उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनो शङ्का—पूर्वोक्त पद्धति के अनुसार वेदान्त वाक्यों से आपाततः ज्ञान होने पर भी साक्षात्कार के निमित्त प्रसंख्यान विधि को क्यों न माना जाय ? समा०—'तत् त्वम्' पदार्थ का परिशोधन किये हुए व्यक्ति को वेदान्त वाक्य से ही 'अहं ब्रह्मास्मि'—मैं ब्रह्म हूँ—यह ज्ञान निरपवादरूप से (अबाधित) हो जाता है, क्योंकि पदार्थ—परिशोधन होने पर 'नियोज्योऽहम्' मैं नियोज्य हूँ, यह बुद्धि नहीं रह पाती, उसका तो उन्मूलन ही हो जाता है। अतः प्रसंख्यानविधि के लिये कोई अवकाश नहीं है। हाँ, पदार्थपरिशोधन के पूर्व 'मैं नियोज्य हूँ'—यह बुद्धि होती रहती है, किन्तु वह कल्पित है, अतएव पदार्थ- शोधन के पश्चात् उस कल्पित बुद्धि का बाध हो जाता है ॥ १८ ॥ यथा सर्वान्तरं व्योम व्योम्नोऽप्यभ्यन्तरो* ह्यहम् । निर्विकारोऽचलः शुद्धोऽजरो मुक्तः सदाद्वयः ॥१९॥ यथेति—जिस प्रकार आकाश सर्वत्र सबमें व्याप्त [ओतप्रोत] है, उसी प्रकार 'मैं' आकाश के भी अन्तर्गत तथा निर्विकार, अचल, अजर, शुद्ध, मुक्त, नित्य और अद्वयस्वरूप हूँ ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनो 'ब्रह्मवित्' में निर्विकारता होने से उसे 'मैं नियोज्य हूँ'—ऐसी बुद्धि (यह ज्ञान) होती ही नहीं ॥ १९ ॥ ॥ इति द्वादशम्प्रकाशप्रकरणं समाप्तम् ॥
- प्याभ्य—पाठान्तरम्