उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
गद्यभाग २: कूटस्थाद्वयात्मबोधप्रकरणम्
कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरण ३०७ नैव, भगवान् शक्नोमि न कर्तुम् । अन्येन केनचित्प्रयुक्तोऽहं, न स्वतन्त्र इति ॥६६॥ हृदयस्पर्शिनी नैवेति—शिष्य कहता है—नहीं भगवन् ! देहाद्यात्मभावना के न करने में मैं समर्थ (स्वतन्त्र) नहीं हूँ । मैं किसी अन्य के द्वारा प्रेरित हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ । मैं नहीं चाहता हूँ, तथापि मेरी उससे निवृत्ति नहीं हो पाती । ऐसा लगता है, जैसे मुझे कोई प्रेरित कर रहा हो । गीता में कहा ही है कि "अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः१” ॥ ६६ ॥ न र्तार्ह अचितिमित्त्वात्स्वार्थस्त्वम् । येन प्रयुक्तोऽस्वतन्त्रः प्रवर्तसे, स चितिमान् स्वार्थः । संघात एव त्वम् ॥६७॥ हृदयस्पर्शिनी न तर्हीति—गुरु कहते हैं कि यदि तू अन्य के द्वारा प्रेरित हो रहा है तो तू अचेतन है, तब तू स्वार्थ नहीं है, अपितु परार्थ ही है। जिसके द्वारा प्रेरित होकर तू अस्वतन्त्रता से प्रवृत्त होता है, वह चेतन ही स्वार्थ (स्वतन्त्र) है, तू तो संघात ही है ॥ ६७ ॥ यद्यचेतनोऽहम्, कथं सुखदुःखवेदनां भवदुक्तं च जानामि ? ॥६८॥ हृदयस्पर्शिनी यदीति—शिष्य कहता है कि यदि मैं अचेतन हूँ, तो सुख-दुःख के अनुभव को या आपकी बात को कैसे समझ रहा हूँ ? ॥ ६८ ॥ गुरुरुवाच--किं सुखदुःखवेदनाया मदुक्त ञ्चान्यस्त्वम्, किंवाऽनन्य एव इति ॥६९॥ हृदयस्पर्शिनी गुरुरिति—गुरु बोले—तू सुख-दुःख के अनुभवात्मक ज्ञान से और मेरे कथन से भिन्न है, अथवा उनसे अभिन्न ही है ? ॥ ६९ ॥ शिष्य उवाच--नाहं तावदनन्यः । कस्मात् ? यस्मात्तदुभयं कर्मभूतं घटादिकमिव जानामि । यद्यनन्योऽहम्, तेन तदुभयं न जानीयाम्, किंतु जानामि, तस्मादन्यः । सुखदुःखवेदनाविक्रिया च स्वार्थैव प्राप्नोति, त्वदुक्तं च स्यात्, अनन्यत्वे । नच तयोः स्वार्थता युक्ता । नहि चन्दनकण्टककृते सुखदुःखे चन्दनकण्टकार्यै, घटोपयोगो वा घटार्थः । तस्मात्तद्विज्ञातुर्मम चन्दनादिकृतोऽर्थः । अहं हि ततोऽन्यः समस्तमर्थं जानामि बुद्धचारूढम् ॥७०॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य इति—शिष्य ने कहा—मैं उनसे अभिन्न (अनन्य) तो हूँ नहीं । अभिन्न क्यों नहीं हूँ ? क्योंकि मैं घटादि के समान कर्मभूत उन दोनों को जानता हूँ । यदि मैं उनसे अनन्य (अभिन्न) होता तो उन दोनों को जान नहीं सकता था, किन्तु जानता हूँ । यदि उनसे मेरा अभेद होता तो सुख-दुःख का अनुभवरूप विकार स्वार्थ ही सिद्ध होता और फिर आपके कहे हुए अनित्यत्व आदि दोष भी प्राप्त होते । किन्तु उनका स्वार्थ होना ठीक नहीं है । क्योंकि चन्दन और कण्टक से उत्पन्न होनेवाले सुख और दुःख, चन्दन और कण्टक के ही लिए नहीं होते, उसी तरह घट का उपयोग भी घट के लिए ही नहीं होता । अतः चन्दन आदि से उत्पन्न हुआ कार्य, उसके जाननेवाले मुझ ज्ञाता के लिए ही है। और मैं तो उससे भिन्न हूँ तथा अपनी बुद्धिवृत्ति पर आरूढ़ हुए समस्त कार्य को जानता हूँ ॥ ७० ॥ १. ( भग. गी. ३।३६ )
३०८ उपदेशसाहस्री
तं गुरुरुवाच--एवं तर्हि स्वार्थस्त्वं चितिमत्त्वात्, न परेण प्रयुज्यसे । नहि चितिमान् परतन्त्रः परेण प्रयुज्यते, चितिमत्प्रश्रितिमदर्थत्वानुपपत्तेः, समत्वात्, प्रदीपप्रकाशयोरिव नाप्यचितिमदर्थत्वं चितिमतो भवति, चितिमतोऽचितिमत्त्वादेव स्वार्थसम्बन्धानुपपत्तेः नाप्यचितिमतो रन्योन्यार्थत्वं दृष्टम् । नहि काष्ठकुड्ये अन्योन्यार्थं कुरुतः ॥७१॥
हृदयस्पर्शिनी तमिति - तब उस शिष्य से गुरु बोले - इस प्रकार यदि तुम अपने को संघात से भिन्न समझते हो तो तुम स्वार्थ (स्वयं अपने लिए) ही हो, और चेतन होने के कारण तुम किसी अन्य (चेतन) से प्रयुक्त नहीं होते हो । क्योंकि कोई भी चेतन (चितिमान्) परतन्त्र होकर किसी दूसरे (चेतन) के द्वारा प्रयुक्त नहीं किया जाता । क्योंकि दीपक और प्रकाश के समान वे दोनों चेतन तुल्य होने के कारण किसी चेतन का किसी दूसरे चेतन के लिए होना संभव नहीं है । और न ही चेतन का किसी अचेतन के लिए होना संभव है । और अचेतन होने के कारण अचेतन का स्वार्थसंबंध होना भी संभव नहीं है, एवं न ही किसी अचेतन को किसी अन्य अचेतन के लिए देखा गया है, अर्थात् अचेतन पदार्थ परस्पर एक दूसरे के लिए नहीं होते हैं । जैसे काष्ठ और भित्ति एक दूसरे का कार्य नहीं किया करते ॥ ७१ ॥
