भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 364 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 124

९८ उपदेशसाहस्री परिणामित्व की उपपत्ति हो जाती है। तस्मात् विकारी होने के कारण उसे साक्षी कैसे कहा जा सकता है ? उक्त प्रश्न का यह उत्तर है कि शव के समान ब्राह्मणत्वादि जाति, उसी प्रकार वय, अवस्था आदि तथा पिता-पुत्रादि सम्बन्धों में भी आत्मत्व का अभिनिवेश होने से, वे विधि के प्रयोजक (प्रवर्तक) बनते हैं। वस्तुतः प्राण निकल जाने पर देह, 'शव' कहलाता है, तथापि 'मेरी माता, मेरे पिता'—यह अध्यास दृढ़ रहने के कारण, वह संस्कार का प्रयोजक होता दिखाई देता है, अर्थात् उसके संस्कारादि किये जाते हैं। उसके अभाव में नहीं। उसी प्रकार (शव के समान ही) जाति, वृद्धादि अवस्था, एवं पिता-पुत्रादि सम्बन्ध भी आत्मा के धर्म नहीं है। यदि इन सब को आत्मा के धर्म कहें तो घट आदि के समान उसमें अनात्मता (जड़ता) सिद्ध होगी। तस्मात् आत्मा को साक्षी समझना चाहिये, कर्म का अधिकारी सुनकर उसे परिणामी (विकारी) नहीं समझना चाहिये ॥ ५ ॥ न प्रियाप्रिय इत्युक्तेर्नादेहत्वं क्रियाफलम् । देहयोगः क्रियाहेतुस्तस्माद्विद्वान् क्रियास्त्यजेत् ॥६॥ नेति—'आत्मा' अशरीरी है, उसे कभी भी सुख-दुःख आदि स्पर्श नहीं करते—इस श्रुतिवचन के अनुरोध से 'अशरीरत्व' को 'कर्म' का फल नहीं समझना चाहिये। 'कर्म' का फल तो 'देह' के साथ सम्बन्ध होना ही है। अतः विद्वान् (ज्ञानी) पुरुष को कर्मों का त्याग कर देना चाहिये ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि कर्तृत्व को अध्यास-निबन्धन नहीं कह सकते, क्योंकि मुमुक्षु विद्वान् को भी मोक्षार्थ क्रियानुष्ठान करना पड़ता है। उसका समाधान यह होगा कि अशरीरत्व (शरीर रहित होना) को 'मोक्ष' कहा जाता है। उसे किसी क्रिया का फल नहीं कह सकते। क्योंकि क्रिया के फल तो 'सुख-दुःख' संसार में प्रसिद्ध हैं। वे सुख-दुःख शरीर को ही हुआ करते हैं, शरीर से अन्यत्र अशरीर पर होते उन्हें न किसी ने देखा और न सुना है। अशरीरी आत्मा को सुख-दुःख स्पर्श नहीं करते—'अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः'१ इस श्रुतिवचन से ही उसकी मुक्तता स्पष्ट हो जाती है। कर्म का फल तो देह के साथ संबन्ध होना ही है। अर्थात् कर्म (क्रिया) से देहसम्बन्ध ही साध्य है, मोक्ष नहीं। तस्मात् विद्वान् मुमुक्षु यह समझे कि मुक्ति, 'कर्म' से—साध्य होने वाली नहीं, अपितु एकमात्र 'ज्ञान' से ही वह साध्य है। इस प्रकार समझते हुए वह अहंकार सहित सम्पूर्ण कर्मों का परित्याग करे, अर्थात् संन्यस्त होकर श्रवण- मननादि में तत्पर रहे ॥ ६ ॥ कर्मस्वात्मा स्वतन्त्रश्चेन्निवृत्तौ* च तथेष्यताम् । अदेहत्वे फलेऽकार्ये ज्ञाते कुर्यात्कथं क्रियाः ॥७॥ कर्मेति—'कर्म' करने में यदि 'आत्मा' स्वतन्त्र है, तो कर्म के त्याग करने में भी उसकी वैसे ही स्वतन्त्रता समझनी चाहिये। देहसम्बन्धरहित मोक्षरूप फल यदि कर्म से साध्य नहीं है, तो 'ज्ञान' होने पर मुमुक्षु विद्वान् कर्मा- नुष्ठान क्यों करे ? ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि लोकव्यवहार में हम अनुभव करते रहते हैं कि सभी कर्म (क्रियाएँ) आत्मकर्तव्य के रूप में होते हैं, ऐसी स्थिति में विद्वान् मनुष्य उन कर्मों (क्रियाओं) को कैसे त्याग सकेगा ? समाधान यह है कि यदि आत्मा कर्म (क्रियाओं के) करने में स्वतन्त्र है, तो उसे उन कर्मों के त्यागने में भी वैसा ही स्वतन्त्र समझो। जैसे आसक्त (रागादिमान्) पुरुष प्रवृत्तिरूप कर्म में स्वतन्त्र होता है, उसीप्रकार विशुद्ध वीतराग पुरुष को भी कर्म के त्यागने (निवृत्ति) में स्वतन्त्र समझना चाहिये। कर्मसाध्य फल की अभिलाषा न रहने पर कर्म का त्याग तो अर्थात् प्राप्त है। देहसम्बन्ध से शून्य (शरीरसम्बन्धरहित) मोक्षरूप फल, किसी भी कर्म से साध्य नहीं है (अकार्य है), १. ( छां. उ. ८।१२।१ )

  • निवृत्तं ०—पाठान्तरम् ।