भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

प्रकाशप्रकरणम् ६१ शंका-हम संसारी मनुष्यों को दिन-रात सुख-दुःखादि से युक्त आत्मा का ही तो अनुभव होता रहता है। तब हम उसे (आत्मा को) नित्य दृशिरूप (अनुभवरूप) कैसे समझें ? समा०-शरीर के जिस प्रदेश (भाग) पर रवि का ताप होता है, वही ताप (तापाश्रयप्रदेशविशिष्ट ताप) जैसे आत्मा (दृशि) का विषय होता है, उसी प्रकार व्यवहार में भी हमें बुद्धि में होने वाले (सत्त्वस्थ = अन्तःकरणस्थ ) सुख-दुःखरूप ताप का ही (स्वाश्रयान्तःकरण सहित ताप का ही) भान होता है। अर्थात् बुद्धिविशिष्ट ताप ही दृशि (आत्मा) का विषय होता है। यानी 'ताप' दृग्रूप (दृशिरूप) आत्मा से सम्बद्ध (समवेत) नहीं है, वह तो अन्तःकरण (बुद्धि) से सम्बद्ध है। निष्कर्ष यह हुआ कि 'ताप' आत्मा का धर्म नहीं है, वह तो अन्तःकरण का धर्म है, यह अनुभव में आता है। अतः आत्मा नित्य है और चैतन्य (ज्ञान, अनुभव) रूप ही है। अथवा - शरीर में होनेवाला रवि का ताप, देह के जिस प्रदेश में स्थित रहता है, उससे (उस ताप से) विशिष्ट वह सम्पूर्ण देह ही समझा जाता है और वह 'तप्तोऽहम्' = मैं सन्तप्त हूँ कहता रहता है। एवंच व्यवहार में वह ताप, लौकिक आत्मा (दृशि) का विषय है, यह समझा जाता है। उसी प्रकार विषयसम्पर्कजनित सुख-दुःखादि ताप, अन्तःकरण में (सत्त्व में) वस्तुतः स्थित है, इसलिये सुख-दुःखादितापविशिष्ट वह अन्तःकरण, उस साक्षी (दृशि) का विषय होता है। तथाच 'सुखी अहम्' = मैं सुखी हूँ इस अभिमान का अध्यास (भ्रम) अपने साक्षी (दृशि) आत्मा में मनुष्य को होता रहता है, क्योंकि अन्तःकरण को ही मनुष्य 'आत्मा' समझता है, अर्थात् आत्मा में सुखी-दुःखी होने का जो अभिमान है, वह अन्तःकरणाध्यासनिबन्धन है। किन्तु जो विवेकी पुरुष है, उसे कभी भी सुखी या दुःखी के रूप में आत्मा की प्रतीति नहीं हुआ करती । किन्तु लौकिक पुरुष देह के ताप का आत्मा में अध्यास करता है, इसलिये वह अपने आत्मा को ही तप्त समझा करता है ॥ १० ॥ प्रतिषिद्धेदर्मशो ज्ञः खमिवैकरसोऽद्वयः । नित्यमुक्तः सदा शुद्धः सोऽहं ब्रह्मास्मि केवलः ॥११॥ प्रतिषिद्ध इति - जहां 'इदम्' अंश का बाध हो गया है और जो 'चेतन' स्वरूप है, आकाश के समान सदा एकरस है, अद्वितीय है, नित्यमुक्त है तथा सर्वदा शुद्धस्वरूप है, ऐसा जो एक मात्र ब्रह्म है, वही 'मैं' हूँ ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'इदम्' अंश का बाध हो जाने से सुख-दुःखादि से युक्त जो अन्तःकरण उसके साथ इस (आत्मा) का सम्बन्ध नहीं है, यह स्पष्ट हो जाता है। इसका स्वरूप, दृश्यमान जड़ जगत् से नितान्त पृथक् है ॥ ११ ॥ विज्ञातुर्नैव विज्ञाता परोऽन्यः संभवत्यतः । विज्ञाताऽहं परो मुक्तः सर्वभूतेषु सर्वदा ॥१२॥ विज्ञातुरिति-समस्त जगत् के विज्ञाता का अन्य कोई और विज्ञाता मानना संभव नहीं है। इस कारण सम्पूर्ण भूतों में सर्वदा विद्यमान 'मैं' ही मुक्तस्वरूप परम विज्ञाता हूँ ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी जब कि सर्वविज्ञातुरूप आत्मा के सिवाय अन्य दूसरा व्यापक विज्ञाता है ही नहीं, अतः समस्त स्थावर- जङ्गमात्मक जगत् में व्याप्त होकर रहने वाला तथा उसके (ज्ञेय के) धर्म से रहित होने से सर्वदा मुक्त ऐसा परम विज्ञाता मैं ही हूँ । समस्त देहों में विज्ञाता का जो भेद स्फुरित होता है, वह अप्रामाणिक है। अतः उस विज्ञाता के अद्वयत्व तथा ब्रह्मत्व में शंका नहीं करनी चाहिये ॥ १२ ॥ यो वेद्धालुप्तदृष्टित्वमात्मनोऽकर्तृतां यथा । ब्रह्मवित्त्वं तथा मुक्त्वा स आत्मज्ञो न चेतरः ॥१३॥ य इति - जो व्यक्ति अपनी ब्रह्मज्ञता के अभिमान का त्याग कर आत्मा के अलुप्त चैतन्य [दृष्टित्व] तथा अकर्तृत्व को समझता है, वही व्यक्ति आत्मज्ञानी है, अन्य नहीं ॥ १३ ॥