ननु चितिमत्त्वे समेऽपि भृत्यस्वामिनोरन्योन्यार्थत्वं दृष्टम् ॥७२॥
हृदयस्पर्शिनी नन्विति - इस पर शिष्य पुनः शंका करता है - दो चेतनों में चेतनता की समानता रहने पर भी स्वामी और सेवक को एक दूसरे के लिए देखा जाता है ॥ ७२ ॥
नैवम्, अग्नेरुष्णप्रकाशवत्तव चितिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात् । प्रदर्शितश्च दृष्टान्तः प्रदीप- प्रकाशयोरिवेति । तत्रैवं सति, स्वबुद्ध्यारूढमेव सर्वमुपलभसे अग्न्युष्णप्रकाशतुल्येन कूटस्थनित्यचैतन्य- स्वरूपेण । यदि चैवमात्मनः सर्वदा निर्विशेषत्वमुपगच्छसि, किमित्यूचिवान् सुषुप्ते विश्रम्य विश्रम्य जाग्रत्स्वप्नयोर्दुःखमनुभवामि, किमयमेव मम स्वभावः, किंवा *न ? इति च किमसौ व्यामोहोऽपगतः किंवा न ? ॥७३॥
हृदयस्पर्शिनी नैवमिति - गुरु कहते हैं कि जैसा तुम समझ रहे हो, वैसा नहीं है । तुम्हारा चैतन्य, अग्नि के उष्णत्व और प्रकाश के समान है, यह बताना हम चाह रहे हैं । अतएव इस विषय में दीपक और प्रकाश का दृष्टान्त भी हमने प्रदर्शित किया था। ऐसा होने के कारण ही अग्नि के उष्णत्व, प्रकाश के तुल्य तुम अपने कूटस्थ नित्य चैतन्यस्वरूप से ही अपनी बुद्धि पर आरूढ हुए सभी पदार्थों का अनुभव करते हो । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार दीपक अपने प्रकाश से व्याप्त हुए पदार्थों (वस्तुओं) को अपने स्वभाव (स्वरूप) से ही प्रकाशित कर देता है । उन्हें प्रकाशित करने के लिए उसे कोई किसी प्रकार का व्यापार नहीं करना पड़ता है । अतः स्वामिचैतन्य का उपकारक सेवक का शरीर- रूप अचेतन अंश (भाग) ही है, उसका 'आत्मा' नहीं । उसी प्रकार सेवक के चैतन्यभाग का उपकारक भी स्वामी का शरीररूप अचेतन भाग ही है, स्वामी का चैतन्य नहीं । उन दोनों के चेतन भाग, एक-दूसरे के अचेतन भागों द्वारा किए हुए उपकारों के केवल प्रकाशकमात्र हैं । इस प्रकार यदि तुम आत्मा के नित्य निर्विशेषत्व को जान गये हो तो 'मैं सुषुप्ति में विश्राम ले-ले कर जाग्रत् और स्वप्नावस्था में बार-बार दुःख का अनुभव करता हूँ, क्या यह मेरा स्वभाव ही है, अथवा किसी निमित्त से (नैमित्तिक) है ? - ऐसा तुमने क्यों कहा था ? अब तुम्हारा यह व्यामोह दूर हुआ या नहीं ? अब तुम अपने को मैं नित्यमुक्त हूँ, मैं संघाताध्यासकर्ता नहीं हूँ, मुझे संघातधर्मसंसर्ग भी नहीं है, ऐसा समझो और स्वस्थ हो जाओ ॥ ७३ ॥
- नैमित्तिकः - पाठान्तरम् ।
कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरणम् ३०९ इत्युक्तः शिष्य उवाच--भगवन्, अपगतस्त्वत्प्रसादाद्व्यामोहः, किंतु मम कूटस्थतायां संशयः । कथम् ? शब्दादीनां स्वतः सिद्धिर्नास्ति, अचेतनत्वात्, शब्दाद्याकारप्रत्ययोत्पत्तेस्तु तेषाम् प्रत्ययानामितरेतरव्यावृत्तविशेषाणां नीलपीताद्याकार*त्वस्य स्वतः सिद्धयसंभवात् । तस्माद्वाह्याकार- निमित्तत्वं गम्यत इति बाह्याकारवच्छब्दादिसिद्धिः । तथा प्रत्ययानामप्यहंप्रत्ययालम्बनवस्तुभेदानां संहतत्वाच्चैतन्नोपपत्तेः । स्वार्थत्वासंभवात् स्वरूपव्यतिरिक्तग्राहकग्राह्यत्वेन सिद्धिः, शब्दादिवदेव । असंहतत्वे सति चैतन्यात्मकत्वात्स्वार्थोऽप्यहंप्रत्ययानां नीलपीताद्याकाराणामुपलब्धेति विक्रियावानेव, कथं कूटस्थः ?--इति संशयः ॥७४॥ हृदयस्पर्शिनी इत्युक्त इति—इस प्रकार गुरु के समझाने पर शिष्य बोला—भगवन् ! आपके अनुग्रह से मेरा मोह दूर हो गया । तथापि मुझे अपनी कूटस्थता के विषय में सन्देह है । 'कूट' का अर्थ 'निहाई' है । स्वर्णकार या लुहार जिस पर रखकर कोई चीज गढ़ा करते हैं, उस पर कितनी ही चोट करने पर भी उसमें किसी प्रकार का विकार नहीं होता, वह निर्विकार ही रहता है। उसी प्रकार यह आत्मा भी निर्विकार है । अतएव उसे 'कूटस्थ' कहा जाता है। उसकी कूटस्थता में तुम्हें सन्देह क्यों हो रहा है ? 'शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि विषय तो अचेतन हैं, उस कारण उनकी स्वतः सिद्धि (स्वतः स्फुरण) नहीं हो सकती । शब्दादि की सिद्धि (स्फूति) तो शब्दाद्याकाररूप ज्ञान की उत्पत्ति से ही होती है । शब्दादिकों के आकार, प्रत्ययरूप (ज्ञानरूप) होने से उनकी स्वातिरिक्त ग्राह्यता नहीं है । इस प्रकार विज्ञान- वादी के मत से उसने यह आशंका की है । उसका निराकरण गुरु कर रहे हैं कि जिनके विशेषण एक-दूसरे से पृथक् हैं, ऐसे जो नील-पीतादि आकार के ज्ञान हैं, उनकी भी स्वतः सिद्धि होना संभव नहीं है । इसलिए उनका भी बाह्या- कारनिमित्तक होना सिद्ध होता है । क्योंकि ज्ञान (प्रत्यय) प्रकाशस्वरूप होने के कारण परोपराग के बिना उनकी नील- पीताद्याकारवत्ता अपने आप भी असंभव है । अतः शब्दादिकों का प्रत्ययमात्र (ज्ञानमात्र) स्वरूप नहीं है। इस कथन से बाह्य आकारों के समान शब्दादि के आकारत्व की भी सिद्धि हो जाती है। चैतन्य से पृथक् आकारवाले पराग्व्यवहारयोग्य जो शब्द-स्पर्शादि विषय हैं, उनके द्वारा प्रत्ययों का आकार होने से उन प्रत्ययों की सिद्धि होती है, स्वतः नहीं । इस प्रकार शब्दादि विषयों को यदि तुम स्व-व्यतिरिक्त प्रत्ययग्राह्य समझते हो तो प्रत्ययस्वरूप में विशेषाभाव की सिद्धि होने से उसमें कूटस्थता की सिद्धि होती है, ऐसी आशंका यदि हो तो उसका समाधान यह है कि विषयसंसृष्ट होकर भासमान विषयाकार प्रत्यय आगमापायी होने से स्वप्रकाश चैतन्यरूप नहीं होते हैं, किन्तु अन्य- साक्षिक ही होते हैं । उनका स्वरूपविशेष इस प्रकार का होता है—अहं प्रत्यय की आलम्बनभूत वस्तु (अन्तःकरण) के भेदरूप शब्दादि ज्ञान भी संहत होने के कारण अचेतन हैं। ऐसी स्थिति में उनका स्वार्थत्व संभव न होने के कारण शब्दादि के समान उनकी सिद्धि भी अपने स्वरूप से भिन्न ग्राहक के द्वारा ग्राह्य रूप से ही हो सकती है । इसलिए असंहत होने के कारण स्वार्थ रहने पर भी आत्मा चेतनस्वरूप होने से अन्तःकरण की नील-पीतादिरूप वृत्तियों को प्राप्त करता है । अतः वह विकारी ही है, वह कूटस्थ कैसे हो सकता है ? यही मुझे सन्देह है । निष्कर्ष यह है कि शब्द- स्पर्शादि विषय तो अचेतन हैं । इसलिए उनका स्फुरण तदाकार ज्ञान के ही अधीन है। जैसे प्रकाशशून्य घटादि पदार्थ, प्रकाश से व्याप्त होने पर ही अवगत हुआ करते हैं, वैसे ही शब्दादि विषयों का ज्ञान भी अन्तःकरणवृत्ति के तदाकार होने पर ही होता है। इस कथन से विज्ञानवादी बौद्ध के इस मत का भी खण्डन हो जाता है कि 'बाह्य पदार्थ कोई नहीं है । यह जो कुछ भी प्रतीत होता है, वह सब विज्ञान का ही परिणाम है' । बाह्य पदार्थों की असत्ता को यदि स्वीकार करते हैं तो वृत्तियों के नील-पीतादि भेद का क्या कारण बताओगे ? दूसरी बात यह भी है कि यदि समस्त पदार्थों को अन्तर ही (ज्ञानाकार ही) मानोगे तो 'अयं नीलः' की जगह 'अहं नीलः' यह कहना होगा । अतः बौद्धों का विज्ञानवाद उचित नहीं है । ये नील-पीतादि ज्ञान भी संहत होने के कारण अचेतन ही हैं । अतः इनको प्रकाशित करनेवाला कोई अन्य ही होना चाहिए । वह अन्य, आत्मा के अतिरिक्त कोई नहीं हो सकता । वह आत्मा, उन विषयों को तदाकार होकर ही प्रकाशित करेगा, तब उसका (आत्मा का) विकारी होना सिद्ध हो जायगा । यह आशंका शिष्य ने की है ॥ ७४ ॥
- कारवतां, कारवत्तायाः—पाठौ । † ब्दाद्याकारत्व—पाठान्तरम् ।
३१० उपदेशसाहस्री तं गुरुर्वाच-न युक्तस्तव संशयः, यतस्तेषां प्रत्ययानां नियमेनाशेषत उपलब्धेरेवापरिणा- मित्वात्कूटस्थत्वसिद्धौ निश्चयहेतुमेवाशेषचित्तप्रचारोपलब्धिं संशयहेतुमात्थ । यदि हि तव परिणामित्वं स्यात्, अशेष-स्वविषयचित्तप्रचारोपलब्धिर्न स्यात्, चित्तस्य* स्वविषये, यथा चेन्द्रियाणां स्वविषयेषु; न च तथाऽऽत्मनस्तव स्वविषयैकदेशोपलब्धिः । अतः कूटस्थतैव तवेति ।।