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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पद्यभाग १८: तत्त्वमसिप्रकरणम्

तत्त्वमसिप्रकरणम्* येनात्मना विलीयन्ते उद्भवन्ति च वृत्तयः। नित्यावगतये तस्मै नमो †धीप्रत्ययात्मने ॥१॥ येनेति—अन्तःकरण की वृत्तियाँ जिस आत्मचैतन्य से उत्पन्न होती हैं और उसी में लीन हो जाती हैं, उस आत्मचैतन्य के लिए मेरा प्रणाम है। वह आत्मचैतन्य, बुद्धिवृत्तियों का अधिष्ठान और नित्यज्ञानस्वरूप है ॥१॥ हृदयस्पर्शिनी आक्षेप—ब्रह्मात्मविषयक अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) ज्ञान, मोक्ष का साधन है, और वह वेदान्तवाक्यों से होता है, यह पूर्व- प्रकरण में कहा गया है। किन्तु वह ठीक नहीं है, क्योंकि वेदान्तवाक्य भी स्वर्गकामादि वाक्यों के तुल्य ही परोक्षज्ञान ही कराते हैं, अपरोक्षज्ञान तो प्रसंख्यान से ही होता है। अतः प्रसंख्यान के लिये ही प्रयत्न करना चाहिये, ऐसा कुछ लोग कहते हैं। समाधान—उनके कथन का निराकरण करने के लिये पूर्वकथित अपने सम्पूर्ण सिद्धान्त को वेदानुकूल एवं तर्कपूर्ण प्रतिपादन करने की इच्छा से प्रकारणान्तर का प्रारंभ करते हुए देवतानमस्कारात्मक मङ्गल करने के व्याज (बहाने) से अन्तःकरण की वृत्तियों के भाव-अभाव का साक्षी, कूटस्थ चिदेकतान (ज्ञानरुप) नित्य अपरोक्ष ब्रह्म है, ऐसा प्रतिपादन करनेवाले वेदान्तवाक्य 'ब्रह्म' का परोक्ष ज्ञान नहीं कराते हैं। वह अपरोक्ष ब्रह्म ही इस प्रकरण का प्रतिपाद्य है। जिस आत्मस्वरूप से अन्तःकरण को वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, विलीन होती रहती हैं, उन बुद्धिवृत्तियों के अधिष्ठानभूत नित्यज्ञानस्वरूप आत्मा को प्रणाम है। ये वृत्तियाँ साभास बुद्धि की परिणामरूप हैं ॥ १ ॥ प्रमथ्य वज्रोपमयुक्तिसंभृतैः श्रुतेररातीञ्शतशो ‡वचोऽसिभिः। ररक्ष वेदार्थनिधिं विशालधीः नमो यतीन्द्राय गुरोर्गरीयसे ॥२॥ प्रमथ्येति—उन यतिराज परमगुरुचरणों (श्रीगौड़पादाचार्य) को मेरा प्रणाम है, जिन महान् मेधावी गुरुचरणों ने वज्रोपम अकाट्य युक्तियों से और खड्गरूप सैकड़ों वेदान्तवाक्यों से भगवती श्रुतिमाता के शत्रुओं का पराभव कर वेदार्थरूप निधि (कोष) की रक्षा की है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब अपने द्वारा प्रतिपादन किये जानेवाले अर्थ में मुमुक्षुओं का विश्वास उत्पन्न कराने हेतु स्वाचार्य के गुणों का वर्णन करते हुए सम्प्रदायशुद्धि को बता रहे हैं—जिस अप्रतिहत विशाल बुद्धिवाले ने वज्रतुल्य अभेद्य (अकाट्य) तर्कों से और खड्गरूप सैकड़ों (शतशः) वेदान्तवाक्यों द्वारा श्रुति (वेद) के शत्रुओं (अरातियों) का संहार कर वेदार्थरूप कोष (जो वेदान्तमञ्जूषा में रखा हुआ है, उस अद्वय ब्रह्मात्मतत्त्व रूप कोष) की सुरक्षा की है, उस यतिशिरोमणि परमगुरुदेव श्रीगौड़पादाचार्य को मेरा प्रणाम है ॥ २ ॥ नित्यमुक्तः सदेवास्मोत्येवं चेन्न भवेन्मतिः। किमर्थं श्रावयत्येवं मातृवच्छ्रुतिरादृता§ ॥३॥ नित्यमिति—वेदान्तवाक्यों से 'मैं नित्यमुक्त सत् ही हूँ'—यह अपरोक्ष ज्ञान यदि नहीं होता, तो माँ के तुल्य हितकामना करनेवाली भगवती श्रुति, आदरपूर्वक उनको क्यों सुना रही है ? ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार प्रणाम के व्याज (मिष) से प्रकरणार्थ और स्वसम्प्रदायशुद्धि को बताकर, अब 'तत्त्वमस्यादि वाक्य' से ही आत्मा का अपरोक्षज्ञान (प्रत्यक्षज्ञान) होता है इस प्रकरणसिद्धान्त को कह रहे हैं। वेदान्तवाक्य से 'सदेवास्मि' मैं नित्यमुक्त सत् ही हूँ, यह अपरोक्ष ज्ञान यदि न होता, तो माता के समान पुत्रहितैषिणी श्रुति सिद्धवत् निर्देश के समान उसे आदर पूर्वक श्रवण ही क्यों कराती ? ॥ ३ ॥

  • तत्त्वमति.—पाठान्तरम् । † धीप्रत्यगात्मने—पाठान्तरम् । ‡ वचोबलैः—पाठान्तरम् । § रादरात्—पाठान्तरम् ।

१८४ उपदेशसाहस्री सिद्धादेवाहमित्यस्माद्युष्मद्धर्मो निषिध्यते । रज्ज्वामिवाहिर्धीर्युक्त्या तत्त्वमित्यादिशासनैः ॥४॥ सिद्धादेवेति—रज्जु में भ्रमवश होनेवाली सर्पबुद्धि जैसे दूर हो जाती है, वैसे ही युक्तिपूर्वक ‘तत् त्वम् असि’—तू वह ब्रह्म है—इत्यादि गुरुपदेश के द्वारा ‘अहम्’ पद का लक्ष्य जो आत्मा, उससे ‘अहंकारादि’ अनात्मधर्मों का निषेध किया जाता है ॥ ४ ॥ हृदयस्पशिनी नित्य अपरोक्षस्वभाव आत्मस्वरूप ब्रह्म का अपरोक्षज्ञान वेदान्तवाक्यों से ही प्राप्त करने पर आरोपित अनर्थ की निवृत्ति हो जाती है । जिस प्रकार रज्जु पर आरोपित हुई सर्पबुद्धि निवृत्त हो जाती है, उसी प्रकार तर्कपूर्वक ‘तू वह (ब्रह्म) है’ इत्यादि वेदान्तवाक्योपदेशों से ‘अहं’ पद के लक्ष्य आत्मा से अहंकारादि अनात्मधर्मों का निषेध किया जाता है । अर्थात् ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ इस अनुभव में ‘अहं’ शब्द से लक्षित, अपरोक्षतया स्वतःसिद्ध आत्मा में तत्-त्वम् पदार्थ का शोधन कर ‘तत्त्वमसि’ के उपदेश से युष्मद्धर्म (तू का धर्म) अहंकारादि पराक् अर्थ का निषेध किया जाता है । निष्कर्ष यह है कि भ्रम से पारोक्ष्य सदृश्यता के आकार का जो ग्रहण हुआ था, उसका विलापन कर आत्मतत्त्व का प्रतिपादन किया जाता है ॥ ४ ॥ शास्त्रप्रामाण्यतो ज्ञेया धर्मादेरस्तिता यथा । विषापोहो यथा ध्यानाद् *ह्रुतिः स्यात्पाप्मनस्तथा ॥५॥ शास्त्रेति—शास्त्रप्रमाण के द्वारा ‘धर्मादि’ के अस्तित्व का जिस प्रकार ज्ञान होता है, तथा गारुडादि मन्त्र बीज के ध्यान (जप) से ‘विष’ की निवृत्ति होती है, उसी प्रकार वेदान्तवाक्यों से उत्पन्न होनेवाले तत्त्वज्ञान से ‘अज्ञान’ रूप पाप की निवृत्ति होती है ॥ ५ ॥ हृदयस्पशिनी अनर्थनिवृत्ति को दो दृष्टान्त देकर स्पष्ट करते हैं, अथवा नित्य अपरोक्ष आत्मा ही ब्रह्म है और उसका अवगम (ज्ञान) अनर्थनिवृत्ति का कारण है, इसे यथाक्रम दो दृष्टान्तों से सिद्ध करते हैं—जिस प्रकार शास्त्रप्रमाण से धर्मादि के अस्तित्व का ज्ञान होता है, अथवा गारुड़ादि मन्त्रबीज के स्मरण से सद्यः (तत्काल) विषनिवृत्ति होती है, उसी प्रकार वेदान्तवाक्य से उत्पन्न हुए तत्त्वज्ञान से अज्ञानरूप पाप का विनाश होता है। ब्रह्म ही आत्मा के रूप में विद्यमान है, उसकी अस्तिता (विद्यमानता) में ‘अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य’१, ‘तत्त्वमसि’२ इत्यादि शास्त्रप्रामाण्य से समझनी चाहिये । उस ‘सत्सञ्ज्ञक’ देवता ने ईक्षण किया, मैं इस जीवात्मा के रूप से इन तीनों देवताओं में अनुप्रवेश कर नाम और रूप की अभिव्यक्ति करूँ । वह जो यह अणिमा है, तद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है। हे श्वेतकेतो ! ‘वही तू है’, तब आरुणि के इस प्रकार कहने पर श्वेतकेतु बोला—‘भगवन् ! मुझे पुनः समझाइये । तब आरुणि ने कहा—‘अच्छा सौम्य ! ॥ ५ ॥ सद्ब्रह्माहं करोमीति प्रत्ययावात्मसाक्षिकौ । तयोरज्ञानजस्यैव त्यागो युक्ततरो मतः ॥६॥ सदिति—‘मैं सत्स्वरूप ब्रह्म हूँ’ और ‘मैं करता हूँ’ ये दोनों ही ज्ञान ‘आत्मा’ के साक्षित्व में होते हैं । इन दोनों ज्ञानों में से ‘मैं करता हूँ’—यह जो अज्ञान से होनेवाला प्रत्यय है, उसी का त्याग अधिक उचित माना जाता है ॥ ६ ॥

