उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पद्यभाग १५: नान्यदन्यत्प्रकरणम्
नान्यदन्यत्प्रकरणम् नान्यदन्यद्भवेद्यस्मान्नान्यत्किंचिद्विचिन्तयेत् । अन्यस्यान्यात्म*भावे हि नाशस्तस्य ध्रुवो भवेत् ॥१॥ नान्यदिति—प्रत्येक वस्तु, स्वरूपतः भिन्न ही रहती है, इसीलिये कोई वस्तु, किसी दूसरी वस्तु के रूप में नहीं समझी जाती—यह लौकिक नियम है, तदनुसार जीव 'ब्रह्म' नहीं हो सकता, यह भावना मुमुक्षु पुरुष को नहीं करनी चाहिये। अर्थात् 'ब्रह्म' मुझसे भिन्न है—यह चिन्तन नहीं करना चाहिये। यदि अन्य का अन्य भाव हो जाता है, यानी ब्रह्म, आत्मस्वरूप में परिणत होता है और आत्मा 'ब्रह्मरूप' हो जाता है—इस प्रकार चिन्तन करने पर तो उसका अवश्य ही नाश हो जायेगा। क्योंकि परिणामी मानने पर ब्रह्म की अनित्यता का वारण नहीं हो सकेगा। उसे अनित्य कहना होगा। अतः वास्तव में आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं। उनमें कोई भेद नहीं है ॥ १॥ हृदयस्पर्शिनी कतिपय एकदेशीय विद्वानों का कहना है कि यदि आत्मा, स्वभावत एव शुद्ध है, तो साधनों के निरूपण करने की आवश्यकता ही नहीं, उनका निरूपण करना व्यर्थ होगा। साधन निरूपण करने से स्पष्ट हो रहा है कि वह आत्मा स्वभावत एवं शुद्ध नहीं है, अपितु स्वभावतः ही वह संसारी है और ज्ञान, ध्यान आदि साधनों के अनुष्ठान से स्वभावशुद्ध ब्रह्मस्वरूपता (ब्रह्मभाव) को प्राप्त करता है। किन्तु इन एकदेशीयों के कहने पर मुमुक्षुजनों को विश्वास नहीं करना चाहिये, क्योंकि उनके कथन का श्रुति से तथा युक्ति से बाध हो जाता है। एकदेशीयों से यह प्रष्टव्य है कि जीव और ब्रह्म में अत्यन्त भेद आपको इष्ट है, या भेदाभेद इष्ट है ? अन्तिम पक्ष को इष्ट कहना तो उचित न होगा, क्योंकि भेद और अभेद दोनों परस्परविरुद्ध स्वभाव के हैं। अतः 'ब्रह्म अहम्' = मैं ब्रह्म ही हूँ, इस प्रकार ब्रह्म की और अपनी एकरूपता का ध्यान तथा ज्ञान करना संभव नहीं, और जब वह संभव ही नहीं, तब असंसारी ब्रह्मभावरूप फल की निष्पत्ति होना भी संभव नहीं। इसी भाव को मन में रखकर प्रथम पक्ष में दोष प्रदर्शित कर रहे हैं—दोनों के स्वरूप को यदि अत्यन्त भिन्न मानेंगे अर्थात् एक को जीवरूप और दूसरे को ब्रह्मरूप मानेंगे तो जो जीवरूप से स्थित है, उसे दूसरे के रूपवाला अर्थात् ब्रह्मरूप का कभी कहा ही नहीं जा सकेगा, क्योंकि दोनों का स्वरूप नितान्त भिन्न है, दोनों का स्वरूप परस्पर विरुद्ध है। दूसरा कारण यह भी है कि यदि जीवरूप नष्ट होकर ब्रह्मरूप होता है ऐसा कहें तो, पानेवाला जीवरूप ही जब नहीं रहा तब ब्रह्मरूप को पाया किसने ? अतः दोनों में अत्यन्त भेद नहीं माना जा सकता—यह बात युक्ति से सिद्ध हुई। और भेद मानने पर 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति'१ इस श्रुति से विरोध होना तो स्पष्ट ही है। एवंच एकदेशीयों का मत, श्रुति और युक्ति विरुद्ध होने से 'अन्यत् ब्रह्म' मुझसे (आत्मा से) अतिरिक्त कोई ब्रह्म है, ऐसा ईषन्मात्र (किञ्चिन्मात्र) भी चिन्तन मुमुक्षु को नहीं करना चाहिए। अपितु 'अहमेव ब्रह्म', 'ब्रह्मैवाहम्' इस प्रकार भेदोपमर्दन करते हुए एकरूप से ही आत्मवस्तु का चिन्तन करना चाहिए। यह सब ठीक है, तथापि लोकव्यवहार में हम देखते हैं कि किसी साधनविशेष की सहायता से एक वस्तु, दूसरी वस्तु के रूप में परिणत हो जाती है। जैसे औषधविशेष के सम्बन्ध से ताम्र भी सुवर्ण बन जाता है। अर्थात् ताम्र का रूप सुवर्ण के रूप में बदल जाता है। तद्वत् यहाँ पर भी मान लिया जाय कि जीव का रूप ज्ञान, ध्यान के अनुष्ठान की सहायता से ब्रह्मरूप में परिवर्तित हो जाता है। किन्तु इस प्रकार मानना अनुचित होगा२। क्योंकि जैसे लाल तपे हुए लोहे के गोले पर (अयगोलक पर) डला हुआ (प्रविष्ट हुआ) १. (तै. आ. २।२ ) २. "रसविद्धमयः स्वर्ण यथा भवति सर्वदा, केनचित् साधनेनैव तथा जीवः शिवो भवेत् ।। इति केचित् स्वमोहेन प्रवदन्ति तु वादिनः ।।"-( सूत सं. ४।३९-४० )
- न्यत्व ०—पाठान्तरम् ।
९६ उपदेशसाहस्री जलबिन्दु निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है, उसी तरह भेदवादी के अनुसार ब्रह्मस्वरूप के विरुद्ध (भिन्न) स्वरूप वाले जीव का, अपने से भिन्न स्वरूप वाले ब्रह्म में यदि एकीभाव कहा जाय तो निश्चय ही जीव के रूप का नाश हो जायगा, उस कारण ब्रह्मभावापत्ति की पुरुषार्थ में गणना न होगी, बल्कि उसे पुरुषार्थ न कहा जाकर अनर्थार्थ कहा जायगा । ताम्र का दृष्टान्त देना यहाँ उचित न होगा । ताम्र का रूप, सुवर्ण के रूप में परिवर्तित समझना केवल भ्रम है, वास्तविक नहीं है । जैसे वस्त्र को नीले पीले किसी रंग में रंगने पर उसका अपना निजी रूप, नीले-पीले आदि रंग से अभिभूत हो जाता है, ठीक उसी तरह सुवर्ण के रूप से ताम्र का रूप कुछ काल के लिये अभिभूतमात्र हो जाता है, कुछ समय के पश्चात् सुवर्णाकारता (सुवर्ण का रूप) के हट जाने पर पुनः ताँबे का रूप दृष्टिगोचर होने लगता है, उसपर सर्वदा के लिये सुवर्णरूप नहीं रहता । अतः 'ताँबे का सोना हो गया'—यह ज्ञान जैसे भ्रमात्मक, वैसे ही जीव और ब्रह्म को भिन्न मानकर जीव का ब्रह्मरूप हो जाने का ज्ञान भी भ्रमात्मक ही रहेगा । अतः जीव को ब्रह्म से भिन्न नहीं समझना चाहिए ॥ १ ॥ स्मरतो दृश्यते दृष्टं पटे चित्रमिवार्पितम् । यत्र येन च तौ ज्ञेयौ सत्त्वक्षेत्रज्ञसंज्ञकौ ॥२॥ स्मरत इति—पूर्व दृष्ट नील-पीत आदि वर्णों का स्मरण करने वाले पुरुष को वस्त्र पर काढ़े हुए चित्र के समान उन नील-पीतादि वर्णों के वासनाओं की उपलब्धि होती है। वह उपलब्धि जहाँ होती है और जिसे होती है, उन्हें क्रमशः 'सत्त्व' (बुद्धि) और क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) समझना चाहिये ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि अपने (आत्मा) से अतिरिक्त कोई ध्येय नहीं है, और ध्यातृ-ध्येयभाव के उपपन्न न हो पाने से अपना ही अपने में ध्यान करना भी संभव नहीं है, तो निदिध्यासन का विधान क्यों किया गया है ? अतः जीव-ब्रह्म का भेद मानना चाहिए । इस प्रश्न के उत्तर में यही कह रहे हैं कि बिना भेद माने भी उपपत्ति हो जाती है, उसके लिये भेद मानने की आवश्यकता नहीं । पूर्वदृष्ट नील-पीतादि रंग का स्मरण करने वाले पुरुष के अन्तःकरण में, वस्त्र पर काढ़े हुए चित्र के समान उन नील-पीतादि रंगों के वासनाओं की उपलब्धि होती है। वह उपलब्धि जहाँ होती है, उसे सत्त्व (बुद्धि-अन्तःकरण) कहते हैं, और जिसे वह होती है, उसे क्षेत्रज्ञ (जीव) कहते हैं। तथाच 'आत्मा निदिध्यासितव्यः' विधि ने 'त्वम्' पदार्थ का विवेक (विचार) सम्पादन ही निरन्तर करने के लिए कहा है, विवेक किया हुआ (विविक्त हुआ) 'त्वमर्थ' ही तो ब्रह्म है। 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्याकारक अपरोक्षानुभव (प्रत्यक्ष) से ही संसारनिवृत्तिरूप फल की प्राप्ति होती है। अपने (आत्मा) से ब्रह्म अन्य (भिन्न) है, इत्याकारक अन्यत्व की भावना करने पर पूर्वोक्त न्याय से अन्य की अन्यात्मकता न हो सकने से संसार की निवृत्ति होना कभी संभव नहीं है, जिससे विधि को निष्फल कहना पड़ेगा ॥ २ ॥ फलान्तं चानुभूतं यद्युतं कर्त्रादिकारकैः । स्मर्यमाणं हि कर्मस्थं पूर्वं* कर्मैव तच्चितः ॥३॥ फलान्तमिति—सुख-दुःखादि फल पर्यन्त कर्तृ-कर्मादिकारकविशिष्ट जिन द्वैत पदार्थों का पहले अनुभव किया था, वे द्वैत पदार्थ ही अब याद आने पर कर्मस्थ (दृश्यरूप अन्तःकरण आदि में स्थित) दिखाई देते हैं। इसलिये पहले भी वे चेतन आत्मा के कर्म (दृश्य) थे । निष्कर्ष यह है कि जब हम स्मरण करते हैं, उस समय वासनात्मक द्वैत अपने आश्रयभूत अन्तःकरण में स्थित दिखाई देता है। उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में भी सुख-दुःखादि पर्यन्त जितना भी कर्तृ- कर्मादिकारकविशिष्ट स्थूल प्रपञ्च है, वह सब अपने आश्रयभूत स्थूल-सूक्ष्म शरीर में स्थित हुआ ही अनुभव होता था । अतः सभी अवस्थाओं में वे पदार्थ आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित होते रहते हैं यह मानना होगा, क्योंकि उनके जो आश्रय हैं, वे भी उन्हीं के समान 'आत्मा' के दृश्य हैं। इसलिये केवल 'आत्मा' ही साक्षी है, और उसके अतिरिक्त सभी पदार्थ 'आत्मा' के दृश्य हैं, और उसमें अध्यस्त हैं—यही समझ में आता है ॥ ३ ॥
- पूर्वकर्म०—पाठान्तरम्
