भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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६२ उपदेशसाहस्री

हृदयस्पर्शिनी

शंका—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादि श्रुति के उपदेश के अनुसार समस्त शरीरों में अद्वय आत्मा का ज्ञान रखने पर भी 'ब्रह्मविदेव चाहम्' मैं ब्रह्मवित् हूँ, इस प्रकार अपने ब्रह्मवित् (ब्रह्मज्ञ) होने का अभिमान उसे रहता ही है, अतः उसमें सविशेषता है, ऐसा कहना ही पड़ेगा। इससे उसमें निर्विशेषता सिद्ध नहीं हो पायेगी। समा०—जो व्यक्ति सम्पूर्ण अभिमान अर्थात् 'मैं ब्रह्मज्ञानी हूँ'—इस अभिमान का भी त्याग कर श्रुति-प्रतिपादित निर्विशेष आत्मा का साक्षात्कार करता है अर्थात् अलुप्त चिन्मात्रता के कारण आत्मा के द्रष्टृत्व तथा अकर्तृत्व को जानता है, वही व्यक्ति आत्मज्ञानी (आत्मवित्, ब्रह्मवित्) कहलाने योग्य है। और जिसमें अभिमान का लेशमात्र भी हो वह ब्रह्मज्ञानी कहलाने योग्य नहीं है। क्योंकि अपने को ब्रह्मज्ञ समझने का जो अभिमान है, वह भी अज्ञानजनित ही है। 'ब्रह्म' वास्तव में ज्ञेय वस्तु नहीं है, तब उसके ज्ञान का अभिमान कैसे ? ॥ १३ ॥

ज्ञातैवाहमविज्ञेयः शुद्धो मुक्तः सदेत्यपि । विवेकी प्रत्ययो बुद्धेर्दृश्यत्वान्नाशवान्यतः ॥ १४॥

ज्ञातैवेति—'मैं' ज्ञाता ही हूँ, ज्ञेय नहीं हूँ तथा 'शुद्ध', 'मुक्त' और 'सत्' स्वरूप हूँ—यह जो बुद्धि का विवेकी प्रत्यय है, वह भी दृश्य होने के कारण विनाशी है। अतः ज्ञानी में आत्मज्ञता के अभिमान के लिये अवकाश ही नहीं है ॥ १४॥

हृदयस्पर्शिनी

शंका—अशेष (सम्पूर्ण) विशेष का त्याग करने पर भी आत्मा में ब्रह्मात्मज्ञान के विद्यमान रहने से ब्रह्मवित्त्व के अभिमान का त्याग करना कैसे संभव हो सकता है ? अतः आत्मा को अत्यन्त निर्विशेष कैसे कह सकते हैं ? समा०—'ज्ञातैवाहम्' मैं ज्ञाता ही हूँ, ज्ञेय नहीं हूँ—इस प्रकार का जो विवेकी प्रत्यय है (विवेकवान् प्रत्यय यानी विविक्त आत्मनिष्ठ प्रत्यय) है, वह अन्तःकरणवृत्तिरूप (बुद्धिबोधेद्ध) है, इसलिए वह दृश्य है, और दृश्य होने से वह साक्षिभास्य है, अतः नाशवान् होने से उस वृत्ति का भी नाश हो जाता है। इस कारण ब्रह्मवित् में अभिमान का लेश भी नहीं पाया जाता। जिस प्रकार मृत्तिका से मलिन हुए जल में प्रक्षिप्त कतकरेणु (निर्मली बीज) उस जल की सम्पूर्ण मलिनता को नीचे बैठाकर स्वयं भी बैठ जाता है, उसी प्रकार यह बोधवृत्ति भी अन्तःकरण की होने के कारण अज्ञानजनित ही है, अतः अज्ञान का नाश करने के पश्चात् वह (वृत्ति) स्वयं भी नष्ट हो जाती है। अर्थात् पर प्रत्यगात्मा में प्रक्षिप्त वह विवेकबुद्धिवृत्ति, प्रत्यगात्मगत सकल विशेषरूप मलों का उन्मूलन कर अन्त में स्वयं भी उन्मूलित हो जाती है, प्रत्यगात्मा को समस्त विशेषों से रहित अनाविल कर देती है। तात्पर्य यह है कि उक्त विवेक (प्रत्यय) साक्षी का विषय है, विनाशी है, परिणामशीला बुद्धि का धर्म है, आत्मा का नहीं। इससे स्पष्ट होता है कि यह प्रत्यगात्मा, निर्विशेष ब्रह्म ही है ॥ १४ ॥

अलुप्ता त्वात्मनो दृष्टिनोत्पाद्या कारकैरतः । दृष्ट्या चान्यथा दृष्ट्या जन्यतास्याः प्रकल्पिता ॥ १५॥

अलुप्तेति—आत्मा की चिन्मयी दृष्टि का कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह कर्ता आदि कारकों द्वारा उत्पन्न नहीं की जाती। अन्यदृश्य बुद्धि-वृत्ति के द्वारा उस आत्मा की उत्पत्ति [जन्यता] की कल्पना हुआ करती है ॥ १५ ॥

हृदयस्पर्शिनी

शंका—प्रकृत बुद्धिप्रत्यय के समान आत्मचैतन्यप्रतिभास भी विनाशी है—'आत्मचैतन्यप्रतिभासोऽपि नाशवान्, आत्मप्रकाशत्वात्, या (जन्यत्वात्), प्रकृतबुद्धिप्रत्ययवत्'। इस अनुमान से यह कह सकते हैं कि 'ज्ञान' (दृष्टि) को आत्मा का स्वरूप भले ही मान लिया गया हो तथापि वह नश्वर है, क्योंकि वह (ज्ञान) जन्य है, अतः उसमें जन्यत्व प्रतीति होने से उसे नश्वर ही समझना होगा। समा०—उक्त अनुमान में हेतु के सोपाधिक होने से वह अनुमान ठीक नहीं है। वहां 'कारकाधीनात्म-लाभत्व' उपाधि है। जो साध्य का 'व्यापक' होकर साधन का 'अव्यापक' रहे उसे 'उपाधि' कहते हैं। आत्मस्वरूप जो ज्ञान (दृष्टि) है, उसकी जन्यता तो एक अन्यबुद्धिवृत्ति रूप उपाधि से, जो स्वरूपज्ञान (दृष्टि) के विशेष आकार वाली