  • निवृत्तिः पा. —पाठान्तरम् । १. (छां. उ. ६।३।२) ‘सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥ २ ॥ २. (छां. उ. ६।८।७) ‘स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद ँ सर्वं तत्सत्य ँ स आत्मा “तत्त्वमसि” श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् १८५ हृदयस्पर्शिनी 'तत्त्वमसि' वाक्य से उत्पन्न 'अहं ब्रह्मास्मि' प्रत्यय (ज्ञान) की तरह 'अहं करोमि' यह प्रत्यय भी हुआ करता है, यह अनुभवसिद्ध है, इस प्रकार विरोध रहने से 'अहं ब्रह्मास्मि' प्रत्यय की प्रतिष्ठा कैसे हो सकेगी ? अर्थात् 'अहं ब्रह्मास्मि' प्रत्यय से 'अहं करोमि' प्रत्यय का ही बाध होता है, यह कैसे समझा जाय ? अतः नियामक हेतु देकर उत्तर दे रहे हैं—'मैं सत्स्वरूप ब्रह्म हूँ, 'मैं करता हूँ' ये दोनों ही ज्ञान आत्मा के साक्षित्व में होते हैं। उनमें से 'अहं करोमि' यह ज्ञान (प्रत्यय) 'अज्ञान' से उत्पन्न हुआ है। अतः उसी का त्याग करना अधिक सयुक्तिक कहा जाता है। 'युक्ततरो मतः' यहाँ पर 'तरप्' प्रत्यय है, उससे यह अर्थ प्रतीत हुआ कि जैसे पूर्वप्रवृत्त यागविनियोजक श्रुति से पश्चात्प्रवृत्त लिङ्गादि अप्राप्त होने पर भी बाधित हो जाते हैं। अथवा प्रकृति से विकृति में पूर्व ही अतिदिष्ट हुए अंगों का पश्चात् उपस्थित किये गये विकृतिगत विशेषोपदेश से बाध किया जाता है, इस प्रकार उचित रहने पर भी बाध्य-बाधक भाव में पूर्वापरीभाव का नियम नहीं है। किन्तु यहाँ तो नियम है। अतः 'अहं ब्रह्मास्मि' इस प्रत्यय से ही 'अहं करोमि' प्रत्यय का बाध किया जाता है ॥ ६ ॥ सदस्मीति प्रमाणोत्था धीरन्या तन्निभोद्भवा । प्रत्यक्षादिनिभा वाऽपि बाध्यते दिग्भ्रमादिवत् ॥७॥ सदस्मीति—'मैं सत्स्वरूप हूँ'—यह जो ज्ञान है, वह 'प्रमाण' से उत्पन्न हुआ है। किन्तु 'मैं करता हूँ'— यह ज्ञान, किसी प्रमाण से जनित नहीं है, अर्थात् यह ज्ञान, प्रमाणाभाव से जनित है। अतः जिस प्रकार प्रत्यक्ष से प्रतीत होनेवाला 'दिग्-विभ्रम', आप्तवाक्य से निवृत्त हो जाता है, उसी प्रकार 'मैं करता हूँ'—यह ज्ञान प्रत्यक्षवत् सत्य प्रतीत होने पर भी श्रुतिप्रमाणजनित 'आत्मज्ञान' से बाधित हो जाता है ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब प्रमाण से उत्पन्न होने वाला और अज्ञान से उत्पन्न होने वाला प्रत्यय कौन-सा है ? 'तत्त्वमसि' इस निर्दुष्ट वाक्यप्रमाण से उत्पन्न हुआ 'मैं सत्स्वरूप हूँ' यह ज्ञान है और इससे भिन्न 'अहं कर्ता' यह ज्ञान, प्रमाणाभास- जनित है। क्योंकि अविवेकादि दोष से वह युक्त है। अतः प्रत्यक्षादिवत् होने पर भी वह दिग्भ्रमादि के समान बाधित हो जाता है। जैसे प्रत्यक्षवत् प्रतीत होने वाला भ्रम आप्तवाक्य से दूर हो जाता है, वैसे ही 'अहं करोमि' मैं करता हूँ, यह ज्ञान यद्यपि प्रत्यक्षवत् सत्य प्रतीत होता है, तथापि श्रुतिप्रमाण से उत्पन्न हुए आत्मज्ञान से उसका बाध हो जाता है ॥ ७ ॥ *कर्ता भोक्तेति यच्छास्त्रं लोकबुद्ध्यनुवादि तत् । सदस्मीति श्रुतेर्जाता †बाध्यतेऽन्यैतयैव धीः ॥८॥ कुर्विति—'धर्मं चर', 'सत्यं वद'—धर्म का अनुष्ठान करो, 'सत्य भाषण करो', 'स हि कर्ता भोक्तेत्याहु- र्मनोषिणः'—वह कर्ता है, भोक्ता है, ये शास्त्रवाक्य तो लोकबुद्धि के अनुवादक हैं। इसलिए 'मैं सत् हूँ' इस श्रुतिवचन से उत्पन्न होनेवाली बुद्धि के द्वारा पूर्वोक्त कर्तृत्व भोक्तृत्व बुद्धि का बाध हो जाता है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'ब्रह्मास्मि' ज्ञान की तरह कर्तृत्वादिबुद्धि भी शास्त्रसिद्ध है, क्योंकि "सत्यं वद । धर्मं चर१", "स हि कर्ता२" "भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः३" इत्यादि वचनों से उसकी शास्त्रसिद्धता स्पष्ट है। जब कि दोनों ज्ञानों की शास्त्रसिद्धता समान है, तब कर्तृत्वादिबुद्धि का बाध कैसे होगा ? जो शास्त्रानभिज्ञ रहते हैं तथा शास्त्र के ज्ञाताओं की संगति से जो हीन रहते हैं, उनमें ही 'मैं कर्ता, भोक्ता हूँ' यह बुद्धि रहती है, अतः 'कुरु' = करो इत्यादि शास्त्र, लोकसिद्ध अर्थ का अनुवाद मात्र

  • कुरु० — पाठान्तरम् । † बाध्यतेऽन्या तथैव० — पाठान्तरम् । १. (तै. उ. १।११) २. (बृ. उ. ४।३।१०) ३. (कठ. उ. ३।४) २४

१८६ उपदेशसाहस्री करता है, वह अनधिगत अर्थ का बोधक नहीं होता। किन्तु 'सदस्मि' में सत् हूँ, यह बुद्धि अनन्यसिद्ध अर्थ की श्रुति से उत्पन्न हुई है। अतः 'सदस्मि' श्रुति से उत्पन्न 'ब्रह्मास्मि' बुद्धि निरवकाश है, और अनुवादक वाक्य से उत्पन्न 'कर्ता, भोक्ता' बुद्धि सावकाश है। इसलिये निरवकाश से सावकाश का बाध होना ही उचित है। अर्थात् 'धर्मानुष्ठान करो' 'आत्मा भोक्ता है' यह शास्त्र तो लोकबुद्धि का अनुवादक है। इस कारण 'मैं सत् हूँ' इस श्रुति से उत्पन्न होने वाली बुद्धि से लोकबुद्धि के अनुवादक शास्त्र का बाध हो जाता है ॥ ८ ॥ सदेव त्वमसीत्युक्ते नात्मनो मुक्तता स्थिरा । प्रवर्त्तते प्रसंख्यानतो युक्त्याऽनुचिन्तयेत् ॥ ९॥ सदेवेति—'त्वं सदेव असि'—तू सत् ही है—इस उपदेश के श्रवणमात्र से 'आत्मा' की मुक्ति का स्थिर निश्चय नहीं है। इस उपदेश से तो प्रसंख्यान (मनन-निदिध्यासन) में प्रवृत्ति होती है। अतः उस उपदेश का युक्तिपूर्वक सतत, मनन-निदिध्यासन करते रहना चाहिए ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी तत्त्वमस्यादि वाक्य से ही आत्मविषयक अपरोक्ष ज्ञान उत्पन्न होता है। 'तू सत् ही है' ऐसा कहने पर तो आत्मा की मुक्ति निश्चितरूप से नहीं होती, इससे तो प्रसंख्यान अर्थात् शब्दावृत्ति (वाक्य का अनुचिन्तन) की प्रवृत्ति होती है। अतः उस अनुचिन्तन का युक्तिपूर्वक निरन्तर चिन्तन (विचार) करते रहना चाहिये। अर्थात् 'त्वं तदेव' इस वाक्य से ही निर्विचिकित्स ब्रह्मात्मप्रतिपत्ति होती है ॥ ९ ॥ सकृदुक्तं न गृह्णाति वाक्यार्थज्ञोऽपि यो भवेत् । अपेक्षतेऽत एवान्यदवोचाम द्वयं हि तत् ॥१०॥ सकृदिति—जो पुरुष वाक्य के अर्थ को नहीं जानता, वह एक बार के सुनने मात्र उसे ग्रहण नहीं कर पाता, उसे अन्य सहायक साधनों की आवश्यकता होती है। अतएव हमने पूर्व श्लोक में वाक्यानुचिन्तन और युक्तिपूर्वक विचार इन दो साधनों को बताया था ॥ १० ॥ हृदयस्पर्शिनी जो व्यक्ति 'सदस्मि' वाक्य के अर्थ को नहीं जानता, उसके न जानने में कारण वाक्य का असामर्थ्य नहीं, अपितु अवान्तरवाक्यार्थ के ज्ञान न हो पाने से वह नहीं जानता। क्योंकि पदार्थज्ञान के बिना वाक्यार्थज्ञान नहीं हो सकता, इस आशंका के उत्तर में कहा गया है कि जो व्यक्ति अवान्तर वाक्य से तदर्थभूत पदार्थ को भी जानता है, उसे भी 'तत्त्वमसि' वाक्य के एक बार कहने मात्र से वाक्यार्थज्ञान नहीं हो पाता। इसीलिये वह महावाक्य, स्वार्थबोध कराने के लिये अन्य सहकारी कारण की अपेक्षा रखता है। अतएव पूर्वश्लोक में वाक्यानुचिन्तन और युक्तिपूर्वक विचार ये दो सहकारी कारण बताये गये हैं ॥ १० ॥ नियोगोऽप्रतिपन्नतत्वात्कर्मणां स यथा भवेत् । अविरुद्धो भवेत्ताऽवद्यावत्संवेद्यता दृढा ॥११॥ नियोग इति—जब तक ज्ञान की परिपक्वता नहीं हो पाती है, तब तक निजस्वरूप की उपलब्धि नहीं होती। अतः उन व्यक्तियों के लिए कर्म करने की जो आज्ञा दी गयी है, वह भी विरुद्ध नहीं है, अर्थात् आत्मसाक्षात्कार के पूर्व उसके लिए कर्म करना अत्यन्त आवश्यक है ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में विधि की उपलब्धि तो है नहीं। ब्रह्मात्मभाव की स्वतः सिद्धि हो जाने से मुमुक्षु के लिये नियोग (विधान) भी उपपन्न नहीं हो रहा है। इस आशंका पर यह समाधान दे रहे हैं कि जब तक ज्ञान दृढ़ नहीं रहता, तबतक स्वरूपसाक्षात्कार न हो सकने के कारण उस मुमुक्षु के लिये कर्मों का नियोग (विधि) भी विरुद्ध नहीं है। निष्कर्ष यह है कि आत्मसाक्षात्कार से पूर्व उसके लिये वैदिक कर्म की विधि उचित ही है ॥ ११ ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् १८७ चेष्टितं च *यतो मिथ्या स्वच्छन्दः प्रतिपद्यते । प्रसङ्ख्यानमतः कार्यं यावदात्मानुभूयते ॥ १२॥ चेष्टितमिति—स्वेच्छाचारी पुरुष को भी यदि ब्रह्मात्मैक्यज्ञान हो सकता है, तो यम-नियमादि साधनों का अनुष्ठान जो बताया गया है, वह व्यर्थ ही रहेगा। अतः यह समझना चाहिए कि जब तक आत्मसाक्षात्कार न हो तबतक प्रसंख्यान (वाक्यानुचिन्तन) का अभ्यास आवश्यक ही है ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी बिना विधि (यम-नियमादि) के अर्थात् स्वेच्छा से वाक्यार्थ ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, तो अनुष्ठान किये हुए यम-नियमादि साधन व्यर्थ कहलायेंगे। अतः जब तक आत्मसाक्षात्कार न हो, तब तक प्रसंख्यान का अभ्यास नियोगवशात् करना ही चाहिये ॥ १२ ॥ सदस्मीति च विज्ञानमक्षजो बाधते ध्रुवम् । शब्दोत्थं दृढसंस्कारो दोषैश्चाकृष्यते बहिः ॥१३॥ सदिति—प्रसंख्यानका अभ्यास इसलिए भी आवश्यक है कि 'मैं सत्स्वरूप हूँ' इस शब्दजनित ज्ञान का इन्द्रिय-जनित दृढ़ संस्कार के द्वारा अभिभूत हो जाना निश्चित है। जब वह शब्दजनित ज्ञान अभिभूत हो जाता है, तब रागादि दोष उस मुमुक्षु को बहिर्मुख कर देते हैं ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसके अतिरिक्त 'मैं सत्स्वरूप हूँ' इस शब्दजनित ज्ञान को इन्द्रियजनित कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप दृढ़ संस्कार का निश्चय पराभूत (अभिभूत) भी कर सकता है। क्योंकि दृढ़ संस्कार के कारण वह इन्द्रियजन्य ज्ञान (अक्षज ज्ञान), शब्दजनित ज्ञान से प्रबल है। और रागादि दोष मुमुक्षु को बहिर्मुख भी कर दिया करते हैं। अतः प्रसंख्यान का अभ्यास दोषनिवृत्त्यर्थ करना उचित ही है ॥ १३ ॥ श्रुतानुमानजन्मानौ सामान्यविषयौ यतः । प्रत्ययावक्षजोऽवश्यं विशेषार्थो निवारयेत् ॥१४॥ श्रुतेति—शब्द और अनुमान प्रमाण से होनेवाला ज्ञान, सामान्य विषय को अपना विषय बनाता है। अतः विशेषविषयक प्रत्यक्ष, पूर्वोक्त ज्ञानों का बाध अवश्य कर सकता है ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी अक्षज ज्ञान (प्रत्यक्ष ज्ञान) चिरनिरूढ़वासनाघटित (दृढ़संस्कारनिश्चय) होने मात्र से ही प्रबल नहीं है, अपितु विशेषविषयक होने से भी उसकी प्रबलता है। शब्दजनित ज्ञान और अनुमानजनित ज्ञान, सामान्यविषयविषयक होते हैं। अतः विशेषविषयक प्रत्यक्ष, उनको अवश्य बाधित कर देगा। श्रुत (शब्द) से तथा अनुमान (लिङ्गज्ञान) से होनेवाले ज्ञानों में विप्रलिप्सा (वंचना, प्रतारणा) एवं भ्रान्ति की भी संभावना हो सकती है, तथा वह ज्ञान उपायान्तर से भी हो सकता है। किन्तु प्रत्यक्ष में यह सब कुछ न हो सकने से वह, उनसे प्रबल समझा जाता है। किंच- 'अग्नि' शब्द को श्रवण कर अथवा धूम को देखकर होने वाला अग्निज्ञान, सामान्य ज्ञान (अग्निसामान्य का ज्ञान) होता है; किन्तु अग्नि के साथ इन्द्रियसन्निकर्ष होने पर होने वाला अग्निज्ञान, विशेष-ज्ञान (अग्निविशेष का ज्ञान) कहलाता है। विशेषज्ञान, सामान्यज्ञान से प्रबल कहा जाता है। अतः 'मैं देह हूँ'—यह प्रत्यक्ष ज्ञान, 'मैं सत्स्वरूप हूँ'—इस शब्दजनित ज्ञान का बाधक कहा जा सकता है ॥ १४ ॥ वाक्यार्थप्रत्ययो कश्चिन्निर्दुःखो नोपलभ्यते । यदि वा दृश्यते कश्चिद्वाक्यार्थश्रुतिमात्रतः ॥१५॥