नान्यदन्यत्प्रकरणम् ९७ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि अन्तःकरण के प्रत्यक्ष न होने से उसमें स्थित नील-पीतादि की उपलब्धि, स्मृति-अवस्था में कैसे हो सकती है ? इसका उत्तर तो यह है कि सुख-दुःखादि फलपर्यन्त जिन कर्तृ-कर्मादि कारकों से युक्त द्वैत पदार्थों का प्रथमतः (पूर्व) अनुभव किया था, उनका अब स्मरण किये जानेपर वे दृश्यरूप अन्तःकरणादि में स्थित (कर्मस्थ) दिखाई देते हैं; द्रष्टृनिष्ठ नहीं दिखाई पड़ते । क्योंकि उससे पूर्व भी स्मर्यमाण अधिकरण का अधिकरणरूप अन्तः- करण, 'आत्मा' (चित्) का दृश्य (कर्म) ही है । निष्कर्ष यह है- पूर्वानुभूत विषयाकार वृत्ति, जो अन्तःकरण की परिणामरूप है, उसे ही 'स्मृति' कहते हैं। उसमें भासित होनेवाला (भासमान) जो विषय, वह आश्रय के सहित (साश्रय) ही भासित होता है । उस समय साक्षी के द्वारा अनुभूयमान विषय की अवस्थिति का भान कहीं बाहरी आश्रय में नहीं होता है । जिस प्रकार स्मरण करते समय वासनात्मक द्वैत अपने आश्रय अन्तःकरण में स्थित दिखाई देता है, उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में भी सुखदुःखादिपर्यन्त जितना कर्तृ-कर्मादिकारकविशिष्ट स्थूल प्रपञ्च है, वह सब अपने आश्रय स्थूल-सूक्ष्म शरीर में स्थित ही अनुभूत होता है । अतः सभी अवस्थाओं में वे आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित होनेवाले हैं, क्योंकि उनके आश्रय तो उनके समान ही आत्मा के दृश्य हैं । अतः एकमात्र आत्मा ही साक्षी है, शेष सभी पदार्थ आत्मा के दृश्य और उसमें अध्यस्त हैं। एवंच पहिले भी ये सभी चेतन (आत्मा) के कर्म (दृश्य) ही थे ॥ ३ ॥ द्रष्टुश्चान्यद्भवेद्दृश्यं दृश्यत्वाद्घटवत्सदा । दृश्याद्द्रष्टाऽसजातीयो न धीवत्साक्षिताऽन्यथा ॥४॥ द्रष्टुरिति—सभी दृश्य पदार्थ घट-पटादि के समान दृश्य रहने से सर्वदा ही द्रष्टा से पृथक् होते हैं। 'द्रष्टा' कभी भी 'दृश्य' का सजातीय नहीं होता । यदि यह न माना जाय तो उसे भी बुद्धि के समान परिणामी कहना होगा । तब उसे 'साक्षी' नहीं कह सकेंगे ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक से 'स्मर्यमाण के अधिकरण के रूप में चित्त ही दिखाई देता है',—यह बताया गया, जिससे अन्तःकरण में साक्षी की प्रत्यक्षता सिद्ध हुई । किन्तु भाट्ट मीमांसकों ने आत्मा को ही द्रष्टा और दृश्य दोनों रूपों में माना है । अतः कहना होगा कि स्वगत वासनारूप को ही आत्मा देखता है, 'इदं स्मरामि'—यह अनुभव तो अन्यथा भी सिद्ध हो सकता है, अतः अन्तःकरण को साक्षीप्रत्यक्ष कैसे कह सकेंगे ? उत्तर यह होगा कि दृश्य पदार्थ, घटादि के समान दृश्य होने के कारण ही सर्वदा द्रष्टा से भिन्न होते हैं, अर्थात् 'विमतं दृश्यं द्रष्टुरत्यन्तं भिन्नं, दृश्यत्वात्, घटवत्'—इस अनुमान से द्रष्टा और दृश्य का भेद सिद्ध रहने पर भी परिणामिता के कारण साजात्य (सजातीयता) का संभव होने से द्रष्टा का सजातीय ही यह दृश्य है, यह क्यों न कहा जाय ? द्रष्टा कभी भी दृश्य का सजातीय नहीं होता । अन्यथा दृश्यांश के अचेतन होने से उसका (द्रष्टा का) आत्मत्व उपपन्न नहीं हो सकेगा । तथा बुद्धि के समान उसे परिणामी मानने पर उसकी साक्षिता सिद्ध न हो पायगी ॥ ४ ॥ स्वात्मबुद्धिमपेक्ष्यासौ विधीनां स्यात्प्रयोजकः । जात्यादिः शववत्तेन तदज्ञानात्मताऽन्यथा ॥५॥ स्वात्मबुद्धिमिति—माता-पिता आदि के मृत शरीर में आत्मीयता का दृढ़ अभ्यास रहने से उसके संस्कार करने की प्रवृत्ति होती है, उसी तरह ब्राह्मणत्वादि जाति, वृद्धादि अवस्था और पिता-पुत्रादि सम्बन्धों में भी आत्मत्व का अभिनिवेश रहने से ही वे विधि में प्रवृत्त कराते हैं । वे शव के समान ही आत्मा के धर्म नहीं हैं। नहीं तो 'आत्मा' की अनात्मता कही जायगी ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि आत्मा तो साक्षी हो ही नहीं सकता, क्योंकि वह तो ब्राह्मणत्व आदि जातिमान् रहता है, उस कारण उसमें विशेषता रहती है, जिससे उसको कर्मानुष्ठान का अधिकार प्राप्त रहता है, इस प्रकार उसमें १३
९८ उपदेशसाहस्री परिणामित्व की उपपत्ति हो जाती है। तस्मात् विकारी होने के कारण उसे साक्षी कैसे कहा जा सकता है ? उक्त प्रश्न का यह उत्तर है कि शव के समान ब्राह्मणत्वादि जाति, उसी प्रकार वय, अवस्था आदि तथा पिता-पुत्रादि सम्बन्धों में भी आत्मत्व का अभिनिवेश होने से, वे विधि के प्रयोजक (प्रवर्तक) बनते हैं। वस्तुतः प्राण निकल जाने पर देह, 'शव' कहलाता है, तथापि 'मेरी माता, मेरे पिता'—यह अध्यास दृढ़ रहने के कारण, वह संस्कार का प्रयोजक होता दिखाई देता है, अर्थात् उसके संस्कारादि किये जाते हैं। उसके अभाव में नहीं। उसी प्रकार (शव के समान ही) जाति, वृद्धादि अवस्था, एवं पिता-पुत्रादि सम्बन्ध भी आत्मा के धर्म नहीं है। यदि इन सब को आत्मा के धर्म कहें तो घट आदि के समान उसमें अनात्मता (जड़ता) सिद्ध होगी। तस्मात् आत्मा को साक्षी समझना चाहिये, कर्म का अधिकारी सुनकर उसे परिणामी (विकारी) नहीं समझना चाहिये ॥ ५ ॥ न प्रियाप्रिय इत्युक्तेर्नादेहत्वं क्रियाफलम् । देहयोगः क्रियाहेतुस्तस्माद्विद्वान् क्रियास्त्यजेत् ॥६॥ नेति—'आत्मा' अशरीरी है, उसे कभी भी सुख-दुःख आदि स्पर्श नहीं करते—इस श्रुतिवचन के अनुरोध से 'अशरीरत्व' को 'कर्म' का फल नहीं समझना चाहिये। 'कर्म' का फल तो 'देह' के साथ सम्बन्ध होना ही है। अतः विद्वान् (ज्ञानी) पुरुष को कर्मों का त्याग कर देना चाहिये ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि कर्तृत्व को अध्यास-निबन्धन नहीं कह सकते, क्योंकि मुमुक्षु विद्वान् को भी मोक्षार्थ क्रियानुष्ठान करना पड़ता है। उसका समाधान यह होगा कि अशरीरत्व (शरीर रहित होना) को 'मोक्ष' कहा जाता है। उसे किसी क्रिया का फल नहीं कह सकते। क्योंकि क्रिया के फल तो 'सुख-दुःख' संसार में प्रसिद्ध हैं। वे सुख-दुःख शरीर को ही हुआ करते हैं, शरीर से अन्यत्र अशरीर पर होते उन्हें न किसी ने देखा और न सुना है। अशरीरी आत्मा को सुख-दुःख स्पर्श नहीं करते—'अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः'१ इस श्रुतिवचन से ही उसकी मुक्तता स्पष्ट हो जाती है। कर्म का फल तो देह के साथ संबन्ध होना ही है। अर्थात् कर्म (क्रिया) से देहसम्बन्ध ही साध्य है, मोक्ष नहीं। तस्मात् विद्वान् मुमुक्षु यह समझे कि मुक्ति, 'कर्म' से—साध्य होने वाली नहीं, अपितु एकमात्र 'ज्ञान' से ही वह साध्य है। इस प्रकार समझते हुए वह अहंकार सहित सम्पूर्ण कर्मों का परित्याग करे, अर्थात् संन्यस्त होकर श्रवण- मननादि में तत्पर रहे ॥ ६ ॥ कर्मस्वात्मा स्वतन्त्रश्चेन्निवृत्तौ* च तथेष्यताम् । अदेहत्वे फलेऽकार्ये ज्ञाते कुर्यात्कथं क्रियाः ॥७॥ कर्मेति—'कर्म' करने में यदि 'आत्मा' स्वतन्त्र है, तो कर्म के त्याग करने में भी उसकी वैसे ही स्वतन्त्रता समझनी चाहिये। देहसम्बन्धरहित मोक्षरूप फल यदि कर्म से साध्य नहीं है, तो 'ज्ञान' होने पर मुमुक्षु विद्वान् कर्मा- नुष्ठान क्यों करे ? ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि लोकव्यवहार में हम अनुभव करते रहते हैं कि सभी कर्म (क्रियाएँ) आत्मकर्तव्य के रूप में होते हैं, ऐसी स्थिति में विद्वान् मनुष्य उन कर्मों (क्रियाओं) को कैसे त्याग सकेगा ? समाधान यह है कि यदि आत्मा कर्म (क्रियाओं के) करने में स्वतन्त्र है, तो उसे उन कर्मों के त्यागने में भी वैसा ही स्वतन्त्र समझो। जैसे आसक्त (रागादिमान्) पुरुष प्रवृत्तिरूप कर्म में स्वतन्त्र होता है, उसीप्रकार विशुद्ध वीतराग पुरुष को भी कर्म के त्यागने (निवृत्ति) में स्वतन्त्र समझना चाहिये। कर्मसाध्य फल की अभिलाषा न रहने पर कर्म का त्याग तो अर्थात् प्राप्त है। देहसम्बन्ध से शून्य (शरीरसम्बन्धरहित) मोक्षरूप फल, किसी भी कर्म से साध्य नहीं है (अकार्य है), १. ( छां. उ. ८।१२।१ )
- निवृत्तं ०—पाठान्तरम् ।
नान्यदन्यत्प्रकरणम् ९९ यह बात शास्त्र आदि के द्वारा ज्ञात हो जाने पर मुमुक्षु पुरुष क्यों कर्म करेगा ? अर्थात् कभी नहीं करेगा । उसके लिये क्रियाएँ निष्प्रयोजन ही हैं ॥ ७ ॥ जात्यादीन्संपरित्यज्य निमित्तं कर्मणां बुधः । कर्महेतुविरुद्धं यत्स्वरूपं शास्त्रतः स्मरेत् ॥८॥ जात्यादीनिति—ज्ञानी पुरुष 'कर्मों' की निमित्तभूत जाति आदि का सम्यक् प्रकार से त्याग कर कर्मरूप निमित्त के विरुद्ध जो आत्मा का स्वरूप है, उसका शास्त्र के अनुसार चिन्तन करे । 'ब्राह्मण वसन्त ऋतु में अग्नि का आधान करे'—इस विधिवाक्य में ब्राह्मण जाति ही अग्न्याधान करने में निमित्त है। अतः कर्मानुष्ठान में 'जाति' को ही निमित्त कहना होगा, किन्तु शुद्ध आत्मा में कोई जाति आदि नहीं है, इसलिये उसे कर्म के निमित्त के विरुद्ध कहा गया है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी तो क्या केवल क्रिया (कर्म) परित्याग करनेमात्र से विदेहकैवल्यरूप अकार्य की प्राप्ति हो जायगी ? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा जा रहा है कि बुद्धिमान् (पण्डित) पुरुष, कर्मों की निमित्तभूत जाति का अर्थात् जाति आदि के अभिमान का सम्यक् प्रकार से त्याग कर कर्म-निमित्त के उपमर्दक शुद्ध आत्मस्वरूप का शास्त्रानुसार चिन्तन करता रहे । तात्पर्य यह है कि 'वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत'—वसन्त ऋतु में ब्राह्मण अग्न्याधान करे, इस विधि के अनुसार अग्न्याधान में निमित्त 'ब्राह्मणत्व जाति' है । अतः कर्म के अनुष्ठान में निमित्त ब्राह्मणत्व जाति ही कही जायगी, किन्तु शुद्ध आत्मा में कोई जाति आदि नहीं है। अतः शुद्ध आत्मस्वरूप को कर्म की निमित्तभूत जाति आदि से विरुद्ध कहा गया है। एवञ्च कर्मपरित्याग करने मात्र से विदेहकैवल्य (मोक्ष) प्राप्त नहीं होगा, अपितु यथाशास्त्र विशुद्ध आत्मस्वरूप के चिन्तन करने से वह प्राप्त होगा ॥ ८ ॥ आत्मैकः सर्वभूतेषु तानि तस्मिंश्च खे यथा । पर्यगाद्व्योमवत्सर्वं शुक्लं दीप्तिमदिष्यते ॥९॥ आत्मैक इति—समस्त भूतों में आकाश के समान एक ही आत्मा व्याप्त है, तथा वे भूत भी उसी (आत्मा) में अध्यस्त हैं। क्योंकि 'स पर्यगाच्छुक्र' अर्थात् वह (आत्मा) सर्वगत, शुक्र अशरीरी, अक्षत, स्नायु आदि से रहित, शुद्ध और पापशून्य है। इस श्रुतिवचन के अनुसार आत्मा को आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त, शुद्ध और प्रकाशमय माना गया है ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी किस रूप के (किंलक्षण) आत्मा का चिन्तन करे ? और कौन-सा वह शास्त्र है, जिसके अनुसार चिन्तन करे ? उसके उत्तर में शास्त्रीय वाक्यों का उल्लेख करते हुए स्मर्तव्य आत्मस्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं—'आत्मैकः··· खे यथा ।' इस पूर्वार्ध से ईशावास्योपनिषद् के मन्त्र¹ के अर्थ को बताया गया है। और अग्रिम सार्धश्लोक से आठवें मन्त्र² के अर्थ को बताया है । सम्पूर्ण भूतों में 'मैं' ही एकमात्र आत्मा हूँ, भिन्न-भिन्न भूतों में भिन्न-भिन्न आत्मा (चेतन) नहीं है । तो क्या ये भूत, आत्मा के अधिकरणस्वरूप हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा कि ये भूत, आत्मा के अधिकरण नहीं हैं, प्रत्युत उस आत्मा में ही ये भूत अध्यस्त हैं, उससे पृथक् नहीं हैं। तथाच अपने (आत्मा) में अध्यस्त हुए समस्त विकारों में मणियों में, सूत्र के समान पिरोये हुए (अनुस्यूत) सत्तास्फूर्तिरूप आत्मा का विकारोप- मर्दपुरःसर अनुसन्धान करते रहना चाहिये । अन्तः (भीतर) सुषिर रूप से और बाहर अवकाश रूप से विद्यमान आकाश में जैसे भूतसम्बन्ध है, उसी प्रकार से समझना चाहिये । वह आत्मा सर्वगत, शुभ्र, अशरीरी, अक्षत, १. "यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ॥ सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥"—( ई. उ. ६) २. "स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ।"—(ई० उ० ८) ।
१०० उपदेशसाहस्री स्नायुरहित, शुद्ध, पापशून्य है। ब्राह्मण¹ ने भी इसी का समर्थन किया है। इस शास्त्र के अनुसार प्रकाशस्वभाव (शुक्रमू=दीप्तिमत्) शुद्ध आत्मस्वरूप माना गया है, उस आत्मस्वरूप का चिन्तन करे ॥ ९ ॥ व्रणस्नावोरभावेन स्थूलं देहं निवारयेत् । शुद्धापापत्तयाऽलेपं लिङ्गं चाकायमित्युत ॥१०॥ व्रणेति—पूर्वोक्त 'स पर्यगात्' इत्यादि श्रुति ने व्रण और स्नायु का अभाव बताकर स्थूल शरीर का निराकरण किया है। शुद्ध और निष्पाप बताकर उसे ( आत्मा को ) निर्लेप बताया है, तथा अकाय कहकर सूक्ष्म शरीर का निषेध किया है ॥ १०॥ हृदयस्पर्शिनी अब दशम श्लोक के द्वारा श्रुतिगत 'अव्रणम्, अस्नाविरम्' पदों के अर्थ को बता रहे हैं। श्रुति ने व्रण (क्षत) और स्नायु (शिराजाल) का अभाव बताकर (निरास कर) स्थूल देह के आत्मत्व का निराकरण किया है, शुद्ध (रागादि दोषों से हीन) रहने से ही अपाप अर्थात् निष्पाप (पुण्य और पाप दोनों से रहित) कह कर उसे निर्लेप बताया है। अर्थात् सुख-दुःख और उसके अनुभव तथा उससे उत्पन्न संस्कार से हीन वह आत्मा है। और 'अकाय' (अशरीर) कह कर सूक्ष्म शरीर (लिङ्ग शरीर) की आत्मता का भी निराकरण किया गया है। तात्पर्य यह है कि स्थूल-सूक्ष्म देह, उनके कार्य, तज्जन्य संस्कार इन सबसे अतिरिक्त (पृथक्), समान, एक, अपरिच्छिन्न आत्मा का सर्वदा चिन्तन करना चाहिये ॥ १० ॥ वासुदेवो यथाऽश्वत्थे स्वदेहे चाब्रवीत्समम् । तद्वद्वेत्ति य आत्मानं समं स ब्रह्मवित्तमः ॥११॥ वासुदेव इति—जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण ने 'अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्' तथा 'वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि' कह कर अश्वत्थ ( पीपल ) के वृक्ष में और अपने शरीर में अपनी सत्ता को समान बताया है, उसी प्रकार जो पुरुष अपनी आत्मा को समस्त उपाधियों के वैषम्य से रहित सर्वत्र देखता है, वही ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ माना जाता है ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व निर्दिष्ट प्रकार से आत्मा को जो जानता है, वही ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ है। भगवान् ²वासुदेव श्रीकृष्ण ने निकृष्टोपाधिक अश्वत्थ वृक्ष के शरीर में और आविर्भूत विज्ञानैश्वर्यशक्तिमत् आत्माधिष्ठित उत्कृष्टोपाधिक अपने शरीर में 'अश्वत्थ सर्ववृक्षाणाम्'³ और ⁴'वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मिः' कहकर अपनी समान सत्ता का निर्देश किया है, उसी तरह जो पुरुष अपनी आत्मा को समस्त उपाधिकृत वैषम्य से रहित देखता है (जानता है), वही सर्वाधिक ब्रह्मवित् है ॥ ११ ॥ यथा ह्यन्यशरीरेषु ममाहन्ता न चेष्यते । अस्मिंश्चापि तथा देहे धीसाक्षित्वाविशेषतः ॥१२॥ यथेति—जिस प्रकार अन्य शरीरों में ममता और अहंता ( अहंकार ) अभीष्ट नहीं है, उसी प्रकार इस शरीर में भी ममता तथा अहंता नहीं होनी चाहिये। क्योंकि दोनों ही शरीरों में उसका ( आत्मा का ) बुद्धिसाक्षित्व समान रूप से है। निष्कर्ष यह है कि आत्मतत्त्व के विचार करने में अहंकार आदि का अवकाश न रहने से सर्वत्र समान रूप से आत्मदर्शन करना चाहिये ॥ १२ ॥ १. 'नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम्'—( बृ. उ. २।५।१८ ) २. 'सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्ति परमात्मनि । भूतेषु च स सर्वात्मा वासुदेवस्ततः स्मृतः ।—( वि. पु. ६।५।८० ) ३. ( भ. गी. १०।२६ ) ४. ( भ. गी. १०।२७ )
नान्यदन्यत्प्रकरणम् १०१ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि अपनी आत्मा को सर्वत्र समान रूप से देखना भगवान् वासुदेव श्रीकृष्ण के लिये तो ठीक हो सकता है, क्योंकि वह उपाधियों के प्रति ममता और अहंकार से रहित हैं, किन्तु मुमुक्षु पुरुष तो उपाधियों के प्रति ममता और अहंकार सहित होता है । अतः वह अपनी आत्मा को सर्वत्र समभाव से कैसे देख सकेगा ? उत्तर यह है कि जिस प्रकार बाहर दिखाई देनेवाले अन्य शरीरों में ममभाव (ममता) अहंभाव (अहंता=अहंकार) इष्ट नहीं रहता, क्योंकि वे सब दृश्य होने से उनमें अनात्मत्व का निश्चय रहता है। उसी प्रकार स्वत्वेन अभिमत इस (अपने) शरीर में भी ममता, अहंता करना इष्ट नहीं है। क्योंकि अपने और दूसरे उभयविध शरीरों में आत्मा की बुद्धिसाक्षिता समान (एक-सी) है। इस कारण आत्मतत्त्व का आलोचन (विचार) करते समय ममता-अहंकार आदि को अवकाश न होने के कारण भगवान् वासुदेव श्रीकृष्ण के समान सर्वत्र समान रूप से अपनी आत्मा को देखना उचित ही है ।। १२ ।। रूपसंस्कारतुल्याधी रागद्वेषौ भयं च यत् । गृह्यते धीश्रयं तस्माज्ज्ञाता शुद्धोऽभयः सदा ॥१३॥ रूपेति—यदि किसी को यह आशंका हो कि राग, द्वेष और भय आदि की उपलब्धि तो सभी को हुआ करती है। अतः 'आत्मा' में अभिमान का सर्वथा अभाव कैसे हो सकता है ? तो इसका समाधान यह है कि ये जो राग, द्वेष और भय आदि हैं, वे भी सब नीलादिरूप संस्कार के समान साश्रय (आश्रय वाले ) हैं, अर्थात् वे सभी, बुद्धि के ही आश्रित रहते हैं, किन्तु उन सबका साक्षी जो आत्मा है, वह सर्वदा शुद्ध और भयरहित है ।। १३ ।। हृदयस्पर्शिनी यदि यह कहें कि राग, द्वेष, और भय आदि की उपलब्धि होने से आत्मा में अभिमान (अहंकार), ममता आदि का सर्वथा अभाव कैसे हो सकता है ? उनका अभाव इस तरह समझा जा सकता है कि ये जो राग, द्वेष और भय हैं, वे नीलादिरूप संस्कार के समान आश्रय (आधि) वाले हैं, क्योंकि ये सब बुद्धि के ही आश्रित देखे जाते हैं । स्वाश्रय में पूर्व उद्भूतावस्था के समान अन्य अवस्था के आपादक अतीन्द्रिय धर्म को संस्कार कहते हैं । तत्तश्च रूपाद्याकार में परिणत अन्तःकरण में रूपादि संस्कार, पुनरपि रूपाद्याकार परिणाम में हेतु बनता है, और वहींपर रूपादि दर्शननिमित्त राग-द्वेष और तन्निमित्तक भय भी वहींपर होता है। श्रुति भी कह रही है—"कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव१”। राग-द्वेष-भय ये तीनों बुद्धि के ही आश्रित रहते हैं अर्थात् तीनों का आश्रय बुद्धि ही है। इन तीनों को आत्मा जानता है, आत्मा तीनों का ज्ञाता (साक्षी) है। ये आत्मा के आश्रित नहीं रहते । अतः आत्मा तो सर्वदा शुद्ध (रागादि से रहित) और अभय है ।। १३ ।। यन्मनास्तन्मयोऽन्यत्वे नात्मत्वात्सौ क्रियाऽऽत्मनि । आत्मत्वे चानपेक्षत्वात्सापेक्षं हि न तत्स्वयम् ॥१४॥ यन्मना इति—ध्याता और ध्येय का यदि भेद रहता है, तो ध्याता जिस प्रकार के ध्येय में अपना मन लगाता है, तद्रूप ही वह हो जाता है । किन्तु आत्मप्राप्ति के लिये किसी ध्यान आदि क्रिया करने की अपेक्षा नहीं है । क्योंकि आत्मा तो मोक्षस्वरूप ब्रह्म ही है, अतः उसे किसी क्रिया की अपेक्षा नहीं रहती। यदि उसे भी सापेक्ष कहा जाय तो उसमें आत्मस्वरूपता की स्थिति नहीं होगी ।। १४ ।। हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक के द्वारा आत्मा को सर्वदा शुद्ध बताया गया है, किन्तु वह सर्वदा शुद्ध कैसे होगा ? श्रुति भी कह रही है—"यथा क्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति२”। उसी तरह स्मृति भी कह रही है— १. (बृ. उ. १।५।३ ) २. (छां. उ. ३।१४।१ )
