उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअचक्षुष्ट्वप्रकरणम् अचक्षुष्ट्वान्न दृष्टिर्मे तथाऽश्रोत्रस्य का श्रुतिः । अवाक्त्वात्न तु वक्तिः स्यादामनस्त्वान्मतिः कुतः ॥१॥ अचक्षुष्ट्वादिति— चक्षुर्विहीन [नेत्रहीन] होने से मेरी कोई दृष्टि नहीं है, उसी तरह मैं श्रोत्रहीन हूँ, अतः मुझमें श्रवण शक्ति भी कैसे हो सकती है ? तथा वाक् (वाणी) रहित होने के कारण मुझमें वचन शक्ति भी नहीं है, और मनोहीन (अमना) होने के कारण मुझमें मननशक्ति भी कैसे हो सकती है ? ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी लोगों को पदार्थ के स्वरूप का ठीक-ठीक परिचय न होने से ही वाक्य के अर्थ का ज्ञान नहीं हो पाता, किन्तु पदार्थ का परिचय होते ही वाक्य के ठीक-ठीक अर्थ का ज्ञान हो जाता है। अतः प्रसंख्यानविधि अनर्थक और अनुपपन्न है, यह पहले कह चुके हैं। पूर्व प्रकरण के अन्त में 'निर्विकारो ऽ चलः शुद्धः' के द्वारा आत्मा का शुद्धत्व और अचलत्व जो बताया गया था, उसी को और अधिक स्पष्ट करने के लिये इस नवीन प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है। इस प्रकरण में आत्मा को सर्वकरणशून्य बताया गया है। चक्षुरिन्द्रिय के माध्यम से बाहर की ओर प्रसृत (फैली हुई) और रूपादि विषयों से उपरञ्जित (रूपादि विषयाकार हुई) 'जानामि' जानता हूँ—यह क्रिया ही 'दृष्टि' शब्द से यहाँ विवक्षित है। इस प्रकार की वह दृष्टि मुझमें नहीं है अर्थात् वह मेरा विकार यानी मेरा धर्म नहीं है। क्योंकि 'अचक्षुष्ट्वात्' अर्थात् चक्षु तो देह (शरीर) देश के आश्रित है, अतः वह भौतिक कारण है। वह मेरे आश्रित नहीं है, यह अन्वय-व्यतिरेक से निश्चित है, अतः हेतु के असिद्ध होने की (हेत्वसिद्धि की) शंका नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार श्रुति (श्रोत्र) आदि के विषय में समझ लेना चाहिये। तथाच तत्तदिन्द्रियद्वारक बुद्धिवृत्तिरूप दृष्टि आदि क्रिया से हीन होने के कारण आत्मा की अचलता और शुद्धता१ स्पष्ट हो जाती है। अर्थात् उसके (आत्मा के) निश्चल होने से ही उसकी शुद्धता समझनी चाहिये ॥ १ ॥ अप्राणस्य न कर्मास्ति बुद्धयभावे न वेदिता। विद्याविद्ये ततो न स्तश्चिन्मात्रज्योतिषो मम ॥२॥ अप्राणस्येति— मैं प्राणरहित हूँ, अतः मेरा कोई कर्म नहीं है, तथा बुद्धि का अभाव होने के कारण मुझमें ज्ञातृत्व भी नहीं है, अतएव मुझ चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप में ज्ञान और अज्ञान भी नहीं हैं ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी कर्तृत्व, ज्ञातृत्व आदि विकारों के हेतुभूत प्राण, बुद्धि के अभाव से (न रहने के कारण) भी मैं शुद्ध हूँ। मैं तो चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप अर्थात् सदा प्रकाशमान चिदेकरस हूँ। मुझमें न विद्या न अविद्या अर्थात् ज्ञान और उसका अभाव या ज्ञान और क्रिया नहीं है, क्योंकि वे दोनों बुद्धि की ही विशेष अवस्थारूप हैं। आत्मा में बुद्धि के न होने से उसकी शुद्धता सिद्ध हो जाती है। एवंच आत्मा में कर्तृत्व, ज्ञातृत्व न होने से उसकी निश्चलता और निश्चलता होने से शुद्धता है। उससे बुद्धि का संबंध न होने से उसमें ज्ञातृत्व नहीं है। उसमें ज्ञातृत्व न होने से उसकी चिन्मात्रता स्पष्ट है, उस चिन्मात्र आत्मा से विद्या-अविद्या का कोई संबन्ध न होने से भी उसकी शुद्धता स्पष्ट है ॥ २ ॥ नित्यमुक्तस्य शुद्धस्य कूटस्थस्याविचालिनः । अमृतस्याऽक्षरस्यैवमशरीरस्य सर्वदा ॥३॥ १. (बृह. उ. ३।८।८) ९