  • तथा—पाठान्तरम् ।

१८८ उपदेशसाहस्री निर्दुःखोऽतीतदेहेषु कृतभावोऽनुमीयते । चर्या नोऽशास्त्रसंवेद्या स्यादनिष्टं तथा सति ॥१६॥ वाक्यार्थप्रत्ययोति—केवल वाक्यार्थ का ज्ञान रखने वाला कोई पुरुष, दुःख से रहित भी नहीं दीखता, और यदि कदाचित् कोई पुरुष, वाक्यार्थ श्रवण करने मात्र से ही दुःखरहित दिखाई देता भी हो ... ॥ १५ ॥ निर्दुःख इति—तो पूर्व-पूर्वतर जन्मों में उस पुरुष ने प्रसंख्यान (वाक्यार्थानुचिन्तन) का अभ्यास अवश्य किया होगा, यह अनुमान किया जाता है। अन्यथा संन्यास धर्म का आचरण करना शास्त्र नहीं बताता, और उसके न बताने पर महान् अनिष्ट होता ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शनी यदि वाक्यार्थज्ञान होने मात्र से किसी को कृतकृत्य हुआ देखा जाय, तो प्रसंख्यान की कल्पना करना ही व्यर्थ होगा, किन्तु वैसा कृतकृत्य हुआ कोई दिखाई नहीं देता। अतः प्रसंख्यान आवश्यक है। वाक्यार्थश्रवणमात्र से ही यदि कोई दुःखहीन दिखाई देता है तो उसने पूर्वजन्म में प्रसंख्यान का अभ्यास किया होगा, ऐसा अनुमान होता है। वामदेवादि महात्मा वाक्यार्थज्ञानमात्र से ही कृतकृत्य हो चुके हैं। अतः कार्य से कारण का अनुमान कर लेना चाहिये। यदि ऐसा न माना जाय तो हमारा संन्यासधर्माचरण (परमहंसआश्रमआचार) अशास्त्रसंवेद्य (शास्त्रविहित नहीं) होगा। और वैसा होने पर महान् अनिष्ट होगा अर्थात् संन्यास (यति) आश्रमचर्या का परित्याग करने पर भी आरूढ-पतितता नहीं हो सकेगी, यह अनिष्ट प्रसंग होगा। क्योंकि संन्यासी यदि संन्यासचर्या का परित्याग करता है तो वह ‘आरूढपतित’ कहा जाता है। “तद्धैतत्पश्यन् ऋषिर्वामदेवः प्रतिपेदे”१, “तद्धास्य विजज्ञौ”२ ॥ १५-१६ ॥ सदसीति फलं चोक्त्वा विधेयं साधनं यतः । न तदन्यत्प्रसङ्ख्यानात्प्रसिद्धार्थमिहेष्यते ॥१७॥ सदिति—क्योंकि 'तू सत् स्वरूप है' यह फल निर्देश करके उसके साधन का विधान कर्तव्य है। अतः प्रथमतः वेदान्तवाक्य का उपदेश किया जाता है। वेदान्तप्रसिद्ध अर्थ को अभिव्यक्त करने के 'लिए 'प्रसंख्यान' से पृथक् कोई अन्य साधन नहीं है ॥ १७ ॥ हृदयस्पर्शनी प्रसंख्यानविधिपक्ष में सिद्धब्रह्म के उपदेश करने का फल क्या होगा ? इस प्रश्न के उत्तर में कह रहे हैं कि ‘त्वं सद्ब्रह्मासि’ ‘तू सत्स्वरूप ब्रह्म है’। यह फल बताकर उसके साधन का विधान करना है—यही कारण है कि सर्वत्र फल बताकर पश्चात् उसका साधन बताया जाता है। अतः ब्रह्मात्मैक्य की इच्छा रखने वाला प्रसंख्यान करे— इस प्रकार से यह विधि सार्थक होती है। इसीलिये प्रथमतः वेदान्तवाक्य का उपदेश किया जाता है। तथा वेदान्त- प्रसिद्ध अर्थ की अभिव्यक्ति के लिये प्रसंख्यान से भिन्न और कोई साधन उपयुक्त नहीं है। उपदेश का यह क्रम होता है कि प्रथमतः फल बताकर पश्चात् साधन बताना। अतः वेदान्तसम्प्रदाय में जो महावाक्योपदेश का क्रम है, वह फल निर्देश के लिये है। उसके पश्चात् प्रसंख्यानरूप साधन अवश्य कर्तव्य है। प्रसंख्यान से भिन्न अग्निहोत्रादि कर्म इसके उपयुक्त नहीं हैं, वे तो केवल चित्तशुद्धि के साधन हैं। यही कारण है कि अग्निहोत्रादि, ज्योतिष्टोमादि कर्मों का ब्रह्मभाव के लिये विधान नहीं किया गया है। अर्थात् ज्योतिष्टोमादि कर्मों में सिद्धब्रह्म का अभिव्यञ्जन करने की सामर्थ्य नहीं है ॥ १७ ॥ तस्मादनुभवायैव प्रसंचक्षीत यत्नतः । त्यजत्साधनतत्साध्यविरुद्धं शमनादिमान् ॥१८॥ १. (बृ. उ. १।४।१०) २. (छां. उ. ६।७।६, ६।१६।३)

तत्त्वमसिप्रकरणम् १८९ तस्मादिति-इसलिए शमादिषट्सम्पत्तिमान् पुरुष को 'प्रसंख्यान' से निष्पन्न होनेवाले ब्रह्मात्मैक्य के विरुद्ध जो कर्मनिष्ठता है, उसका त्याग करके आत्मस्वरूप के अनुभवार्थ प्रयत्नपूर्वक प्रसंख्यान का ही अभ्यास करना चाहिए ॥ १८॥ हृदयस्पर्शिनी अतः शम-दमादि से सम्पन्न व्यक्ति को, प्रसंख्यानरूप साधन और उससे होने वाले ब्रह्मात्मैक्यरूप साध्य के विरोधी कर्मनिष्ठत्व का त्याग कर आत्मसाक्षात्कार के लिये प्रयत्नपूर्वक प्रसंख्यान का ही अभ्यास करना चाहिये । अर्थात् प्रसंख्यानरूप साधन और तत्साध्य (फल) आत्मैक्यसाक्षात्कार इन दोनों का विरोधी जो कर्मनिष्ठत्व है, उसका त्याग करे । यह सब वही कर सकता है, जो शम-दम-उपरति आदि षड्गुणों से युक्त होता है ॥ १८ ॥ नैतदेवं रहस्यानां नेति नेत्यवसानतः । क्रियासाध्यं पुरा श्राव्यं न मोक्षो नित्यसिद्धतः ॥१९॥ नैतदिति—उपर्युक्त पूर्व पक्ष के उपस्थित होने पर सिद्धान्ती का कहना है कि तुम जैसा समझ रहे हो, वैसी बात नहीं है, क्योंकि उपनिषद् वाक्यों का तात्पर्य, दृश्य पदार्थों के निषेध को अवधि जहाँ समाप्त हो जाता है, उस 'परब्रह्म' में है। अतः प्रसंख्यान-विधि में उनका तात्पर्य नहीं है। क्रिया (कर्म) से साध्य होनेवाले फल को वेद के पूर्वकाण्ड ने बता दिया है। 'मोक्ष' तो नित्य सिद्ध फल है। अतः उसे क्रियासाध्य नहीं कह सकते ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार पूर्वपक्ष करने पर सिद्धान्ती उत्तर देता है-आप जैसा कह रहे हैं वैसी बात नहीं है, क्योंकि उपनिषद्ववाक्यों के तात्पर्य का पर्यवसान दृश्य का निषेध करते हुए उसके अवधिभूत परब्रह्म में होता है, प्रसंख्यान विधि में नहीं। जो फल, क्रिया (कर्म) से प्राप्य होने वाला है, उसका उल्लेख वेद के पूर्वकाण्ड में किया गया है, वहीं वह सुनाई देता है। उपनिषदों में उसका उल्लेख नहीं है। मोक्ष तो नित्यसिद्ध है, उसकी प्राप्ति कर्मानुष्ठान से नहीं हो सकती। पूर्वपक्षी बताये कि वेदान्तवाक्यों में प्रसंख्यान का साक्षात् विधान है या वर्तमानोपदेश होने से फलवचना- नुपत्या विधान की कल्पना की जाती है? प्रथम पक्ष का स्वीकार करना उचित न होगा क्योंकि रहस्यभूत उपनिषद्ववाक्यों की विध्यर्थता तो हो नहीं सकती, उन वेदान्तवाक्यों के द्वारा दृश्य का निषेध करते-करते निषेधावधिभूत ब्रह्मात्मस्वरूप में उन वाक्यों का पर्यवसान होता है। द्वितीय पक्ष इसलिये उचित न होगा, जो क्रियासाध्य फल है, वह पुरा (पूर्वं) काण्ड में श्राव्य है, उपनिषदों में नहीं। उपनिषदों में श्रूयमाण मोक्ष, क्रियासाध्य नहीं है, क्योंकि वह तो नित्यसिद्ध है, नित्यसिद्ध होने से वह साध्य नहीं है ॥ १९ ॥ पुत्रदुःखं यथाऽध्यस्तं पित्राऽदुःखे स्व आत्मनि । *अहंकर्त्रा तथाऽध्यस्तो नित्यादुःखे स्व आत्मनि ॥२०॥ पुत्रेति-जिस प्रकार पिता के द्वारा अपने दुःखरहित आत्मा में पुत्र के दुःख का आरोप कर लिया जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य अपने दुःखरहित आत्मा में 'मैं कर्ता हूँ' यह आरोप (अध्यास) कर लेता है ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी तत्त्वमस्यादि वाक्य, अपरोक्ष, अद्वितीय ब्रह्मात्मज्ञान द्वारा उस अज्ञान की और उसके द्वारा अध्यस्त हुए दुःखित्वादि संसार की निवृत्ति कराता है, यह बताने के लिये अज्ञान से अध्यस्त दुःखादि के विषय में दृष्टान्त बता रहे हैं-जिस प्रकार पिता अपने ज्वरादिदुःखरहित आत्मा में पुत्र के दुःख का आरोप कर लेता है, उसी प्रकार यह मानव प्राणी अपने नित्य दुःखरहित अर्थात् सर्वदा दुःखादिसंसाररहित अपने स्वरूपभूत निरुपाधिक आत्मा में 'मैं कर्ता हूँ'-ऐसा अध्यास करता रहता है। क्योंकि इसने अपने स्वरूपभूत आत्मा को साभास अन्तःकरण से अविविक्त समझ लिया है। अर्थात् अविवेकलक्षण अविद्या से उसे दुःखादिधर्मवाला मान लिया है। इस पद्य में आनन्दगिरि ने 'अहं कर्ता' पाठ लिया है, अतः 'स्वे आत्मनि' दुःखादिः, जोड़ लेना चाहिये । रामतीर्थ ने 'अहं कर्ता' पाठ रखा है।

