख्यान-विधि कहना व्यर्थ है। अर्थात् जबकि अविद्याप्रयुक्त देहाद्यभिमाननिबन्धन दुःखित्व आदि धर्म हैं, तब अविद्यात्मक कारण (प्रयोजक) के निवृत्त होने से ही दुःखित्व आदि अभिमान की निवृत्ति हो ही जायेगी, और अविद्या की निवृत्ति एकमात्र ज्ञान के ही अधीन है। अतः कर्मविधि के लिये यहाँ अवकाश नहीं है, अर्थात् देहाभिमानशून्य के लिये कर्म का विधान नहीं है। दुःखित्व-सुखित्व आदि आत्मा का स्वाभाविक रूप नहीं है, उसका स्वाभाविक रूप तो 'अदेहत्व' है। अथवा श्लोक में कहे गये 'नाऽदेहस्य' पद के द्वारा 'देहाभिमानव्यतिरेकेण न दुःखमस्ति' कहा गया है। देहाभिमान के अभाव में दुःख नहीं है, इस अभिप्राय के समर्थन में सुषुप्ति का दृष्टान्त दिया गया है। अतः दृशिरूप आत्मा के देहाभिमान की समूल निवृत्ति के लिये ही भगवती श्रुति ने 'तत्त्वमसि' का उपदेश किया है। एवं च ब्रह्मा और आत्मा की एकता का बोधन किया जा रहा है; कर्म का नहीं ॥ ५ ॥ दृशेश्च्छाया यदारूढा मुखच्छायेव दर्शने । पश्यंस्तं प्रत्ययं योगी दृष्ट आत्मेति मन्यते ॥६॥ दृशेरिति—जिस प्रकार दर्पण आदि में मुख की छाया [प्रतिबिम्ब] पड़ती है, उसी प्रकार जिसमें साक्षी आत्मा का आभास [प्रतिबिम्ब] पड़ता है, उस 'अहम्प्रत्यय' [बुद्धि] को देखकर ही कतिपय योगी 'मुझे आत्मसाक्षात्कार हो गया है' ऐसा समझने लगते है ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'तत्त्वमसि' आदि वाक्योपदेश के अनन्तर आत्मा को देह से व्यतिरिक्त (पृथक्—भिन्न) जाननेवाले को भी 'मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार की प्रतीति (अनुभव) होती है, अर्थात् आत्मा के शुद्ध स्वरूप का ज्ञान होनेपर भी उन्हें अपनी आत्मा के सुखी-दुःखी होने का अनुभव होता ही रहता है। अतः कहना होगा कि 'देहाभिमान दुःख आदि का कारण नहीं है'। इस आशंका के समाधान में यह कहा गया है कि 'अहम्' यह प्रत्यय कल्पित आत्मविषयक है। चिदाभास- विशिष्ट अन्तःकरण (बुद्धि) को आत्मदर्शन के रूप में समझना, यह भ्रम है। वह शुद्ध आत्मदर्शन न होकर आत्म- दर्शनाभास है। मूल श्लोक में 'दर्शने' का अर्थ है 'दर्पणे' अर्थात् दर्पण में। क्योंकि 'दर्शयतीति दर्शनं दर्पणादि', उस दर्पण में मुख का आभास (छाया, प्रतिबिम्ब) जैसे आरूढ़ होता (पड़ता) है, उसी प्रकार दृशि रूप प्रत्यगात्मा की छाया (आभास) जिस प्रत्यय में संक्रान्त (आरूढ़) होती है, उस प्रत्यय १ (साभास अन्तःकरण) को देखनेवाला अर्थात् 'अहम्' रूप में समझनेवाला योगी, अग्रहणात्मक अविद्या से सम्बद्ध होने के कारण 'मैंने आत्मदर्शन कर लिया' समझने लगता है। जैसे छोटे-बड़े मलिन दर्पण में अपने मुख को देखनेवाला मूर्ख मनुष्य अपने मुख को ही मलिन एवं छोटा-बड़ा समझता है, क्योंकि उसे दर्पण और मुख के स्वरूप का विवेक नहीं है। वैसे ही यह नवीन योगी उपाधि के दोषों से आस्कन्दित (युक्त) हुए के समान ही मानो अपनी आत्मा को समझकर 'मैं कर्ता हूँ, मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार अपने को कर्ता, सुखी, दुःखी समझता है। क्योंकि उसे उपाधि के और अपने आत्मा के स्वरूप का विवेकज्ञान (पृथक्-पृथक् रूपेण ज्ञान) नहीं है। एवं च 'अहम्' यह ज्ञान (दर्शन) कल्पित आत्मविषयक है। यह ध्यान में रखकर ही यह कहा १. प्रत्ययः—प्रत्याययतीति प्रत्ययः अहंकारः साभासमन्तःकरणम् ।