७५।। हृदयस्पर्शिनी तं गुरुरिति-यदि तुम दृश्य और दर्शन का विवेचन करोगे तो तुम्हें संशय नहीं होगा, यह मन में रखकर गुरु उससे बोले-तुम्हारा यह संशय उचित नहीं है। क्योंकि उन प्रत्ययों की नियमेन पूर्णतया जो अपरिणामिनी उपलब्धि होती है, उसीसे आत्मा के कूटस्थत्व की सिद्धि का निश्चय हो जाता है, अर्थात् कूटस्थत्व के निश्चय करने में यह अपरिणामिनी उपलब्धि ही हेतु है। उन समस्त चित्तवृत्तियों की उपलब्धि को ही तुम अपने संशय का कारण समझ रहे हो। यदि तुम परिणामी होते तो, तुम्हें अपने विषय के प्रति चित्त की सम्पूर्ण गतियों का ज्ञान न हो पाता । जैसे चित्त को अपने विषय का तथा इन्द्रियों को अपने विषयों का केवल एकदेशीय ज्ञान हो पाता है, उन्हीं के समान तुझ आत्मा को अपने विषय के केवल एक देश की ही उपलब्धि (ज्ञान) नहीं होती, अपितु सार्वदेशिक उपलब्धि होती है। अतः तेरी (तुझ आत्मा की) कूटस्थता ही सिद्ध होती है। यह जो तुम समझ रहे हो कि अन्तःकरण की वृत्तियाँ परस्पर व्यावृत्त- स्वरूप की होने से जड़ हैं, अतः उन सभी का कोई अन्य प्रकाशक होना चाहिये, और वह 'आत्मा' ही हो सकता है, इसलिये 'आत्मा' विकारी है। किन्तु यही कथन उस आत्मा की कूटस्थता को सिद्ध कर देता है, क्योंकि 'आत्मा' उन वृत्तियों के केवल किसी अंशविशेष का ही प्रकाशक नहीं है, अपितु अन्तःकरण की जितनी भी ज्ञात-अज्ञात वृत्तियाँ हैं; उन सभी का एकरूप से प्रकाशक है। जो विकारी प्रकाशक होते हैं, वे विषय के केवल अंशमात्र को प्रकाशित करते हैं। जैसे नेत्र, घर का जितना भाग सामने रहता है, उतने भाग को ही देख सकता है, पीछे के भाग को नहीं देख सकता । किन्तु आत्मा ऐसा नहीं है। वह ज्ञात-अज्ञात रूप से रहने वाली सभी वृत्तियों का अखण्ड प्रकाशक है। इस कारण वह आत्मा नित्य निर्विकार है ॥ ७५ ॥ तत्राह-उपलब्धिर्नाम धात्वर्थो विक्रियैव, उपलब्धुः कूटस्थात्मता चेति विरुद्धम् ।।७६।। हृदयस्पर्शिनी तत्रेति-इस पर शिष्य कहता है-प्रकृति-प्रत्ययार्थ के पर्यालोचन से उपलब्ध को कूटस्थ कहना विरुद्ध प्रतीत हो रहा है। क्योंकि 'उप' उपसर्गवाले 'लभ्' धातु से 'कर्तरि' 'तृच्' का विधान किया है। और 'उपलब्धि' रूप धात्वर्थ ही क्रिया है। और क्रिया तो उत्पत्ति-विनाशवती हुआ करती है, अतः वह विकाररूपा है। ऐसी स्थिति में उपलब्धारूप कर्ता को निर्विकार, कूटस्थ कैसे बता रहे हैं ? ॥ ७६ ॥ न, धात्वर्थविक्रियायामुपलब्ध्युपचारात् । यो हि बौद्धः प्रत्ययः, स धात्वर्थो विक्रियात्मकः आत्मनः उपलब्ध्याभासफलावसान इत्युपलब्धिशब्देनोपचर्यते, यथा छिदिक्रिया द्वैधीभावफलावसानेति धात्वर्थत्वेनोपचर्यते तद्वत् ॥७७॥ हृदयस्पर्शिनी नेति-इस पर गुरु कहते हैं-प्रकृतिभूत धात्वर्थ क्रिया ही हो और प्रत्ययार्थ कर्ता ही सर्वत्र मुख्य हो, ऐसा कोई नियम नहीं है। क्योंकि "गडि वदनैकदेशे", "सविता प्रकाशते", "सविता प्रकाशयति" यहाँ व्यभिचार दिखाई देता है। अतः प्रकृत में धात्वर्थ तत्कर्तृवाचक उपलब्ध शब्द को गौणार्थक मानना ही उचित होगा। अर्थात् धातु के अर्थरूप विकार में 'उपलब्धि' का गौण प्रयोग (उपचार) है। बुद्धिपरिणाम (बौद्ध) अर्थात् बुद्धिजनित ज्ञान ही विकाररूप धात्वर्थ हुआ करता है। अर्थात् धात्वर्थ ही विक्रियारूप (विशिष्ट क्रियारूप) है। अतः बुद्धि (अन्तःकरण) द्रव्य होने से उसका परिणाम मृत्परिणाम घटादि की तरह द्रव्य ही है, वह क्रियारूप नहीं है, ऐसा समझना ठीक नहीं है। मृदादि के समान अपने आकार को तिरोहित करके अन्तःकरण का परिणाम नहीं हुआ करता, किन्तु जलूका या आलोक की
- स्येव
कूटस्थाद्वयात्मबोधप्रकरणम् ३११ तरह संकोच-विकास के साथ उसका परिणाम हुआ करता है। वह परिणाम परिणामिचेष्टारूप है। अतः उसे क्रिया कहना ही उचित है। उस क्रिया में 'उपलब्धि' शब्द का गौण प्रयोग करने में निमित्त यह है कि "सत्यं ज्ञानम्"१, "विज्ञान- घन एव"२ इत्यादि श्रुतियों से सिद्ध जो आत्मा की स्वरूपभूता उपलब्धि है, वह तो अपने आभासरूप फल तक ही है। अतः उसका 'उपलब्धि' शब्द से वैसे ही उपचार किया जाता है, जैसे किसी वस्तु के दो खण्ड होने में समाप्त हो जानेवाली छेदनक्रिया का धात्वर्थ के रूप में उपचार किया जाता है। अर्थात् जैसे किसी वस्तु के दो टुकड़े हो जाने में छेदन क्रिया का उपचार (गौण प्रयोग) किया जाता है, वैसे ही तप्त हुए लोहपिण्ड में अग्नि के व्याप्त होने के समान चिदाभासरूप से बुद्धिवृत्ति में व्याप्त होने के कारण चेतन आत्मा में 'उपलब्धि क्रिया' का उपचार (गौण प्रयोग) हुआ करता है। जिस प्रकार लोहपिण्ड में व्याप्त हुआ अग्नि सर्वथा निष्क्रिय और निर्विकार होता हुआ भी जलता है, प्रकाश करता है, इत्यादि रूप से क्रियावान्-सा बताया जाता है, उसी प्रकार यद्यपि चिदाभासविशिष्ट अन्तःकरण ही सभी पदार्थों का उपलब्धा है, तथापि अपने स्वाभाविक चैतन्य से अन्तःकरण में वस्तु की उपलब्धि की शक्ति प्रदान करने के कारण उस आत्मा को ही 'उपलब्धा' कह देते हैं। 