उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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है, उससे कल्पित (आरोपित) है। वह बुद्धिवृत्ति दृश्य कोटि में है। जैसे घट की उत्पत्ति होने से घटाकाश की उत्पत्ति कही जाती है। अतः उक्त 'कारकाधीनात्मलाभत्व' साधन (हेतु) का अव्यापक होने से हेतु की 'उपाधि' है, अर्थात् वह साधन का व्यापक नहीं है। 'जन्यत्व' हेतु भी असिद्ध है। अन्तःकरणदृष्टि (ज्ञान) में आत्मदृष्टि (ज्ञान) का आभास (भ्रम) होता है। उन दोनों का विवेक न होने से आत्मदृष्टि में ही समस्त व्यवहार होता रहता है। वस्तुतः स्वात्मदर्शी के लिये कोई व्यवहार नहीं है एवं च जैसे घट-पट आदि जन्य पदार्थों की सत्ता कारकों के अधीन है, वैसे आत्मचैतन्य, कारकों के अधीन नहीं है। इस कारण वह स्वयं सिद्ध और नित्य है। जैसे घट की उत्पत्ति से घटाकाश की उत्पत्ति मान ली जाती है, उसी प्रकार बुद्धिवृत्तिरूप उपाधि के कारण आत्मचैतन्य भी उत्पन्न हुआ-सा जान पड़ता है ॥ १५ ॥ देहात्मबुद्ध्यपेक्षत्वादात्मनः कर्तृता मृषा । नैव किंचित्करोमीति सत्या बुद्धिः प्रमाणजा ॥१६॥ देहात्मेति—आत्मा की कर्तृता [कर्तृत्व] देहात्मबुद्धि [देहात्मज्ञान] की अपेक्षा रखती है अर्थात् देहात्म- बुद्धि पर निर्भर है। अतः वह मिथ्या है, इसलिये 'मैं कुछ भी नहीं करता' यह प्रमाणजन्य ज्ञान ही सत्य है ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसके पूर्व श्लोक में यह बताया था कि चित्प्रकाश आत्मा में अव्यभिचरित तथा नित्य होने से 'यो वेद्धालु- प्तदृष्टित्वम्'—(१३) श्लोक के द्वारा उसे (चित्प्रकाश) नित्यदृष्टि (नित्यज्ञान) रूप बताया है। आगे चलकर उसी श्लोक में 'अकर्तृ तां यथा' भी कहा गया था, अतः अब उसी 'निर्विकारत्व' को 'देहात्मबुद्धि' और 'कर्तृत्वं कारकापेक्षम्' इन दो श्लोकों के द्वारा बता रहे हैं। 'देहात्मबुद्धि' यह मिथ्या बुद्धि है, और उसी कारण आत्मा में जो कर्तृत्व आदि की प्रतीति होती रहती है, वह भी मिथ्या है। 'नैव किञ्चित् करोमि' = मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ, इस प्रकार की 'आत्मा' में जो अकर्तृत्वबुद्धि है, वह उपनिषत्प्रमाण¹ से उत्पन्न होती है, अतः वह सप्रमाण है, इस कारण वही सत्य है, और प्रमाणरहित देहात्मबुद्धि की बाधक है। एवं च आत्मा में होनेवाला कर्तृत्वादिप्रतिभास मिथ्या (अज्ञानमूलक होने से मिथ्या) है और अकर्ता, अभोक्ता आत्मा का ज्ञान, प्रमाणजनित होने से बलवान् है। अतः ब्रह्मात्मज्ञानी के लिए कोई व्यवहार नहीं है ॥ १६ ॥ कर्तृत्वं कारकापेक्षमकर्तृत्वं स्वभावतः । कर्ता भोक्तेति विज्ञानं मृषैवेति सुनिश्चितम् ॥१७॥ कर्तृत्वमिति—कर्तृत्व तो कारकों की अपेक्षा रखता है, किन्तु आत्मा का अकर्तृत्व स्वाभाविक है। अतः 'मैं कर्ता हूँ, भोक्ता हूँ—यह विज्ञान मिथ्या ही है, यही सुनिश्चित सिद्धान्त है ॥ १७॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त श्लोक के द्वारा भी पूर्वोक्त अर्थ को ही (आत्मा में कर्तृत्वबुद्धि पारमार्थिक नहीं है) बता रहे हैं। वस्तुतः असंग, निरवयव आत्मा में कारकों का संसर्ग (संबंध) अनुपपन्न ही है। क्योंकि उसमें अकर्तृत्व तो स्वाभाविक है, इस कारण उसे कर्ता, भोक्ता आदि समझना मिथ्या ही है, वास्तविक (सत्य) नहीं है। 'आत्मा' तो नित्य निर्मल ही है ॥ १७ ॥ एवं शास्त्रानुमानाभ्यां स्वरूपेऽवगते सति । नियोज्योऽहमिति ह्येषा सत्या बुद्धिः कथं भवेत् ॥१८॥ एवमिति—इस प्रकार शास्त्र² और अनुमान³ प्रमाण द्वारा आत्मस्वरूप का बोध हो जाने पर 'मैं नियोज्य [कर्मविधायक वाक्य के द्वारा प्रवृत्त किये जाने योग्य] हूँ'—ऐसी बुद्धि सत्य कैसे हो सकती है ? ॥ १८ ॥ १. 'निष्कलं निष्क्रयं शान्तम्'—( श्वेता. उ. ६।१९ ) २. 'विज्ञातार्यस्तु विज्ञाता स त्वमित्युच्यते यतः'—(श्वेता. उ. १२।८ ) ३. 'यत्स्थस्तापो रवेर्देहे'—( श्वेता. उ. १२।१० )