गया है कि 'दुःखित्व' अविवेक अभिमाननिबन्धन है। अतः 'तत्त्वमसि' महावाक्य से सम्यक् आत्मज्ञानसम्पन्न व्यक्ति में दुःखित्व आदि की अनुवृत्ति का होना संभव नहीं है। बल्कि प्रतिभास के ही बाधित होने की अनुवृत्ति होती रहती है ॥ ६ ॥ तं च मूढं च यद्यन्यं प्रत्ययं वेत्ति नो दृशेः । स एव योगिनां प्रेष्ठो* नेतरः स्यान्न संशयः ॥७॥ तं चेति—जो व्यक्ति उस उपाधिभूत अहंकार, मोहात्मक अविवेक और अन्य उपाधिगत सुख-दुःखादि प्रत्ययों को साक्षी प्रत्यगात्मा में नहीं मानता, वही व्यक्ति आत्मज्ञानी योगियों को प्रियतम लगता है, अन्य नहीं, इसमें कोई संशय नहीं ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका-यदि साभास अहंकार को आत्मा समझनेवाला (आत्मरूप में देखनेवाला) सम्यग्दर्शी (परमार्थ- दर्शी) नहीं, तो सम्यग्दर्शी किसे कहा जाय ? समा०-जो पुरुष उपाधिभूत अहंकार (प्रत्यय), और मोहात्मक अविवेक (मूढ़) तथा अन्य उपाधिगत आभास या दुःख आदि को—'साक्ष्यमेव इदं सर्वम्'=यह सब कुछ दृश्य (साक्ष्य) है, —साक्ष्य (दृश्य) के रूप में मानता (जानता) है; दृशि (साक्षी) जो आत्मा है, उससे इसका कोई सम्बन्ध नहीं है—इस प्रकार विवेक-बुद्धि रखनेवाला व्यक्ति ही सम्यग्दर्शी (परमार्थदर्शी) है, अर्थात् योगियों१ का प्रियतम (प्रेष्ठ) रहता है। साभास अहंकार को ही आत्मा समझनेवाला सम्यग्दर्शी नहीं है। इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं करना चाहिए। भगवद्गीता२ में भगवान् ने भी अपने श्रीमुख से 'संशय करते रहना ठीक नहीं है अर्थात् अनुचित है'—ऐसा कहा है ॥ ७ ॥ विज्ञातेर्यस्तु विज्ञाता स त्वमित्युच्यते यतः । स स्यादनुभवस्तस्य ततोऽन्योऽनुभवो मृषा ॥८॥ विज्ञातेरिति—जो विज्ञाति का [समस्त विशिष्ट ज्ञानों का] विज्ञाता [प्रकाशक] है, वही 'त्वम्' पद से बताया गया है, अतः उस 'त्वम्' पद का यथार्थ अनुभव तो वही है और उससे भिन्न जो अनुभव है, वह मिथ्या है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—सभी लोगों के लिये आत्मा के रूप में भासित होनेवाला अहंकार भी देह की तरह अनात्मा होने के कारण यदि त्याज्य है तो उससे पृथक् अन्य कोई अर्थ 'त्वम्' पद से प्रतीत नहीं हो रहा है, ऐसी स्थिति में 'तत्त्व- मसि' महावाक्य का तो कोई विषय ही नहीं रहेगा अर्थात् महावाक्य को निरालम्बन ही कहना होगा। समा०—अहंकार आदि से विविक्त (भिन्न, पृथक्) अर्थ का प्रतिपादन श्रुति ने ही कर दिया है। अतः उक्त आशंका ठीक नहीं है। अर्थात् पूर्वप्रतिपादित 'त्वम्' पद के यथार्थ अर्थ का अवलम्बन कर 'तत्त्वमसि' वाक्य प्रवृत्त हुआ है, इसलिए उसके निरालम्बन होने की आशंका करना उचित नहीं है। क्योंकि श्रुति३ में षष्ठ्यन्त शब्द से निर्दिष्ट बुद्धिवृत्तिरूप अनित्य ज्ञान (विज्ञान, विज्ञाति) को तुम, विज्ञाता (नित्य विज्ञप्ति = ज्ञान या विज्ञान के रूप में ज्ञाता) मत समझो। किन्तु 'तत्त्वमसि' वाक्य के 'त्वम्' शब्द से उसको बताया जा रहा है, जो विज्ञप्ति (विज्ञान या ज्ञान) का विषय नहीं है, अपितु उसका (विज्ञप्ति, ज्ञान या विज्ञान का) विज्ञाता (ज्ञाता) है, सर्वसाक्षी है। उस सर्वावभासक (सर्वप्रकाशक) को ही 'त्वम्' शब्द से 'तत्त्वमसि' महावाक्य में बताया गया है। एवं च उस सर्वावभासक का अवलम्बन कर 'तत्त्वमसि' वाक्य की प्रवृत्ति होने से उसके निरालम्बनत्व की आशंका के लिये कोई अवकाश नहीं १. योगिनाम्—युज्यतेऽनेनेति योगस्तत्त्वज्ञानं, तद् विद्यते येषां ते योगिनः तेषाम् । २. 'अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।'-( भ. गी. ४।४० ) ३. 'नहि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते ।'-( बृ. उ. ४।३।३० ) 'न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः ।'—( बृ. उ. ३।४।२ )

  • श्रेष्ठो—पाठान्तरम् ।

६० उपदेशसाहस्री है। अर्थात् विज्ञप्तिरूप (नित्यज्ञानरूप) जो साक्षी है, 'वही तू है'—यह अर्थ 'तत्त्वमसि' वाक्य से बताया जा रहा है। तव उस ज्ञानी के लिए स्वरूपानुभव (ज्ञान) ही होता रहेगा। इस प्रकार से (श्रुत्युक्त प्रकार से) होनेवाला 'त्वम्' पदार्थ का अनुभव ही सम्यक् अनुभव है। उसके अतिरिक्त जो अनुभव है, वह बुद्धि और तत्स्थित आभासविशिष्ट होने से मिथ्या अध्यास (मृषा) है। अर्थात् स्वरूपव्यतिरिक्त जो अनुभव है, वह साधनाधीन होने से उसे मिथ्या ही समझना चाहिये ।। ८ ।। दृशिरूपे सदा नित्ये दर्शनादर्शने मयि । कथं स्यातां ततो नान्य इष्यतेऽनुभवस्ततः ॥९॥ दृशीति—मैं सर्वदा नित्य साक्षीस्वरूप हूँ, मुझमें आगमापायी ज्ञान और अज्ञान कैसे रह सकते हैं ? इस- लिये उस आत्मस्वरूप से भिन्न अन्य कोई किसी प्रकार का अनुभव अभीष्ट नहीं है ।। ९ ।। हृदयस्पर्शिनी शंका—'आत्मा' ज्ञान का विषय नहीं है, ऐसा यदि श्रुति कहती है तो उसका अनुभव कैसे हो सकेगा ? यदि कहें कि वह (आत्मा) स्वयं अनुभवरूप है, अतः उसके लिये अन्य अनुभव की अपेक्षा नहीं है, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभाव्य और अनुभव दोनों में भेद हुआ करता है। अतएव घट-पटादि वस्तुएँ ज्ञान का विषय कही जाती हैं, वे वस्तुएँ और उनका अनुभवात्मक ज्ञान दोनों एक दूसरे से पृथक्-पृथक् होते हैं। उसी तरह आत्मा के सम्बन्ध में भी क्यों न कहा जाय ? अर्थात् आत्मा और उसका ज्ञान दोनों पृथक् हैं, अतः आत्मा को ज्ञान (अनुभव) का विषय ही कहना उचित होगा। तात्पर्य यह है कि आत्मा यदि ज्ञान का विषय नहीं (अविषय) है तो भगवती श्रुति उसके ज्ञान (साक्षात्कार) के लिये क्यों कह रही है ? और ज्ञान का अविषय होने से उसका अनुभव (साक्षात्कार) कैसे हो सकेगा ? यदि आत्मा अनुभवरूप होने से उसे अन्य अनुभव की अपेक्षा नहीं है ऐसा कहा जाय तो ठीक न होगा, क्योंकि सर्वत्र जड़ और चेतन की विशेषता के कारण अनुभाव्य और अनुभव में भेद देखा गया है, इसलिये आत्मा को अनुभवरूप नहीं कह सकते । समा०—जिसकी स्व-सत्ता में प्रकाश का व्यभिचार रहता है उसे आगन्तुक ज्ञान की अपेक्षा रहती है, अतः उस वस्तु के दर्शन (प्रत्यक्ष अनुभव) या अदर्शन (अप्रत्यक्ष अर्थात् अननुभव) में एक अन्य ज्ञान के आगम और अपाय की अपेक्षा रहा करती है। यह कारण है कि किसी भी जड़ वस्तु के प्रकाशक ज्ञान के होने पर उस वस्तु की सत्ता का ज्ञान हो पाता है और प्रकाशक ज्ञान के न होने पर उस वस्तु की सत्ता का ज्ञान नहीं हो पाता। 'मैं' तो सदा ही दृशिरूप अर्थात् ज्ञानस्वरूप हूँ, अतः 'मैं' सत्य हूँ, नित्य हूँ, मुझे अपनी सत्ता के प्रकाशित होने में किसी अन्य ज्ञान की अपेक्षा (आवश्यकता) नहीं है। एवं च मैं स्वरूपतः और ज्ञानतः नित्य हूँ। इसलिये मेरा दर्शन और अदर्शन जड़ वस्तु की तरह कैसे संभव हो सकता है ? दोनों बातें मुझमें कभी संभव नहीं हो सकतीं । तस्मात् मेरी सत्ता को बताने के लिये मेरे स्वरूप के अतिरिक्त अन्य किसी अनुभव की अपेक्षा करना उचित नहीं है ।। ९ ।। यत्स्थस्तापो रवैर्देहे दृशेः स विषयो यथा । सत्त्वस्थस्तद्वदेवेह दृशेः स विषयस्तथा ।।१०।। यत्स्थ इति—शरीर के जिस भाग [अंश] पर रवि [सूर्य] के ताप का संयोग [सम्बन्ध] होता है, वही भाग साक्षी का विषय होता है। उसी प्रकार व्यवहार दशा में अन्तःकरण में स्थित दुःख आदि आत्मा के विषय होते हैं ।। १० ।। हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में बता चुके हैं कि घट-पट आदि का अनुभव जैसे घट-पटादि से पृथक् रूप में व्यक्त होता है, उसी तरह आत्मा का अनुभव भी उससे पृथक् रूप में व्यक्त हो, यह नहीं समझना चाहिये । क्योंकि आत्मा तो सदा स्फुरणरूप है अर्थात् वह सदा अनुभवरूप ही है। एवं च आत्मा नित्य दृग्रूप है। इसी अभिप्राय को पुनः शंका- समाधान के द्वारा दृढ़ करने के लिये और स्पष्ट कर रहे हैं—