  • अहं कर्ता० - पाठान्तरम् ।

१९० उपदेशसाहस्री आत्मा तो सदा ही दुःखशून्य है, वह दुःखादि का साक्षी है, परिशुद्ध है, ऐसा रहने पर भी अविवेक (अज्ञान) के कारण दुःखादि उसमें कल्पित किये जाते हैं ॥ २० ॥ सोऽध्यासो नेति नेतीति प्राप्तवत्प्रतिषिध्यते । भूयोऽध्यासविधिः कश्चित्कुतश्चिन्नोपपद्यते ॥२१॥ स इति—प्राप्त हुई वस्तु के समान उस अध्यास का 'यह स्थूल देह आत्मा नहीं है, यह सूक्ष्म देह भी आत्मा नहीं है'—इस प्रकार 'नेति-नेति' श्रुति से निषेध किया जाता है। इस परिस्थिति में किसी प्रकार के अध्यास के लिए पुनः विधि करना किसी तरह भी उपपन्न नहीं हो सकता ॥ २१ ॥ हृदयस्पर्शिनी अपरोक्ष ब्रह्मात्मा में अज्ञान से प्राप्त हुए अध्यास की ब्रह्मात्मविषयक विज्ञान से अज्ञाननिवृत्तिपूर्वक निवृत्ति की जाती है। तात्पर्य यह है कि आत्मा ब्रह्मस्वरूप है, यह ज्ञान न रहने से अध्यस्त हुआ संसार, उसके स्वरूप का ज्ञान होते ही, जो ज्ञान 'नेति नेति' और 'तत्त्वमसि' शास्त्र से उत्पन्न हुआ है, उससे निवृत्त होता है। तब आत्मा की समस्त क्रियाओं के अधिकार की निवृत्ति हो जाने से सुषुप्ति के समान पुनः अध्यासबीज के न होने से कृतकृत्य होने वाले उसे प्रसंख्यान विधि का अवसर ही नहीं है। 'प्राप्तवत्' यहाँ पर 'वति' प्रयोग करने से वस्तुवृत्त्या प्राप्ति का अभाव रहने से आरोपितत्व दृढ़ किया गया है। उस अध्यास को प्राप्त हुई वस्तु के समान यह स्थूल देह आत्मा नहीं है, यह सूक्ष्म देह आत्मा नहीं है, इस क्रम से निषेध किया जाता है—ऐसी अवस्था में पुनः किसी प्रकार के अध्यास के लिये विधि करना तो किसी तरह भी युक्तियुक्त नहीं है ॥ २१ ॥ आत्मनीह यथाऽध्यासः प्रतिषेधस्तथैव च। मलाध्यासनिषेधौ खे क्रियेते च यथाऽबुधैः ॥२२॥ आत्मनीति—जिस प्रकार आत्मा में देह और उसके जरामरणादि धर्म का अध्यास और प्रतिषेध होता है तथा जिस प्रकार प्राकृत अज्ञानी लोग इन्द्रियों के अविषयभूत आकाश में मलिनता का आरोप और निषेध करते हैं, उसी प्रकार अविषयभूत प्रत्यगात्मा ब्रह्म में भी संसार का अध्यास और निषेध किया जा सकता है ॥ २२ ॥ हृदयस्पर्शिनी किन्तु यह शंका हो सकती है कि सामने उपस्थित विषयभूत शुक्तिका आदि में रजतादि का अध्यास होता देखा जाता है, किन्तु अविषयभूत प्रत्यगात्मा ब्रह्म में विषय के दुःखित्वादि धर्म का अध्यास कैसे हो सकता है ? यह शंका करना उचित नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार देहातिरिक्त आत्मवादी नैयायिकों के मतानुसार आत्मा में देह और उसके जरा- मरणादि धर्मों का अध्यास और प्रतिषेध होता है, अथवा जिस प्रकार अज्ञानी लोग इन्द्रियों के अविषयभूत आकाश में मलिनता का आरोप एवं निषेध करते हैं, उसी प्रकार अविषयभूत प्रत्यगात्मा ब्रह्म में भी संसार का अध्यास और निषेध हो सकता है। मूल पद्य में 'यथाऽध्यासः' के स्थान पर यदि 'तथाऽध्यासः' पाठ उपलब्ध हो तो वहाँ पूर्वार्द्ध का दार्ष्टान्त और उत्तरार्ध का दृष्टान्तपरक अर्थ करना चाहिये । अध्यास में अधिष्ठानस्वरूप का स्फुरणमात्र अपेक्षित रहता है। उसका विषयत्वेन स्फुरण अपेक्षित नहीं होता। स्वप्रकाश आत्मा में वह स्वतः सिद्ध है। अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ॥ २२ ॥ प्राप्तश्चेत्प्रतिषिध्येत मोक्षोऽनित्यो भवेद्ध्रुवम् । अतोऽप्राप्तनिषेधोऽयं दिव्यग्निचयनादिवत् ॥२३॥ प्राप्तेति—आत्मा में प्राप्त हुए बन्ध का प्रतिषेध यदि माना जाय तो उसका मोक्ष अवश्य ही अनित्य सिद्ध होगा। इसलिए आकाश में अग्निचयनादि के प्रतिषेध के समान इसे अप्राप्त बन्ध का प्रतिषेध कहना चाहिए ॥ २३ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि आत्मा में प्राप्त हुए बन्ध का प्रतिषेध माना जाय तो संसारबन्धनिवृत्तिरूप जो मोक्ष है, वह आगन्तुक हो जाने से अनित्य सिद्ध होगा, यह निश्चित है। अतः आकाश में अग्निचयनादि के प्रतिषेध के समान यह अप्राप्तबन्ध का

तत्त्वमसिप्रकरणम् १९१ प्रतिषेध है। तात्पर्य यह है कि यदि प्राप्त बन्ध का प्रतिषेध किया जायगा, तो सादि होने के कारण मोक्ष की अनित्यता का प्रसंग उपस्थित होगा। किन्तु ऐसा कोई नियम नहीं है कि प्राप्त वस्तु का ही प्रतिषेध किया जाता हो। 'नान्तरिक्षे न दिवि अग्निश्चेतव्यः' इससे अन्तरिक्ष और आकाश में अप्राप्त अग्निचयन का ही प्रतिषेध किया जाता है। उसी प्रकार आकाश में नीलिमा, रज्जु में सर्प, तथा शुक्ति में रजत भी अप्राप्त हैं। अतः आत्मा में भी अप्राप्त बन्ध की ही निवृत्ति की जाती है। उस कारण आत्मा की नित्य मुक्तरूपता सिद्ध होती है। सबका निष्कर्ष यह है कि संसार यदि प्रमाणसिद्ध हो तो प्राप्तवत् प्रतिषेध हो सकता है, उससे मोक्ष को अनित्य कहना होगा। परमार्थवृत्ति से (वस्तुतः) आत्मगत बन्ध की परमार्थतः (वास्तविक) ही निवृत्ति कहने पर उस आत्मा में अवस्थान्तर की आपत्ति होगी, जिससे उसे विकारी कहना होगा और विकारी होने से उसे अनित्य भी अवश्य मानना होगा। तथा अनादि भावरूप बन्ध को पारमार्थिक कहने पर उसकी निवृत्ति असंभव ही रहेगी। यदि बन्ध को सादि कहें तो वह आत्मा के द्वारा अपने आप ही कृत होने से पुनः उसमें निवृत्तसजातीय (निवृत्त हुए के तुल्य) दूसरे बन्ध की उत्पत्ति होगी, जिससे मोक्ष की अनित्यता अवश्य ही प्रसक्त होगी। अतः बन्ध को आविद्यक ही अवश्य मानना चाहिये। और उस आविद्यक बन्ध की निवृत्ति तो ज्ञान से ही हो जायगी, इसलिये प्रसंख्यान निरर्थक है—इस अभिप्राय से उपसंहार कर रहे हैं कि यह अप्राप्तनिषेध है। जैसे—"नान्तरिक्षे न दिव्यानिश्चेतव्यः"¹—कहकर पृथिवी के तुल्य अन्तरिक्षादि में अग्निचयन का आरोप करने से अप्राप्त का ही प्रतिषेध किया जा रहा है। उसी तरह संसारबन्ध से रहित आत्मा में उसका आरोप और निषेध किये जा रहे हैं ॥ २३ ॥ संभाव्यो गोचरे शब्दः प्रत्ययो वा न चान्यथा । न संभाव्यौ तदात्मत्वादहंकर्तुस्तथैव च ॥२४॥ संभाव्य इति—शब्द से तथा प्रत्यक्षादि प्रमाण से होनेवाला ज्ञान, किसी विषय का ही हो सकता है। वह अन्यथा अर्थात् निर्विषयक नहीं होगा। इसलिए ब्रह्मस्वरूप होने के कारण अहंकर्ता (प्रमाता) को ब्रह्मविषयक ज्ञान, शब्द से अथवा प्रत्यक्षादि किसी प्रमाण से होना असम्भव है। क्योंकि 'ब्रह्म' तो किसी का विषय नहीं है ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में बन्ध के सम्बन्ध का बोधक प्रमाण न होने से भी उस आत्मा का बन्ध वास्तविक नहीं है। क्योंकि आत्मा के बन्ध के सम्बन्ध का बोधक प्रमाण 'शब्द' होगा या कोई 'अन्य प्रमाण' होगा ? अर्थात् शब्दजन्य ज्ञान अथवा प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धिजनित ज्ञान, किसी न किसी विषय के ही आश्रय से हो सकते हैं, विषयरहित नहीं हो सकते। किन्तु 'ब्रह्म' किसी का विषय नहीं है। शब्द की प्रवृत्ति के हेतु (निमित्त) भूत जाति, गुण, क्रिया आदि का अभाव होने के कारण उसमें शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, जिससे 'यह आत्मा संसारी है'—ऐसा बोध शब्द से हो पायेगा। रूपादि से रहित (हीन) होने के कारण उसे बाह्य इन्द्रियों का भी विषय नहीं कहा जा सकता। किसी अनुमापक लिङ्गविशेष के न होने के कारण उसका अनुमान भी नहीं किया जा सकता। अवयवरहित (निरवयव) होने के कारण वह उपमानप्रमाण का भी विषय नहीं हो सकता। अविकारी (विकारशून्य) होने से उसे अर्थापत्तिप्रमाणगम्य भी नहीं कह सकते। और भावरूप होने से उसे अनुपलब्धिप्रमाण का भी विषय नहीं कहा जायगा। अतः परिशेषात् प्रतीतिमात्र वह रहता है, इसलिये उसमें बन्धसंबंध प्रमाणसिद्ध नहीं है। इसके अतिरिक्त 'प्रमाता' जो अहंकर्ता है, वह भी 'ब्रह्म' में ही अध्यस्त है। अतः अपने अधिष्ठानरूप 'ब्रह्म' को वह विषयरूप से नहीं जान सकता। तात्पर्य यह है कि शब्दज्ञान तथा प्रत्यक्षादि प्रमाणजन्य ज्ञान, विषय में ही हो सकते हैं, अन्यथा अर्थात् अविषय में नहीं हो सकते। अतः ब्रह्मस्वरूप होने के कारण अहंकर्ता (प्रमाता) को ब्रह्मविषयक शब्द या प्रत्यक्षादि अन्य ज्ञान का होना संभव ही नहीं है। क्योंकि ब्रह्म तो विषय होने योग्य ही नहीं है। आत्मा का ज्ञान, शब्द से या अन्य किसी भी प्रमाण से नहीं हो सकता। क्योंकि वे सभी आत्मरूप ही हैं। चिदात्मा का स्वरूप उनसे पृथक् नहीं है ॥ २४ ॥ १. (तै० सं० ५।२।७) अयमभिप्रायः—प्रसक्तमेव सर्वत्र निषेध्यं भवति, नाऽप्रसक्तम् । यत्तु क्वचिदप्रसक्तस्यापि निषेधो दृश्यते, यथा—"नान्तरिक्षे न दिवि" इत्यत्र, तत्र गत्यन्तराभावः । वस्तुतः तत्रापि निषेधपरत्वं नास्ति, अर्थवादोऽयं रुक्मोपधानस्य,—"रुक्ममुपदधाति" इत्यनेन एकवाक्यत्वात् । तस्माद्यथा कथंचन तत्स्तुतावेव तात्पर्यम् । अत्र तु द्वैतनिषेधपरत्वमिति वैषम्यम् । तदिहापि प्रसक्तद्वैतप्रपंचनिषेधपरत्वं युक्तं, नाऽप्रसक्तेश्वरनानात्वनिषेधपरत्वमिति ॥

१९२ उपदेशसाहस्री अहंकर्त्रात्मनि न्यस्तं चैतन्ये कर्तृतादि यत् । नेति नेतीति तत्सर्वं साहंकर्त्रा निषिध्यते ॥२५॥ अहमिति—चैतन्यस्वरूप आत्मा में अहंकर्ता (साभास अन्तःकरण) के द्वारा जिन कर्तृत्वादि का आरोप किया जाता है, उन सबका अहंकर्ता के सहित 'नेति-नेति' श्रुति से क्रमशः निषेध किया जाता है ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी तस्मात् अध्यस्त का ही निषेध कहना चाहिये। चैतन्यस्वरूप आत्मा में अहंकर्ता (साभास अन्तःकरण के साथ अविवेक रहने से) ने जिन कर्तृत्वादि का आरोप किया है, उन सबका अहंकर्ता के सहित 'नेति नेति' के द्वारा निषेध किया गया है ॥ २५ ॥ उपलब्धिः स्वयंज्योतिर्दृशिः प्रत्यक्सदक्रियः* । साक्षात्सर्वान्तरः साक्षी चेता नित्योऽगुणोऽद्वयः ॥२६॥ उपलब्धिरिति—यह आत्मा ज्ञानस्वरूप है, स्वयंप्रकाश है, चित्स्वरूप है, प्रत्यक्, सत्, एवं अक्रिय है। वह साक्षात् सर्वान्तर्यामी, सभी का द्रष्टा, प्रकाशक, नित्य, निर्गुण और अद्वितीय है ॥ २६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि शास्त्र के द्वारा अध्यस्त का ही निषेध किया जाता है तो आत्मस्वरूप की उपलब्धि कैसे होगी ? उसपर कहते हैं कि आत्मा को अनुपलब्धिस्वरूप मानने में कोई प्रमाण नहीं है। उसके विपरीत 'साक्षात्' इत्यादि उत्तरार्ध में सूत्रित श्रुतियां प्रमाणरूप में उपस्थित रहने से 'आत्मा' स्वप्रकाश ही है अर्थात् स्वतःसिद्ध ही है, उसके ज्ञानार्थ प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। वह आत्मा ज्ञानस्वरूप है, स्वयंप्रकाश है, चित्स्वरूप है, प्रत्यक्, सत् और अक्रिय है। वह साक्षात् अन्तर्यामी, सर्वद्रष्टा, प्रकाशक, नित्य, निर्गुण और अद्वितीय है ॥ २६ ॥ सन्निधौ सर्वदा तस्य स्यात्तदाभोऽभिमानकृत् । आत्मात्मीयं द्वयं चातः स्यादहंममगोचरः ॥२७॥ सन्निधाविति—सर्वदा उस चेतन की सन्निधि में रहने से अहंकार भी उसी के समान चेतन-सा प्रतीत होता है। अतएव अहम्-ममविषयक आत्मभाव और आत्मीयभाव दोनों होने लगते हैं ॥ २७ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा-आत्मीय ये दोनों अहं और मम प्रत्यय के गोचर (विषय) हुआ करते हैं, यह तो प्रसिद्ध ही है। अतः आत्मा को स्वतःसिद्ध कैसे कहा जाय ? इस आशंका का समाधान यह होगा कि उपाधिवशात् व्यवहार में वैसी प्रसिद्धि है, वस्तुतः तो आत्मा स्वतःसिद्ध ही है। अहंकार का काम है अभिमान करना। वह चिदात्मा की सन्निधि में सर्वदा रहता है, उस कारण उसी के समान चैतन्य प्रकाश से युक्त होने से चेतन-सा अर्थात् चेतनाकार-सा ज्ञात होता है, उसी कारण आत्मभाव और आत्मीयभाव अर्थात् 'अहं' 'मम'—'मैं और मेरा'—यह व्यवहार चलता रहता है। एवंच मैं और मेरा यह व्यवहार, साभास अन्तःकरण और उसकी वृत्ति से अतिरिक्त आत्मा है, इस प्रकार के ज्ञान के न होने से चलता है। अतः आत्मा स्वभावतः स्वतःसिद्ध है ॥ २७ ॥ जातिकर्मादिमत्त्वाद्धि तस्मिञ्शब्दास्त्वहंकृति । न कश्चिद्वर्तते शब्दस्तदभावात्स्व आत्मनि ॥२८॥ जातीति—जाति और कर्म आदि 'अहंकार' में ही हुआ करते हैं। अतः उसी में (अहंकार में ही) शब्द- प्रवृत्ति होती है। किन्तु आत्मा में जाति-कर्म आदि का अभाव रहने से उसमें (आत्मा में) शब्द की प्रवृत्ति नहीं होती ॥ २८ ॥

