भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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तत्त्वमसिप्रकरणम् १८५ हृदयस्पर्शिनी 'तत्त्वमसि' वाक्य से उत्पन्न 'अहं ब्रह्मास्मि' प्रत्यय (ज्ञान) की तरह 'अहं करोमि' यह प्रत्यय भी हुआ करता है, यह अनुभवसिद्ध है, इस प्रकार विरोध रहने से 'अहं ब्रह्मास्मि' प्रत्यय की प्रतिष्ठा कैसे हो सकेगी ? अर्थात् 'अहं ब्रह्मास्मि' प्रत्यय से 'अहं करोमि' प्रत्यय का ही बाध होता है, यह कैसे समझा जाय ? अतः नियामक हेतु देकर उत्तर दे रहे हैं—'मैं सत्स्वरूप ब्रह्म हूँ, 'मैं करता हूँ' ये दोनों ही ज्ञान आत्मा के साक्षित्व में होते हैं। उनमें से 'अहं करोमि' यह ज्ञान (प्रत्यय) 'अज्ञान' से उत्पन्न हुआ है। अतः उसी का त्याग करना अधिक सयुक्तिक कहा जाता है। 'युक्ततरो मतः' यहाँ पर 'तरप्' प्रत्यय है, उससे यह अर्थ प्रतीत हुआ कि जैसे पूर्वप्रवृत्त यागविनियोजक श्रुति से पश्चात्प्रवृत्त लिङ्गादि अप्राप्त होने पर भी बाधित हो जाते हैं। अथवा प्रकृति से विकृति में पूर्व ही अतिदिष्ट हुए अंगों का पश्चात् उपस्थित किये गये विकृतिगत विशेषोपदेश से बाध किया जाता है, इस प्रकार उचित रहने पर भी बाध्य-बाधक भाव में पूर्वापरीभाव का नियम नहीं है। किन्तु यहाँ तो नियम है। अतः 'अहं ब्रह्मास्मि' इस प्रत्यय से ही 'अहं करोमि' प्रत्यय का बाध किया जाता है ॥ ६ ॥ सदस्मीति प्रमाणोत्था धीरन्या तन्निभोद्भवा । प्रत्यक्षादिनिभा वाऽपि बाध्यते दिग्भ्रमादिवत् ॥७॥ सदस्मीति—'मैं सत्स्वरूप हूँ'—यह जो ज्ञान है, वह 'प्रमाण' से उत्पन्न हुआ है। किन्तु 'मैं करता हूँ'— यह ज्ञान, किसी प्रमाण से जनित नहीं है, अर्थात् यह ज्ञान, प्रमाणाभाव से जनित है। अतः जिस प्रकार प्रत्यक्ष से प्रतीत होनेवाला 'दिग्-विभ्रम', आप्तवाक्य से निवृत्त हो जाता है, उसी प्रकार 'मैं करता हूँ'—यह ज्ञान प्रत्यक्षवत् सत्य प्रतीत होने पर भी श्रुतिप्रमाणजनित 'आत्मज्ञान' से बाधित हो जाता है ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब प्रमाण से उत्पन्न होने वाला और अज्ञान से उत्पन्न होने वाला प्रत्यय कौन-सा है ? 'तत्त्वमसि' इस निर्दुष्ट वाक्यप्रमाण से उत्पन्न हुआ 'मैं सत्स्वरूप हूँ' यह ज्ञान है और इससे भिन्न 'अहं कर्ता' यह ज्ञान, प्रमाणाभास- जनित है। क्योंकि अविवेकादि दोष से वह युक्त है। अतः प्रत्यक्षादिवत् होने पर भी वह दिग्भ्रमादि के समान बाधित हो जाता है। जैसे प्रत्यक्षवत् प्रतीत होने वाला भ्रम आप्तवाक्य से दूर हो जाता है, वैसे ही 'अहं करोमि' मैं करता हूँ, यह ज्ञान यद्यपि प्रत्यक्षवत् सत्य प्रतीत होता है, तथापि श्रुतिप्रमाण से उत्पन्न हुए आत्मज्ञान से उसका बाध हो जाता है ॥ ७ ॥ *कर्ता भोक्तेति यच्छास्त्रं लोकबुद्ध्यनुवादि तत् । सदस्मीति श्रुतेर्जाता †बाध्यतेऽन्यैतयैव धीः ॥८॥ कुर्विति—'धर्मं चर', 'सत्यं वद'—धर्म का अनुष्ठान करो, 'सत्य भाषण करो', 'स हि कर्ता भोक्तेत्याहु- र्मनोषिणः'—वह कर्ता है, भोक्ता है, ये शास्त्रवाक्य तो लोकबुद्धि के अनुवादक हैं। इसलिए 'मैं सत् हूँ' इस श्रुतिवचन से उत्पन्न होनेवाली बुद्धि के द्वारा पूर्वोक्त कर्तृत्व भोक्तृत्व बुद्धि का बाध हो जाता है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'ब्रह्मास्मि' ज्ञान की तरह कर्तृत्वादिबुद्धि भी शास्त्रसिद्ध है, क्योंकि "सत्यं वद । धर्मं चर१", "स हि कर्ता२" "भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः३" इत्यादि वचनों से उसकी शास्त्रसिद्धता स्पष्ट है। जब कि दोनों ज्ञानों की शास्त्रसिद्धता समान है, तब कर्तृत्वादिबुद्धि का बाध कैसे होगा ? जो शास्त्रानभिज्ञ रहते हैं तथा शास्त्र के ज्ञाताओं की संगति से जो हीन रहते हैं, उनमें ही 'मैं कर्ता, भोक्ता हूँ' यह बुद्धि रहती है, अतः 'कुरु' = करो इत्यादि शास्त्र, लोकसिद्ध अर्थ का अनुवाद मात्र

  • कुरु० — पाठान्तरम् । † बाध्यतेऽन्या तथैव० — पाठान्तरम् । १. (तै. उ. १।११) २. (बृ. उ. ४।३।१०) ३. (कठ. उ. ३।४) २४