प्रकाशप्रकरणम् ६१ शंका-हम संसारी मनुष्यों को दिन-रात सुख-दुःखादि से युक्त आत्मा का ही तो अनुभव होता रहता है। तब हम उसे (आत्मा को) नित्य दृशिरूप (अनुभवरूप) कैसे समझें ? समा०-शरीर के जिस प्रदेश (भाग) पर रवि का ताप होता है, वही ताप (तापाश्रयप्रदेशविशिष्ट ताप) जैसे आत्मा (दृशि) का विषय होता है, उसी प्रकार व्यवहार में भी हमें बुद्धि में होने वाले (सत्त्वस्थ = अन्तःकरणस्थ ) सुख-दुःखरूप ताप का ही (स्वाश्रयान्तःकरण सहित ताप का ही) भान होता है। अर्थात् बुद्धिविशिष्ट ताप ही दृशि (आत्मा) का विषय होता है। यानी 'ताप' दृग्रूप (दृशिरूप) आत्मा से सम्बद्ध (समवेत) नहीं है, वह तो अन्तःकरण (बुद्धि) से सम्बद्ध है। निष्कर्ष यह हुआ कि 'ताप' आत्मा का धर्म नहीं है, वह तो अन्तःकरण का धर्म है, यह अनुभव में आता है। अतः आत्मा नित्य है और चैतन्य (ज्ञान, अनुभव) रूप ही है। अथवा - शरीर में होनेवाला रवि का ताप, देह के जिस प्रदेश में स्थित रहता है, उससे (उस ताप से) विशिष्ट वह सम्पूर्ण देह ही समझा जाता है और वह 'तप्तोऽहम्' = मैं सन्तप्त हूँ कहता रहता है। एवंच व्यवहार में वह ताप, लौकिक आत्मा (दृशि) का विषय है, यह समझा जाता है। उसी प्रकार विषयसम्पर्कजनित सुख-दुःखादि ताप, अन्तःकरण में (सत्त्व में) वस्तुतः स्थित है, इसलिये सुख-दुःखादितापविशिष्ट वह अन्तःकरण, उस साक्षी (दृशि) का विषय होता है। तथाच 'सुखी अहम्' = मैं सुखी हूँ इस अभिमान का अध्यास (भ्रम) अपने साक्षी (दृशि) आत्मा में मनुष्य को होता रहता है, क्योंकि अन्तःकरण को ही मनुष्य 'आत्मा' समझता है, अर्थात् आत्मा में सुखी-दुःखी होने का जो अभिमान है, वह अन्तःकरणाध्यासनिबन्धन है। किन्तु जो विवेकी पुरुष है, उसे कभी भी सुखी या दुःखी के रूप में आत्मा की प्रतीति नहीं हुआ करती । किन्तु लौकिक पुरुष देह के ताप का आत्मा में अध्यास करता है, इसलिये वह अपने आत्मा को ही तप्त समझा करता है ॥ १० ॥ प्रतिषिद्धेदर्मशो ज्ञः खमिवैकरसोऽद्वयः । नित्यमुक्तः सदा शुद्धः सोऽहं ब्रह्मास्मि केवलः ॥११॥ प्रतिषिद्ध इति - जहां 'इदम्' अंश का बाध हो गया है और जो 'चेतन' स्वरूप है, आकाश के समान सदा एकरस है, अद्वितीय है, नित्यमुक्त है तथा सर्वदा शुद्धस्वरूप है, ऐसा जो एक मात्र ब्रह्म है, वही 'मैं' हूँ ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'इदम्' अंश का बाध हो जाने से सुख-दुःखादि से युक्त जो अन्तःकरण उसके साथ इस (आत्मा) का सम्बन्ध नहीं है, यह स्पष्ट हो जाता है। इसका स्वरूप, दृश्यमान जड़ जगत् से नितान्त पृथक् है ॥ ११ ॥ विज्ञातुर्नैव विज्ञाता परोऽन्यः संभवत्यतः । विज्ञाताऽहं परो मुक्तः सर्वभूतेषु सर्वदा ॥१२॥ विज्ञातुरिति-समस्त जगत् के विज्ञाता का अन्य कोई और विज्ञाता मानना संभव नहीं है। इस कारण सम्पूर्ण भूतों में सर्वदा विद्यमान 'मैं' ही मुक्तस्वरूप परम विज्ञाता हूँ ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी जब कि सर्वविज्ञातुरूप आत्मा के सिवाय अन्य दूसरा व्यापक विज्ञाता है ही नहीं, अतः समस्त स्थावर- जङ्गमात्मक जगत् में व्याप्त होकर रहने वाला तथा उसके (ज्ञेय के) धर्म से रहित होने से सर्वदा मुक्त ऐसा परम विज्ञाता मैं ही हूँ । समस्त देहों में विज्ञाता का जो भेद स्फुरित होता है, वह अप्रामाणिक है। अतः उस विज्ञाता के अद्वयत्व तथा ब्रह्मत्व में शंका नहीं करनी चाहिये ॥ १२ ॥ यो वेद्धालुप्तदृष्टित्वमात्मनोऽकर्तृतां यथा । ब्रह्मवित्त्वं तथा मुक्त्वा स आत्मज्ञो न चेतरः ॥१३॥ य इति - जो व्यक्ति अपनी ब्रह्मज्ञता के अभिमान का त्याग कर आत्मा के अलुप्त चैतन्य [दृष्टित्व] तथा अकर्तृत्व को समझता है, वही व्यक्ति आत्मज्ञानी है, अन्य नहीं ॥ १३ ॥

