भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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नान्यदन्यत्प्रकरणम् ९९ यह बात शास्त्र आदि के द्वारा ज्ञात हो जाने पर मुमुक्षु पुरुष क्यों कर्म करेगा ? अर्थात् कभी नहीं करेगा । उसके लिये क्रियाएँ निष्प्रयोजन ही हैं ॥ ७ ॥ जात्यादीन्संपरित्यज्य निमित्तं कर्मणां बुधः । कर्महेतुविरुद्धं यत्स्वरूपं शास्त्रतः स्मरेत् ॥८॥ जात्यादीनिति—ज्ञानी पुरुष 'कर्मों' की निमित्तभूत जाति आदि का सम्यक् प्रकार से त्याग कर कर्मरूप निमित्त के विरुद्ध जो आत्मा का स्वरूप है, उसका शास्त्र के अनुसार चिन्तन करे । 'ब्राह्मण वसन्त ऋतु में अग्नि का आधान करे'—इस विधिवाक्य में ब्राह्मण जाति ही अग्न्याधान करने में निमित्त है। अतः कर्मानुष्ठान में 'जाति' को ही निमित्त कहना होगा, किन्तु शुद्ध आत्मा में कोई जाति आदि नहीं है, इसलिये उसे कर्म के निमित्त के विरुद्ध कहा गया है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी तो क्या केवल क्रिया (कर्म) परित्याग करनेमात्र से विदेहकैवल्यरूप अकार्य की प्राप्ति हो जायगी ? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा जा रहा है कि बुद्धिमान् (पण्डित) पुरुष, कर्मों की निमित्तभूत जाति का अर्थात् जाति आदि के अभिमान का सम्यक् प्रकार से त्याग कर कर्म-निमित्त के उपमर्दक शुद्ध आत्मस्वरूप का शास्त्रानुसार चिन्तन करता रहे । तात्पर्य यह है कि 'वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत'—वसन्त ऋतु में ब्राह्मण अग्न्याधान करे, इस विधि के अनुसार अग्न्याधान में निमित्त 'ब्राह्मणत्व जाति' है । अतः कर्म के अनुष्ठान में निमित्त ब्राह्मणत्व जाति ही कही जायगी, किन्तु शुद्ध आत्मा में कोई जाति आदि नहीं है। अतः शुद्ध आत्मस्वरूप को कर्म की निमित्तभूत जाति आदि से विरुद्ध कहा गया है। एवञ्च कर्मपरित्याग करने मात्र से विदेहकैवल्य (मोक्ष) प्राप्त नहीं होगा, अपितु यथाशास्त्र विशुद्ध आत्मस्वरूप के चिन्तन करने से वह प्राप्त होगा ॥ ८ ॥ आत्मैकः सर्वभूतेषु तानि तस्मिंश्च खे यथा । पर्यगाद्व्योमवत्सर्वं शुक्लं दीप्तिमदिष्यते ॥९॥ आत्मैक इति—समस्त भूतों में आकाश के समान एक ही आत्मा व्याप्त है, तथा वे भूत भी उसी (आत्मा) में अध्यस्त हैं। क्योंकि 'स पर्यगाच्छुक्र' अर्थात् वह (आत्मा) सर्वगत, शुक्र अशरीरी, अक्षत, स्नायु आदि से रहित, शुद्ध और पापशून्य है। इस श्रुतिवचन के अनुसार आत्मा को आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त, शुद्ध और प्रकाशमय माना गया है ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी किस रूप के (किंलक्षण) आत्मा का चिन्तन करे ? और कौन-सा वह शास्त्र है, जिसके अनुसार चिन्तन करे ? उसके उत्तर में शास्त्रीय वाक्यों का उल्लेख करते हुए स्मर्तव्य आत्मस्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं—'आत्मैकः··· खे यथा ।' इस पूर्वार्ध से ईशावास्योपनिषद् के मन्त्र¹ के अर्थ को बताया गया है। और अग्रिम सार्धश्लोक से आठवें मन्त्र² के अर्थ को बताया है । सम्पूर्ण भूतों में 'मैं' ही एकमात्र आत्मा हूँ, भिन्न-भिन्न भूतों में भिन्न-भिन्न आत्मा (चेतन) नहीं है । तो क्या ये भूत, आत्मा के अधिकरणस्वरूप हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा कि ये भूत, आत्मा के अधिकरण नहीं हैं, प्रत्युत उस आत्मा में ही ये भूत अध्यस्त हैं, उससे पृथक् नहीं हैं। तथाच अपने (आत्मा) में अध्यस्त हुए समस्त विकारों में मणियों में, सूत्र के समान पिरोये हुए (अनुस्यूत) सत्तास्फूर्तिरूप आत्मा का विकारोप- मर्दपुरःसर अनुसन्धान करते रहना चाहिये । अन्तः (भीतर) सुषिर रूप से और बाहर अवकाश रूप से विद्यमान आकाश में जैसे भूतसम्बन्ध है, उसी प्रकार से समझना चाहिये । वह आत्मा सर्वगत, शुभ्र, अशरीरी, अक्षत, १. "यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ॥ सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥"—( ई. उ. ६) २. "स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ।"—(ई० उ० ८) ।

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