भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 364 में से

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पृष्ठ 213

तत्त्वमसिप्रकरणम् १८७ चेष्टितं च *यतो मिथ्या स्वच्छन्दः प्रतिपद्यते । प्रसङ्ख्यानमतः कार्यं यावदात्मानुभूयते ॥ १२॥ चेष्टितमिति—स्वेच्छाचारी पुरुष को भी यदि ब्रह्मात्मैक्यज्ञान हो सकता है, तो यम-नियमादि साधनों का अनुष्ठान जो बताया गया है, वह व्यर्थ ही रहेगा। अतः यह समझना चाहिए कि जब तक आत्मसाक्षात्कार न हो तबतक प्रसंख्यान (वाक्यानुचिन्तन) का अभ्यास आवश्यक ही है ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी बिना विधि (यम-नियमादि) के अर्थात् स्वेच्छा से वाक्यार्थ ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, तो अनुष्ठान किये हुए यम-नियमादि साधन व्यर्थ कहलायेंगे। अतः जब तक आत्मसाक्षात्कार न हो, तब तक प्रसंख्यान का अभ्यास नियोगवशात् करना ही चाहिये ॥ १२ ॥ सदस्मीति च विज्ञानमक्षजो बाधते ध्रुवम् । शब्दोत्थं दृढसंस्कारो दोषैश्चाकृष्यते बहिः ॥१३॥ सदिति—प्रसंख्यानका अभ्यास इसलिए भी आवश्यक है कि 'मैं सत्स्वरूप हूँ' इस शब्दजनित ज्ञान का इन्द्रिय-जनित दृढ़ संस्कार के द्वारा अभिभूत हो जाना निश्चित है। जब वह शब्दजनित ज्ञान अभिभूत हो जाता है, तब रागादि दोष उस मुमुक्षु को बहिर्मुख कर देते हैं ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसके अतिरिक्त 'मैं सत्स्वरूप हूँ' इस शब्दजनित ज्ञान को इन्द्रियजनित कर्तृत्व-भोक्तृत्वरूप दृढ़ संस्कार का निश्चय पराभूत (अभिभूत) भी कर सकता है। क्योंकि दृढ़ संस्कार के कारण वह इन्द्रियजन्य ज्ञान (अक्षज ज्ञान), शब्दजनित ज्ञान से प्रबल है। और रागादि दोष मुमुक्षु को बहिर्मुख भी कर दिया करते हैं। अतः प्रसंख्यान का अभ्यास दोषनिवृत्त्यर्थ करना उचित ही है ॥ १३ ॥ श्रुतानुमानजन्मानौ सामान्यविषयौ यतः । प्रत्ययावक्षजोऽवश्यं विशेषार्थो निवारयेत् ॥१४॥ श्रुतेति—शब्द और अनुमान प्रमाण से होनेवाला ज्ञान, सामान्य विषय को अपना विषय बनाता है। अतः विशेषविषयक प्रत्यक्ष, पूर्वोक्त ज्ञानों का बाध अवश्य कर सकता है ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी अक्षज ज्ञान (प्रत्यक्ष ज्ञान) चिरनिरूढ़वासनाघटित (दृढ़संस्कारनिश्चय) होने मात्र से ही प्रबल नहीं है, अपितु विशेषविषयक होने से भी उसकी प्रबलता है। शब्दजनित ज्ञान और अनुमानजनित ज्ञान, सामान्यविषयविषयक होते हैं। अतः विशेषविषयक प्रत्यक्ष, उनको अवश्य बाधित कर देगा। श्रुत (शब्द) से तथा अनुमान (लिङ्गज्ञान) से होनेवाले ज्ञानों में विप्रलिप्सा (वंचना, प्रतारणा) एवं भ्रान्ति की भी संभावना हो सकती है, तथा वह ज्ञान उपायान्तर से भी हो सकता है। किन्तु प्रत्यक्ष में यह सब कुछ न हो सकने से वह, उनसे प्रबल समझा जाता है। किंच- 'अग्नि' शब्द को श्रवण कर अथवा धूम को देखकर होने वाला अग्निज्ञान, सामान्य ज्ञान (अग्निसामान्य का ज्ञान) होता है; किन्तु अग्नि के साथ इन्द्रियसन्निकर्ष होने पर होने वाला अग्निज्ञान, विशेष-ज्ञान (अग्निविशेष का ज्ञान) कहलाता है। विशेषज्ञान, सामान्यज्ञान से प्रबल कहा जाता है। अतः 'मैं देह हूँ'—यह प्रत्यक्ष ज्ञान, 'मैं सत्स्वरूप हूँ'—इस शब्दजनित ज्ञान का बाधक कहा जा सकता है ॥ १४ ॥ वाक्यार्थप्रत्ययो कश्चिन्निर्दुःखो नोपलभ्यते । यदि वा दृश्यते कश्चिद्वाक्यार्थश्रुतिमात्रतः ॥१५॥

  • तथा—पाठान्तरम् ।
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