६२ उपदेशसाहस्री

हृदयस्पर्शिनी

शंका—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादि श्रुति के उपदेश के अनुसार समस्त शरीरों में अद्वय आत्मा का ज्ञान रखने पर भी 'ब्रह्मविदेव चाहम्' मैं ब्रह्मवित् हूँ, इस प्रकार अपने ब्रह्मवित् (ब्रह्मज्ञ) होने का अभिमान उसे रहता ही है, अतः उसमें सविशेषता है, ऐसा कहना ही पड़ेगा। इससे उसमें निर्विशेषता सिद्ध नहीं हो पायेगी। समा०—जो व्यक्ति सम्पूर्ण अभिमान अर्थात् 'मैं ब्रह्मज्ञानी हूँ'—इस अभिमान का भी त्याग कर श्रुति-प्रतिपादित निर्विशेष आत्मा का साक्षात्कार करता है अर्थात् अलुप्त चिन्मात्रता के कारण आत्मा के द्रष्टृत्व तथा अकर्तृत्व को जानता है, वही व्यक्ति आत्मज्ञानी (आत्मवित्, ब्रह्मवित्) कहलाने योग्य है। और जिसमें अभिमान का लेशमात्र भी हो वह ब्रह्मज्ञानी कहलाने योग्य नहीं है। क्योंकि अपने को ब्रह्मज्ञ समझने का जो अभिमान है, वह भी अज्ञानजनित ही है। 'ब्रह्म' वास्तव में ज्ञेय वस्तु नहीं है, तब उसके ज्ञान का अभिमान कैसे ? ॥ १३ ॥

ज्ञातैवाहमविज्ञेयः शुद्धो मुक्तः सदेत्यपि । विवेकी प्रत्ययो बुद्धेर्दृश्यत्वान्नाशवान्यतः ॥ १४॥

ज्ञातैवेति—'मैं' ज्ञाता ही हूँ, ज्ञेय नहीं हूँ तथा 'शुद्ध', 'मुक्त' और 'सत्' स्वरूप हूँ—यह जो बुद्धि का विवेकी प्रत्यय है, वह भी दृश्य होने के कारण विनाशी है। अतः ज्ञानी में आत्मज्ञता के अभिमान के लिये अवकाश ही नहीं है ॥ १४॥

हृदयस्पर्शिनी

शंका—अशेष (सम्पूर्ण) विशेष का त्याग करने पर भी आत्मा में ब्रह्मात्मज्ञान के विद्यमान रहने से ब्रह्मवित्त्व के अभिमान का त्याग करना कैसे संभव हो सकता है ? अतः आत्मा को अत्यन्त निर्विशेष कैसे कह सकते हैं ? समा०—'ज्ञातैवाहम्' मैं ज्ञाता ही हूँ, ज्ञेय नहीं हूँ—इस प्रकार का जो विवेकी प्रत्यय है (विवेकवान् प्रत्यय यानी विविक्त आत्मनिष्ठ प्रत्यय) है, वह अन्तःकरणवृत्तिरूप (बुद्धिबोधेद्ध) है, इसलिए वह दृश्य है, और दृश्य होने से वह साक्षिभास्य है, अतः नाशवान् होने से उस वृत्ति का भी नाश हो जाता है। इस कारण ब्रह्मवित् में अभिमान का लेश भी नहीं पाया जाता। जिस प्रकार मृत्तिका से मलिन हुए जल में प्रक्षिप्त कतकरेणु (निर्मली बीज) उस जल की सम्पूर्ण मलिनता को नीचे बैठाकर स्वयं भी बैठ जाता है, उसी प्रकार यह बोधवृत्ति भी अन्तःकरण की होने के कारण अज्ञानजनित ही है, अतः अज्ञान का नाश करने के पश्चात् वह (वृत्ति) स्वयं भी नष्ट हो जाती है। अर्थात् पर प्रत्यगात्मा में प्रक्षिप्त वह विवेकबुद्धिवृत्ति, प्रत्यगात्मगत सकल विशेषरूप मलों का उन्मूलन कर अन्त में स्वयं भी उन्मूलित हो जाती है, प्रत्यगात्मा को समस्त विशेषों से रहित अनाविल कर देती है। तात्पर्य यह है कि उक्त विवेक (प्रत्यय) साक्षी का विषय है, विनाशी है, परिणामशीला बुद्धि का धर्म है, आत्मा का नहीं। इससे स्पष्ट होता है कि यह प्रत्यगात्मा, निर्विशेष ब्रह्म ही है ॥ १४ ॥

अलुप्ता त्वात्मनो दृष्टिनोत्पाद्या कारकैरतः । दृष्ट्या चान्यथा दृष्ट्या जन्यतास्याः प्रकल्पिता ॥ १५॥

अलुप्तेति—आत्मा की चिन्मयी दृष्टि का कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह कर्ता आदि कारकों द्वारा उत्पन्न नहीं की जाती। अन्यदृश्य बुद्धि-वृत्ति के द्वारा उस आत्मा की उत्पत्ति [जन्यता] की कल्पना हुआ करती है ॥ १५ ॥