  • सदाक्रियः—पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् १९३ हृदयस्पर्शिनी तथापि 'शब्द' का प्रमेय होनेसे 'आत्मा' को स्वतःसिद्ध नहीं कह सकते । अर्थात् अहम्प्रत्यय जो होता है, वह आत्मविषयक न होकर अन्यविषयक है। इसी प्रकरण के २४ वे श्लोक 'संभाव्यो गोचरे शब्दः' से आत्मा को प्रत्यय का अविषय होना बताया गया है । अब इस श्लोक से बता रहे हैं कि वह 'शब्द' का भी विषय नहीं होता, 'शब्द' का विषय भी कोई अन्य ही होता है । जाति, कर्म आदि शब्दों की प्रवृत्ति होने में निमित्त 'साभास अहंकार' है, अतः 'शब्द' का विषय साभास अहंकार है अर्थात् आभास-विशिष्ट अहंकार है। एवंच शब्द का प्रमेय विशिष्ट रहने पर भी केवल शुद्ध आत्मा, शब्द का विषय न होने से वह (आत्मा) स्वतःसिद्ध है। उस निरुपाधिक आत्मा में कोई भी शब्द, प्रवृत्त नहीं होता, क्योंकि जाति, कर्मादि शब्दों की प्रवृत्ति में निमित्त तो साभास अन्तःकरण अर्थात् विशिष्ट अन्तःकरण (अहंकार) होता है। अतः आत्मा, किसी शब्द के द्वारा सिद्ध नहीं है, अपितु स्वतःसिद्ध है ॥ २८ ॥ आभासो यत्र तत्रैव शब्दाः प्रत्यग्दृशि स्थिताः । लक्षयेयुर्न साक्षात्तमभिदध्युः कथंचन ॥२९॥ आभास इति—'आत्मा' को किसी शब्द के द्वारा नहीं बताया जा सकता, क्योंकि वह अनिर्देश्य है । तब वेदान्तवाक्य भी उसको कैसे बता पायेंगे ? क्योंकि वे वाक्य भी शब्दरूप ही हैं। इस जिज्ञासा का समाधान यह है कि जहाँ अहंकारादि में चैतन्य का प्रतिबिम्ब स्फुरित होता है, वहीं पर रहनेवाले आत्मादि शब्द उस प्रत्यगात्मा को लक्षित कराते हैं। वे शब्द किसी भी प्रकार से उसका साक्षात् प्रतिपादन नहीं करते ॥ २९ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त कथनानुसार तो स्वरूपभूत शुद्ध केवल आत्मा में प्रवृत्तिनिमित्त जाति आदि के अभाव के कारण किसी शब्द की प्रवृत्ति न होने से तो वेदान्तवाक्य भी उसका बोध नहीं करा पायेंगे । क्योंकि वेदान्तवाक्य भी शब्दरूप ही हैं। ऐसी स्थिति में उस आत्मा को वेदान्तवेद्य या औपनिषद कैसे कह सकते हैं? इसका समाधान यह है कि जब अहंकारादि में आभास अर्थात् चैतन्य का प्रतिबिम्ब स्फुरित होता है, तब वह प्रतिबिम्बित आत्मा (चैतन्य) और अन्तःकरण दोनों एकाकार (अविविक्त, अपृथक्) हुए से ज्ञात होते हैं। उसी को लोग 'आत्मा' शब्द से कहा करते हैं । अर्थात् आत्मादि शब्द उसी के वाचक होते हैं और प्रत्यक्तया भासमान जो 'दृशि' अर्थात् शुद्ध आत्मा है, उसे वे आत्मादि शब्द लक्षणा के द्वारा ज्ञापित करते हैं, उसे साक्षात् अभिधा से नहीं बताते । अतः आत्मा को औपनिषद कहने में कोई विरोध नहीं है ॥ २९ ॥ न ह्यजात्यादिमान्कश्चिदर्थः शब्देनिरूप्यते ॥३०॥ नेति—क्योंकि जाति आदि से रहित किसी भी पदार्थ को शब्द नहीं बता सकते ॥ ३० ॥ हृदयस्पर्शिनी क्योंकि किसी भी जाति आदि से शून्य (रहित) वस्तु का शब्द से प्रतिपादन नहीं किया जा सकता ॥ ३० ॥ आत्माभासो यथाऽहंकृदात्मशब्दैस्तथोच्यते । उल्मुकादौ यथान्यर्थाः परार्थत्वान्न चाञ्जसा ॥३१॥ आत्मेति—आत्मा के समान 'अहंकार' की प्रतीति जैसे होती है, उसी तरह 'आत्मा' आदि शब्दों के द्वारा उसको बताया भी जाता है । अग्नि के कार्यरूप 'दाह' आदि का प्रयोग जैसे 'उल्मुक' (अंगार) में किया जाता है । क्योंकि वे दाह आदि परार्थ (अन्यन्यर्थक) हैं, अतः उनका प्रयोग उल्मुक आदि में साक्षात् नहीं किया जाता ॥ ३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा यदि अहंकार से अतिरिक्त हो तो लक्षणा के द्वारा वेदान्तवाक्य उसको बता पायेंगे, तब अहंकार में आत्मशब्द का प्रयोग लोग कैसे कर सकते हैं ? लक्षणा से भी जहाँ शब्द का तात्पर्य होता है, वहीं शब्द का अर्थ माना जाता है । जिस प्रकार अहंकार आत्मा के तुल्य प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मादि शब्दों के द्वारा उसका प्रतिपादन भी २५

१९४ उपदेशसाहस्री किया जाता है। जिस प्रकार उल्मुक आदि में अग्नि के दाहादि कार्य का प्रयोग किया जाता है। जिस समय खूब तपे हुए लोहे से त्वचा का स्पर्श होने पर दाह होता है, तो 'लोहे ने जला दिया' ऐसा लोग कहा करते हैं किन्तु यदि विचार करें तो मानना होगा कि जलाना लोहे का धर्म (काम) नहीं है, किन्तु व्यवहार के समय लोहे में अग्नि के धर्म का आरोप करते हैं। वैसेही आत्मवत् प्रतीत होनेवाले अहंकार में आत्मत्व का आरोप होता है और उसे ही आत्मा शब्द से कहने लगते हैं। तात्पर्य यह है कि आत्माभास से युक्त अहंकार आदि में वर्तमान शब्द, उसके साक्षी को लक्षित करते हैं, साक्षात् नहीं बताते हैं। जैसे 'उल्मुकं दहति' 'अयो दहति'—इत्यादि प्रयोगों में उल्मुकादि शब्दों का प्रयोग साक्षात् अग्नि में नहीं होता है, उनका अर्थ तो अंगार आदि है। तथापि दाह को अनुपपत्ति के कारण उनका 'अग्नि' अर्थ मान लिया जाता है। उसी तरह लक्षणा के द्वारा अहं, आत्मा आदि शब्द, ब्रह्मात्मप्रतिपत्त्यर्थक होते हैं ॥ ३१ ॥ मुखादन्यो मुखाभासो यथाऽऽदर्शानुकारतः । आभासान्मुखमप्येवमादर्शाननुवर्तनात् ॥३२॥ मुखादिति—जिस प्रकार मुख का 'प्रतिबिम्ब' दर्पण का अनुवर्ती होने के कारण मुख से पृथक् है, उसी प्रकार 'मुख' भी दर्पण का अनुवर्ती न होने के कारण अपने 'प्रतिबिम्ब' से भिन्न ही रहता है ॥ ३२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वोक्त २९ वें श्लोक में सिद्धान्ती ने 'आभास' का अंगीकार किया है। भेदविपर्यासवशिष्टरूप से भासित होने वाला वह अहंकार, पारमार्थिक है या अपारमार्थिक है ? ऐसा सन्देह होने पर सिद्धान्त बताते हैं कि वह परमार्थतः नहीं है, उसमें दृष्टान्त बता रहे हैं—जैसे मुख का प्रतिबिम्ब दर्पण का अनुवर्तन करने के कारण मुख से भिन्न होता है, वैसे ही दर्पण का अनुवर्तन न करने के कारण मुख भी अपने प्रतिबिम्ब से भिन्न ही है। तथा बिम्ब की चेष्टा के बिना भी प्रति- बिम्ब की चेष्टा हो सकेगी, क्योंकि आभास से मुख भी अन्य ही है। वह आदर्श (दर्पण) के अन्वय-व्यतिरेक का अनुविधायी नहीं है। उसकी सत्ता का स्फुरण आदर्शनिरपेक्ष होता है। इसलिये वह (मुख) आदर्शानिनुवर्ति है। तथाच आदर्श में प्रतिबिम्बित हुए ग्रीवास्थ मुख का आदर्शस्थतावैशिष्ट्य से भासमान होना ही 'आभास' कहा जाता है। वह आभास सत्य नहीं है, क्योंकि आदर्श, मुख से वियुक्त होने पर अथवा तिर्यक् निरीक्षण करने पर उस आदर्श में नहीं दिखाई पड़ता। उसे असत् भी नहीं कह सकते, क्योंकि उसका अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) प्रतिभास होता है। अतः आभास को अनिर्व- चनीय ही कहा जाता है। तस्मात् उस आभास से मुख अन्य ही है ॥ ३२ ॥ अहंकृत्यात्मनिर्भासो मुखाभासवदिष्यते । मुखवत्स्मृत आत्माऽन्योऽविविक्तौ तौ तथैव च ॥३३॥ अहमिति—अहंकार में आत्मा का जो प्रतिबिम्ब है, वह मुख के प्रतिबिम्ब के ही तुल्य है, और उस प्रतिबिम्ब से भिन्न जो आत्मा है, वह मुख के तुल्य बताया गया है। एवञ्च मुख और मुखाभास के समान ही वे परस्पर भिन्न हैं ॥ ३३ ॥ हृदयस्पर्शिनी अहंकार में आत्मा का प्रतिबिम्ब (चेतनावत्त्व का अवभास) मुख के प्रतिबिम्ब के तुल्य है और उससे भिन्न आत्मा, मुख के तुल्य बताया गया है। उन मुख और मुखाभास के समान ही वे प्रातिभासिक दृष्टि से परस्पर भिन्न हैं। वस्तुतः आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, अतः भेद वस्तुतः नहीं है। आत्मा, आत्माभास तथा मुख और मुखाभास वास्तव में अविविक्त हैं अर्थात् परमार्थतः भेदरहित हैं। 'च' कार से आभासाश्रय अन्तःकरण भी उस से विविक्त नहीं है ॥ ३३ ॥ संसारी च स इत्येक आभासो यस्त्वहंकृतिः । वस्तुच्छाया स्मृतेरन्यन्माधुर्यादि च कारणम् ॥३४॥ संसारीति—कुछ विद्वान्, आत्मा के आभासरूप अहंकार को (चिदाभास को) ही 'संसारी जीव' कहते हैं। स्मृतिवचन के अनुसार छाया भी भावरूप पदार्थ (वस्तु) है तथा उसके वस्तुरूप होने में माधुर्य, शीतलता भी कारण हैं ॥ ३४ ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् १९५ हृदयस्पर्शिनी अनादि अविद्या और उसके कार्यभूत अहंकारादि में प्रतिबिम्बित हुआ चिन्मात्र ही चिदात्मस्वरूप है, उसी को उपाधिस्थतारूप वैशिष्ट्य के अध्यास के कारण संसारी कहते हैं, इस प्रकार अपना मत बताकर, उसे ही दृढ़ करने के लिये मतान्तर बता रहे हैं। हमने अहंकार में जिस आभास को पृथक् बताया है, उसी को कुछ लोग 'संसारी' कहते हैं। किन्तु प्रश्न यह उपस्थित होता है कि आभास तो अवस्तुरूप है, उसे बन्ध-मोक्ष का भागी मानकर संसारी कैसे कहा जा सकता है ? उक्त प्रश्न का उत्तर यह है कि 'आभास' शब्द से 'चिच्छाया' अभिप्रेत है। और वह वस्तुरूप है, अवस्तु नहीं है। अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है। स्मृति ने भी 'नाक्रमेत् कामतश्छायां गुर्वादि:'१ कहकर बताया है कि जानबूझकर गुरु आदि की छाया का अतिक्रमण न करे। याज्ञवल्क्य स्मृति में भी कहा है— 'देवत्विक्स्नातकाचार्यराज्ञां छायां परस्त्रियः। नाक्रमेद्रक्तविण्मूत्रष्ठीवनोद्वर्तनादिकम्२ ।।' देवता, ऋत्विज्, स्नातक, आचार्य, राजा, परस्त्री की छाया, रक्त, विष्ठा, मूत्र, थूँक, उद्वर्तनादि को न लांघे—इस प्रकार छाया के अतिक्रमण का निषेध किया है। इससे स्पष्ट है कि 'छाया' वस्तुरूप है, अवस्तु नहीं है। यदि छाया वस्तुरूप न होती तो उसका अतिक्रमण करने पर कोई दोष नहीं हो सकता था। उसी प्रकार छाया के वस्तु होने में एक अन्य कारण माधुर्यादि भी है। ग्रीष्म से संतप्त होने पर छाया में बैठे हुए मनुष्यादि प्राणी का मुख, मधुर दिखाई देता है, तथा उसे शीतलता का अनुभव होता है, इस से भी छाया का वस्तुत्व स्पष्ट होता है ॥ ३४ ॥ जैकदेशो विकारो वा तदभासाश्रयः परे। अहंकर्तैव संसारी स्वतन्त्र इति केचन ॥३५॥ जैकदेश इति—कुछ विद्वान् परमात्मा के एक देश को ही संसारी जीव कहते हैं। कुछ लोग उसके विकार को संसारी जीव कहते हैं। कुछ लोग चिदाभासविशिष्ट अहंकार को और कुछ लोग स्वतन्त्र आत्मा को ही संसारी जीव कहते हैं ॥ ३५ ॥ हृदयस्पर्शिनी पुनः एकदेशियों के तीन मतों को बता रहे हैं—कुछ लोग चित्-सत्-आनन्दरूप 'परमात्मा के एक देश' को 'संसारी' कहते हैं, क्योंकि “ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः”३ यह स्मृति कह रही है। कुछ लोग अग्निविस्फुलिंग का दृष्टान्त देकर उस परमात्मा के 'विकार' को 'संसारी' कहते हैं।४ कुछ लोग चिदाभास के आश्रय को अर्थात् चिदात्मा- भासविशिष्ट अहंकार (साभास अन्तःकरण) को ही 'संसारी' कहते हैं।५ भाट्टमत के अनुसार अहम् अर्थात् अहंकार ही 'संसारी' है, जो स्वतन्त्र है, परमात्मा का अंशादिरूप नहीं है ॥ ३५ ॥ अहंकारादिसंतानः संसारी नान्वयी *पृथक् । इत्येवं सौगता आहुस्तत्र न्यायो विचार्यताम् ॥३६॥ अहंकारेति—बौद्ध विद्वान् कहते हैं कि अहंकारादि क्षणिकविज्ञानसन्तति ही संसारी जीव है, उसमें कोई अन्वयी नहीं है। किन्तु इन सब मतों में कौन-सा मत न्यायोचित है, उसका विचार करना चाहिए ॥ ३६ ॥ हृदयस्पर्शिनी अहंकारेति—बौद्धमत के अनुसार अहंकारादि क्षणिकविज्ञानसन्तति (अविरल उदित होते रहने से जो विच्छिन्न नहीं है) अर्थात् क्षणिकज्ञानधारा ही संसारी है, उनसे पृथक् कोई एक अन्वयी (सबसे सम्बन्ध रखने वाला),

