भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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१८६ उपदेशसाहस्री करता है, वह अनधिगत अर्थ का बोधक नहीं होता। किन्तु 'सदस्मि' में सत् हूँ, यह बुद्धि अनन्यसिद्ध अर्थ की श्रुति से उत्पन्न हुई है। अतः 'सदस्मि' श्रुति से उत्पन्न 'ब्रह्मास्मि' बुद्धि निरवकाश है, और अनुवादक वाक्य से उत्पन्न 'कर्ता, भोक्ता' बुद्धि सावकाश है। इसलिये निरवकाश से सावकाश का बाध होना ही उचित है। अर्थात् 'धर्मानुष्ठान करो' 'आत्मा भोक्ता है' यह शास्त्र तो लोकबुद्धि का अनुवादक है। इस कारण 'मैं सत् हूँ' इस श्रुति से उत्पन्न होने वाली बुद्धि से लोकबुद्धि के अनुवादक शास्त्र का बाध हो जाता है ॥ ८ ॥ सदेव त्वमसीत्युक्ते नात्मनो मुक्तता स्थिरा । प्रवर्त्तते प्रसंख्यानतो युक्त्याऽनुचिन्तयेत् ॥ ९॥ सदेवेति—'त्वं सदेव असि'—तू सत् ही है—इस उपदेश के श्रवणमात्र से 'आत्मा' की मुक्ति का स्थिर निश्चय नहीं है। इस उपदेश से तो प्रसंख्यान (मनन-निदिध्यासन) में प्रवृत्ति होती है। अतः उस उपदेश का युक्तिपूर्वक सतत, मनन-निदिध्यासन करते रहना चाहिए ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी तत्त्वमस्यादि वाक्य से ही आत्मविषयक अपरोक्ष ज्ञान उत्पन्न होता है। 'तू सत् ही है' ऐसा कहने पर तो आत्मा की मुक्ति निश्चितरूप से नहीं होती, इससे तो प्रसंख्यान अर्थात् शब्दावृत्ति (वाक्य का अनुचिन्तन) की प्रवृत्ति होती है। अतः उस अनुचिन्तन का युक्तिपूर्वक निरन्तर चिन्तन (विचार) करते रहना चाहिये। अर्थात् 'त्वं तदेव' इस वाक्य से ही निर्विचिकित्स ब्रह्मात्मप्रतिपत्ति होती है ॥ ९ ॥ सकृदुक्तं न गृह्णाति वाक्यार्थज्ञोऽपि यो भवेत् । अपेक्षतेऽत एवान्यदवोचाम द्वयं हि तत् ॥१०॥ सकृदिति—जो पुरुष वाक्य के अर्थ को नहीं जानता, वह एक बार के सुनने मात्र उसे ग्रहण नहीं कर पाता, उसे अन्य सहायक साधनों की आवश्यकता होती है। अतएव हमने पूर्व श्लोक में वाक्यानुचिन्तन और युक्तिपूर्वक विचार इन दो साधनों को बताया था ॥ १० ॥ हृदयस्पर्शिनी जो व्यक्ति 'सदस्मि' वाक्य के अर्थ को नहीं जानता, उसके न जानने में कारण वाक्य का असामर्थ्य नहीं, अपितु अवान्तरवाक्यार्थ के ज्ञान न हो पाने से वह नहीं जानता। क्योंकि पदार्थज्ञान के बिना वाक्यार्थज्ञान नहीं हो सकता, इस आशंका के उत्तर में कहा गया है कि जो व्यक्ति अवान्तर वाक्य से तदर्थभूत पदार्थ को भी जानता है, उसे भी 'तत्त्वमसि' वाक्य के एक बार कहने मात्र से वाक्यार्थज्ञान नहीं हो पाता। इसीलिये वह महावाक्य, स्वार्थबोध कराने के लिये अन्य सहकारी कारण की अपेक्षा रखता है। अतएव पूर्वश्लोक में वाक्यानुचिन्तन और युक्तिपूर्वक विचार ये दो सहकारी कारण बताये गये हैं ॥ १० ॥ नियोगोऽप्रतिपन्नतत्वात्कर्मणां स यथा भवेत् । अविरुद्धो भवेत्ताऽवद्यावत्संवेद्यता दृढा ॥११॥ नियोग इति—जब तक ज्ञान की परिपक्वता नहीं हो पाती है, तब तक निजस्वरूप की उपलब्धि नहीं होती। अतः उन व्यक्तियों के लिए कर्म करने की जो आज्ञा दी गयी है, वह भी विरुद्ध नहीं है, अर्थात् आत्मसाक्षात्कार के पूर्व उसके लिए कर्म करना अत्यन्त आवश्यक है ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में विधि की उपलब्धि तो है नहीं। ब्रह्मात्मभाव की स्वतः सिद्धि हो जाने से मुमुक्षु के लिये नियोग (विधान) भी उपपन्न नहीं हो रहा है। इस आशंका पर यह समाधान दे रहे हैं कि जब तक ज्ञान दृढ़ नहीं रहता, तबतक स्वरूपसाक्षात्कार न हो सकने के कारण उस मुमुक्षु के लिये कर्मों का नियोग (विधि) भी विरुद्ध नहीं है। निष्कर्ष यह है कि आत्मसाक्षात्कार से पूर्व उसके लिये वैदिक कर्म की विधि उचित ही है ॥ ११ ॥