उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८८ उपदेशसाहस्री निर्दुःखोऽतीतदेहेषु कृतभावोऽनुमीयते । चर्या नोऽशास्त्रसंवेद्या स्यादनिष्टं तथा सति ॥१६॥ वाक्यार्थप्रत्ययोति—केवल वाक्यार्थ का ज्ञान रखने वाला कोई पुरुष, दुःख से रहित भी नहीं दीखता, और यदि कदाचित् कोई पुरुष, वाक्यार्थ श्रवण करने मात्र से ही दुःखरहित दिखाई देता भी हो ... ॥ १५ ॥ निर्दुःख इति—तो पूर्व-पूर्वतर जन्मों में उस पुरुष ने प्रसंख्यान (वाक्यार्थानुचिन्तन) का अभ्यास अवश्य किया होगा, यह अनुमान किया जाता है। अन्यथा संन्यास धर्म का आचरण करना शास्त्र नहीं बताता, और उसके न बताने पर महान् अनिष्ट होता ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शनी यदि वाक्यार्थज्ञान होने मात्र से किसी को कृतकृत्य हुआ देखा जाय, तो प्रसंख्यान की कल्पना करना ही व्यर्थ होगा, किन्तु वैसा कृतकृत्य हुआ कोई दिखाई नहीं देता। अतः प्रसंख्यान आवश्यक है। वाक्यार्थश्रवणमात्र से ही यदि कोई दुःखहीन दिखाई देता है तो उसने पूर्वजन्म में प्रसंख्यान का अभ्यास किया होगा, ऐसा अनुमान होता है। वामदेवादि महात्मा वाक्यार्थज्ञानमात्र से ही कृतकृत्य हो चुके हैं। अतः कार्य से कारण का अनुमान कर लेना चाहिये। यदि ऐसा न माना जाय तो हमारा संन्यासधर्माचरण (परमहंसआश्रमआचार) अशास्त्रसंवेद्य (शास्त्रविहित नहीं) होगा। और वैसा होने पर महान् अनिष्ट होगा अर्थात् संन्यास (यति) आश्रमचर्या का परित्याग करने पर भी आरूढ-पतितता नहीं हो सकेगी, यह अनिष्ट प्रसंग होगा। क्योंकि संन्यासी यदि संन्यासचर्या का परित्याग करता है तो वह ‘आरूढपतित’ कहा जाता है। “तद्धैतत्पश्यन् ऋषिर्वामदेवः प्रतिपेदे”१, “तद्धास्य विजज्ञौ”२ ॥ १५-१६ ॥ सदसीति फलं चोक्त्वा विधेयं साधनं यतः । न तदन्यत्प्रसङ्ख्यानात्प्रसिद्धार्थमिहेष्यते ॥१७॥ सदिति—क्योंकि 'तू सत् स्वरूप है' यह फल निर्देश करके उसके साधन का विधान कर्तव्य है। अतः प्रथमतः वेदान्तवाक्य का उपदेश किया जाता है। वेदान्तप्रसिद्ध अर्थ को अभिव्यक्त करने के 'लिए 'प्रसंख्यान' से पृथक् कोई अन्य साधन नहीं है ॥ १७ ॥ हृदयस्पर्शनी प्रसंख्यानविधिपक्ष में सिद्धब्रह्म के उपदेश करने का फल क्या होगा ? इस प्रश्न के उत्तर में कह रहे हैं कि ‘त्वं सद्ब्रह्मासि’ ‘तू सत्स्वरूप ब्रह्म है’। यह फल बताकर उसके साधन का विधान करना है—यही कारण है कि सर्वत्र फल बताकर पश्चात् उसका साधन बताया जाता है। अतः ब्रह्मात्मैक्य की इच्छा रखने वाला प्रसंख्यान करे— इस प्रकार से यह विधि सार्थक होती है। इसीलिये प्रथमतः वेदान्तवाक्य का उपदेश किया जाता है। तथा वेदान्त- प्रसिद्ध अर्थ की अभिव्यक्ति के लिये प्रसंख्यान से भिन्न और कोई साधन उपयुक्त नहीं है। उपदेश का यह क्रम होता है कि प्रथमतः फल बताकर पश्चात् साधन बताना। अतः वेदान्तसम्प्रदाय में जो महावाक्योपदेश का क्रम है, वह फल निर्देश के लिये है। उसके पश्चात् प्रसंख्यानरूप साधन अवश्य कर्तव्य है। प्रसंख्यान से भिन्न अग्निहोत्रादि कर्म इसके उपयुक्त नहीं हैं, वे तो केवल चित्तशुद्धि के साधन हैं। यही कारण है कि अग्निहोत्रादि, ज्योतिष्टोमादि कर्मों का ब्रह्मभाव के लिये विधान नहीं किया गया है। अर्थात् ज्योतिष्टोमादि कर्मों में सिद्धब्रह्म का अभिव्यञ्जन करने की सामर्थ्य नहीं है ॥ १७ ॥ तस्मादनुभवायैव प्रसंचक्षीत यत्नतः । त्यजत्साधनतत्साध्यविरुद्धं शमनादिमान् ॥१८॥ १. (बृ. उ. १।४।१०) २. (छां. उ. ६।७।६, ६।१६।३)