१०२ उपदेशसाहस्री "यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः१ ।। अतः पूर्व में अशुद्ध रहा हुआ भी पुरुष, ब्रह्मभावना करने से शुद्ध होगा, पश्चात् ब्रह्मभाव को ही पायेगा । इस कारण आत्मा को सर्वदा ही शुद्ध कहना उचित नहीं है । किन्तु इस प्रकार समझ बैठना समुचित नहीं है, क्योंकि ध्याता और ध्येय का भेद रहने पर तो ध्याता (ध्यान करने वाला) जिस प्रकार के देवादि ध्येय में मन लगाता है, तो वह ध्येय देवादिमय (तन्मय) हो जाता है, ध्यान की क्रिया वहीं पर सार्थक हो पाती है । किन्तु आत्मप्राप्ति के लिये (आत्मस्वरूप में अवस्थिति प्राप्त करने के लिये) आत्मा में किसी ध्यानादि क्रिया की अपेक्षा नहीं होती। क्योंकि मोक्षरूप ब्रह्म ही तो आत्मा है, उस कारण वहाँ किसी क्रिया की अपेक्षा नहीं रहती। क्योंकि वह चतुर्विध क्रियाफल से विलक्षण है। यदि कैवल्य (मोक्ष) को क्रियासापेक्ष माना जाय तो वह स्वयं आत्मरूप नहीं हो सकता । क्योंकि जो क्रिया से साध्य होता है, वह अनात्मरूप और अनित्य होता है । एवञ्च आत्मा सर्वदा ही शुद्ध है, उसमें जो अशुद्धि का आभास होता है, वह मिथ्या, अध्यास है ।। १४ ।। खमिवैकरसा ज्ञप्तिरविभक्ताऽजरामला । चक्षुराद्युपधाना सा विपरीता विभाव्यते ।। १५ ।। खमिवेति—स्व (आत्मा) के समान ज्ञप्ति (ज्ञान) भी एकरस, निर्विभाग (अखण्ड), जरारहित और निर्मल (अमल) है, तथापि चक्षु (नेत्र) आदि उपाधियों के कारण ही वह विपरीत प्रतीत होता रहता है। जैसे निर्मल स्फटिक मणि जपापुष्प की सन्निधि से लाल रंग का दिखाई पड़ता है। अथवा जैसे व्यापक आकाश घट-मठादि उपाधियों के कारण विभक्त हुआ-सा प्रतीत होता है। उसी प्रकार एक ही शुद्ध ज्ञान, जो साक्षात् आत्मस्वरूप ही है, तथापि नेत्र आदि उपाधियों के कारण रूप-रसादि विभिन्न भेदों से युक्त हुआ-सा प्रतीत होता है ।। १५ ।। हृदयस्पर्शिनी विभागादि मलों के न रहने से और चिदेकरस होने से आत्मा को सर्वदा ही शुद्ध समझना चाहिये । उसी तरह अर्थात् आत्मा के समान ज्ञान भी एकरस, विभागरहित (निर्विभाग), जरारहित और निर्मल है। यदि कोई कहे कि ज्ञान (ज्ञप्ति) का स्वरूप इस प्रकार का है, तो जन्म-विनाश आदि भेद अर्थात् जायते, नश्यति (पैदा होता है, नष्ट होता है) इत्यादि प्रतीति क्यों कर होती है? उसका उत्तर तो यह है कि नेत्रादि उपाधियों के कारण ही वैसी प्रतीति होती है । जिस प्रकार निर्मल स्फटिक, जपाकुसुम आदि की सन्निधि से रक्त वर्ण का भासित होता है अथवा एक ही व्यापक आकाश घट-मठादि उपाधियों के कारण विभक्त हुआ-सा ज्ञात होता है, उसी प्रकार एक ही शुद्ध ज्ञान, जो साक्षात् आत्मस्वरूप ही है, नेत्रादि उपाधियों के संसर्गदोष के कारण उसके जन्म, विनाश तथा रूप, रस आदि भेदों की प्रतीति होती है ।। १५ ।। दृश्यत्वादहमित्येष नात्मधर्मो घटादिवत् । तथाऽन्ये प्रत्यया ज्ञेया दोषाश्चात्माऽमलो ह्यतः ।।१६।। दृश्यत्वादिति—'मैं' यह प्रतीति भी घट-पटादि के समान दृश्य रहने से उसे 'आत्मा' का धर्म नहीं कह सकते । उसी तरह अन्यान्य दूसरी प्रतीतियाँ और राग-द्वेष आदि दोषों को भी समझना चाहिये । अतः 'आत्मा' निर्मल ही है ।। १६ ।। हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में प्रतिपादित आत्मा के अमलत्व को अधिक स्पष्ट करने के लिये कह रहे हैं—'अहम्' = मैं, यह प्रतीति भी दृश्य होने के कारण घट-पट आदि दृश्य पदार्थों के तुल्य आत्मा का धर्म नहीं है—अर्थात् आत्म- निष्ठ नहीं है, इसका बोध हमें 'अहमिति प्रत्ययः नात्मधर्मः दृश्यत्वात् घटादिवत्'—इस अनुमान से होता है । उसी १. ( भ. गी. ८।६ )
नान्यदन्यत्प्रकरणम् १०३ प्रकार अन्यान्य राग-द्वेषादि दोषरूप परिणाम (प्रत्यय, प्रतीतियाँ) भी आत्मधर्म (आत्मनिष्ठ) नहीं हैं, क्योंकि आत्मा तो निर्मल (अमल, मलरहित) है ॥ १६ ॥ सर्वप्रत्ययसाक्षित्वादविकारी च सर्वगः । विक्रियेत यदि द्रष्टा बुद्ध्यादीवाल्पविद्भवेत् ॥१७॥ सर्वेति—सभी प्रतीतियों का साक्षी होने से 'आत्मा' अविकारी और सर्वगत है। साक्षी आत्मा में भी यदि विकार माना जाय तो वह बुद्धि आदि के समान अल्पज्ञ हो होगा ॥ १७ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रश्न—अहंकार आदिकों में आत्मधर्मता के न होने पर भी आत्मा को शुद्ध (मलरहित) नहीं कह सकते, क्योंकि वह विकारी और परिच्छिन्न ज्ञात होता है, ऐसी स्थिति में उसे शुद्ध कैसे कहा जाय ? उत्तर—प्रश्नकर्त्ता के कथनानुसार आत्मा को यदि विकारी या परिच्छिन्न कहा जाय तो उसमें सर्व- साक्षिता नहीं बन पायेगी। वह बुद्धि, चित्त, मन की तरह अल्पज्ञ कहलायेगा। यहाँ पर मूलगत 'बुद्ध्यादि' शब्द से बुद्धिगत आभास को लक्षित किया गया है। अन्यथा बुद्ध्यादि तो स्वरूपतः अचेतन हैं, तथापि ज्ञान (वेदन) सम्बन्ध के कारण उनमें अल्पवित्त्व जो कहा गया है, वह उपपन्न नहीं हो सकेगा। विषय का अवभास कराने मात्र में उपक्षीण परिणाम वाली साभास बुद्धि जैसे पूर्व-पर अनुभूति, तदवस्था, तत्प्रचार का अनुसंधान नहीं कर पाती, क्योंकि वह विकारी है, उसी तरह द्रष्टा (आत्मा) को भी विकारी मानने पर वह भी पूर्वापर अनुभूति आदि का अनुसन्धान नहीं कर पायेगा, जिससे कोई व्यवहार ही नहीं चल पायेगा, अर्थात् समस्त व्यवहार ही लुप्त होने का प्रसंग प्राप्त होगा। अतः आत्मा यच्चयावत् समस्त प्रतीतियों का साक्षी होने से विकाररहित (अविकारी) और सर्वव्यापक (सर्वत्र व्याप्त, सर्वगत) है ॥ १७ ॥ न दृष्टिलुप्यते द्रष्टुश्चक्षुरादेर्यथैव तत् । नहि द्रष्टुरिति ह्युक्तं तस्माद्द्रष्टा *सदैकदृक् ॥१८॥ नेति—चक्षुरादि की दृष्टि के समान द्रष्टा (आत्मा) की दृष्टि का कभी लोप नहीं होता। अतएव भगवती श्रुति ने भी कहा है—"न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्"—अविनाशी होने से द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता—इसलिये द्रष्टा (आत्मा) सर्वदा एकरूप दृष्टृस्वभाव ही है ॥ १८ ॥ हृदयस्पर्शिनी शङ्का—बुद्धि के समान द्रष्टा आत्मा को भी अल्पवित् (अल्पज्ञ) ही कहा जाय, क्योंकि जो साधन के अधीन होता है, वह उत्पत्ति-विनाशवान् होता है। समा०—किन्तु यह कथन इसलिये उचित नहीं है कि जैसे परिणामिता (विकार) के कारण चक्षुरादि- द्वारक दृष्टि का लोप होता है, वैसे आत्मारूप द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता, क्योंकि वह (दृष्टि) अपरिणामी आत्मस्वरूप ही है। आत्मा की दृष्टि को श्रुति ने नित्य कहा है१। इस कारण द्रष्टा की दृष्टि का लोप न होना प्रमाणसिद्ध है। 'सदैकदृक्' का अर्थ है—एकरूप दृष्टि स्वभाव वाला। 'सदैकभुक्' पाठ यदि हो तो 'भुङ्क्ते पश्यति' इति भुक्=साक्षी अर्थ होगा। एवं च द्रष्टा, सदा साक्षी है ॥ १८ ॥ सङ्घातो वाऽस्मि भूतानां करणानां तथैव च । व्यस्तं वाऽन्यत्तमो वाऽस्मि को वाऽस्मीति विचारयेत् ॥१९॥ संघात इति—अतः मुमुक्षु पुरुष को यह विचारना चाहिये कि क्या मैं भूतों का संघातरूप स्थूल शरीर हूँ? अथवा इन्द्रियों (करणों) का संघात (समूह) हूँ? यदि मैं इन्द्रियों का संघातस्वरूप हूँ तो क्या मैं भिन्न-भिन्न प्रत्येक इन्द्रियरूप हूँ? अथवा उनमें से कोई एक हूँ? या उनसे पृथक् कोई अन्य हूँ? और यदि कोई अन्य हूँ, तो कौन हूँ? ॥१९॥ १. 'न हि द्रष्टुदृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् ।'—(बृ. उ. ४।३।२३)
- सदैव दृक्०—पाठान्तरम् ।
१०४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार आत्मा शुद्धस्वरूप सिद्ध होने पर भी उपाधि सम्बन्ध से वह अन्यथा प्रतीत होता है। अतः मुमुक्षु को चाहिए कि वह आत्मा को ब्रह्मरूप में समझने के लिए पदार्थ-विवेक (पदार्थों के यथार्थ स्वरूप का विचार) करे। आत्मा की प्रतीति 'अहम्'—(मैं) के आकार में होती है। इस प्रतीति में मैं कृश हूँ, स्थूल हूँ इस प्रकार भूतों के संघात रूप स्थूल शरीर का स्फुरण होता रहता है। उसी तरह 'मैं' द्रष्टा, श्रोता, रसयिता, काण, बधिर हूँ—इस प्रकार 'मैं' कहने से इन्द्रियों (करणों) का भी उल्लेख होता रहता है। अतः मुमुक्षु को चिन्तन करना होगा कि क्या 'मैं' भूतों का संघात (समूह-समुदाय) रूप स्थूल शरीर हूँ? या 'मैं' इन्द्रिय (करण) संघात रूप हूँ? यदि 'मैं' इन्द्रियों का संघात रूप हूँ, तो पृथक्-पृथक् इन्द्रियों के प्रति पृथक्-पृथक् अहंकार (प्रत्येक इन्द्रिय के प्रति अहंकार) होने से क्या 'मैं' पृथक्-पृथक् प्रत्येक इन्द्रियस्वरूप हूँ? अथवा एक ही शरीर में अनेक रूपों में रहने पर कदाचित् वैमत्य (विरोध) होने की भी संभावना रहने से भोगव्यवस्था नहीं बन पायेगी, इस कारण उन इन्द्रियों में से कोई एक हूँ? या इन्द्रिय संघात से भिन्न कोई अन्य हूँ, उन सबका अधिष्ठाता हूँ? यदि उनमें से ही कोई अन्यतम हूँ, तो क्या अन्तःकरण, प्राण आदि में से ही कोई एक हूँ? किंवा उनका साक्षी होकर उनसे विलक्षण स्वरूप का हूँ? इस रीति से विचार करना चाहिए ॥ १९ ॥ व्यस्तं नाहं समस्तं वा भूतमिन्द्रियमेव वा । ज्ञेयत्वात्करणत्वाच्च ज्ञाताऽन्योऽस्माद्घटादिवत् ॥२०॥ व्यस्तमिति—विचारने पर यह निश्चय अवश्य होगा कि मैं भूत नहीं हूँ, तथा इन्द्रिय नहीं हूँ, तथा व्यस्त अथवा समस्त भी नहीं हूँ, क्योंकि ये सब घट आदि के समान ज्ञेय और करण रूप हैं। मैं तो इनका ज्ञाता हूँ। अतः मैं इनसे भिन्न हूँ ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार विचार करने पर पदार्थविवेकरूप फल की प्राप्ति होती है। उपर्युक्त रीति से विचारने पर मुमुक्षु को यह निश्चय हो जाता है कि 'मैं' न भूत हूँ, न इन्द्रिय हूँ तथा न व्यस्त (पृथक्-पृथक्) हूँ, न समस्त हूँ, क्योंकि ये सभी घटादि के समान अचेतन (जड़) हैं, और कुठार आदि के समान कारणरूप (साधनरूप) हैं। तस्मात् 'मैं' तो इन सबका ज्ञाता हूँ, चेतन हूँ, इन सभी अन्तःकरण, प्राण आदि जड़ पदार्थों से भिन्न हूँ, इस प्रकार द्रष्टा और दृश्य का अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा आलोचन करते हुए विवेक करना चाहिए ॥ २० ॥ आत्मागनेरिन्धनं बुद्धिरविद्याकामकर्मभिः । दीपिता प्रज्वलत्येषा द्वारैः श्रोत्रादिभिः सदा ॥२१॥ आत्मागनेरिति—आत्मा रूप अग्नि का ईंधन—'बुद्धि' है। यह बुद्धिरूप ईंधन अविद्या, काम और कर्मों से दीपित होकर श्रोत्रादि के द्वारा सर्वदा प्रज्वलित होता रहता है ॥ २१ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक से पदार्थविवेक करने की रीति बताई गई। अब २१ से २६ तक के श्लोकों से साक्षी और साक्ष्य का अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा आलोचन करते हुए अवस्थात्रय (तीन अवस्थाओं) का विवेक और उसके द्वारा तत्साक्षी तुरीय का अधिगम करने का (ज्ञान का) प्रकार बता रहे हैं—अग्नि को किसी विशेष आकार में अभिव्यक्त करने में कारण ईंधन होता है। उसी तरह आत्मचैतन्य को विशेष आकार में अभिव्यक्त करनेवाली यह 'बुद्धि' है। अग्नि- स्थानापन्न आत्मचैतन्य को और ईंधनस्थानापन्न बुद्धि को समझना चाहिए। बुद्धि को ईंधनस्थानापन्न इसलिए कहते हैं कि जैसे काष्ठादि ईंधन के द्वारा अग्नि को प्रकाशित किया जाता है, वैसे ही यह बुद्धि, आत्मचैतन्य को व्यवहार- योग्य बनाती है। 'इध्यते प्रकाश्यते व्यवहारयोग्यः क्रियते अनया इति इन्धना बुद्धिः'। जैसे वायु के कारण अग्निस्थित ईंधन प्रज्वलित हो उठता है, उसी तरह अविद्या काम कर्म के कारण उत्तेजित (दीपित) हुई वह बुद्धि, चैतन्यग्रस्त होने