'उपलब्धि' शब्द का अर्थ तो 'अर्थप्रकाश' है। वह अर्थ (वस्तु, पदार्थ) का धर्म तो हो नहीं सकता, क्योंकि अर्थ (वस्तु, पदार्थ) जड़ है। वह अन्तःकरण का भी धर्म नहीं हो सकता, क्योंकि वह करण होने से उसमें चैतन्यप्रकाशाश्रयत्व हो नहीं सकता। तथापि स्वयं प्रकाशमान नित्य चैतन्य आत्मा में बिना व्यवधान के 'अहं' रूप से अध्यास होने के कारण, अपनी सत्ता में प्रकाश का अव्यतिरेक रहने से, आत्म चैतन्य व्याप्त हुई तत्तदर्थाकार वृत्तियों को उत्पन्न करता हुआ अन्तःकरण ही उपलब्धा, कर्ता, प्रमाता, भोक्ता होने के कारण वही प्रमातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, अनुभवितृत्व आदि व्यवहार के योग्य होता है। यह व्यवहार 'अयःपिण्डो दहति, प्रकाशयति' के समान ही समझना चाहिये। और आत्मा आकाश के समान अविक्रिय होने से कूटस्थ रहता हुआ भी उस प्रकार के अन्तःकरण में स्थित अपने आभास का विवेक न हो पाने से उस अन्तःकरण के धर्म और अवस्थाओं से युक्त हुआ-सा मिथ्या ही समझा जाता है, जैसे अयःपिण्डगत आभास के अविवेक से अग्नि को ही चतुष्कोण, वर्तुल, कृश, स्थूल, उत्पन्न, नष्ट समझा जाता है। तस्मात् विकारी अन्तःकरण में कर्तृत्व रहने पर भी उपलब्धि में क्रियमाणता के न होने से उपलब्धिस्वरूप आत्मा की कूटस्थता सिद्ध हो जाती है ॥ ७७ ॥
इत्युक्तः शिष्य आह—ननु भगवन् मम कूटस्थत्वप्रतिपादनं प्रत्यसमर्थो दृष्टान्तः ? कथम् ? छिदिः छेद्यविक्रियावसाना उपचर्यते यथा धात्वर्थत्वेन, तथोपलब्धिशब्दोपचरितोऽपि धात्वर्थो बौद्धः प्रत्ययः आत्मन उपलब्धिविक्रियावसानश्चेत्, नात्मनः कूटस्थतां प्रतिपादयितुं समर्थः ॥७८॥
हृदयस्पर्शिनी इत्युक्त इति—उक्त अर्थ को ही और अधिक विशद करने के लिये शिष्य की शंका को उपस्थित करते हैं। शिष्य कहता है कि आपका बताया हुआ दृष्टान्त, दार्ष्टान्त के अनुरूप नहीं है। अर्थात् आपका दिया हुआ दृष्टान्त, मेरी (आत्मा) कूटस्थता को बताने में असमर्थ है। गुरु पूछते हैं—किस प्रकार असमर्थ है ? तब शिष्य कहता है कि जिस प्रकार छेद्य वस्तु के विकार में छिदिक्रिया का गौण प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार 'उपलब्धि' शब्द के गौण प्रयोगात्मक धात्वर्थरूप बौद्ध प्रत्यय का फल भी यदि आत्मा के उपलब्धिरूप विकार में ही है तो वह आत्मा की कूटस्थता का प्रतिपादन करने में असमर्थ है। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार छेदन क्रिया के द्वारा निष्पन्न होनेवाला किसी वस्तु का द्वैधीभाव एक विकार है, उसी प्रकार 'उपलब्धि' भी एक विकार है। अतः बौद्ध-प्रत्ययरूप उपलब्धि का आत्मा में भले ही उपचार होता हो, तथापि साध्य होने के कारण उपलब्धि भी विकार ही है। क्योंकि साध्यमात्र अनित्य होता है। अतः उसका कर्ता आत्मा कूटस्थ नहीं हो सकता है ॥ ७८ ॥
१. (तै. उ. २।१) २. (बृ. उ. २।४।१२)
३१२ उपदेशसाहस्री गुरुवाच—सत्यमेवं स्यात्, यद्युपलब्ध्युपलब्ध्रोर्विशेषः। नित्योपलब्धिमात्र एव ह्युपलब्धा। न तु तार्किकसमय इवान्या उपलब्धिः, अन्य उपलब्धा च ॥७९॥ हृदयस्पर्शिनी गुरुरिति—गुरु बोले—यदि उपलब्धि और उपलब्धा में भेद होता तो तुम्हारी शंका उचित हो सकती थी, किन्तु उपलब्धा तो नित्य उपलब्धिमात्र ही है। 'नित्य' शब्द से क्षणिक विज्ञानवादी बौद्ध का और 'मात्र' शब्द से भेदा- भेदवादी का व्यावर्तन किया गया है। नैयायिक के अनुसार वेदान्त सिद्धान्त में 'उपलब्धि' अन्य हो और 'उपलब्धा' अन्य हो, ऐसा नहीं है। हमारे मत में तो "प्रज्ञानघन एव",$^१$ "प्रज्ञानं ब्रह्म"$^२$ इत्यादि श्रुतिसिद्ध उपलब्धि(ज्ञान)स्वरूप ही आत्मा है ॥ ७९ ॥ ननूपलब्धिफलावसानो धात्वर्थः कथमिति ? ॥८०॥ हृदयस्पर्शिनी नन्विति—इस पर शिष्य ने पूछा कि 'उपलब्धि' शब्द का धात्वर्थ उपलब्धिरूप फलपर्यन्त आपने बताया, वह कैसे उपपन्न होगा ? ॥ ८० ॥ उच्यते---शृणु। उपलब्ध्याभासफलावसान इत्युक्तम्। किं न श्रुतं तत्त्वया ? न त्वात्मा विक्रियोत्पादनावसान इति मयोक्तम् ॥८१॥ हृदयस्पर्शिनी उच्यत इति—गुरु ने कहा—सुनो, क्या तुमने यह नहीं सुना कि उपलब्धि के आभासात्मक फल तक ही इसका धात्वर्थ है, यह मैंने कहा था। आत्मा, विकारोत्पत्तिरूप फल तक है, ऐसे मैंने नहीं कहा था। उपलब्धि तो आत्मा का स्वरूप ही है। यदि वह उसका फल या गुण होती तो वह अनित्य होती, उस अवस्था में आत्मा की कूटस्थता सिद्ध नहीं हो सकती थी। परन्तु वास्तविकता इस प्रकार नहीं है। 'उपलब्धि' तो आत्मा का स्वरूप ही है। बुद्धि में उस स्वरूप- चैतन्य के प्रतिबिम्बित होने से बुद्धि चैतन्यवत् प्रतीत होती है। बुद्धि में प्रतिबिम्बित हुए उस चैतन्य को 'चिदाभास' के नाम से कहते हैं। वही बुद्धिवृत्तियों के परिणाम का प्रकाशक है। उसी के कारण एक ही अधिकारी चेतन उपाधिवश कर्ता, भोक्ता, विज्ञाता आदि नामों से कहा जाता है, किन्तु वास्तव में वह असंग, कूटस्थ ही है। आविर्भाव-तिरोभाव धर्मवाली अन्तःकरण की वृत्तियाँ होती हैं। उन धर्मों से विशिष्ट होकर ही वृत्तियों का स्फुरण होता है। विषयस्थ चैतन्य के साथ अभेदेन प्रकाशमानवृत्तितत्स्थ आभासाश्रय के रूप में भासित होनेवाले आत्मा को 'प्रमाता' कहते हैं। कर्मेन्द्रियों को अधिष्ठान बनाकर क्रियावत्प्राणप्रधान अन्तःकरणलिङ्गत आभास का विवेक न होने से वही 'कर्ता' कहा जाता है। शुभाशुभकर्मोपस्थापित-अन्तःकरण-परिणामविशेष को अविवेक के कारण अपना ही समझनेवाला आत्मा 'भोक्ता' कहा जाता है। इन सभी चित्तविलासावस्थाओं को स्वरूपचैतन्य का अनुगम करने मात्र से साक्षात् अवभासित कराता हुआ-सा, भासित होनेवाला, अलुप्तप्रकाश, असन्दिग्ध, अविपर्यस्त, अविषय साक्षी को 'उपलब्धा', 'साक्षी', 'ज्ञाता' कहा जाता है। वृत्ति का विनाश होने से तद्गत चिदाभास का भी विलय होता है, किन्तु उसका संस्कार रहने पर, कालान्तर में पूर्वावगत विषयाकार स्मृतिवृत्ति का जब उदय होता है, तब तद्गत आभास द्वारा उसी को 'स्मर्ता' कहते हैं। समस्त कार्य-कारणप्रपञ्चोपलक्षित उसी चिदात्मा को तदनुवृत्त सत्ता के अभेद रूप में 'सर्वाधिष्ठान' कहते हैं। कारणोपाधि के अविवेक से और अलुप्त ज्ञानशक्तित्व के रहने से वही 'अन्तर्यामी' आदि शब्दों का वाच्य होता है। सबका तात्पर्य यह है कि किसी न किसी उपाधि के कारण कहीं-कहीं वैसा-वैसा व्यवहार होने से अविद्यावशात् वैसा भासमान होता हुआ भी आत्मा स्वरूपतः निर्विकार, निर्धर्मक, असंग और कूटस्थ ही है ॥ ८१ ॥ १. (बृ. उ. ४।५।१३) २. (ऐ. उ. ५।३)
कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरणं ३१३ शिष्य उवाच--कथं तर्हि कूटस्थे मय्यशेषस्वविषयचित्तप्रचारोपलब्धृत्वमित्यात्थ ? ॥८२॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य इति-तब शिष्य बोला कि आपने यह क्यों कहा था कि मुझ कूटस्थ में अपने चित्त की समस्त वृत्तियों का उपलब्धृत्व अर्थात् उपलब्धंकर्तृत्व है ॥ ८२ ॥ तं गुरुराह--सत्यमेवावोचम् तेनैव कूटस्थतामवोचं* तव ॥८३॥ हृदयस्पर्शिनी तमिति-उसपर गुरु ने कहा कि मैंने सत्य कहा था । उसी के द्वारा मैंने तुम्हारी कूटस्थता को भी तुम्हें बताया था ॥ ८३ ॥ यद्येवं भगवन्, कूटस्थनित्योपलब्धिस्वरूपे मयि शब्दाद्याकारबौद्धप्रत्ययेषु च मत्स्वरूपोप- लब्ध्याभासफलावसानवत्सूत्पद्यमानेषु कस्त्वपराधो मम ? ॥८४॥ हृदयस्पर्शिनी यद्येवमिति-आत्मा की अशेष स्वगत विशेषताओं के नित्य निवृत्त रहने से उसकी कूटस्थता का ज्ञान होनेपर अपने स्वरूप को वह जान गया, तथापि अपने आपको यह जो भ्रान्ति हुई, उसका बीज (कारण) समझ में न आने से वह पुनः पूछने लगा। यदि मैं नित्य उपलब्धिरवरूप हूँ, और सम्पूर्ण बौद्ध प्रत्यय मेरे ही आभास से प्रकाशित होते हैं तो इन शब्दादि विषयों के ज्ञानों का ग्रहीता होने में मेरा क्या अपराध है ? इस अभिप्राय से शिष्य कहता है कि भगवन् ! यदि ऐसी बात है तो कूटस्थ नित्योपलब्धिस्वरूप मुझ में मेरी स्वरूपभूता उपलब्धि के आभासरूप फल में पर्यवसित होनेवाले शब्दादिरूप बौद्धज्ञानों के उत्पन्न होने में मेरा क्या अपराध है? अर्थात् उनका ग्रहीता होने के कारण मैं तो विकारी ही सिद्ध हो रहा हूँ ॥ ८४ ॥ सत्यम् नास्त्यपराधः, किन्त्वविद्यामात्रस्त्वपराध इति प्रागेवावोचम् ॥८५॥ हृदयस्पर्शिनी सत्यमिति-गुरु ने कहा कि सत्य है, तुमने अपने अनुभव को नहीं छिपाया, इसलिये तुम्हारा अपराध नहीं है । किन्तु अविद्यामात्र तो अपराध है ही, ऐसा मैं पहले ही कह चुका हूँ ॥ ८५ ॥ यदि, भगवन्, सुषुप्त इव मम विक्रिया नास्ति, कथं स्वप्नजागरिते ॥८६॥ हृदयस्पर्शिनी यदीति-शिष्य कहता है, भगवन् ! सुषुप्तावस्था के समान यदि मुझ में विकार है ही नहीं, तो मुझे स्वप्न और जागरित अवस्था कैसे प्राप्त होती हैं ? ॥ ८६ ॥ तं गुरुराह--किंत्वनुभूयेते त्वया ⁺सन्ततम् ॥८७॥ हृदयस्पर्शिनी तं गुरुरिति-तब गुरु ने उससे कहा-किन्तु इन अवस्थाओं का तुम्हारे द्वारा सतत अनुभव तो किया जा रहा है। अर्थात् क्या तुम उन अवस्थाओं का सतत अनुभव नहीं करते हो ? वे अवस्थाएं तो तुम्हारे चैतन्य से प्रकाश्य हैं, वे तुम्हारी स्वाभावरूप नहीं हैं ॥ ८७ ॥ शिष्य उवाच--बाढमनुभवामि, किंतु विच्छिद्य-विच्छिद्य, न तु सन्ततम् ॥८८॥
- मब्रूवम्-पाठान्तरम् । † सततम्-पाठान्तरम् । ४०
३१४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी शिष्य इति—इस पर शिष्य कहता है—हाँ, अनुभव तो करता हूँ, किन्तु रुक-रुक कर (व्यवधान से) अनुभव करता हूँ, सतत नहीं ॥ ८८ ॥ गुरुराह—तर्हि आगन्तुके त्वेते, न त्वात्मभूते । यदि त्वात्मभूते, चैतन्यस्वरूपवत्स्वतः सिद्धे सन्तते एव स्याताम् । किंच, स्वप्नजागरिते न त्वात्मभूते, व्यभिचारित्वात्, वस्त्रादिवत् । न हि यस्य यस्य यत्स्वरूपं, तत्तद्व्यभिचारि दृष्टम् । स्वप्नजागरिते तु चैतन्यमात्रत्वात् व्यभिचरतः । सुषुप्ते चेत्स्वरूपं व्यभिचरेत् तन्नष्टं, नास्तीति बाध्यं वा स्यात्—आगन्तुकानामतद्धर्माणामुभयात्मकत्वदर्शनात्— यथा धनवस्त्रादीनां नाशो दृष्टः, स्वप्नभ्रान्तिलब्धानां त्वभावो दृष्टः ॥८९॥ हृदयस्पर्शिनी गुरुरिति—गुरु ने उससे कहा—तब तो अवस्थाएँ आगन्तुक ही हैं। सुषुप्ति में आत्मस्वरूप के भासमान होने पर भी स्वप्न-जागरित का अवभास नहीं होता । अतः वे दोनों अवस्थाएँ आत्मा की स्वरूपभूत नहीं हैं। इसी कारण उनका अनुभव तुम्हें विच्छिद्य-विच्छिद्य (रुक-रुककर) होता है । यदि वे तुम्हारी स्वरूपभूत होतीं अर्थात् स्वतः सिद्ध होतीं तो वे निरन्तर अनुभूत होती रहतीं । अतः अनुमान प्रमाण से अवगत होता है कि 'विमते अवस्थे अनात्मभूते व्यभिचारित्वात् वस्त्रादिवत्' अर्थात् वस्त्रादि के समान आगमापायिनी (व्यभिचारिणी) होने के कारण स्वप्न और जाग्रत् अवस्थाएँ आत्मा की स्वरूपभूता नहीं हैं क्योंकि जो जिसका स्वरूप होता है, वह उससे व्यभिचारी (पृथक् रहनेवाला) नहीं देखा गया है। किन्तु स्वप्न और जाग्रत् का तो चैतन्यस्वरूप आत्मा से व्यभिचार (विच्छेद) होता है। यदि सुषुप्ति अवस्था में स्वरूप का व्यभिचार माना जाय तो वह या तो नष्ट हो जाता है या है ही नहीं, इसलिये उसका बाध ही हो जाता है, क्योंकि वस्तु में न रहने वाले आगन्तुक धर्म दो ही प्रकार के देखे जाते हैं। जैसे धन, वस्त्र आदि का तो नाश देखा जाता है, और स्वप्न एवं भ्रान्ति से प्राप्त हुए पदार्थों का सर्वथा अभाव देखा गया है ॥ ८९ ॥ नन्वेवं, भगवन्, चैतन्यस्वरूपमप्यागन्तुकं प्राप्तम्, स्वप्नजागरितयोरिव सुषुप्तेऽनुपलब्धेः, अचैतन्यस्वरूपो वा स्यामहम् ॥९०॥ हृदयस्पर्शिनी नन्विति—शिष्य कहता है—हे भगवन् ! इस प्रकार से तो आत्मा का चैतन्यस्वरूप भी आगन्तुक सिद्ध होता है, क्योंकि स्वप्न और जाग्रत् के तुल्य सुषुप्ति में उसकी उपलब्धि नहीं होती। अथवा मुझमें अचैतन्यस्वरूपता की भी प्राप्ति हो सकती है—क्योंकि अन्य कोई गति नहीं है ॥ ९० ॥ न, पश्य । तदनुपपत्तेः । चैतन्यस्वरूपं चेदागन्तुकं पश्यसि, पश्य, नैतद्वर्षशतेनाप्युपपत्त्या कल्पयितुं* शक्नुमो वयम्, अन्यो वाऽचैतन्योऽपि; तस्य संहतत्वात्पारार्थ्यमनेकत्वं नाशित्वं च न केनचि- दुपपत्त्या वारयितुं शक्यम्—अस्वार्थस्य स्वतःसिद्धयभावादित्यवोचाम । चैतन्यस्वरूपस्य त्वात्मनः स्वतः सिद्धेरन्यानपेक्षत्वं न केनचिद्वारयितुं शक्यम्, अव्यभिचारात् ॥