  • क्वचित्—पाठान्तरम् । १. (मनु. स्मृ. ४।१३०) २. (या. स्मृ. आचा. अध्या. ६।१५२) ३. (भग. गी. १५।७) ४. (बृ. उ. २।१।२०) माध्यन्दिन पाठ के अनुसार । काण्व पाठ के अनुसार “सर्वाणि भूतानिव्युच्चरन्ति” इति । ५. “तन्मनो दिशं दिशं पतित्वा”—(छां. उ. ६।८।२)

१९६ उपदेशसाहस्री जो विज्ञानों की उत्पत्ति-विनाशों का द्रष्टा हो, ऐसा कोई नहीं है, यह सौगतों (बौद्धों) का कथन है। इन उक्त पक्षों में वस्तुविषय की दृष्टि से तथा विरोध को दृष्टि से विकल्प और समुच्चय का असंभव रहने के कारण किसी एक पक्ष की उपादेयता अथवा हमारे कथन के अनुसार अहंकारादिगत आभास का अविद्या के कारण विवेक न हो पाने से ब्रह्म ही संसारी है, इन सब मतों में कौनसा न्याययुक्त है, इसका विचार करना चाहिए ॥ ३६ ॥

संसारिणां कथा त्वास्तां प्रकृतं त्वधुनोच्यते । मुखाभासो य आदर्शे धर्मो नान्यतरस्य सः । द्वयोरेकस्य चेद्धर्मो *वियुक्तोऽन्यतरे भवेत् ॥३७॥

संसारिणामिति — संसारियों की बात तो यहीं रहने दें। प्रस्तुत विषय को (आभास के सम्बन्ध में) बताते हैं। दर्पण में मुख का जो प्रतिबिम्ब पड़ता है, वह 'दर्पण और मुख' इन दोनों में से किसी एक का धर्म नहीं है। यदि (वह) दोनों में से किसी एक का धर्म होता तो अन्य के न रहने पर भी वह हो सकता था ॥ ३७ ॥

हृदयस्पर्शिनी प्रसंगप्राप्त संसारियों की चिन्ता को यहीं पर त्यागकर प्रकृत आभासनिरूपण की प्रतिज्ञा कर रहे हैं—यहाँ से प्रतिपक्षी के मत का खण्डन आरंभ कर रहे हैं—दर्पण में मुख का जो प्रतिबिम्ब (आभास) दिखाई देता है, क्या वह मुख और आदर्श दोनों में से किसी एक का धर्म है, या मुख का ही धर्म है, अथवा दोनों का ही धर्म है, या दोनों से भिन्न कोई वस्त्वन्तर है? इतने पक्ष (विकल्प) उपस्थित होने पर 'धर्मो नान्यतरस्य सः' से प्रथम पक्ष का खण्डन कर रहे हैं—वह प्रतिबिम्ब, दर्पण और मुख इन दोनों में से किसी एक का धर्म नहीं है। यदि वह दोनों में से किसी एक का (अन्यतर का) धर्म होता तो अन्यतर के अभाव में भी वह प्रतिबिम्ब पड़ सकता था, किन्तु ऐसा होता नहीं। दर्पण या मुख दोनों में से किसी एक का भी अभाव रहने पर मुखाभास की प्रतीति नहीं होती। इस कारण वह मुखाभास (प्रतिबिम्ब) अन्यतर (किसी एक का) धर्म नहीं है ॥ ३७ ॥

मुखेन व्यपदेशात्स मुखस्यैवेति चेन्मतम् । नादर्शानुविधानाच्च मुखे †सत्यविभावतः ॥३८॥

मुखेनेति—यदि यह कहें कि मुख के द्वारा उसका उल्लेख होने के कारण वह 'मुख' का ही धर्म है किन्तु यह कहना उचित न होगा, क्योंकि वह दर्पण का अनुवर्ती है। दर्पण के न रहने पर मुख के रहते हुए भी वह (प्रतिबिम्ब) नहीं दीखता ॥ ३८ ॥

हृदयस्पर्शिनी 'मुखेन व्यपदेशात् स मुखस्यैवेति चेन्मतम्' से द्वितीय पक्ष को उपस्थित कर 'नादर्शानुविधानाच्च' से उसका खण्डन करते हैं। उसका (आभास-प्रतिबिम्ब का) मुख के द्वारा उल्लेख होता यदि माना जाता हो तो उसे (प्रतिबिम्ब को) मुख का ही धर्म कहते, किन्तु वैसा कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि वह (प्रतिबिम्ब) दर्पण का अनुवर्ती है, और दर्पण के अभाव में मुख के रहते हुए भी वह दृष्टिगत नहीं हो पाता है ॥ ३८ ॥

द्वयोरेवेति चेत्तन्न द्वयोरेवाप्यदर्शनात् । अदृश्यस्य सतो दृष्टिः स्याद्राहोरिन्दुसूर्ययोः ॥३९॥

द्वयोरिति—यदि उसे दोनों का धर्म कहें तो भी ठीक न होगा, क्योंकि दोनों के रहने अथवा न रहने पर भी वह नहीं दिखाई देता। यदि उसे दोनों से भिन्न सत्य वस्तु कहें तो जिस प्रकार पूर्वसिद्ध राहु की प्रतीति, सूर्य और चन्द्रमा के अस्तित्व में ही होती है, उसी प्रकार अदृश्य किन्तु विद्यमान प्रतिबिम्ब की प्रतीति मुख और दर्पण का संयोग होने पर ही होती है ॥ ३९ ॥

  • वियुक्तेऽन्य० —पाठान्तरम् । † सत्यप्यभावतः। सत्यप्यभासतः—पाठौ ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् १९७ हृदयस्पर्शिनी 'द्वयोरेवेति चेत्'—यदि कहें कि वह (प्रतिबिम्ब) दोनों का धर्म है—इस तृतीय पक्ष का 'तन्न' से खण्डन करते हैं। उसे दोनों का धर्म नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों के रहने अथवा न रहने में भी उसे देखा नहीं जाता। मुख और दर्पण में से किसी भी एक के अभाव में तो मुखाभास की प्रतीति न होना स्पष्ट ही है, किन्तु यदि उसे उनके संयोग का ही धर्म माना जाय तो भी उनका किसी प्रकार भी संयोग होने पर उसकी प्रतीति होनी चाहिये, किन्तु होती नहीं है। इसलिये उसे उनके संयोग का भी धर्म नहीं कह सकते। अतः प्रतिबिम्ब को दोनों का धर्म नहीं कह सकते। यदि यह कहें कि 'वह (आभास) इन दोनों से भिन्न सत्य वस्तु है' इस चतुर्थ पक्ष की आशंका को दृष्टान्त के द्वारा उपस्थित करते हैं—'अदृश्यस्य सतो दृष्टिः'। जिस प्रकार पूर्वसिद्ध राहु की प्रतीति, सूर्य और चन्द्रमा की विद्यमानता में ही होती है, उसी प्रकार अदृश्य किन्तु विद्यमान प्रतिबिम्ब की प्रतीति मुख और दर्पण का संयोग होने पर ही होती है ॥ ३९ ॥ राहोः प्रागेव वस्तुत्वं सिद्धं शास्त्रप्रमाणतः । छायापक्षे त्ववस्तुत्वं तस्य स्यात्पूर्वयुक्तितः ॥४०॥ राहोरिति—उपर्युक्त आशंका उचित नहीं है, क्योंकि राहु की विद्यमानता तो चन्द्रग्रहणादि के पूर्व भी शास्त्रप्रमाण से सिद्ध है, किन्तु जो लोग पृथिवी आदि की छाया को ही राहु कहते हैं, उनके अनुसार तो उसका (राहु का) अवस्तुत्व उपर्युक्त युक्ति से ही सिद्ध हो जाता है ॥ ४० ॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त कथन उचित नहीं है, क्योंकि दृष्टान्त में वैषम्य है। क्योंकि सैंहिकेय राहु की वस्तुता तो चन्द्रग्रहण के पूर्व से ही ज्योतिःशास्त्रप्रमाण से अथवा पुराणादि शास्त्र प्रमाण से निश्चित है, वैसा यहाँ पर किसी प्रमाण से प्रतिबिम्ब की वस्तुता का निश्चय नहीं है। अर्थात् मुख-दर्पण के सम्बन्ध से पूर्व या अनन्तर मुखप्रतिबिम्ब की तद्व्य- तिरिक्त वस्तुता किसी प्रमाण से कहीं पर भी संभावित नहीं हुई है। इस प्रकार राहु की वस्तुता को मानकर दाष्ट्रान्तिक में अनुगुणता का अभाव (अननुगुणता) बताया गया है। किन्तु अब उस राहु में भी वस्तुता नहीं है अतः प्रतिबिम्ब को वस्तुसिद्ध करने में उस अवस्तुभूत राहु का दृष्टान्त देना उचित नहीं है, यह बता रहे हैं। कुछ लोग पृथिवी की छाया को ही राहु कहते हैं, उनके मतानुसार उस राहु का अवस्तुत्व ही निश्चित है। “मुखाभासो य आदर्श” इस ३७ वें श्लोक (पद्य) में उक्त युक्ति को यहाँ भी लगाया जा सकता है । ॥ ४० ॥ छायाक्रान्तेर्निषेधोऽयं न तु वस्तुत्वसाधकः । न ह्यर्थान्तरनिष्ठं सद्वाक्यमर्थान्तरं वदेत् ॥४१॥ छायेति—गुरु आदि पूज्य लोगों की छाया के अतिक्रमण का निषेध स्मृति ने किया है। वह निषेध भी उसके वस्तुत्व को सिद्ध नहीं करता है, क्योंकि कोई भी वाक्य किसी एक अर्थ में स्थित होकर अन्य अर्थ को नहीं बताता है ॥ ४१ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि इसी प्रकरण के ३४ वें श्लोक 'वस्तुच्छाया स्मृतेः'—छाया की वस्तुतासिद्धि में स्मृति का प्रमाण बताया है कि 'गुरु आदि की छाया का अतिक्रमण न करें'। किन्तु यह छायातिक्रमण का निषेध भी उसके वस्तुत्व का साधक नहीं है। यदि उसे वस्तुत्व का साधक कहा जाय तो सोचना होगा कि वह साक्षात् उसका साधक है, या अर्थात् साधक है। उक्त निषेधवाक्य को वस्तुत्वसाधक साक्षात् नहीं कह सकते, क्योंकि एक ही वाक्य को उभयार्थ मानने पर वाक्यभेद होगा । 'एकस्य वाक्यस्य उभयार्थत्वे वाक्यभेदः'। अतः किसी एक अर्थ में स्थित हुआ वाक्य, अन्य अर्थ का प्रतिपादन नहीं करता। अब उसे अर्थात् वस्तुत्वसाधक कहें तो यह द्वितीय पक्ष भी उचित नहीं है, क्योंकि निषेध तो 'प्राप्तिमात्रसापेक्ष' रहता है, अतः निषेध्यविषय में वस्तुत्व के न रहने से निषेध की अनुपपत्ति होने में कोई नियामक नहीं है। अतः छायालंघनप्रतिषेधपरक वाक्य छाया की वस्तुता को नहीं बता रहा है ॥ ४१ ॥