नान्यदन्यत्प्रकरणम् १०५ से प्रकाशित हो जाती है, जैसे अभिव्यक्त हुए अग्नि से जलता हुआ ईंधन प्रकाशित होता है। और गवाक्षों से निर्गत दीर्घ प्रभा जैसे सर्वदा प्रकाशित होती रहती है, वैसे ही श्रोत्रादि के माध्यम से निकलनेवाली यह बुद्धि सर्वदा प्रज्वलित (प्रकाशित) होती रहती है। इस प्रसंग में अग्नि-ईंधन के रूपक से निर्देश करने का प्रयोजन यह है कि व्यवहार-काल में विषयग्रहण के होम करने की भावना की जा सके, इस प्रकार की भावना करने से फल यह होगा कि विषयों के प्रति होनेवाली आसक्ति की निवृत्ति होगी। एवंच अविद्या आदि के द्वारा प्रेरित होनेवाली बुद्धि का परिणत होते रहना ही जागरित अवस्था है ।। २१ ।। दक्षिणाक्षिप्रधानेषु यदा बुद्धिविचेष्टते । विषयैर्हविषा दीप्ता* ह्यात्माग्निः स्थूलभुक्त्तदा ॥२२॥ दक्षिणाक्षीति—जिस समय विषय रूपी हवि से दीपित हुई बुद्धि, दक्षिण नेत्रादि इन्द्रियों में चेष्टा करती है, उस समय आत्मस्वरूप अग्नि स्थूल विषयों का भोग करता है अर्थात् भोक्ता होता है ।। २२ ।। हृदयस्पर्शिनी जिस समय विषयरूपी हवि से दीप्त हुई बुद्धि, दक्षिण नेत्रादि इन्द्रियों में चेष्टा (व्यापार) करती है, अर्थात् हविःस्थानापन्न विषयों से दीप्त होती है, यानी विषय को व्याप्त करके उस विषय के आकार में प्रकाशित होती है, उस समय आत्मारूप अग्नि, स्थूल विषयों का भोक्ता होता है, तब उसे 'जागता है' कहते हैं अर्थात् यही बुद्धि की अवस्था, जाग्रत् अवस्था (जागरण) शब्द से कही जाती है। पुरुष के दक्षिण अंग की श्रेष्ठता प्रसिद्ध है, इस कारण अक्षि में 'दक्षिण' विशेषण दिया गया है ।। २२ ।। हूयन्ते तु हवींषीति रूपादिग्रहणे स्मरन् । अरागद्वेष आत्माग्नौ जाग्रद्दोषैर्न लिप्यते ॥२३॥ हूयन्तेत्विति—जो पुरुष रूपादि विषयों के ग्रहण करते समय राग-द्वेष रहित ( वीतराग ) होकर यह स्मरण रखता है कि आत्मारूप अग्नि में हवियों का होम (हवन) किया जा रहा है, तब वह पुरुष जाग्रत् अवस्था के दोषों से लिप्त नहीं होता है ।। २३ ।। हृदयस्पर्शिनी रूपक के द्वारा निरूपण करने का फल बता रहे हैं—विषयों का ग्रहण करते समय शोभन-अशोभन के अध्यास (मिथ्या ज्ञान) से होनेवाले राग-द्वेषों से शून्य रहकर जो व्यक्ति यह स्मरण रखता है कि इन विषयरूप हवियों का आत्मारूप अग्नि में हवन (होम) किया जा रहा है, उसे जाग्रत् अवस्था के दोषों का लेप नहीं हो पाता । अर्थात् वह व्यक्ति विषयोपलब्धिनिबन्धन पुण्य-अपुण्यलक्षण जाग्रत् दोषों से लिप्त (संश्लिष्ट = सम्बद्ध) नहीं होता ।। २३ ।। मानसे तु गृहे व्यक्तः† सोऽविद्याकर्मवासनाम् । पश्यंस्तैजस आत्मोक्तः स्वयंज्योतिः प्रकाशिता‡ ॥२४॥ मानसेत्विति—अब स्वप्नावस्था को बता रहे हैं। तदनन्तर मनोरूप घर में अभिव्यक्त होकर अविद्या से उत्पन्न कर्मवासना को देखने के कारण 'आत्मा' को तैजस कहते हैं। उस समय यह स्वयंज्योति आत्मा ही विषयों का प्रकाशक होता है। क्योंकि उस समय सूर्यादि बाह्य ज्योतियों का अभाव रहता है ।। २४ ।। हृदयस्पर्शिनी जागरित अवस्था को बताने के बाद अब स्वप्नावस्था को बता रहे हैं—मनोरूप गृह (मनः परिणामाेपाधि- रूप मानसगृह) में अभिव्यक्त हुआ वह आत्मा, अविद्या से उत्पन्न हुए कर्म से उद्बुद्ध हुई वासना (अविद्याजनित कर्म- वासना) को विषय के आकार में देखनेवाला आत्मा 'तैजस' शब्द से कहा जाता है। क्योंकि वह तेज में (तेजोरूप वासनामय विषय में) अभिव्यक्त होता है। उस समय भासमान कर्म, सुख-दुःख आदि सभी मनोमात्र ही होते हैं। उस
- दीप्त आत्मा। † व्यक्ता अविद्याकर्मवासनाः । ‡ प्रकाशिताः—पाठान्तरम् । १४
१०६ उपदेशसाहस्री समय वे सब दृश्यरूप में ही स्थित रहते हैं। उस समय आत्मा की कोई अन्य उपाधि भी नहीं होती। उस समय सूर्यादि बाह्य ज्योतियों का भी अभाव रहता है। उस समय स्वयंज्योति आत्मा ही विषयों का प्रकाशक (साक्षी) होता है। इसी अभिप्राय को श्रुति भी बता रही है—"दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च१", "अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति२" इति ॥ २४ ॥ विषया वासना वापि चोद्यन्ते नैव कर्मभिः । यदा बुद्धौ तदा ज्ञेयः प्राज्ञ आत्मा ह्यनन्यदृक् ॥२५॥ विषया इति—जिस समय कर्मों के द्वारा विषय (स्थूल) तथा वासनाओं (सूक्ष्म) की भी अन्तःकरण में उद्भूति न हो, उस समय आत्मा (अपने) व्यतिरिक्त विषय अथवा वासना को न देखने के कारण उसे (आत्मा को) प्राज्ञ समझना चाहिये ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी स्वप्नावस्था बताने के बाद अब सुषुप्ति अवस्था को बताते हैं—जिस समय बुद्धि (अन्तःकरण) में कर्मों के द्वारा स्थूल विषय तथा सूक्ष्म वासनाएँ, जो स्वप्न में दृश्य रहती हैं, उनका भी उद्बोध; न हो, उस समय वह अपने से भिन्न किसी भी विषय को या वासना को नहीं देखता है, इस कारण उसे अनन्यदृक् (अपरिच्छिन्नदर्शी) अर्थात् 'प्राज्ञ' शब्द से कहा जाता है। 'प्रज्ञातिशयात् तदा प्राज्ञः' इस व्युत्पत्ति से उसे 'प्राज्ञ' कहा गया है। उपर्युक्त तीनों अवस्थाओं को तथा तत्कालीन चैतन्य एवं उनके कोष और शरीर को समझने के लिए निम्नलिखित सरल प्रकार यह है— १. जाग्रत् अवस्था के समय स्थित चैतन्य—समष्टि को 'वैश्वानर' और चैतन्य—व्यष्टि को 'विश्व' कहते हैं, और उनका कोष 'अन्नमय' कोष और शरीर 'स्थूल शरीर' होता है। २. स्वप्न अवस्था के समय स्थित चैतन्य—समष्टि को 'सूत्रात्मा', और चैतन्य—व्यष्टि को 'तैजस' कहते हैं, और उनके तीन कोष 'मनोमय', 'प्राणमय', 'विज्ञानमय' होते हैं, और शरीर 'सूक्ष्म शरीर' होता है। ३. सुषुप्ति अवस्था के समय स्थित चैतन्य—समष्टि को 'ईश्वर' और चैतन्य—व्यष्टि को 'प्राज्ञ' कहते हैं, और उनका कोष 'आनन्दमय कोष' और शरीर 'कारणशरीर' होता है ॥ २५ ॥ मनोबुद्धीन्द्रियाणां च* ह्यवस्थाः कर्मचोदिताः । चैतन्येनैव भास्यन्ते रविणेव घटादयः ॥२६॥ मनोबुद्धीन्द्रियाणामिति—जिस प्रकार घटादि पदार्थ सूर्य से प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार कर्म के द्वारा उद्बुद्ध हुईं ये मन, बुद्धि और इन्द्रियों की अवस्थाएँ 'चैतन्य=आत्मा' से ही प्रकाशित की जाती हैं। मन की अवस्था 'स्वप्न', बुद्धि की अवस्था 'सुषुप्ति', और इन्द्रियों की अवस्था 'जाग्रत्' कहलाती है ॥ २६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार तीन अवस्थाओं तथा तदवस्थ आत्मा का द्रष्टा-दृश्यभाव से विवेचन करने के बाद अब अभिमानी सहित अवस्थात्रय के साक्षीरूप में विश्वावित्रय की अपेक्षा तुरीय (चतुर्थ) नित्यविज्ञप्ति (नित्यविज्ञान) स्वभाववाले प्रत्यक् आत्मा को बता रहे हैं— जिस प्रकार घट-पटादि पदार्थ, सूर्य (रवि) से प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार कर्म के द्वारा उद्बुद्ध होने- वाली ये मन, बुद्धि और इन्द्रियों की अवस्थाएँ आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित होती हैं। इन्द्रियों की अवस्था जागरण (जाग्रत्), मन की अवस्था स्वप्न, और बुद्धि की अवस्था यानी कारणावस्था सुषुप्ति कही जाती है ॥ २६ ॥ १. (बृ. उ. ४।३।१५, १६, २४, २७) २. (बृ. उ. ४।३।९,१४)
- या अव०—पाठान्तरम् ।
