भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

६० उपदेशसाहस्री है। अर्थात् विज्ञप्तिरूप (नित्यज्ञानरूप) जो साक्षी है, 'वही तू है'—यह अर्थ 'तत्त्वमसि' वाक्य से बताया जा रहा है। तव उस ज्ञानी के लिए स्वरूपानुभव (ज्ञान) ही होता रहेगा। इस प्रकार से (श्रुत्युक्त प्रकार से) होनेवाला 'त्वम्' पदार्थ का अनुभव ही सम्यक् अनुभव है। उसके अतिरिक्त जो अनुभव है, वह बुद्धि और तत्स्थित आभासविशिष्ट होने से मिथ्या अध्यास (मृषा) है। अर्थात् स्वरूपव्यतिरिक्त जो अनुभव है, वह साधनाधीन होने से उसे मिथ्या ही समझना चाहिये ।। ८ ।। दृशिरूपे सदा नित्ये दर्शनादर्शने मयि । कथं स्यातां ततो नान्य इष्यतेऽनुभवस्ततः ॥९॥ दृशीति—मैं सर्वदा नित्य साक्षीस्वरूप हूँ, मुझमें आगमापायी ज्ञान और अज्ञान कैसे रह सकते हैं ? इस- लिये उस आत्मस्वरूप से भिन्न अन्य कोई किसी प्रकार का अनुभव अभीष्ट नहीं है ।। ९ ।। हृदयस्पर्शिनी शंका—'आत्मा' ज्ञान का विषय नहीं है, ऐसा यदि श्रुति कहती है तो उसका अनुभव कैसे हो सकेगा ? यदि कहें कि वह (आत्मा) स्वयं अनुभवरूप है, अतः उसके लिये अन्य अनुभव की अपेक्षा नहीं है, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभाव्य और अनुभव दोनों में भेद हुआ करता है। अतएव घट-पटादि वस्तुएँ ज्ञान का विषय कही जाती हैं, वे वस्तुएँ और उनका अनुभवात्मक ज्ञान दोनों एक दूसरे से पृथक्-पृथक् होते हैं। उसी तरह आत्मा के सम्बन्ध में भी क्यों न कहा जाय ? अर्थात् आत्मा और उसका ज्ञान दोनों पृथक् हैं, अतः आत्मा को ज्ञान (अनुभव) का विषय ही कहना उचित होगा। तात्पर्य यह है कि आत्मा यदि ज्ञान का विषय नहीं (अविषय) है तो भगवती श्रुति उसके ज्ञान (साक्षात्कार) के लिये क्यों कह रही है ? और ज्ञान का अविषय होने से उसका अनुभव (साक्षात्कार) कैसे हो सकेगा ? यदि आत्मा अनुभवरूप होने से उसे अन्य अनुभव की अपेक्षा नहीं है ऐसा कहा जाय तो ठीक न होगा, क्योंकि सर्वत्र जड़ और चेतन की विशेषता के कारण अनुभाव्य और अनुभव में भेद देखा गया है, इसलिये आत्मा को अनुभवरूप नहीं कह सकते । समा०—जिसकी स्व-सत्ता में प्रकाश का व्यभिचार रहता है उसे आगन्तुक ज्ञान की अपेक्षा रहती है, अतः उस वस्तु के दर्शन (प्रत्यक्ष अनुभव) या अदर्शन (अप्रत्यक्ष अर्थात् अननुभव) में एक अन्य ज्ञान के आगम और अपाय की अपेक्षा रहा करती है। यह कारण है कि किसी भी जड़ वस्तु के प्रकाशक ज्ञान के होने पर उस वस्तु की सत्ता का ज्ञान हो पाता है और प्रकाशक ज्ञान के न होने पर उस वस्तु की सत्ता का ज्ञान नहीं हो पाता। 'मैं' तो सदा ही दृशिरूप अर्थात् ज्ञानस्वरूप हूँ, अतः 'मैं' सत्य हूँ, नित्य हूँ, मुझे अपनी सत्ता के प्रकाशित होने में किसी अन्य ज्ञान की अपेक्षा (आवश्यकता) नहीं है। एवं च मैं स्वरूपतः और ज्ञानतः नित्य हूँ। इसलिये मेरा दर्शन और अदर्शन जड़ वस्तु की तरह कैसे संभव हो सकता है ? दोनों बातें मुझमें कभी संभव नहीं हो सकतीं । तस्मात् मेरी सत्ता को बताने के लिये मेरे स्वरूप के अतिरिक्त अन्य किसी अनुभव की अपेक्षा करना उचित नहीं है ।। ९ ।। यत्स्थस्तापो रवैर्देहे दृशेः स विषयो यथा । सत्त्वस्थस्तद्वदेवेह दृशेः स विषयस्तथा ।।१०।। यत्स्थ इति—शरीर के जिस भाग [अंश] पर रवि [सूर्य] के ताप का संयोग [सम्बन्ध] होता है, वही भाग साक्षी का विषय होता है। उसी प्रकार व्यवहार दशा में अन्तःकरण में स्थित दुःख आदि आत्मा के विषय होते हैं ।। १० ।। हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में बता चुके हैं कि घट-पट आदि का अनुभव जैसे घट-पटादि से पृथक् रूप में व्यक्त होता है, उसी तरह आत्मा का अनुभव भी उससे पृथक् रूप में व्यक्त हो, यह नहीं समझना चाहिये । क्योंकि आत्मा तो सदा स्फुरणरूप है अर्थात् वह सदा अनुभवरूप ही है। एवं च आत्मा नित्य दृग्रूप है। इसी अभिप्राय को पुनः शंका- समाधान के द्वारा दृढ़ करने के लिये और स्पष्ट कर रहे हैं—