हृदयस्पर्शिनी

शंका—प्रकृत बुद्धिप्रत्यय के समान आत्मचैतन्यप्रतिभास भी विनाशी है—'आत्मचैतन्यप्रतिभासोऽपि नाशवान्, आत्मप्रकाशत्वात्, या (जन्यत्वात्), प्रकृतबुद्धिप्रत्ययवत्'। इस अनुमान से यह कह सकते हैं कि 'ज्ञान' (दृष्टि) को आत्मा का स्वरूप भले ही मान लिया गया हो तथापि वह नश्वर है, क्योंकि वह (ज्ञान) जन्य है, अतः उसमें जन्यत्व प्रतीति होने से उसे नश्वर ही समझना होगा। समा०—उक्त अनुमान में हेतु के सोपाधिक होने से वह अनुमान ठीक नहीं है। वहां 'कारकाधीनात्म-लाभत्व' उपाधि है। जो साध्य का 'व्यापक' होकर साधन का 'अव्यापक' रहे उसे 'उपाधि' कहते हैं। आत्मस्वरूप जो ज्ञान (दृष्टि) है, उसकी जन्यता तो एक अन्यबुद्धिवृत्ति रूप उपाधि से, जो स्वरूपज्ञान (दृष्टि) के विशेष आकार वाली

प्रकाशप्रकरणम् | ६३

है, उससे कल्पित (आरोपित) है। वह बुद्धिवृत्ति दृश्य कोटि में है। जैसे घट की उत्पत्ति होने से घटाकाश की उत्पत्ति कही जाती है। अतः उक्त 'कारकाधीनात्मलाभत्व' साधन (हेतु) का अव्यापक होने से हेतु की 'उपाधि' है, अर्थात् वह साधन का व्यापक नहीं है। 'जन्यत्व' हेतु भी असिद्ध है। अन्तःकरणदृष्टि (ज्ञान) में आत्मदृष्टि (ज्ञान) का आभास (भ्रम) होता है। उन दोनों का विवेक न होने से आत्मदृष्टि में ही समस्त व्यवहार होता रहता है। वस्तुतः स्वात्मदर्शी के लिये कोई व्यवहार नहीं है एवं च जैसे घट-पट आदि जन्य पदार्थों की सत्ता कारकों के अधीन है, वैसे आत्मचैतन्य, कारकों के अधीन नहीं है। इस कारण वह स्वयं सिद्ध और नित्य है। जैसे घट की उत्पत्ति से घटाकाश की उत्पत्ति मान ली जाती है, उसी प्रकार बुद्धिवृत्तिरूप उपाधि के कारण आत्मचैतन्य भी उत्पन्न हुआ-सा जान पड़ता है ॥ १५ ॥ देहात्मबुद्ध्यपेक्षत्वादात्मनः कर्तृता मृषा । नैव किंचित्करोमीति सत्या बुद्धिः प्रमाणजा ॥१६॥ देहात्मेति—आत्मा की कर्तृता [कर्तृत्व] देहात्मबुद्धि [देहात्मज्ञान] की अपेक्षा रखती है अर्थात् देहात्म- बुद्धि पर निर्भर है। अतः वह मिथ्या है, इसलिये 'मैं कुछ भी नहीं करता' यह प्रमाणजन्य ज्ञान ही सत्य है ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसके पूर्व श्लोक में यह बताया था कि चित्प्रकाश आत्मा में अव्यभिचरित तथा नित्य होने से 'यो वेद्धालु- प्तदृष्टित्वम्'—(१३) श्लोक के द्वारा उसे (चित्प्रकाश) नित्यदृष्टि (नित्यज्ञान) रूप बताया है। आगे चलकर उसी श्लोक में 'अकर्तृ तां यथा' भी कहा गया था, अतः अब उसी 'निर्विकारत्व' को 'देहात्मबुद्धि' और 'कर्तृत्वं कारकापेक्षम्' इन दो श्लोकों के द्वारा बता रहे हैं। 'देहात्मबुद्धि' यह मिथ्या बुद्धि है, और उसी कारण आत्मा में जो कर्तृत्व आदि की प्रतीति होती रहती है, वह भी मिथ्या है। 'नैव किञ्चित् करोमि' = मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ, इस प्रकार की 'आत्मा' में जो अकर्तृत्वबुद्धि है, वह उपनिषत्प्रमाण¹ से उत्पन्न होती है, अतः वह सप्रमाण है, इस कारण वही सत्य है, और प्रमाणरहित देहात्मबुद्धि की बाधक है। एवं च आत्मा में होनेवाला कर्तृत्वादिप्रतिभास मिथ्या (अज्ञानमूलक होने से मिथ्या) है और अकर्ता, अभोक्ता आत्मा का ज्ञान, प्रमाणजनित होने से बलवान् है। अतः ब्रह्मात्मज्ञानी के लिए कोई व्यवहार नहीं है ॥ १६ ॥ कर्तृत्वं कारकापेक्षमकर्तृत्वं स्वभावतः । कर्ता भोक्तेति विज्ञानं मृषैवेति सुनिश्चितम् ॥१७॥ कर्तृत्वमिति—कर्तृत्व तो कारकों की अपेक्षा रखता है, किन्तु आत्मा का अकर्तृत्व स्वाभाविक है। अतः 'मैं कर्ता हूँ, भोक्ता हूँ—यह विज्ञान मिथ्या ही है, यही सुनिश्चित सिद्धान्त है ॥ १७॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त श्लोक के द्वारा भी पूर्वोक्त अर्थ को ही (आत्मा में कर्तृत्वबुद्धि पारमार्थिक नहीं है) बता रहे हैं। वस्तुतः असंग, निरवयव आत्मा में कारकों का संसर्ग (संबंध) अनुपपन्न ही है। क्योंकि उसमें अकर्तृत्व तो स्वाभाविक है, इस कारण उसे कर्ता, भोक्ता आदि समझना मिथ्या ही है, वास्तविक (सत्य) नहीं है। 'आत्मा' तो नित्य निर्मल ही है ॥ १७ ॥ एवं शास्त्रानुमानाभ्यां स्वरूपेऽवगते सति । नियोज्योऽहमिति ह्येषा सत्या बुद्धिः कथं भवेत् ॥१८॥ एवमिति—इस प्रकार शास्त्र² और अनुमान³ प्रमाण द्वारा आत्मस्वरूप का बोध हो जाने पर 'मैं नियोज्य [कर्मविधायक वाक्य के द्वारा प्रवृत्त किये जाने योग्य] हूँ'—ऐसी बुद्धि सत्य कैसे हो सकती है ? ॥ १८ ॥ १. 'निष्कलं निष्क्रयं शान्तम्'—( श्वेता. उ. ६।१९ ) २. 'विज्ञातार्यस्तु विज्ञाता स त्वमित्युच्यते यतः'—(श्वेता. उ. १२।८ ) ३. 'यत्स्थस्तापो रवेर्देहे'—( श्वेता. उ. १२।१० )