नान्यदन्यत्प्रकरणम् १०७ तत्रैवं सति बुद्धीज्ञं आत्मभासाऽवभासयन्। कर्ता तासां यदर्थास्ता मूढैरेवाभिधीयते ॥२७॥ तत्रेति—ये उक्त अवस्थाएँ 'आत्मा' में अध्यस्त हैं। अतः अपने सुख-दुःख का अवभास कराने वाली बुद्धियों को अपने प्रकाश (अपने चैतन्य के आभास) से प्रकाशित करनेवाला आत्मा, मूढ़ लोगों के द्वारा उनका कर्ता कहा जाता है ॥ २७ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर कोई कह सकता है कि यदि आत्मा निर्विकार ही साक्षी कहलाता है तो उसे बुद्धि आदि का कर्ता क्यों कहते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि उपरिनिर्दिष्ट तीनों अवस्थाएँ निर्विकार आत्मा में मोह से अध्यस्त हैं। अतः अपने सुख-दुःखावभास की कारणीभूत अवस्था सहित बुद्धियों को अपने प्रकाश (आत्मभास, स्वचैतन्याभास) से प्रकाशित करनेवाला आत्मा (ज्ञ), शास्त्राचार्योपदेश से रहित मूढ़ पुरुषों के द्वारा उनका कर्ता कहा जाता है। अर्थात् जिस आत्मा के सुख-दुःख का ज्ञान कराने के लिये बुद्धियों का स्वीकार किया गया है, उन बुद्धियों को यह आत्मा अपने प्रकाश से प्रकाशित करता रहता है, जिस कारण मूर्ख लोग उसे कर्ता कहा करते हैं। अर्थात् कर्म के कारण उद्भासित बुद्धयवस्थाओं का अनुगमन करनेवाले चिदाभास और आत्मा दोनों में विवेक न हो पाने से मूर्ख लोग उस आत्मा को ही 'दर्शनकर्ता' कहते हैं ॥ २७ ॥ सर्वज्ञोऽप्यत एव स्यात्स्वेन भासाऽवभासयन् । सर्वं सर्वक्रियाहेतोः सर्वकृत्त्वं तथाऽऽत्मनः ॥२८॥ सर्वज्ञ इति—अतएव अपने प्रकाश से सबको प्रकाशित करने के कारण वह सर्वज्ञ भी कहा जाता है और उसके सन्निधिमात्र से समस्त क्रियाओं की प्रवृत्ति होने के कारण उसमें सर्वकर्तृत्व माना जाता है ॥ २८ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार अज्ञान और उसके कार्य में प्रतिबिम्बित हुए चिदात्मा का ज्ञातृत्व उपाधिनिबन्धन होता है, यह बताकर अब मायारूप उपाधि में प्रतिबिम्बवशात् उसी की सर्वज्ञता, और सर्वकर्तृता को बता रहे हैं—स्वात्माश्रयविषयक सम्पूर्ण माया (विवर्त) को आदित्य (प्रकाश) के समान अविकृत स्वचैतन्य से भासित करने के कारण उसे सर्वज्ञ कहा जाता है। सर्व विषयों के ज्ञानकर्ता के रूप में उसे सर्वज्ञ नहीं कहा जाता। उसी तरह आत्मा का सर्वकर्तृत्व भी माया- निबन्धन ही है। अर्थात् सन्निधिमात्र से भ्रामक के समान सर्व कारकों की प्रवृत्ति कराने में कारण होने से उसका सर्वकर्तृत्व माना जाता है ॥ २८ ॥ सोपाधिश्चैवमात्मोक्तो निरुपाख्योऽनुपाधिकः । निष्कलो निर्गुणः शुद्धस्तं मनो वाक्च नाप्नुतः ॥२९॥ सोपाधिरिति—इस प्रकार से सोपाधिक आत्मा का निरूपण किया गया। किन्तु निरुपाधिक आत्मा तो अकथनीय, निष्कल, निर्गुण और शुद्ध है। उसे मन और वाणी भी प्राप्त नहीं कर पाते ॥ २९ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार तीनों अवस्थाओं के साक्षी होने से विविक्त, शुद्ध, चिद्रूप आत्मा में ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, सर्व- ज्ञत्वादि व्यवहारास्पदत्व मायोपाधिवशात् है, स्वाभाविक नहीं है, इसी उक्त अर्थ का अनुवाद करके 'वह स्वाभाविक बिम्बतुल्य आत्मस्वरूप क्या है ? इसके उत्तर में कह रहे हैं कि सोपाधिक आत्मा का वर्णन तो किया गया, और निरुपाधिक (निरुपाख्य), जो विषयतया उल्लेख के योग्य नहीं होता, उसे अनुपाधिक अर्थात् सर्वव्यवहारातीत कहते हैं। अर्थात् वह गुण, अवयव से रहित होने के कारण शुद्ध (कूटस्थ) है। उसकी निरुपाख्यता यही है कि उसे मन और वाणी प्राप्त नहीं कर सकते ॥ २९ ॥
१०८ उपदेशसाहस्री चेतनोऽचेतनो वापि कर्ताऽकर्ता गतोऽगतः । बद्धो मुक्तस्तथा चैकोऽनेकः शुद्धोऽन्यथेति वा ॥३०॥ चेतन इति—भिन्न-भिन्न मतवादी विद्वान् आत्मा को चेतन या अचेतन, कर्ता या अकर्ता, व्यापक या अव्यापक, बद्ध या मुक्त, एक या अनेक तथा शुद्ध या शबल इस प्रकार भिन्न-भिन्न रीति से बताते हैं ।। ३० ।। हृदयस्पर्शिनी मन और वाणी से उसकी अगम्यता को बताते हैं—'अहम्' यहाँ पर शब्द और प्रत्यय दोनों पराग्व्यावृत्त हुए प्रत्यक् आत्मा को बताते हैं, इसमें किसी का विवाद नहीं है। ये दोनों (शब्द और प्रत्यय) शुद्ध आत्मा को ही यदि विषय करते हों तो प्रत्यक्षतः उपलब्ध घटादि के समान किसी भी वादी को विप्रतिपत्ति ही नहीं होगी। किन्तु आत्मा के संबन्ध में वादियों की अनेक विप्रतिपत्तियाँ हैं। वेदबाह्य लोगों का कहना है कि देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि में से अन्यतम अचेतन (जड़) या चेतन कोई भी 'आत्मा' है। वेदवादियों का कहना है कि उपर्युक्त समस्त अचेतनों (जड़ों) से भिन्न (अन्य) कोई चेतन आत्मा है। उनमें भी नैयायिक लोग आत्मा को कर्ता के रूप में बताते हैं और सांख्य वाले उसे अकर्ता कहते हैं। जैन दार्शनिक आत्मा को शरीरपरिमाण का मानते हैं। किन्तु रामानुज आदि वैष्णवाचार्य उसे अणु-परिमाण कहते हैं। कुछ लोग जीव को बद्ध और ईश्वर को मुक्त कहते हैं। तथा वेदान्ती केवल 'एक आत्मा' स्वीकार करते हैं। किन्तु सांख्य-नैयायिकादि अनेक आत्माओं को मानते हैं। वेदान्ती और सांख्यवादी आत्मा को शुद्ध (रागादिगुण रहित) कहते हैं, किन्तु नैयायिकादि लोग उसके विपरीत अर्थात् आत्मा को रागादि गुण सहित (शबल) बताते हैं। इस प्रकार एक आत्मा को लेकर भिन्न-भिन्न वादियों के भिन्न-भिन्न मत उपलब्ध होते हैं ।। ३० ।। अप्राप्यैव निवर्तन्ते *वाचो धीभिः सहैव तु । निर्गुणत्वात् क्रियाभावाद्विशेषणामभावतः ॥३१॥ अप्राप्यैवेति—आत्मा, निर्गुण होने के कारण निष्क्रिय है, यानी उसमें क्रिया का अभाव है तथा जाति आदि स्वगत और गो-सुवर्ण आदि बाह्य विशेषणों (विशेषों) का भी उसमें अभाव है। अतएव बुद्धि के सहित वाणी (शब्द) उसे (आत्मा को) प्राप्त किये बिना ही लौट आती है ॥ ३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी वाणी और बुद्धि, आत्मतत्त्व तक बिना पहुँचे ही क्यों परावृत्त होती (लौटती) हैं ? वास्तविक प्रवृत्तिद्वार (प्रवृत्तिबीज) के प्राप्त न होने से उन्हें वापस आना पड़ता है। क्योंकि आत्मा निर्गुण है, उसमें क्रिया का अभाव है, तथा जाति आदि स्वगत एवं गो-सुवर्णादि बाह्य विशेषणों का भी अभाव है। अभिप्राय यह है कि आत्मा रूपादि- गुणों से शून्य होने के कारण बाह्येन्द्रियद्वारक बुद्धि के द्वारा उसकी प्राप्ति नहीं हो पाती, और मन भी बाह्येन्द्रियों से उपलब्ध कराये गये विषयों के अतिरिक्त विषयों को स्वतन्त्रतया प्राप्त करने (देखने) में असमर्थ है। अतः गोचर न हो पाने वाले आत्मा को वह (मन) नहीं प्राप्त कर पाता। अथवा आत्मा, निष्क्रिय होने से मन का विषय नहीं हो पाता। जैसे घट आदि वस्तुओं के द्वारा अनुगत रहने पर भी क्रियाहीन अनवच्छिन्न (अपरिमित) आकाश में किसी अपूर्व (नवीन) धर्म की उत्पत्ति नहीं होती, वैसे ही क्रियाहीन अनवच्छिन्न आत्मवस्तु में किसी क्रियावान् की अनुगति होने मात्र से अपूर्व धर्म की उत्पत्ति का होना संभव नहीं है। व्यावहारिक ज्ञान तो मनःसंयोगजन्य होता है। आत्मा तक मन की पहुँच ही न हो पाने से उसकी मन से भी अवगति नहीं हो पाती। तथा बाह्य गोधनादि विशेष अथवा स्वगत जात्यादिरूप प्रवृत्तिनिमित्तों के न होने से शब्द भी आत्मा तक नहीं पहुँच पाता। क्योंकि शब्द की प्रवृत्ति में हेतुभूत षष्ठी आदि विभक्तियों और बुद्धि की प्रवृत्ति में हेतुभूत रूपादि के वस्तुतः न होने पर भी आरोपित रूप तथा षष्ठी आदि विभक्तिसम्बन्ध के कारण समस्त व्यवहार होता रहता है। आत्मा के विषय में वादियों के जितने भी मत हैं, वे सब अयथाभूत आत्मा तक ही सीमित हैं, अतः 'अहम्' यह शब्द-प्रत्यय भी शुद्ध आत्मा को बताने
- वचो०—पाठान्तरम् ।
नान्यदन्यत्प्रकरणम् १०९ में समर्थ नहीं हैं। श्रुति भी यही कह रही है—"न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा१" इति । तथा "यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह२" इति ॥ ३१ ॥ व्यापकं सर्वतो व्योम मूर्तेः सर्वैर्वियोजितम् । यथा तद्विद्विहात्मानं *विद्याच्छुद्धं परं पदम् ॥ ३२ ॥ व्यापकमिति—जैसे व्यापक आकाश, सम्पूर्ण मूर्त पदार्थों से सर्वथा सम्बन्धशून्य है, वैसे ही वेदान्त के सिद्धान्त में आत्मा को शुद्ध परब्रह्मस्वरूप समझो ॥ ३२ ॥ हृदयस्पर्शिनी जब कि आत्मा, किसी शब्द का, प्रत्यय का, वाणी का—किसी प्रमाण का विषय ही नहीं है, तो उसे वेदान्त-वेदनीय (वेद्य) कैसे कहा जाय ? उत्तर में कहा जाता है कि लक्षणा का ही एक मार्ग है, जिससे वह जाना जाता है। जिस प्रकार व्यापक आकाश, सम्पूर्ण मूर्त पदार्थों से सर्वथा सम्बन्धशून्य है, उसी प्रकार यहाँ वेदान्त सिद्धान्त में शुद्ध अर्थात् अवस्थात्रयोपाधि से रहित और अवस्थात्रय के साक्षीरूप से लक्षित परब्रह्मस्वरूप आत्मा को समझना चाहिये ॥ ३२ ॥ दृष्टं हित्वा स्मृतिं तस्मिन्सर्वग्रश्च तमस्त्यजेत् । सर्वदृग्ज्योतिषा युक्तो दिनकृच्छार्वरं यथा ॥ ३३ ॥ दृष्टमिति—जिस प्रकार भगवान् सूर्य, रात्रि के अन्धकार को नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार मुमुक्षु पुरुष जाग्रत् अवस्था में दृष्ट (देखे हुए) पदार्थों का त्याग करे, और उनकी स्मृति (स्मरण = यानी स्वप्न में देखे हुए पदार्थों) का भी त्याग करे, और आत्मा के सर्वप्रकाशक तेज से युक्त होकर सबको अपने में लीन करने वाले (सुषुप्ति अवस्था के) अज्ञान का भी परित्याग कर दे ॥ ३३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार आत्मतत्त्व का निश्चय रहने पर पुनः अवस्थात्रय (तीन अवस्थाओं) का अभिमान वह नहीं कर सकेगा। द्रष्टा, श्रोता, मन्ता इस प्रकार एक-एक क्रिया से उसे सम्बद्ध समझने का अभिमान न करे। अर्थात् दर्शनादि की अवस्था में भी आत्मा को निर्विशेष ही समझे। उस दृष्ट (देखे हुए) पदार्थ की स्मृति (स्वप्न) का भी त्याग करे। अर्थात् मैं स्वप्न में देव हुआ, व्याघ्र बना, इस प्रकार के अभिमान का त्याग करे। स्वप्न भी संस्कारद्वारक (संस्कार के कारण) होने से उन्हें भी 'स्मृति' शब्द से कहा गया है। यह स्वप्न (स्मृति) की वासना से विशिष्ट दृश्य, मन का ही विकार है, आत्मा का नहीं, इस प्रकार से असंगत (असम्बद्ध) आत्मा का अनुसन्धान करते रहना चाहिये। उसी तरह सुषुप्ति (तम) का भी त्याग करे। यह तम सब को ग्रस लेता है, अतः उसे 'सर्वग्रस्' कहते हैं। 'सर्वं ग्रसतीति सर्वग्रः' । यह आत्मा, सुषुप्ति का भी अवभासक है, अतः उसका प्रकाशस्वभाव कभी भी लुप्त नहीं होता। उसे मूढ या ज्ञानवान् नहीं समझना चाहिये। अतः जिस प्रकार रात्रि के अन्धकार को सूर्य नष्ट कर देता है, उसी प्रकार आत्मजिज्ञासु व्यक्ति जाग्रत् अवस्था में देखे हुए पदार्थ को त्यागकर उनकी स्मृति अर्थात् स्वप्नदृष्ट पदार्थों का त्याग करे, पश्चात् आत्मा के सर्वप्रकाशक तेज से युक्त होकर सबको अपने में लीन करने वाले सुषुप्ति अवस्था के अज्ञान का भी त्याग कर दे। इन तीनों अवस्थाओं का त्यक्ता कौन है ? उत्तर यह है कि सर्वसाक्षी प्रत्यगात्मा जो ज्योति (ब्रह्म) के साथ एकीभूत है। क्योंकि 'ज्योतिषां ज्योतिः३' के द्वारा ब्रह्म को बताया गया है। इस रीति से अद्वयानन्दस्वभाव ही आत्मा सिद्ध होता है ॥ ३३ ॥ ─────────────────────── १. ( मुं० उ० ३।१।८ ) २. ( तै० उ० २।९ ) ३. ( मुं० उ० २।२।९ )
