भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 364 में से

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पृष्ठ 85

गया है कि 'दुःखित्व' अविवेक अभिमाननिबन्धन है। अतः 'तत्त्वमसि' महावाक्य से सम्यक् आत्मज्ञानसम्पन्न व्यक्ति में दुःखित्व आदि की अनुवृत्ति का होना संभव नहीं है। बल्कि प्रतिभास के ही बाधित होने की अनुवृत्ति होती रहती है ॥ ६ ॥ तं च मूढं च यद्यन्यं प्रत्ययं वेत्ति नो दृशेः । स एव योगिनां प्रेष्ठो* नेतरः स्यान्न संशयः ॥७॥ तं चेति—जो व्यक्ति उस उपाधिभूत अहंकार, मोहात्मक अविवेक और अन्य उपाधिगत सुख-दुःखादि प्रत्ययों को साक्षी प्रत्यगात्मा में नहीं मानता, वही व्यक्ति आत्मज्ञानी योगियों को प्रियतम लगता है, अन्य नहीं, इसमें कोई संशय नहीं ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका-यदि साभास अहंकार को आत्मा समझनेवाला (आत्मरूप में देखनेवाला) सम्यग्दर्शी (परमार्थ- दर्शी) नहीं, तो सम्यग्दर्शी किसे कहा जाय ? समा०-जो पुरुष उपाधिभूत अहंकार (प्रत्यय), और मोहात्मक अविवेक (मूढ़) तथा अन्य उपाधिगत आभास या दुःख आदि को—'साक्ष्यमेव इदं सर्वम्'=यह सब कुछ दृश्य (साक्ष्य) है, —साक्ष्य (दृश्य) के रूप में मानता (जानता) है; दृशि (साक्षी) जो आत्मा है, उससे इसका कोई सम्बन्ध नहीं है—इस प्रकार विवेक-बुद्धि रखनेवाला व्यक्ति ही सम्यग्दर्शी (परमार्थदर्शी) है, अर्थात् योगियों१ का प्रियतम (प्रेष्ठ) रहता है। साभास अहंकार को ही आत्मा समझनेवाला सम्यग्दर्शी नहीं है। इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं करना चाहिए। भगवद्गीता२ में भगवान् ने भी अपने श्रीमुख से 'संशय करते रहना ठीक नहीं है अर्थात् अनुचित है'—ऐसा कहा है ॥ ७ ॥ विज्ञातेर्यस्तु विज्ञाता स त्वमित्युच्यते यतः । स स्यादनुभवस्तस्य ततोऽन्योऽनुभवो मृषा ॥८॥ विज्ञातेरिति—जो विज्ञाति का [समस्त विशिष्ट ज्ञानों का] विज्ञाता [प्रकाशक] है, वही 'त्वम्' पद से बताया गया है, अतः उस 'त्वम्' पद का यथार्थ अनुभव तो वही है और उससे भिन्न जो अनुभव है, वह मिथ्या है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका—सभी लोगों के लिये आत्मा के रूप में भासित होनेवाला अहंकार भी देह की तरह अनात्मा होने के कारण यदि त्याज्य है तो उससे पृथक् अन्य कोई अर्थ 'त्वम्' पद से प्रतीत नहीं हो रहा है, ऐसी स्थिति में 'तत्त्व- मसि' महावाक्य का तो कोई विषय ही नहीं रहेगा अर्थात् महावाक्य को निरालम्बन ही कहना होगा। समा०—अहंकार आदि से विविक्त (भिन्न, पृथक्) अर्थ का प्रतिपादन श्रुति ने ही कर दिया है। अतः उक्त आशंका ठीक नहीं है। अर्थात् पूर्वप्रतिपादित 'त्वम्' पद के यथार्थ अर्थ का अवलम्बन कर 'तत्त्वमसि' वाक्य प्रवृत्त हुआ है, इसलिए उसके निरालम्बन होने की आशंका करना उचित नहीं है। क्योंकि श्रुति३ में षष्ठ्यन्त शब्द से निर्दिष्ट बुद्धिवृत्तिरूप अनित्य ज्ञान (विज्ञान, विज्ञाति) को तुम, विज्ञाता (नित्य विज्ञप्ति = ज्ञान या विज्ञान के रूप में ज्ञाता) मत समझो। किन्तु 'तत्त्वमसि' वाक्य के 'त्वम्' शब्द से उसको बताया जा रहा है, जो विज्ञप्ति (विज्ञान या ज्ञान) का विषय नहीं है, अपितु उसका (विज्ञप्ति, ज्ञान या विज्ञान का) विज्ञाता (ज्ञाता) है, सर्वसाक्षी है। उस सर्वावभासक (सर्वप्रकाशक) को ही 'त्वम्' शब्द से 'तत्त्वमसि' महावाक्य में बताया गया है। एवं च उस सर्वावभासक का अवलम्बन कर 'तत्त्वमसि' वाक्य की प्रवृत्ति होने से उसके निरालम्बनत्व की आशंका के लिये कोई अवकाश नहीं १. योगिनाम्—युज्यतेऽनेनेति योगस्तत्त्वज्ञानं, तद् विद्यते येषां ते योगिनः तेषाम् । २. 'अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।'-( भ. गी. ४।४० ) ३. 'नहि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते ।'-( बृ. उ. ४।३।३० ) 'न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः ।'—( बृ. उ. ३।४।२ )

  • श्रेष्ठो—पाठान्तरम् ।