भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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५८ उपदेशसाहस्री जाय ? किन्तु ऐसा सोचना ठीक नहीं होगा, क्योंकि दुःख देहाभिमानी को ही होता है, देहाभिमानहीन आत्मा तो स्वभाव से ही निर्दुःख रहता है, जैसा सुषुप्ति में रहता है। अतः उस देहाभिमान की निवृत्ति के लिये भगवती श्रुति ने 'साक्षी आत्मा' को 'तदेव त्वम्' 'तू वही है' यह उपदेश दिया है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी आशंका करनेवाले का अभिप्राय यह था कि आत्मा में दुःखित्वाभिमान तो प्रत्यक्ष अनुभवसिद्ध है, अतः अनुभवात्मक प्रत्यक्षज्ञान से 'तदेव त्वमसि' वही तू है—इस शाब्दज्ञान (श्रुति से होनेवाले ज्ञान) का ही बाध होना चाहिए। यही बताने के लिए यह प्रसंख्यान-विधि हो सकता है। किन्तु समाधान देनेवाले का यह कहना है कि यदि दुःखित्व आदि धर्म आत्मा के स्वाभाविक होते, तो तत्त्वज्ञान का सैकड़ों बार अभ्यास करनेपर भी उससे उन स्वाभाविक धर्मों की निवृत्ति कदापि न होती, क्योंकि 'ज्ञान' ही अज्ञान का विरोधी है। एवं च दुःखित्वाभिमान के प्रत्यक्षज्ञान के स्थिरीकरणार्थ 'तदेव त्वमसि' को प्रसंख्यान-विधि कहना व्यर्थ है। अर्थात् जबकि अविद्याप्रयुक्त देहाद्यभिमाननिबन्धन दुःखित्व आदि धर्म हैं, तब अविद्यात्मक कारण (प्रयोजक) के निवृत्त होने से ही दुःखित्व आदि अभिमान की निवृत्ति हो ही जायेगी, और अविद्या की निवृत्ति एकमात्र ज्ञान के ही अधीन है। अतः कर्मविधि के लिये यहाँ अवकाश नहीं है, अर्थात् देहाभिमानशून्य के लिये कर्म का विधान नहीं है। दुःखित्व-सुखित्व आदि आत्मा का स्वाभाविक रूप नहीं है, उसका स्वाभाविक रूप तो 'अदेहत्व' है। अथवा श्लोक में कहे गये 'नाऽदेहस्य' पद के द्वारा 'देहाभिमानव्यतिरेकेण न दुःखमस्ति' कहा गया है। देहाभिमान के अभाव में दुःख नहीं है, इस अभिप्राय के समर्थन में सुषुप्ति का दृष्टान्त दिया गया है। अतः दृशिरूप आत्मा के देहाभिमान की समूल निवृत्ति के लिये ही भगवती श्रुति ने 'तत्त्वमसि' का उपदेश किया है। एवं च ब्रह्मा और आत्मा की एकता का बोधन किया जा रहा है; कर्म का नहीं ॥ ५ ॥ दृशेश्च्छाया यदारूढा मुखच्छायेव दर्शने । पश्यंस्तं प्रत्ययं योगी दृष्ट आत्मेति मन्यते ॥६॥ दृशेरिति—जिस प्रकार दर्पण आदि में मुख की छाया [प्रतिबिम्ब] पड़ती है, उसी प्रकार जिसमें साक्षी आत्मा का आभास [प्रतिबिम्ब] पड़ता है, उस 'अहम्प्रत्यय' [बुद्धि] को देखकर ही कतिपय योगी 'मुझे आत्मसाक्षात्कार हो गया है' ऐसा समझने लगते है ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'तत्त्वमसि' आदि वाक्योपदेश के अनन्तर आत्मा को देह से व्यतिरिक्त (पृथक्—भिन्न) जाननेवाले को भी 'मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार की प्रतीति (अनुभव) होती है, अर्थात् आत्मा के शुद्ध स्वरूप का ज्ञान होनेपर भी उन्हें अपनी आत्मा के सुखी-दुःखी होने का अनुभव होता ही रहता है। अतः कहना होगा कि 'देहाभिमान दुःख आदि का कारण नहीं है'। इस आशंका के समाधान में यह कहा गया है कि 'अहम्' यह प्रत्यय कल्पित आत्मविषयक है। चिदाभास- विशिष्ट अन्तःकरण (बुद्धि) को आत्मदर्शन के रूप में समझना, यह भ्रम है। वह शुद्ध आत्मदर्शन न होकर आत्म- दर्शनाभास है। मूल श्लोक में 'दर्शने' का अर्थ है 'दर्पणे' अर्थात् दर्पण में। क्योंकि 'दर्शयतीति दर्शनं दर्पणादि', उस दर्पण में मुख का आभास (छाया, प्रतिबिम्ब) जैसे आरूढ़ होता (पड़ता) है, उसी प्रकार दृशि रूप प्रत्यगात्मा की छाया (आभास) जिस प्रत्यय में संक्रान्त (आरूढ़) होती है, उस प्रत्यय १ (साभास अन्तःकरण) को देखनेवाला अर्थात् 'अहम्' रूप में समझनेवाला योगी, अग्रहणात्मक अविद्या से सम्बद्ध होने के कारण 'मैंने आत्मदर्शन कर लिया' समझने लगता है। जैसे छोटे-बड़े मलिन दर्पण में अपने मुख को देखनेवाला मूर्ख मनुष्य अपने मुख को ही मलिन एवं छोटा-बड़ा समझता है, क्योंकि उसे दर्पण और मुख के स्वरूप का विवेक नहीं है। वैसे ही यह नवीन योगी उपाधि के दोषों से आस्कन्दित (युक्त) हुए के समान ही मानो अपनी आत्मा को समझकर 'मैं कर्ता हूँ, मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार अपने को कर्ता, सुखी, दुःखी समझता है। क्योंकि उसे उपाधि के और अपने आत्मा के स्वरूप का विवेकज्ञान (पृथक्-पृथक् रूपेण ज्ञान) नहीं है। एवं च 'अहम्' यह ज्ञान (दर्शन) कल्पित आत्मविषयक है। यह ध्यान में रखकर ही यह कहा १. प्रत्ययः—प्रत्याययतीति प्रत्ययः अहंकारः साभासमन्तःकरणम् ।