६४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनो शङ्का—पूर्वोक्त पद्धति के अनुसार वेदान्त वाक्यों से आपाततः ज्ञान होने पर भी साक्षात्कार के निमित्त प्रसंख्यान विधि को क्यों न माना जाय ? समा०—'तत् त्वम्' पदार्थ का परिशोधन किये हुए व्यक्ति को वेदान्त वाक्य से ही 'अहं ब्रह्मास्मि'—मैं ब्रह्म हूँ—यह ज्ञान निरपवादरूप से (अबाधित) हो जाता है, क्योंकि पदार्थ—परिशोधन होने पर 'नियोज्योऽहम्' मैं नियोज्य हूँ, यह बुद्धि नहीं रह पाती, उसका तो उन्मूलन ही हो जाता है। अतः प्रसंख्यानविधि के लिये कोई अवकाश नहीं है। हाँ, पदार्थपरिशोधन के पूर्व 'मैं नियोज्य हूँ'—यह बुद्धि होती रहती है, किन्तु वह कल्पित है, अतएव पदार्थ- शोधन के पश्चात् उस कल्पित बुद्धि का बाध हो जाता है ॥ १८ ॥ यथा सर्वान्तरं व्योम व्योम्नोऽप्यभ्यन्तरो* ह्यहम् । निर्विकारोऽचलः शुद्धोऽजरो मुक्तः सदाद्वयः ॥१९॥ यथेति—जिस प्रकार आकाश सर्वत्र सबमें व्याप्त [ओतप्रोत] है, उसी प्रकार 'मैं' आकाश के भी अन्तर्गत तथा निर्विकार, अचल, अजर, शुद्ध, मुक्त, नित्य और अद्वयस्वरूप हूँ ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनो 'ब्रह्मवित्' में निर्विकारता होने से उसे 'मैं नियोज्य हूँ'—ऐसी बुद्धि (यह ज्ञान) होती ही नहीं ॥ १९ ॥ ॥ इति द्वादशम्प्रकाशप्रकरणं समाप्तम् ॥

  • प्याभ्य—पाठान्तरम्

पद्यभाग १३: अचक्षुष्ट्वप्रकरणम्

अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् अचक्षुष्ट्वान्न दृष्टिर्मे तथाऽश्रोत्रस्य का श्रुतिः । अवाक्त्वात्न तु वक्तिः स्यादामनस्त्वान्मतिः कुतः ॥१॥ अचक्षुष्ट्वादिति— चक्षुर्विहीन [नेत्रहीन] होने से मेरी कोई दृष्टि नहीं है, उसी तरह मैं श्रोत्रहीन हूँ, अतः मुझमें श्रवण शक्ति भी कैसे हो सकती है ? तथा वाक् (वाणी) रहित होने के कारण मुझमें वचन शक्ति भी नहीं है, और मनोहीन (अमना) होने के कारण मुझमें मननशक्ति भी कैसे हो सकती है ? ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी लोगों को पदार्थ के स्वरूप का ठीक-ठीक परिचय न होने से ही वाक्य के अर्थ का ज्ञान नहीं हो पाता, किन्तु पदार्थ का परिचय होते ही वाक्य के ठीक-ठीक अर्थ का ज्ञान हो जाता है। अतः प्रसंख्यानविधि अनर्थक और अनुपपन्न है, यह पहले कह चुके हैं। पूर्व प्रकरण के अन्त में 'निर्विकारो ऽ चलः शुद्धः' के द्वारा आत्मा का शुद्धत्व और अचलत्व जो बताया गया था, उसी को और अधिक स्पष्ट करने के लिये इस नवीन प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है। इस प्रकरण में आत्मा को सर्वकरणशून्य बताया गया है। चक्षुरिन्द्रिय के माध्यम से बाहर की ओर प्रसृत (फैली हुई) और रूपादि विषयों से उपरञ्जित (रूपादि विषयाकार हुई) 'जानामि' जानता हूँ—यह क्रिया ही 'दृष्टि' शब्द से यहाँ विवक्षित है। इस प्रकार की वह दृष्टि मुझमें नहीं है अर्थात् वह मेरा विकार यानी मेरा धर्म नहीं है। क्योंकि 'अचक्षुष्ट्वात्' अर्थात् चक्षु तो देह (शरीर) देश के आश्रित है, अतः वह भौतिक कारण है। वह मेरे आश्रित नहीं है, यह अन्वय-व्यतिरेक से निश्चित है, अतः हेतु के असिद्ध होने की (हेत्वसिद्धि की) शंका नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार श्रुति (श्रोत्र) आदि के विषय में समझ लेना चाहिये। तथाच तत्तदिन्द्रियद्वारक बुद्धिवृत्तिरूप दृष्टि आदि क्रिया से हीन होने के कारण आत्मा की अचलता और शुद्धता१ स्पष्ट हो जाती है। अर्थात् उसके (आत्मा के) निश्चल होने से ही उसकी शुद्धता समझनी चाहिये ॥ १ ॥ अप्राणस्य न कर्मास्ति बुद्धयभावे न वेदिता। विद्याविद्ये ततो न स्तश्चिन्मात्रज्योतिषो मम ॥२॥ अप्राणस्येति— मैं प्राणरहित हूँ, अतः मेरा कोई कर्म नहीं है, तथा बुद्धि का अभाव होने के कारण मुझमें ज्ञातृत्व भी नहीं है, अतएव मुझ चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप में ज्ञान और अज्ञान भी नहीं हैं ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी कर्तृत्व, ज्ञातृत्व आदि विकारों के हेतुभूत प्राण, बुद्धि के अभाव से (न रहने के कारण) भी मैं शुद्ध हूँ। मैं तो चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप अर्थात् सदा प्रकाशमान चिदेकरस हूँ। मुझमें न विद्या न अविद्या अर्थात् ज्ञान और उसका अभाव या ज्ञान और क्रिया नहीं है, क्योंकि वे दोनों बुद्धि की ही विशेष अवस्थारूप हैं। आत्मा में बुद्धि के न होने से उसकी शुद्धता सिद्ध हो जाती है। एवंच आत्मा में कर्तृत्व, ज्ञातृत्व न होने से उसकी निश्चलता और निश्चलता होने से शुद्धता है। उससे बुद्धि का संबंध न होने से उसमें ज्ञातृत्व नहीं है। उसमें ज्ञातृत्व न होने से उसकी चिन्मात्रता स्पष्ट है, उस चिन्मात्र आत्मा से विद्या-अविद्या का कोई संबन्ध न होने से भी उसकी शुद्धता स्पष्ट है ॥ २ ॥ नित्यमुक्तस्य शुद्धस्य कूटस्थस्याविचालिनः । अमृतस्याऽक्षरस्यैवमशरीरस्य सर्वदा ॥३॥ १. (बृह. उ. ३।८।८) ९