१९८ उपदेशसाहस्री माधुर्यादि च यत्कार्यमुष्णद्रव्याद्यसेवनात् । छायाया न त्वदृष्टत्वादपामेव च दर्शनात् ॥४२॥ माधुर्यति—उष्ण द्रव्य आदि का सेवन न करने के कारण छाया के माधुर्य आदि कार्य की प्रतीति हुआ करती है, क्योंकि सन्तप्त शिला की छाया में माधुर्य की प्रतीति नहीं होती । माधुर्य की प्रतीति तो केवल जल में ही होती है ॥ ४२ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह जो कहा था कि छाया के माधुर्यादि कार्य को देखने से अर्थक्रियाकारिता के कारण छाया की वस्तुता सिद्ध होती है, किन्तु वह भी अन्यथासिद्ध ही है। क्योंकि छाया में बैठे हुए व्यक्ति को छाया का जो माधुर्यादि कार्य दिखाई देता है, वह भी उष्ण द्रव्यादि का सेवन न करने के कारण है। हेतुभूत छाया का वह माधुर्यादि कार्य नहीं है। क्योंकि अत्यन्त प्रतप्त शिला की छाया में माधुर्य का अनुभव नहीं होता है, केवल जल में ही मधुरता की प्रतीति होती है। उसमें कभी व्यभिचार नहीं होता है एवंच छाया में बैठे हुए व्यक्ति को आतप-संसर्ग न रहने के कारण और जल की स्वाभाविक मधुरता की अभिव्यक्ति के कारण छाया में ही मधुरता का भ्रम होने लगता है ॥ ४२ ॥ आत्माभासाश्रयाश्चैवं मुखाभासाश्रया यथा । गम्यन्ते शास्त्रयुक्तिभ्यामाभासासत्त्वमेव च ॥४३॥ आत्मेति—जिस प्रकार मुख, उसका आभास और उसका आश्रय ये तीन विभक्त भासित होते हैं, उसी तरह आत्मा, उसका आभास और उसका आश्रय भी हुआ करता है। किन्तु वस्तुतः आभास की असत्ता (अवास्तविकता) तो शास्त्र और युक्ति से सिद्ध ही है ॥ ४३ ॥ हृदयस्पर्शिनी जिस प्रकार मुख, मुख का आभास, और मुखका आश्रय ये तीनों व्यवहार में पृथक्-पृथक् ज्ञात होते हैं, उसी प्रकार आत्मा, आत्मा का आभास और आत्मा का आश्रय ये तीनों भी परस्पर विलक्षण प्रतीत होते हैं। किन्तु परमार्थदृष्टि से नहीं, यह सब व्यावहारिक दृष्टि से है। वस्तुतः तो शास्त्र तथा युक्तियों के द्वारा तो आभास की असत्ता (सत्ता का अभाव) ही सिद्ध होती है। 'आत्मा' तो त्वम् पद से लक्ष्य, चित् धातु है। वह अनादि अविद्या के कार्य में प्रतिबिम्बित रहने से तदुपाधिस्थत्ववैशिष्ट्य जो जीवत्व है, वही 'आभास' है। अविद्या और उसकी कार्यरूप उपाधि ही 'आश्रय' है—यह 'त्वम्' पद का अर्थ बताया गया । "रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव"१, "इन्द्रोमायाभिः पुरुरूप ईयते"२, "अनीशया शोचति मुह्यमानः३" तथा "एको वशी सर्वभूतान्तरात्मकं रूपं बहुधा यः करोति४" इत्यादि श्रुतियों से और नित्य सिद्ध साक्षी आत्मा में बुद्ध्यादि एवं आगमापायी विषयान्तरस्वरूप दृश्य का अध्यास हुए विना उसका स्फुरण और सत्ता ही उपपन्न नहीं हो पाती, इस युक्ति से एकमात्र प्रत्यगात्मा की ही सत्ता सिद्ध होती है। आभास आदि की सत्ता नहीं सिद्ध हो रही है, वास्तव में आभास और उसके आश्रय की सत्ता का अभाव ही निश्चित होता है ॥ ४३ ॥ न दृशेरविकारित्वादाभासस्याप्यवस्तुतः । नाचित्त्वादहंकर्तुः कस्य संसारिता भवेत् ॥४४॥ नेति—अविकारी होने के कारण चैतन्यैकरस आत्मा में संसारित्व नहीं है, आभास तो अवस्तुरूप है, इसलिए उसे भी संसारी नहीं कहा जा सकता उसी तरह अहङ्कर्ता, जड़ (अचेतन) होने के कारण उसे भी संसारी नहीं कह सकते । ऐसी स्थिति में यह कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसारित्व किसका कहा जाय ? ॥ ४४ ॥ १. (बृ. उ. २।५।१९ तथा कठ. उ. ५।९।१०) २. (बृ. उ. २।५।१९ तथा ऋ. सं. ६।४७।१७, जैमि० उ. ब्रा. १।४४।१) ३. (मुं. उ. ३।१।२, श्वे. उ. ४।७) ४. (कठ. उ. ५।१२)

तत्त्वमसिप्रकरणम् १९९ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त कथन के अनुसार तुम्हारे मत में संसार और मोक्ष का कोई आश्रय न रहने से उनकी अनुपपत्ति ही रही। क्योंकि आत्मा या उसका आभास या उसका आश्रय, ये सम्मिलित होकर अथवा इनमें से कोई एक भी संसार आदि का आश्रय नहीं कहा जा सकता। ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्वादिलक्षण विकाररूप उपचय को ही संसार कहते हैं। और उसके आत्यन्तिक अपचय को मोक्ष कहते हैं। तथाच क्रमशः उन दोनों से संबन्ध रखने वाला विकारो कहा जायगा। ऐसी स्थिति में चैतन्यैकरस दृशि में संसारिता नहीं बन सकेगी, क्योंकि वह तो अविकारी (कूटस्थ) है। उसी तरह आभास में संसारिता नहीं बन सकेगी, क्योंकि पूर्वोक्त युक्ति से उसके अवस्तु होने का निश्चय हो चुका है, अतः जो वस्तु ही नहीं है अर्थात् शून्य है, उसमें किसी प्रकार का अतिशय होना संभव ही नहीं है। आभास के आश्रयरूप अहंकर्ता अर्थात् अहंकार में भी जडता (अचितित्व) होने से संसारिता नहीं बन सकेगी। ज्ञातृत्व-सुख-दुःखादि-भोक्तृत्वलक्षण संसार की जडाश्रयता संभव नहीं है। अतः तुम्हारे मत में किसकी संसारिता होगी या मोक्ष होगा ? कहना होगा कि किसी का नहीं, तब अनुभवविरोध होगा। अभिप्राय यह है कि अविकारी होने के कारण साक्षी का संसारित्व नहीं होगा, आभास अवस्तुरूप होने के कारण संसारी नहीं होगा, और अहंकार जड़ होने से संसारी नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसारित्व किसका कहा जाय ? ॥ ४४ ॥ अविद्यामात्र एवातः संसारोऽस्त्वविवेकतः । कूटस्थेनात्मना नित्यमात्मवानात्मनोव सः ॥४५॥ अविद्येति—इसलिए केवल अविद्यामात्र (भ्रान्तिमात्र) ही संसार है। आत्मस्वरूप का विवेक न होने के कारण वह अविद्या, कूटस्थ आत्मा की सत्ता से स्वयं अपने को ही सत्तावान् समझती रहती है, और यह समझती हुई ही वह सर्वदा आत्मा में (उसके धर्मरूप में) अवभासित होती है। अर्थात् यह अविद्यारूप संसार, आत्मा में अवभासित होता रहता है ॥ ४५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि संसार और मोक्ष का कोई आश्रय ही नहीं बन सकता तो वास्तविक संसार और मोक्ष किसी के लिये भी नहीं है, ऐसा क्यों न कहा जाय ? इस आशंका का समाधान यह है कि अविद्यामात्र ही संसार है, वह स्वप्न के समान भ्रान्तिमात्र है। आत्मस्वरूप का ज्ञान न होने के कारण संसार उसमें अध्यस्त होता है। अतः कूटस्थ आत्मा की सत्ता से सत्तावान् होकर सर्वदा आत्मा में उसके धर्मरूप से प्रतिभासित होता है। संसार अवस्तुभूत है तथापि आत्मा में अपरोक्षतया (प्रत्यक्षतया) सत् रूप से भासित होता है, इसप्रकार भासित होने में निमित्त यही है कि वह आत्मा में अध्यस्त है, अतः आत्मा की सत्ता से वह भी सत्तावान्-सा प्रतीत होता है ॥ ४५ ॥ रज्जुसर्पो यथा रज्ज्वा सात्मकः प्राग्विबेकतः । अवस्तुसन्नपि ह्येष कूटस्थेनात्मना तथा ॥४६॥ रज्जुसर्प इति—विवेक के पूर्व रज्जु में प्रतीयमान सर्प, रज्जु की सत्ता से जिस प्रकार सत्तावान् प्रतीत होता है, उसी प्रकार यह संसार (अविद्या) अवस्तुरूप होने पर भी कूटस्थ आत्मा की सत्ता से सत्तावान् प्रतीत होता रहता है ॥ ४६ ॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त कथन को दृष्टान्त से स्पष्ट कर रहे हैं। जिस प्रकार विवेक के पूर्व रज्जु में प्रतीत होनेवाला सर्प, रज्जु की सत्ता से सत्तावान् होता है, उसी प्रकार संसार अवस्तुरूप रहने पर भी वह कूटस्थ आत्मा की सत्ता से सत्तावान् प्रतीत होता है ॥ ४६ ॥ आत्माभासाश्रयश्चात्मा प्रत्ययैः स्वैर्विकारवान् । सुखी दुःखी च संसारी नित्य एवेति केचन ॥४७॥