- विन्द्यात्० पाठान्तरम् ।
११० उपदेशसाहस्री रूपस्मृत्यन्धकारार्थाः प्रत्यया यस्य गोचराः। स एवात्मा समो द्रष्टा सर्वभूतेषु सर्वगः ॥३४॥ रूपेति—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के पदार्थ जिसके विषय हैं, वही समस्त भूतों में व्याप्त, सर्वगत, निर्विशेष, साक्षी 'आत्मा' है ॥ ३४ ॥ हृदयस्पशिनी रूप, स्मृति, अन्धकार, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, आदि पदार्थ जिन प्रत्ययों के विषय हैं, वे प्रत्यय भी जिस साक्षी के प्रतिभास्य (गोचर) होते हैं, वही आत्मा है, वही समस्त भूतों में व्याप्त रहने वाला द्रष्टा है, तथापि वह निर्विशेष (सम) है, क्योंकि वह परिच्छेदरहित (सर्वग) है ॥ ३४ ॥ आत्मबुद्धिमनेाक्षार्थविषयालोकसङ्गमात् । विचित्रो जायते बुद्धेः प्रत्ययोऽज्ञानलक्षणः ॥३५॥ आत्मेति—'आत्मा' को निर्विशेष बताया गया है तो विचित्र प्रकार के ज्ञान क्यों होते हैं ? इसका उत्तर यह है कि आत्मा, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, विषय और प्रकाश का संयोग होने से अज्ञानरूप उपाधि के कारण बुद्धि से विविध प्रकार के ज्ञान हुआ करते हैं ॥ ३५ ॥ हृदयस्पशिनी यदि आत्मा निर्विशेष (समस्त विशेषताओं से रहित) है, तो विविध प्रकार के ज्ञान (विचित्र संसारप्रत्ययो- दय) किस प्रकार होते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में कहा गया है कि आत्मा, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, विषय और प्रकाश का संयोग होने पर अज्ञानरूप उपाधि के कारण बुद्धि से नाना प्रकार के ज्ञान होते हैं। यहाँ ज्ञातव्य यह है—आत्मा को असंग बताया जाता है। जब कि वह असंग है, तब उससे किसी का भी सम्बन्ध होना कभी संभव ही नहीं हो सकता। तथापि यहाँ पर बुद्धि आदि के साथ उसका संबंध बताया जा रहा है, वह कैसे संगत हो सकता है ? उसका उत्तर यही होगा कि वास्तव में आत्मा के साथ उनका सम्बन्ध नहीं है, तथापि अज्ञानरूप उपाधि के कारण कल्पित संबंध माना जाता है, उस कारण यह भेदज्ञान होता है। कोई भी ज्ञान, आत्मा के बिना तो होता ही नहीं, अतः उसका संबंध तो मानना ही पड़ेगा। बुद्धि, ज्ञान का आश्रय है। मन, साधारण कारण है। इन्द्रियाँ, विशेष कारण हैं। विषय, निमित्त कारण है। प्रकाश के बिना वस्तु की प्रतीति होती नहीं, इसलिये वह भी उसके ज्ञान में कारण है। एवं च अविद्यापरिकल्पित उपाधियों का और आत्मा का विवेक उपलब्ध न होने से अनर्थात्मक विचित्र संसार की प्रतीति होती रहती है ॥ ३५ ॥ विविच्यास्मात्स्वमात्मानं *विद्याच्छुद्धं परं पदम् । द्रष्टारं सर्वभूतस्थं समं सर्वभयातिगम् ॥३६॥ विविच्येति—मुमुक्षु पुरुष को चाहिये कि वह बुद्धि आदि के संघात से आत्मा का विवेक करे यानी आत्मा को पृथक् समझे। उसे शुद्ध, साक्षी, सर्वभूतान्तर्यामी, निर्विशेष (सम) और सर्वभयातीत प्राप्तव्य स्थान समझे ॥ ३६ ॥ हृदयस्पशिनी अविद्या और उसकी कार्यरूप उपाधियों के साथ आत्मा का विवेक (भेद) उपलब्ध न हो सकने से ही संसार का प्रतिभास हुआ करता है, यह निश्चित हो जाने पर मुमुक्षु का कर्तव्य बताते हैं—इस बुद्धि आदि के संघात से विवेक करके मुमुक्षु पुरुष को अपने परमप्राप्तव्य, शुद्ध, साक्षी, सर्वभूतान्तर्यामी, निर्विशेष, सर्वभयातीत (आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये) ॥ ३६ ॥
- विन्द्यात्०—पाठान्तरम् ।
नान्यदन्यत्प्रकरणम् १११ समस्तं सर्वगं शान्तं विमलं व्योमवत्स्थितम् । निष्कलं निष्क्रियं सर्वं नित्यं द्वन्द्वैर्विर्वाजितम् ॥३७॥ समस्तमिति—सर्वस्वरूप, सर्वगत, शान्त, निर्मल, आकाश की तरह सर्वत्र व्याप्त, निरवयव (निष्कलं), निष्क्रिय, सर्वमय, नित्य एवं सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से रहित इस प्रकार से आत्मा को समझना चाहिये ॥ ३७ ॥ हृदयस्पर्शिनी उसी वेद्य आत्मस्वरूप को पुनः अन्य विशेषणों से युक्त करके बता रहे हैं—सर्वस्वरूप, सर्वगत, शान्त, निर्मल, आकाश के समान सर्वत्र स्थित, निरवयव, निष्क्रिय, सर्वमय, नित्य, एवं सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से रहित आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। मूल में ‘समस्त’ और ‘सर्व’ शब्द प्रयुक्त हुए देखकर पुनरुक्ति की शंका नहीं करनी चाहिये। क्योंकि 'समस्त' शब्द 'आत्मा' को और 'सर्व' शब्द 'ब्रह्म' को बता रहे हैं अतः पुनरुक्ति नहीं है। यहाँ पर विधि-मुखेन और निषेधमुखेन जिन विशेषों का निर्देश किया गया है, उन सबका ‘त्वम्’ पदार्थ ‘साक्षी’ में, और ‘तत्’ पदार्थ-‘ब्रह्म’ में अनुसन्धान करके इन दोनों की तुल्यलक्षणता का निश्चय करके ‘तत्त्वमसि’ वाक्य से ‘अहं ब्रह्म’ इस प्रकार निश्चय कर ले ॥ ३७ ॥ सर्वप्रत्ययसाक्षी ज्ञः कथं ज्ञेयो मयेत्युत । विमृश्यैवं विजानीयाज्ज्ञानकर्म न वेति वा ॥३८॥ सर्वेति—सर्वविध प्रतीतियों का साक्षी जो ज्ञानस्वरूप आत्मा है, वह कैसा है ? वह मेरा ज्ञेय है या नहीं ? वह किसी प्रकार के ज्ञान का कर्म है या नहीं ? यह सब विचार करते हुए आत्मतत्त्व को जानना चाहिये ॥ ३८ ॥ हृदयस्पर्शिनी अपनी आत्मा के रूप में ही ब्रह्म को जाने, इस प्रकार जो बताया, उसी के सम्बन्ध में मुमुक्षु को पुनः कुछ और भी शिक्षा देते हैं—समस्त प्रतीतियों का साक्षी जो ज्ञानस्वरूप आत्मा है, वह कैसा है ? उसका विचार करना चाहिए। ‘कथं’ शब्द से सूचित ‘विमर्श’ को बता रहे हैं—वह आत्मा क्या घट आदि की तरह ज्ञेय है, अथवा नहीं ? यदि ज्ञेय हो तो क्या वह किसी प्रकार के ज्ञान का कर्म है, या नहीं ? इस प्रकार विचार कर ‘प्रत्यग्भूत अविषयत्वेन ज्ञात होनेवाला ब्रह्म है, वह किसी का विषय नहीं है’—इस रीति से आत्मतत्त्व को भी जानना चाहिए ॥ ३८ ॥ अदृष्टं द्रष्टृविज्ञातं दभ्रमित्यादिशासनात् । नैव ज्ञेयं मयाऽन्यैर्वा परं ब्रह्म कथंचन ॥३९॥ अदृष्टमिति—आत्मा दृश्य (दिखाई देने वाला) नहीं है, वह तो सबको देखने वाला (द्रष्टा) है, ‘जो ज्ञान का विषय (ज्ञेय) होता है, वह तो अल्प होता है’—ऐसा श्रुतिवचन है। अतः परब्रह्म मेरे अथवा किसी अन्य के द्वारा किसी प्रकार से भी ज्ञेय नहीं है ॥ ३९ ॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त रीति से विमर्श करने पर ब्रह्म और आत्मा के सम्बन्ध में जो ज्ञेयत्व पक्ष है, वह संभव नहीं हो सकता। ‘आत्मा दृश्य न होकर सबको देखनेवाला (द्रष्टा) है,’ ‘जो ज्ञान का विषय होता है, वह अल्प होता है’१ इत्यादि श्रुतिवाक्य होने के कारण परब्रह्म मेरे अथवा किसी अन्य के द्वारा किञ्चित् भी ज्ञेय नहीं है२। यदि उसे ज्ञेय कहेंगे तो उसमें अल्पत्व होगा और अल्पत्व होने पर अब्रह्मत्वापत्ति होगी ॥ ३९ ॥ स्वरूपाव्यवधानाभ्यां ज्ञानालोकस्वभावतः । अन्यज्ञानानपेक्षत्वाज्ज्ञातं *चैव सदा मया ॥४०॥ १. ‘‘यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणोरूपम्’’—(के० उ० ९) २. ‘‘अदृष्टमविज्ञातम्’’—( बृ० उ० ३।८।११ )
- ब्रह्म०—पाठान्तरम् ।
११२ उपदेशसाहस्री स्वरूपेति-आत्मा तो मेरा स्वरूप है और मुझसे सर्वथा व्यवधानरहित है, तथा वह चैतन्यप्रकाशस्वरूप है, इसलिये उसे किसी अन्य ज्ञान की अपेक्षा नहीं रहती। अतः वह सर्वदा मुझे ज्ञात ही है। क्योंकि वह स्वयंप्रकाश और निरावरण है। अतः वह नित्य ज्ञानस्वरूप है, किसी भी अवस्था में वह अज्ञात नहीं है ॥ ४० ॥ हृदयस्पशिनी उपर्युक्त श्लोक के अनुसार ज्ञेयत्व का उसमें संभव नहीं है, तो 'आत्मन्येवात्मानं पश्येत्' - आत्मा में ही आत्मा को देखे इत्यादि उपदेश कैसे किया है ? यह शंका होती है, उसके समाधान में कहते हैं कि अविषयत्वेन आत्म- तत्त्वविज्ञान का आविर्भाव मात्र होता है। आत्मतत्त्व को विषय बनाकर उसका ज्ञान नहीं होता । क्योंकि 'यस्यामतं- तस्य मतं यस्य न वेद सः' यह श्रुति है। ज्ञाता से भिन्न जो पदार्थ, वे अन्य देश आदि से व्यवहित और जड़ होते हैं, उनके लिये ज्ञान आदि का व्यवहार होता है। नित्य चैतन्यस्वरूप में ज्ञान होने का व्यवहार संभव नहीं, क्योंकि उसका तो स्वतः स्फुरण होता ही रहता है ॥ ४० ॥ नान्येन ज्योतिषा कार्यं रवेरात्मप्रकाशने । स्वबोधान्नान्यबोधेच्छा बोधस्यात्मप्रकाशने ॥४१॥ नान्येनेति-जिस प्रकार सूर्य को अपना स्वरूप प्रकाशित करने के लिये किसी अन्य ज्योतिर्मय पदार्थ (प्रकाश) की आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार बोध (ज्ञान) स्वरूप आत्मा को अपना बोध कराने के लिये आत्म- चैतन्य के अतिरिक्त किसी अन्य चैतन्य की आवश्यकता नहीं रहती ॥ ४१ ॥ हृदयस्पशिनी जैसे सूर्य को अपना स्वरूप प्रकाशित करने के लिए किसी अन्य ज्योतिर्मय पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही ज्ञानस्वरूप आत्मा को अपना ज्ञान (बोध) कराने के लिये आत्मचैतन्य के अतिरिक्त किसी अन्य चैतन्य की आवश्यकता नहीं रहती ॥ ४१ ॥ न तस्यैवान्यतोऽपेक्षा स्वरूपं यस्य यद्भवेत् । प्रकाशान्तरदृश्यो न प्रकाशो ह्यस्ति कश्चन ॥४२॥ न तस्येति-जिस पदार्थ का जो स्वरूप होता है, उसे अपने स्वरूप को प्रकाशित करने के लिये किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती। ऐसा कोई भी प्रकाश नहीं है, जो किसी अन्य प्रकाश से प्रकाशित होता हो ॥ ४२ ॥ हृदयस्पशिनी जो जिसका स्वरूप होता है, उसकी सिद्धि के लिए उसे किसी दूसरे की आवश्यकता नहीं रहती। ऐसा कोई भी प्रकाश नहीं है, जो किसी अन्य प्रकाश से प्रकाशित होता हो। अनुमान प्रयोग इस प्रकार होगा-'आत्मा न अन्यतो ज्ञानमपेक्षते तत्स्वरूपत्वात्, यद् यस्य स्वरूपं तत् न अन्यतस्तदपेक्षते, यथा प्रकाशरूपः सविता, न प्रकाशमन्यतोऽ- पेक्षते, तथा चायं, तस्मात्तथा। किंच- 'नात्मा प्रकाशान्तरदृश्यः, प्रकाशरूपत्वात्, आदित्यवत्' ॥ ४२ ॥ व्यक्तिः स्यादप्रकाशस्य प्रकाशात्मसमागमात् । प्रकाशस्त्वर्ककार्यः स्यादिति मिथ्यावचो ह्यतः ॥४३॥ व्यक्तिरिति-यदि यह कहें कि आत्मा, परप्रकाशय भले ही न हो किन्तु उसे स्वप्रकाशय तो कहना ही होगा, अर्थात् अपने प्रकाश का विषय तो वह होगा ही । किन्तु यह कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि जो वस्तु, प्रकाशशून्य (प्रकाशरहित ) होती है, उसी की अभिव्यक्ति, प्रकाशरूप वस्तु की सन्निधि होने पर हुआ करती है। इसलिये प्रकाश को सूर्य का कार्य समझना अर्थात् 'प्रकाश सूर्य का कार्य है' - यह वाक्य मिथ्या है ॥ ४३ ॥
नान्यदन्यत्प्रकरणम् ११३ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि परप्रकाश्य न होने पर भी (प्रकाशान्तर से दृश्य न रहने पर भी) आत्मा स्वप्रकाश्य (अपने प्रकाश का विषय-स्वरूपप्रकाशदृश्य) ही क्यों न होगा ? जैसे सूर्य, घट-पट आदि वस्तुओं को प्रकाशित करता हुआ अपने को भी प्रकाशित करता ही है, उसी प्रकार आत्मा भी दृश्य को प्रकाशित (अवभासित) करता हुआ स्वयं अपने को भी प्रकाशित करेगा। किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि जो वस्तु प्रकाशशून्य होती है, उसी की, प्रकाशस्वरूप वस्तु की सन्निधि में रहने पर अभिव्यक्ति हुआ करती है। अतः प्रकाश को सूर्य का कार्य कहना मिथ्या है ॥ ४३ ॥ यतोऽभूत्वा भवेद्यच्च तस्य तत्कार्यमिष्यते । स्वरूपत्वादभूत्वा न प्रकाशो जायते रखेः ॥४४॥ यत इति—जो वस्तु पहले नहीं है, किन्तु उत्तर क्षण में जिससे होती है, उसे उसका कार्य कहा जाता है। सूर्य का प्रकाश तो उसका अपना स्वरूप ही है। वह पहले नहीं था, बाद में उत्पन्न हुआ हो—यह बात नहीं है ॥ ४४ ॥ हृदयस्पर्शिनी जो वस्तु पहले न होकर बाद में जिससे होती है, वह उसका कार्य कही जाती है। किन्तु सूर्य का प्रकाश तो उसका अपना स्वरूप है। 'वह पहले नहीं था, बाद में उत्पन्न हुआ' यह नहीं कह सकते ॥ ४४ ॥ सत्तामात्रे प्रकाशस्य कर्त्ताऽऽदित्यादिरिष्यते । घटादिव्यक्तितो यद्वत्तद्वद्बोधात्मनोष्यताम् ॥४५॥ सत्तेति—जिस प्रकार प्रकाश के रहने से घट-पटादि पदार्थों की अभिव्यक्ति होती है। अतः सूर्य आदि को प्रकाश का कर्त्ता माना जाता है। उसी प्रकार भिन्न-भिन्न पदार्थों का ज्ञान होने के कारण आत्मा को बोध का कर्ता कह दिया करते हैं। किन्तु वास्तव में उसमें (आत्मा में) किसी प्रकार का कोई कर्तृत्व नहीं है ॥ ४५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि प्रकाशस्वरूप आदित्य (सूर्य) को प्रकाशक (प्रकाश करनेवाला), और बोध (ज्ञान) स्वरूप आत्मा को बोद्धा (ज्ञाता) कैसे कहा जाता है ? जिस प्रकार प्रकाश की सत्तामात्र से घट-पटादि वस्तुओं की अभिव्यक्ति होने के कारण सूर्य को प्रकाशक कहा जाता है, उसी प्रकार बोधस्वरूप आत्मा में स्वाध्यस्त वस्तु की सन्निधिमात्र रहने पर वह सबका ज्ञाता (बोधक) कहा जाता है, वास्तव में वह कर्ता नहीं है ॥ ४५ ॥ बिलात्सर्पस्य निर्याणे सूर्यो यद्वत्प्रकाशकः । प्रयत्नेन विना तद्वज्ज्ञाताऽऽत्मा बोधरूपतः ॥४६॥ बिलादिति—जिस प्रकार सर्प, बिल से बाहर जब निकलता है तब बिना किसी प्रयत्न के ही सूर्य, उसका प्रकाशक हो जाता है। उसी प्रकार बोधस्वरूप होने के कारण आत्मा भी किसी विकार को प्राप्त हुए बिना ही सभी का ज्ञाता होता है ॥ ४६ ॥ हृदयस्पर्शिनी अपने में (स्वगत) विकार हुए बिना ही आत्मा, अर्थप्रकाशक होता है, इसे सूर्य के दृष्टान्त से बताते हैं— जैसे सर्प अपने बिले से बाहर निकलता है, तब उसे प्रकाशित करने के लिए सूर्य को कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता, बिना प्रयत्न के ही वह सर्प को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार आत्मा बोधस्वरूप होने के कारण बिना प्रयत्न के ही (विकार को प्राप्त हुए बिना ही) ज्ञाता कहा जाता है ॥ ४६ ॥ १५
११४ उपदेशसाहस्री दग्धैवमुष्णः सत्तायां तद्वद्*बोधात्मनीष्यताम् । सत्येव यदुपार्थौ तु ज्ञाते सर्प इवोत्थिते ॥४७॥ दग्धैवमिति—जिस प्रकार उष्ण स्वभाववाला अग्नि, किसी बाह्य वस्तु के समीप रहने पर अपनी सत्ता- मात्र से उसका दाहक हो जाता है। उसी प्रकार बोध्य वस्तु के समीप रहने मात्र से आत्मा उसका बोद्धा कहलाता है। जैसे बिल के बाहर निकले हुए उपाधिभूत सर्प के ज्ञात होने पर ही सूर्य को उसका प्रकाशक कहा करते हैं। वैसे ही आत्मा का बोद्धृत्व भी औपाधिक ही है ॥ ४७ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा अर्थात् उपाधि के रहने पर ही ज्ञातृत्व व्यवहार, और उपाधि के न रहने पर उसका (ज्ञातृत्व व्यवहार का) न होना—इस अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा (‘तत्सत्त्वे तत्सत्त्वम्, तदभावे तदभावः’ यही अन्वय-व्यतिरेक का स्वरूप है) इस प्रकार ज्ञातृत्व औपाधिक है, यह बताने के लिये एक अन्य उदाहरण दे रहे हैं— जिस प्रकार उष्ण स्वभाववाला अग्नि दाह्य वस्तु के सन्निध रहने पर अपनी सत्तामात्र से उसका ( दाह्य वस्तु का ) दाहक होता है। अतः अग्नि में दाहकत्व औपाधिक कहा जाता है, उसी प्रकार बोध्य वस्तु की सन्निधि रहने पर अपनी सत्तामात्र से आत्मा में बोद्धृत्व (ज्ञातृत्व) समझना चाहिए। जिस तरह बिल से निकले हुए उपाधिभूत सर्प के ज्ञात होनेपर ही सूर्य उसका प्रकाशक कहा जाता है, सर्प के ज्ञात न रहने पर नहीं, उसी प्रकार उपाधि के (ज्ञेय पदार्थ के) ज्ञात होनेपर ही आत्मा को ज्ञाता कहा जाता है, अन्यथा नहीं । अतः आत्मा में ज्ञातृत्व ( बोद्धृत्व ) व्यवहार औपचारिक ही है ॥ ४७ ॥ ज्ञाताऽयत्नोऽपि तद्वज्ज्ञः कर्ता भ्रामकवद्भवेत् । स्वरूपेण स्वयं नात्मा ज्ञेयोऽज्ञेयोऽथवा ततः ॥४८॥ ज्ञातेति—जिस प्रकार प्रयत्न के बिना ही ज्ञानस्वरूप आत्मा सभी का ज्ञाता कहलाता है, उसी तरह भ्रामक (सूर्य और चुम्बक) के समान वह आत्मा कर्ता भी कहा जाता है। अतः स्वयं स्वरूप से तो आत्मा न ज्ञेय है और न अज्ञेय है ॥ ४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक से आत्मा के औपाधिक ज्ञातृत्व को सूर्य के दृष्टान्त से बताकर, उसी दृष्टान्त से उसका (आत्मा का) कर्तृत्व भी औपाधिक है—उसे बता रहे हैं। जिस प्रकार यह ‘ज्ञ’ अर्थात् ज्ञानस्वरूप आत्मा, बिना प्रयत्न के ही सबका ज्ञाता है, उसी प्रकार स्वगत किसी विशेष के न रहने पर भी (स्वगतविशेषशून्य होने पर भी) भ्रामक के समान केवल अपनी सत्तामात्र से सन्निहित कारकों को प्रेरित करता हुआ क्रिया का कर्ता कहा जाता है। ‘भ्रामक’ शब्द से सूर्य या चुम्बक (अयस्कान्त) दोनों समझे जाते हैं। क्योंकि सोये हुए पुरुषों को अपनी सत्तामात्र से जगाकर कार्य में प्रवृत्त करने के कारण सूर्य को ‘भ्रामक’ कहते हैं। उसी तरह अपनी सत्तामात्र से सन्निहित लोहखण्ड को अपनी ओर आकर्षित कर लेने के कारण ‘चुम्बक’ को भी ‘भ्रामक’ कहते है। इस प्रकार ‘व्यक्तिः स्यादप्रकाशस्य’—(१५/४३) से आरंभ कर प्रसंगप्राप्त आत्मा के ज्ञानकर्मत्व-अकर्मत्व के द्वारा समर्थित उसके (आत्मा के) अज्ञेयत्व पक्ष और ज्ञेयत्व पक्ष का अब उपसंहार कर रहे हैं। पूर्व श्लोक में बता चुके हैं कि जैसे भ्रामक स्वगतचलनशून्य होकर भी सन्निहित लौह का प्रेरक होता है, उसी तरह आत्मा निश्चल रहता हुआ भी चिदाभासोपेत मोहादि परिणाम की दृष्टि से उसमें कर्तृत्व व्यवहार किया जाता है। किन्तु वास्तव में वह तो निर्विशेष है, स्वभाव से ही वह अलुप्तप्रकाशस्वरूप वाला है। उस कारण वह स्वयं स्वरूपतः ही (असाधारण स्वभाव वाला होने से ही) ज्ञानक्रिया से व्याप्त अर्थात् ज्ञेय नहीं होता, तथा अज्ञेय भी नहीं रहता अर्थात् व्यवहित वस्तु के समान ज्ञानप्रकाशरहित भी नहीं है। ‘अथवा’ शब्द से बता रहे हैं कि वस्तुतः वह आत्मा निर्विकार होने से न किसी का ज्ञाता है, और चैतन्यस्वरूप होने से न किसी का अज्ञाता है। तथा अध्यस्त कारकों का अधिष्ठान होने से उसे कर्ता भी कह देते हैं, और निर्व्यापार रहने से उसे कर्ता नहीं भी मानते । एवंच यह आत्मा, ज्ञाता भी नहीं, कर्ता भी नहीं, न वह ज्ञेय है, और न अज्ञेय है, न कार्य है, न प्राप्य है, न हेय है, इस प्रकार उसकी सर्वविशेषशून्यता सिद्ध हो जाती है ॥ ४८ ॥
- बोद्धात्म०—पाठान्तरम्