उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वमसिप्रकरणम् २०३ नापीति—इसीलिए 'ज्ञप्तिः ज्ञानम्' इस भावव्युत्पत्ति के द्वारा भी आत्मा के अर्थ में 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता, क्योंकि 'आत्मा नित्य है'—यह उपदेश श्रुति ने दिया है। अतः आत्मा को विकारमात्र नहीं कहा जा सकता ॥ ५५ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'ज्ञ' की व्युत्पत्ति 'जानातीति ज्ञः' अर्थात् जो जानता है—ज्ञान का कर्ता है, वह 'ज्ञ' है—ऐसी कर्तृव्युत्पत्ति (कर्तृवाच्य व्युत्पत्ति) करके 'आत्मा' के लिये 'जानाति' पद का प्रयोग नहीं कर सकते, क्योंकि 'आत्मा' निर्धर्मक है। तथा 'जानाति' पद का प्रयोग 'बुद्धि' के लिये भी नहीं कर सकते, क्योंकि 'बुद्धि' जड़ है। और बुद्धि तथा आत्मा मिलकर भी 'जानाति' आदि क्रिया के कर्ता नहीं हो सकते, क्योंकि तम और आलोक (अंधकार और प्रकाश) के समान जड़ और अजड़ (चेतन) का ऐक्य नहीं हो सकता। और न ही दोनों में से किसी एक की सन्निधि के कारण अन्यतर में उभयाश्रयता संगत हो पाती है, क्योंकि अध्यास के बिना सन्निधि नहीं देखी जाती। उसी प्रकार 'ज्ञप्तिः ज्ञानम्' इस भावव्युत्पत्ति (भाववाच्यव्युत्पत्ति) के द्वारा भी 'आत्मा' के लिये 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता। क्योंकि 'भाव' शब्द धात्वर्थमात्र का वाचक होता है। अतः यदि आत्मा को भाववाचक शब्द का वाच्य कहा जाय तो निश्चय ही उसे क्रियात्मक मानना होगा, क्रियात्मक होने से उसे विकारी कहना होगा, और विकारी होने पर वह 'अनित्य' होगा। किन्तु 'आत्मा' को तो नित्य माना जाता है, इसीलिये उसे निर्विकार कहा जाता है। अतः उसे भाव शब्द का वाच्य नहीं कह सकते। एवं च 'भाव' शब्द धात्वर्थसामान्य का वाचक होने से 'ज्ञप्तिर्ज्ञानम्' इस व्युत्पत्ति से भी 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग आत्मा में संगत नहीं होता। क्योंकि क्रियामात्र रहने पर पारतन्त्र्य होने से अनित्यता का प्रसंग प्राप्त होगा, वह तो ठीक न होगा, क्योंकि १श्रुति ने 'आत्मा' को नित्य बताया है, वह विकारमात्र नहीं है ॥ ५५ ॥ न बुद्धेर्बुद्धिवाच्यत्वं करणं न ह्यकर्तृकम् । नापि ज्ञायत इत्येवं कर्मशब्देनिरुच्यते* ॥५६॥ नेति—'बुध्यते अनया इति बुद्धिः'—ऐसी करणवाच्य व्युत्पत्ति के द्वारा भी 'आत्मा' के अर्थ में बुद्धि (ज्ञान) शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते, क्योंकि 'करण' कभी भी कर्ता के बिना नहीं होता। अतः 'बुद्धि' शब्द का वाच्य 'बुद्धि' ही है, 'आत्मा' नहीं। उसी तरह 'ज्ञायते इति ज्ञानम्'—इस कर्मवाच्य व्युत्पत्ति के द्वारा भी 'आत्मा' को नहीं बताया जा सकता, क्योंकि वह स्वयं अपना 'कर्म' बने, यह सम्भव नहीं है ॥ ५६ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे 'जानातीति ज्ञः' इस कर्तृव्युत्पत्ति से और 'ज्ञप्तिर्ज्ञानम्' इस भावव्युत्पत्ति से भी ज्ञान शब्द का वाच्य आत्मा नहीं होता, वैसे ही 'ज्ञायते अनेन' इस करणव्युत्पत्ति से और 'ज्ञायते इति ज्ञानम्' इस कर्मव्युत्पत्ति से भी ज्ञान शब्द का वाच्य आत्मा नहीं हो सकता। 'बुध्यते अनया इति बुद्धिः' इस करण व्युत्पत्ति से बुद्धि शब्द का वाच्य आत्मा नहीं है। किन्तु बुद्धि ही वाच्य है। क्योंकि कर्ता के बिना करण नहीं होता। तथा 'ज्ञायते इति ज्ञानम्' इस कर्मव्युत्पत्ति के द्वारा भी आत्मा का निरूपण नहीं किया जा सकता। बुद्धि शब्द, ज्ञान का पर्याय है। अतः 'बुध्यते अनया' अथवा 'ज्ञायते अनया'—इसके द्वारा जाना जाता है इसलिये वह ज्ञान है—ऐसी करणव्युत्पत्ति करें तो उसका कोई कर्ता होना चाहिये। किन्तु ऐसा कोई पदार्थ नहीं है, जिसका करण आत्मा हो सके। अतः करणवाच्य 'बुद्धि' या 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग भी केवल अन्तःकरण के लिये ही हो सकता है। यदि 'ज्ञायते इति ज्ञानम्'—जाना जाता है, इसलिये ज्ञान है—ऐसी कर्मव्युत्पत्ति करें तो स्वयं ही अपना कर्म बने—ऐसा संभव नहीं है। इसलिये 'आत्मा' कर्मव्युत्पत्ति का भी विषय नहीं हो सकता। यदि 'ज्ञायते अस्मिन् इति ज्ञानम्'—इसमें जाना जाता है, इसलिये वह ज्ञान है—ऐसी अधिकरण व्युत्पत्ति करें तो ज्ञात घटादि के अधिकरण भूतलादि में भी 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग होगा। यदि कहें कि ज्ञातृत्व होते हुए ज्ञेयाधार होने पर ही 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग हो सकता है तो जिस प्रकार भूतलादि में जड़ होने के कारण ज्ञातृत्व नहीं है, उसी प्रकार आत्मा में कोई धर्म न होने के कारण ज्ञातृत्व का अभाव है ॥ ५६ ॥
- निरुप्यते०—पाठान्तरम् । १. (कठ. उ. २।१८, ३।१३, मुं. उ. १।६, नृ. उ. ९)