२०० उपदेशसाहस्री आत्मेति—आत्मा ही आत्माभास (जीवत्व) का आश्रय है। वही अपने धर्मभूत प्रत्ययों के कारण विकारवान् (विकारी) तथा सुखी, दुःखी और संसारी प्रतीत होता है। तथापि कोई वादी उसे नित्य ही कहा करते हैं ॥ ४७ ॥ हृदयस्पर्शिनी एक अन्य मत से कल्पनालाघव प्रदर्शित करते हुए शंका करते हैं—आत्मा ही आत्माभास (जीव) का आश्रय है। अतः वही अपने धर्मभूत प्रत्ययों के कारण विकारी तथा सुखी, दुःखी और संसारी होता है। तथापि कतिपय वादीगण उसे 'नित्य ही' कहते हैं। क्योंकि तरंगादिकों से समुद्र के विकारी होने पर भी उसमें स्थैर्य (स्थिरता) दृष्टिगत होती ही है। अतः आभास और तदाश्रयात्मना भेदकल्पना करने में गौरव होता है। इसलिये आत्मा ही संसारी है, यह कल्पना क्षुद्र होगी, ऐसा कुछ लोगों का कथन है ॥ ४७ ॥ आत्माभासापरिज्ञानाद्याथात्म्येन विमोहिताः । अहंकर्तारमात्मेति मन्यन्ते ते निरागमाः ॥४८॥ आत्मेति—आत्मा और आत्माभास का ठीक-ठीक ज्ञान न होने से जो लोग मोह से ग्रस्त रहते हैं, तथा अहङ्कार को ही आत्मा मानते हैं, वे लोग शास्त्रबाह्य हैं अर्थात् उन्हें शास्त्र के रहस्य का ज्ञान नहीं है ॥ ४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसी प्रकरण के 'संभाव्यो गोचरे शब्दः' (१८।२४ वें) श्लोक से यह बताया था कि आत्मा को संसारी कहने में कोई प्रमाण नहीं है, उसे नहीं भूलना चाहिये। अतः एकदेशियों की कल्पना केवल उत्प्रेक्षामूलक ही है, प्रमाणमूलक नहीं है। जो लोग आत्मा और आत्माभास का यथार्थ ज्ञान न होने के कारण मोहग्रस्त हो रहे हैं और अहंकार को ही आत्मा समझ रहे हैं, वे शास्त्रबाह्य हैं, अर्थात् आगमरहस्यपरिचयशून्य हैं। “निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्१”, “साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च२”, “कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव३, “अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः४”, इत्यादि नित्यशुद्धत्वादिपरक श्रुतिसंदर्भ को तथा “अनीशया शोचति मुह्यमानः५”, “अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः६”, “अनृतेन हि प्रत्यूढाः७” इत्यादि श्रुतिसन्दर्भ को जिन लोगों नहीं देखा है, वे आत्मा और आत्माभास में विवेक न कर पाने के कारण, अविद्या से संसारी प्रतीत होनेवाले अहंकार को ही अपनी कल्पना से आत्मा समझते हैं ॥ ४८ ॥ संसारो वस्तुसंस्तेषां कर्तृत्वभोक्तृत्वलक्षणः । आत्माभासाश्रयाज्ञानात् संसरन्त्यविवेकतः ॥४९॥ संसार इति—उनकी दृष्टि में कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसार भी वस्तुतः सत् है। तथा आत्मा और आत्माभास तथा आभास का आश्रय इनका ज्ञान न रहने से अविवेक के कारण वे जन्म-मृत्युरूप संसार को प्राप्त होते रहते हैं ॥ ४९ ॥ हृदयस्पर्शिनी उन मोहग्रस्त लोगों के मत में कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप संसार भी परमार्थतः सत् है, तथा च “नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः८” इस स्मृति के अनुसार संसार अविनाशी है, अतः उनके मत में मोक्ष की असिद्धि है। १. (श्वे. उ. ६।१९) २. (श्वे. उ. ६।११) ३. (बृ. उ. ४।५।१३) ४. (बृ. उ. ४।३।९) ५. (मुं. उ. ३।१।२, श्वे. उ. ४।७) ६. (मुं. उ. १।२।८, कठ. उ. २।५) ७. (छां. उ. ८।३।२) ८. (भ. गी. २।१६)

तत्त्वमसिप्रकरणम् २०९ यदि मोक्ष की अप्राप्ति के भय से संसार को वे भी अवस्तुरूप कहें तो हमारे मत को ही उन्होंने मान लिया, यही कहना होगा। किन्तु मोहग्रस्त होने के कारण आत्मा, आभास और आभास के आश्रय का ज्ञान न होने के कारण वे अविवेक के अधीन होकर जन्म-मृत्यु रूप संसार को प्राप्त होते रहते हैं ॥ ४९ ॥ चैतन्याभासता बुद्धेरात्मनस्तत्स्वरूपता । स्याच्चेत्तं ज्ञानशब्दैश्च वेदः शास्तीति युज्यते ॥५०॥ चैतन्येति—बुद्धि में चैतन्य का आभास और आत्मा का चित्स्वरूपत्व माना जाता है। चैतन्य तो आत्मा का स्वरूप है, धर्म नहीं है। अचेतन बुद्धि में आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ने से वह चैतन्यधर्मवती प्रतीत होती है। इसलिए यह उचित ही कहा जाता है कि वेद ज्ञानमय शब्दों के द्वारा उसका (आत्मा का) उपदेश करते हैं। केवल आत्मा अथवा बुद्धि में शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि आत्मा निर्धर्मक है और बुद्धि जड़ है। अतः बुद्धि में आत्मा का आभास माना जाता है। अतः चिदाभासविशिष्ट बुद्धि ही वेद के उपदेश को ग्रहण करती है। उसी के द्वारा लक्षणा से वेद आत्मा का बोध कराते हैं ॥ ५० ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक के द्वारा यह बताया गया कि आत्मा, आभास, और आश्रय इनका विवेक न होने से बन्ध होता है और उनका विवेक होनेपर मोक्ष होता है। अब यह बता रहे हैं कि आभास का स्वीकार करने पर एक अन्य लाभ होगा : 'चैतन्य' आत्मा का धर्म नहीं है, वह तो उसका स्वरूप ही है। किन्तु 'बुद्धि' जड़ है। उसमें आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ने से वह चैतन्यधर्मवती अवगत होती है। यदि बुद्धि में आत्मा का आभास न स्वीकार किया जाय, तो केवल आत्मा या बुद्धि में शब्द की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि 'आत्मा' निर्धर्मक और 'बुद्धि' जड़ है। अतः चिदाभासविशिष्ट बुद्धि ही वेद के उपदेश को ग्रहण करती है। और उसी के द्वारा लक्षणा से वेदवाक्य, आत्मा का ज्ञान कराता है। अतः आभास का अपलाप नहीं किया जा सकता । इस कारण बुद्धि (अन्तःकरण) की चैतन्याभास्यता और आत्मा की चैतन्यस्वरूपता मानने पर ही वेद, आत्मा को ज्ञान, सत्य, अनन्त, आनन्द आदि शब्दों से बता पाता है । प्रकाशस्वभाव वस्तु जहाँ प्रतिबिम्बित होती है, वहाँ उसके प्रतिबिम्बित होने में प्रकाशाभासोदय ही हेतु होता है। जैसे जल में प्रतिबिम्बित सविता, उसी तरह बुद्धि में जब चैतन्य प्रतिबिम्बित होता है, तब उसमें चित्प्रकाशोदय ही हेतु होता है । तभी तो साभास बुद्धि में गृहीत सम्बन्ध के कारण ज्ञानादि शब्दों के द्वारा वेद, आत्मा को लक्षणा की सहायता से बोधन कर पाता है, अन्यथा निर्धर्मक आत्मा में शब्दप्रवृत्ति हो ही नहीं पायेगी, तब वह वेदान्तवेद्य भी कैसे कहा जायगा ? अन्य कोई प्रमाण भी उसे नहीं बता पाता, उस स्थिति में आत्मा का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं हो सकेगा। अतः आभास को स्वीकार करना ही होगा ॥ ५० ॥ प्रकृतिप्रत्ययार्थौ यौ भिन्नावेकाश्रयौ यथा । करोति गच्छतीत्यादौ दृष्टौ लोकप्रसिद्धितः ॥५१॥ प्रकृतीति—प्रकृति और प्रत्यय के अर्थ भिन्न-भिन्न होने पर भी उनका आश्रय एक ही रहता है, उसी प्रकार लोकप्रसिद्धि के अनुसार करोति, गच्छति इत्यादि में भी भिन्न-भिन्न अर्थ हैं, किन्तु उनका आश्रय एक ही है ॥ ५१ ॥ हृदयस्पर्शिनी आभास के स्वीकार करने पर यद्यपि आत्मा में वेद की प्रवृत्ति का होना उपपन्न हो जाता है, तथापि उसमें 'जानाति' आदि शब्दों की प्रवृत्ति न हो पायेगी, तब व्यवहार ही नहीं चल सकेगा । अथवा 'ज्ञान' शब्द की व्युत्पत्ति करने पर आत्मा में उसकी मुख्यवृत्तिता तो संभव हो ही जाती है, अतः उसे साभास बुद्धिवाचक बताकर आत्मा में लक्षणा से उसकी वृत्ति की कल्पना क्यों की जा रही है ? ऐसी शंका उपस्थित कर, उसका समाधान दे रहे हैं। जैसे—'देवदत्तो गच्छति' इस वाक्य के 'गच्छति' पद में दो अंश हैं, एक 'गम्' और दूसरा 'ति' । इनमें 'गम्' धातु प्रकृति है, उसका अर्थ गमन क्रिया है। तथा 'ति' प्रत्यय कर्तृत्व को सूचित करता है। इस प्रकार प्रकृति और प्रत्यय का अर्थ भिन्न रहने पर भी उन दोनों का आश्रय एकमात्र देवदत्त है । इसी प्रकार 'जानाति' 'करोति' आदि में भी एकमात्र 'आत्मा' को ही आश्रय समझना चाहिये ॥ ५१ ॥ २६

२०२ उपदेशसाहस्री नानयोद्व्यर्थाश्रयत्वं च लोके दृष्टं स्मृतौ तथा । जानात्यर्थेषु को हेतुर्द्वयाश्रयत्वे निगद्यताम् ॥५२॥ नानयोरिति—लोकव्यवहार और व्याकरणस्मृति में भी प्रकृति-प्रत्ययों का द्वयाश्रयत्व (दो आश्रय) नहीं देखा गया, तब 'जानाति' पदार्थ के दो आश्रयवाला होने में ही क्या हेतु हो सकता है ? उसे बताओ ॥ ५२ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रकृत्यर्थ और प्रत्ययार्थ दोनों का एकाश्रयत्व जैसे दृष्ट है, वैसे ही क्वचित् भिन्नाश्रयत्व भी क्यों नहीं हो सकेगा ? उत्तर यही है कि लोकव्यवहार में तथा व्याकरण-स्मृति में भी प्रकृति-प्रत्ययों का द्वयाश्रयत्व (दो आश्रय) नहीं दिखाई देते । अतः 'जानाति' पदार्थ के दो आश्रय मानने में ही कौन हेतु है ? उसे बताओ ॥ ५२ ॥ आत्माभासस्तु तिङ्वाच्यो धात्वर्थश्च धियः क्रिया । उभयं चाविवेकेन जानातीत्युच्यते मृषा ॥५३॥ आत्माभास इति—आत्मा का आभास 'तिङ्' प्रत्यय का वाच्य है तथा धातु का अर्थ 'बुद्धि की क्रिया' है । ये दोनों प्रकृति और प्रत्यय, आत्मा और आत्माभास के अविवेक के कारण 'जानाति' के रूप में एक आश्रयवाले कहे जाते हैं, किन्तु वह मिथ्या है ॥ ५३ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रश्नकर्ता पूछता है कि प्रकृति-प्रत्यय के एकाश्रयत्वमात्र का निषेध कर रहे हो या परमार्थतः उनका एकाश्रयत्व नहीं है, यह बता रहे हो ? सिद्धान्ती उत्तर देता है कि 'जानाति' 'करोति' आदि पदों में बुद्धिगत आत्मा का आभास, 'तिङ्' प्रत्यय का वाच्य है, तथा 'धातु' का अर्थ (प्रकृत्यर्थ), बुद्धि की वृत्तिरूपा क्रिया है । तथाच आत्माभास और बुद्धि ये दोनों (प्रकृति-प्रत्यय) आत्मा और आत्माभास के अविवेक के कारण मिथ्या ही—'जानाति' इत्यादि रूप से एक आश्रय वाले कहे जाते हैं। सिद्धान्ती के कहने का तात्पर्य यह है कि तुम जो एकमात्र आत्मा को 'जानाति, करोति' आदि पदों के अर्थों का आश्रय बताते हो, वह अध्यास के कारण है, वास्तव में नहीं है। क्योंकि 'बुद्धिवृत्ति' क्रियारूप है और 'बुद्धिगत चिदाभास' प्रत्ययरूप है, उन दोनों में अविवेकवशात् आत्मत्व का अध्यास होने से ही आत्मा को 'जानाति' आदि का आश्रय कहा जाता है ॥ ५३ ॥ न बुद्धेरवबोधोऽस्ति नात्मनो विद्यते क्रिया । अतो नान्यतरस्यापि जानातीति च युज्यते ॥५४॥ न बुद्धेरिति—क्योंकि बुद्धि में 'बोध' (ज्ञान) नहीं है और आत्मा में क्रिया (कर्म) नहीं है। अतः दोनों में से किसी के लिए भी 'जानाति' यह प्रयोग करना उचित नहीं कहा जा सकता ॥ ५४ ॥ हृदयस्पर्शिनी द्वितीय विकल्प का उत्तर यह है कि ठीक-ठीक विचार करने पर ज्ञात होता है कि क्रियावाली बुद्धि का अवबोध (चित्प्रकाश) नहीं है, तथा अवबोधस्वभाव आत्मा की क्रिया नहीं है । अतः दोनों में से किसी के लिये भी 'जानाति, अवगच्छति' आदि कहना उचित नहीं है । तथाच लोकव्यवहार तो प्रतीति के बल पर चलता है, अतः 'जानाति' आदि में आरोपित ऐक्यविषयता समझ लेने से लोकविरोध भी नहीं और स्मृतिविरोध भी नहीं होता है ॥ ५४ ॥ नाऽप्यतो भावशब्देन ज्ञप्तिरित्यपि युज्यते । न ह्यात्मा विक्रियामात्रो* नित्य आत्मेति शासनात् ॥५५॥

  • मात्रं—पाठान्तरम् । १. तुलना कीजिये—(तै. उ. वार्तिक २।१।९०-९४, गद्य प्र. वाक्य ७६-८५ ।)