उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०२ उपदेशसाहस्री नानयोद्व्यर्थाश्रयत्वं च लोके दृष्टं स्मृतौ तथा । जानात्यर्थेषु को हेतुर्द्वयाश्रयत्वे निगद्यताम् ॥५२॥ नानयोरिति—लोकव्यवहार और व्याकरणस्मृति में भी प्रकृति-प्रत्ययों का द्वयाश्रयत्व (दो आश्रय) नहीं देखा गया, तब 'जानाति' पदार्थ के दो आश्रयवाला होने में ही क्या हेतु हो सकता है ? उसे बताओ ॥ ५२ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रकृत्यर्थ और प्रत्ययार्थ दोनों का एकाश्रयत्व जैसे दृष्ट है, वैसे ही क्वचित् भिन्नाश्रयत्व भी क्यों नहीं हो सकेगा ? उत्तर यही है कि लोकव्यवहार में तथा व्याकरण-स्मृति में भी प्रकृति-प्रत्ययों का द्वयाश्रयत्व (दो आश्रय) नहीं दिखाई देते । अतः 'जानाति' पदार्थ के दो आश्रय मानने में ही कौन हेतु है ? उसे बताओ ॥ ५२ ॥ आत्माभासस्तु तिङ्वाच्यो धात्वर्थश्च धियः क्रिया । उभयं चाविवेकेन जानातीत्युच्यते मृषा ॥५३॥ आत्माभास इति—आत्मा का आभास 'तिङ्' प्रत्यय का वाच्य है तथा धातु का अर्थ 'बुद्धि की क्रिया' है । ये दोनों प्रकृति और प्रत्यय, आत्मा और आत्माभास के अविवेक के कारण 'जानाति' के रूप में एक आश्रयवाले कहे जाते हैं, किन्तु वह मिथ्या है ॥ ५३ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रश्नकर्ता पूछता है कि प्रकृति-प्रत्यय के एकाश्रयत्वमात्र का निषेध कर रहे हो या परमार्थतः उनका एकाश्रयत्व नहीं है, यह बता रहे हो ? सिद्धान्ती उत्तर देता है कि 'जानाति' 'करोति' आदि पदों में बुद्धिगत आत्मा का आभास, 'तिङ्' प्रत्यय का वाच्य है, तथा 'धातु' का अर्थ (प्रकृत्यर्थ), बुद्धि की वृत्तिरूपा क्रिया है । तथाच आत्माभास और बुद्धि ये दोनों (प्रकृति-प्रत्यय) आत्मा और आत्माभास के अविवेक के कारण मिथ्या ही—'जानाति' इत्यादि रूप से एक आश्रय वाले कहे जाते हैं। सिद्धान्ती के कहने का तात्पर्य यह है कि तुम जो एकमात्र आत्मा को 'जानाति, करोति' आदि पदों के अर्थों का आश्रय बताते हो, वह अध्यास के कारण है, वास्तव में नहीं है। क्योंकि 'बुद्धिवृत्ति' क्रियारूप है और 'बुद्धिगत चिदाभास' प्रत्ययरूप है, उन दोनों में अविवेकवशात् आत्मत्व का अध्यास होने से ही आत्मा को 'जानाति' आदि का आश्रय कहा जाता है ॥ ५३ ॥ न बुद्धेरवबोधोऽस्ति नात्मनो विद्यते क्रिया । अतो नान्यतरस्यापि जानातीति च युज्यते ॥५४॥ न बुद्धेरिति—क्योंकि बुद्धि में 'बोध' (ज्ञान) नहीं है और आत्मा में क्रिया (कर्म) नहीं है। अतः दोनों में से किसी के लिए भी 'जानाति' यह प्रयोग करना उचित नहीं कहा जा सकता ॥ ५४ ॥ हृदयस्पर्शिनी द्वितीय विकल्प का उत्तर यह है कि ठीक-ठीक विचार करने पर ज्ञात होता है कि क्रियावाली बुद्धि का अवबोध (चित्प्रकाश) नहीं है, तथा अवबोधस्वभाव आत्मा की क्रिया नहीं है । अतः दोनों में से किसी के लिये भी 'जानाति, अवगच्छति' आदि कहना उचित नहीं है । तथाच लोकव्यवहार तो प्रतीति के बल पर चलता है, अतः 'जानाति' आदि में आरोपित ऐक्यविषयता समझ लेने से लोकविरोध भी नहीं और स्मृतिविरोध भी नहीं होता है ॥ ५४ ॥ नाऽप्यतो भावशब्देन ज्ञप्तिरित्यपि युज्यते । न ह्यात्मा विक्रियामात्रो* नित्य आत्मेति शासनात् ॥५५॥
- मात्रं—पाठान्तरम् । १. तुलना कीजिये—(तै. उ. वार्तिक २।१।९०-९४, गद्य प्र. वाक्य ७६-८५ ।)