६६ उपदेशसाहस्री नित्येति—इसी प्रकार मुझ नित्यमुक्त, शुद्ध, कूटस्थ, अविचल, अमृतस्वरूप, अविनाशी और अशरीरी में [विद्या, अविद्या नहीं है, इस प्रकार पूर्व श्लोक से सम्बन्ध है ] ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वप्रतिपादित धर्मों का आत्मा में अभाव होने से उसकी शुद्धता बताई गई थी, एवं च उसकी शुद्धता में ‘अशरीरत्व’ को ही हेतु कहना होगा। इसी अभिप्राय से आत्मा के चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप को अनेक विशेषणों से स्पष्ट कर रहे हैं। इन सब विशेषणों से विशिष्ट आत्मा में विद्या-अविद्या नहीं है, ऐसा अन्वय पूर्व श्लोक के साथ लगाना चाहिये। आत्मा की नित्यता में ‘शुद्धत्व’ हेतु है, उसकी कूटस्थता में ‘अविचालित्त्व’ हेतु है, उसके अमृतत्व में ‘अक्षरत्व’ हेतु है। इस प्रकार विशेषणों को लगाना चाहिये। उक्त तीनों में ‘अशरीरत्व’ हेतु है। क्योंकि शरीर का संबंध हुए बिना उसमें अशुद्धि, चलनक्रिया, क्षरणक्रिया की उपपत्ति नहीं हो सकती। आत्मा तो सर्वदा ही अशरीर होने से वह सर्वदा शुद्ध है ॥ ३ ॥ जिघत्सा वा पिपासा वा शोकमोहौ जरामृतो । न विद्यन्तेऽशरीरत्वाद् व्योमवद्व्यापिनो मम ॥४॥ जिघत्सेति—उक्त विशेषणों के द्वारा प्रतिपादित आत्मा में क्षुत् [भूख], पिपासा [प्यास], शोक, मोह, जरा, मृत्यु भी नहीं है, क्योंकि मैं अशरीर [ शरीर रहित ] तथा आकाश के समान व्यापक हूँ ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा के साथ छह ऊर्मियों (षडूमियों) का सम्बन्ध न रहने से भी उसकी शुद्धता सिद्ध होती है। खादितुमिच्छा = जिघत्सा = खाने की इच्छा, पातुमिच्छा = पिपासा = पीने की इच्छा। 'अशरीरत्वात्' यह उपलक्षण है (सूचक है), अर्थात् अशरीरत्वात् कहने से अप्राणत्वात्, अमनस्त्वात् को भी समझना चाहिये। कहा भी है— 'प्राणस्य क्षुत्पिपासे द्वे मनसः शोकमोहकौ। जरामृत्यू शरीरस्य षडूर्मीरहितः शिवः॥' इति। क्षुत् और पिपासा 'प्राण' के धर्म हैं, शोक और मोह 'मन' के धर्म हैं, जरा और मृत्यु 'शरीर' के धर्म हैं, इन छह विकारों (ऊर्मियों) से रहित 'शिव' है ॥ ४ ॥ अस्पर्शत्वान्न मे स्पृष्टिर्नाजिह्वत्वादरसज्ञता । नित्यविज्ञानरूपस्य ज्ञानाज्ञाने न मे सदा ॥५॥ अस्पर्शत्वादिति—मैं स्पर्शशून्य हूँ इस कारण मुझमें 'स्पर्शगुण' नहीं है, रसनाहीन हूँ, इसलिये मुझमें रसज्ञता नहीं है, तथा नित्य विज्ञानस्वरूप होने के कारण मुझमें सर्वदा ही ज्ञान और अज्ञान का अभाव है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी स्पर्श-रसनसम्बन्धप्रतिषेध, अनुक्त सकल इन्द्रियवृत्तियों के प्रतिषेध का उपलक्षण है। एवंच आविर्भाव- तिरोभाव रहित होने से उसकी विशुद्ध चिद्रूपता कही गई है। एवंच अनिषिद्ध इन्द्रियनिषेध द्वारा उनसे (उन इन्द्रियों से) प्राप्त दृष्टादि विकार का आत्मा में निषेध किया गया है। वह (आत्मा) नित्य विज्ञानरूप होने से उसमें विद्या-अविद्या भी नहीं हैं ॥ ५ ॥ या तु स्यान्मानसी वृत्तिश्चाक्षुषका रूपरञ्जना । नित्यमेवात्मनो दृष्ट्या नित्यया दृश्यते हि सा ॥६॥ यात्विति—चक्षुरिन्द्रिय के द्वारा निर्गत होने वाली रूपविषयिणी जो मानसी वृत्ति है, वह सर्वदा ही आत्मा के नित्य चैतन्य से प्रकाशित होती है ॥ ६ ॥

अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् ६७ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में दृष्टि आदि नहीं होते हैं, यह पहले बताया गया है, उसी में उपपत्ति दे रहे हैं—इन्द्रिय का विषय के साथ सम्बन्ध होने पर अन्तःकरण, विषय के आकार में परिणत हो जाता है। अन्तःकरण के इस परिणाम को ही ‘वृत्ति’ कहते हैं। चक्षुरादि इन्द्रियों से होने वाले समस्त ज्ञान, तत्तदाकार में परिणत हुई अन्तःकरण की वृत्ति से ही होते हैं। वह वृत्ति, आत्मरूप नित्य चैतन्यप्रकाशलक्षण दृष्टि से नित्य ही प्रकाशित होती रहती है। इसका सभी को अनुभव है। अन्तःकरण की दृष्टि, आत्मचैतन्य की दृश्य है ॥ ६ ॥ तथाऽन्येन्द्रिययुक्ता या वृत्तयो विषयाञ्जनाः । स्मृती रागादिरूपा च केवलाऽन्तर्मनस्यपि ॥७॥ तथेति—इसी प्रकार जो अन्यान्य इन्द्रियों से युक्त विषयाकार वृत्तियाँ हैं, तथा जो [इन्द्रियसम्बन्धरहित] केवल मन के भीतर होनेवाली स्मरणात्मिका, रागात्मिका आदि वृत्तियाँ हैं [ वे भी आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित होती हैं ॥७॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व प्रतिपादन के अनुसार यह अनुमान प्रयोग कर सकते हैं कि 'न दृष्ट्यादयः चिदात्मीयाः, तद्दृश्यत्वात्, यो येन दृश्यते न स तदीयः, यथा रूपादिः ।' इससे यह सिद्ध होता है कि आत्मा दृष्टि आदि विकारों से रहित होने के कारण उसमें शुद्धता है, इसी अभिप्राय से नेत्रद्वारक वृत्ति में कहे गये न्याय का अतिदेश अन्य वृत्तियों में कर रहे हैं। विषयाञ्जना वृत्ति का अर्थ है विषयोपाधिका अर्थात् विषयाकारा वृत्ति। जो स्मृति, राग आदि वृत्ति, चक्षुरादि बाह्येन्द्रियों की अपेक्षा किये बिना ही शरीरान्तर्वर्ती चित्त में हुआ करती है, वह भी पूर्वोक्त आत्मदृष्टि के द्वारा देखी जाती है, अर्थात् प्रकाशित होती है ॥ ७॥ मानस्यस्तद्वदन्यस्य दृश्यन्ते स्वप्नवृत्तयः । द्रष्टुर्दृष्टिस्ततो नित्या शुद्धाऽनन्ता च केवला ॥८॥ मानस्य इति—उसी तरह मन की परिणाम रूप जो स्वप्नवृत्तियाँ हैं, वे भी सबसे भिन्न आत्मा की ही दृश्य हैं, इस कारण द्रष्टा की दृष्टि नित्य, शुद्ध, अनन्त और अन्यसंसर्गरहित [केवल] है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी अभिप्राय यह है कि स्वप्नावस्था में विद्यमान मनःपरिणामरूप जो विषयाकार वृत्तियाँ हैं, वे सब, अपने से भिन्न द्रष्टा की ही दृश्य जिस प्रकार मानी जाती हैं, उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में सभी वृत्तियाँ (दृष्टियाँ) उनसे भिन्न द्रष्टा की दृश्य होती हैं, क्योंकि स्वाप्निक दृश्य एवं जागरित दृश्य दोनों में समान दृश्यता है। समस्त वृत्तियाँ (दृष्टियाँ) कूटस्थदृष्टिभास्य हैं। इससे निष्कर्ष यह निकला कि द्रष्टा की दृष्टि (ज्ञान) नित्य, शुद्ध, अनन्त और संसर्ग- शून्य है। इन्द्रिय का विषय (वस्तु) के साथ संसर्ग होनेपर अन्तःकरण, विषय के आकार में परिणत हो जाता है। अन्तःकरण के इस परिणाम को ही ‘वृत्ति’ कहते हैं। इन्द्रियों से होनेवाले सभी ज्ञान उन-उन आकारों में परिणत हुई अन्तःकरण की वृत्ति से ही होते हैं ॥ ८ ॥ अनित्या साऽविशुद्धेति गृह्यतेऽत्राविवेकतः । सुखी दुःखी तथा चाहं दृश्ययोपाधिभूतया ॥९॥ अनित्येति—उपाधिरूप जो दृश्यदृष्टि है, उसके साथ आत्मदृष्टि का अविवेक रहने से लोग उसे अनित्य और अशुद्ध समझते हैं, उस कारण 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ' ऐसा समझते हैं ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—यदि आत्मदृष्टि ही कूटस्थ है तो उसे अन्यथा (अनित्य, अशुद्ध) क्यों समझा जाता है ?

६८ उपदेशसाहस्री समा०—वृत्तिमत् (वृत्तिविशिष्ट) अन्तःकरण के साथ अविवेक के होने से वैसा (अन्यथा) समझते हैं । अर्थात् उपाधिभूत दृश्यदृष्टि के साथ विवेक न होने के कारण (विवेकाऽग्रह होने से) व्यवहार दशा में उस नित्य शुद्ध आत्मदृष्टि को ही अविशुद्ध अनित्य समझते रहते हैं और अपने को सुखी-दुःखी मानते हैं ॥ ९ ॥ मूढया मूढ इत्येवं शुद्धया शुद्ध इत्यपि । मन्यते सर्वलोकोऽयं येन संसारमृच्छति ॥१०॥ मूढयेति—मूढ़ वृत्ति के साथ आत्मदृष्टि का अविवेक होने से 'मैं मूढ़ हूँ'—ऐसा संपूर्ण संसार समझता है । और शुद्ध वृत्ति का संसर्ग होने पर 'मैं शुद्ध हूँ'—ऐसा समझने लगता है। उस कारण उसे संसार की प्राप्ति होती है अर्थात् मिथ्या- भिमान [अविवेकनिबन्धन] ही संसारप्राप्ति है ॥ १० ॥ अचक्षुष्कादिशास्त्रोक्तं सबाह्याभ्यन्तरं त्वजम् । नित्यमुक्तमिहात्मानं मुमुक्षुश्चेत्सदा स्मरेत् ॥११॥ अचक्षुष्कादीति—यदि मोक्ष की इच्छा हो तो उसे “अचक्षुष्कम् अश्रोत्रम् अवाक् अगमनः” इत्यादि श्रुति के द्वारा बताये गये बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा एवं नित्यमुक्त आत्मा का स्मरण [मनन] करना चाहिये । अभिप्राय यह है कि संसारनिवृत्ति (मोक्ष) की यदि किसी को इच्छा हो तो उसे श्रुतिप्रतिपादित आचार्योपदिष्ट आत्मस्वरूप का अनवरत [निरन्तर] अनुसन्धान करते रहना चाहिये । इस प्रकार मोक्ष का उपाय [साधन] बताते हुए मुमुक्षु को इस पद्य के द्वारा शिक्षा दी गई है ॥ ११ ॥ अचक्षुष्कादिशास्त्राच्च नेन्द्रियाणि सदा मम । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र इति चाथर्वणं* वचः ॥१२॥ अचक्षुष्कादीति—अचक्षुष्कादि शास्त्र [बृहदारण्यक श्रुति] की प्रामाणिकता सुनिश्चित होने से सर्वदा ही मेरे इन्द्रियाँ नहीं हैं और उसी प्रकार 'आत्मा प्राणहीन, मनो-हीन, एवं शुद्ध है” ऐसा अथर्ववेदीय मुण्डकोपनिषद् का भी वाक्य है ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में आत्मा की जो चक्षुरादिशून्यता बताई गई थी, उसी में अचक्षुष्कादि शास्त्ररूप बृहदारण्यक१ श्रुति को प्रमाण रूप में उपस्थित किया गया है । उसी प्रकार मुण्डकोपनिषद्२ में भी कहा गया है । एवंच आत्मा का प्राण से या मन से सम्बन्ध नहीं है ॥ १२ ॥ शब्दादीनामभावश्च श्रूयते मम काठके । अप्राणो ह्यमना यस्मादविकारी सदा ह्यहम् ॥१३॥ शब्दादीनामिति—मुझमें शब्दादि का अभाव सुना जाता है, तथा मैं प्राणहीन और मनो-हीन भी हूँ, अतः मैं सर्वदा ही अविकारी हूँ ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की निर्विशेषता में श्रुति का प्रमाण दे रहे हैं— “अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥” (कठ उ० १।३।१५) यह उपर्युक्त प्रमाण अचक्षुष्कादि का भी उपलक्षण है । एवंच प्राणादिकों के साथ सम्बन्ध न रहने से तथा अविकारी होने से मुमुक्षुत्व सिद्ध हो जाता है ॥ १३ ॥ १. ( 'अचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनः'—बृ. उ. ३।८।८ ) २. ( मुं. उ. २।१।२ )

  • णेर्व०—पाठान्तरम् ।