९१॥ हृदयस्पर्शिनी नेति—गुरु ने कहा कि नहीं; देखो, ऐसा कहना उचित नहीं है। अर्थात् वस्तुस्वभाव का आलोचन करने पर चैतन्य की आगन्तुकता अनुपपन्न ठहरती है इसलिये तुम्हारा कहना उचित प्रतीत नहीं हो रहा है। इस पर शिष्य कहता है कि सुषुप्ति में दृष्टि(ज्ञान)रूप चैतन्य का अनुभव नहीं होता परन्तु जाग्रत् आदि अवस्थाओं में उसका अनुभव होता है। अतः चैतन्य भी आगन्तुक ही है, ऐसा मैं सोच रहा हूँ। उस पर गुरु ने उससे पूछा कि यह बताओ कि क्या तुम निरुपाधिक चित्स्वरूप (चैतन्यस्वरूप) को ही आगन्तुक कह रहे हो अथवा नेत्रादिद्वारक बुद्धिवृत्ति से उपहित हुए
- कल्पयितुं—पाठान्तरम् ।
कूटस्थाद्वयात्मबोधप्रकरण ३१५ चित्स्वरूप को आगन्तुक कह रहे हो ? यदि प्रथम पक्ष के अनुसार चैतन्यस्वरूप को ही आगन्तुक समझते हो तो तुम अलौकिक बुद्धिमान् हो। अच्छा; देखो, हम तो न्यायप्रमाणकुशल होते हुए भी किसी युक्ति से सौ वर्ष में भी ऐसी कल्पना नहीं कर सकते और न ही कोई अन्य मूढ (मूर्ख) पुरुष भी ऐसा कह सकता है, जैसा तुम कह रहे हो। अभिप्राय यह है—पहले यह विचार करो कि चैतन्य का आगन्तुकत्व, चैतन्य के द्वारा ही ग्रहण किया जाता है? या अचैतन्य के द्वारा ? इसमें प्रथम पक्ष तो ठीक नहीं होगा, क्योंकि स्वग्राह्यत्व मानने पर स्ववृत्तिविरोध होगा । किसी अंगुली के अग्र भाग से उसी अंगुलि को स्पर्श कर पाना कभी संभव नहीं होता। अथवा असिधारा से उसी असिधारा को नहीं काटा जाता। और न ही किसी अन्य चैतन्य से अन्य चैतन्य की आगन्तुकता को ग्रहण किया जा सकता है। क्योंकि अद्यापि अन्यत्व सिद्ध नहीं हो पाया है। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है क्योंकि स्वयं जड़ का प्रकाश, चित् (चैतन्य) के ही अधीन रहता है, अतः वह जड़, चित् का प्रकाशक कैसे होगा? क्योंकि वह स्वयं ही अप्रकाश है, पराधीन होकर ही वह प्रकाशित हो पाता है। अतः चैतन्य आगन्तुक नहीं है। श्रुति भी इस बात को पुष्ट कर रही है—‘‘यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते अविनाशित्वात् । न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यत् पश्येत्१।” इस प्रकार अनुपपत्ति दिखलाकर प्रथम विकल्प का निराकरण किया। अब अचैतन्य के आपादन बताकर द्वितीय विकल्प का निराकरण कर रहे हैं। संहत होने के कारण (नेत्रादि इन्द्रियद्वारक बुद्धि- वृत्तिरूप उपाधिग्रस्त जो पदार्थ होता है, वह संहत होता है) उसकी परार्थता, अनेकता, और नाशशीलता को भी कोई पुरुष युक्ति के द्वारा निवृत्त नहीं कर सकता, क्योंकि जो स्वार्थ नहीं है, उसकी स्वतःसिद्धि नहीं हो सकती, यह हम पहले ही कह चुके हैं। बात को श्रुति भी पुष्ट कर रही है। “न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुया न न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः २।” चैतन्यस्वरूप आत्मा स्वतः सिद्ध है, अतः वह, अन्य की अपेक्षा नहीं करता, क्योंकि वह अव्यभिचारी है, इस तथ्य का निवारण कोई नहीं कर सकता। उपर्युक्त श्रुति में षष्ठ्यन्त शब्दवाच्य दृष्टि आदि, अन्य द्रष्टा से व्याप्य होने के कारण वे अचैतन्यस्वरूप (जड़) बताये गये हैं। और उनसे भिन्न दृष्टि आदि पदार्थों के स्वरूप का प्रकाशक होने से द्रष्टृ आदि शब्दों से निर्दिष्ट साक्षी नित्यचैतन्यस्वभाव है, यह सिद्ध होता है ॥ ९१ ॥ ननु व्यभिचारो दर्शितो मया—सुषुप्ते न पश्यामीति ॥९२॥ हृदयस्पर्शिनी नन्विति—इस पर शिष्य ने कहा कि मैंने पहले ही व्यभिचार दिखा दिया है कि “मैं सुषुप्ति में नहीं देखता हूँ” ॥ ९२ ॥ न, व्याहतत्वात् कथं व्याघातः ? पश्यतस्तव न पश्यामीति व्याहतं वचनम् । न हि कदाचिद्भगवन्, सुषुप्ते मया चैतन्यमन्यद्वा किंचिद्दृष्टम् । पश्यँस्तर्हि सुषुप्ते त्वम्; यस्माद्दृष्टमेव प्रतिषेधसि, न दृष्टिम् । या तव दृष्टिः, तच्चैतन्यम्, इति मयोक्तम् । यया त्वं विद्यमानया न किंचिद्- दृष्टमिति प्रतिषेधसि, सा दृष्टिस्त्वच्चैतन्यम् । तर्हि सर्वत्राव्यभिचारात्कूटस्थनित्यत्वं सिद्धं स्वत एव, न प्रमाणापेक्षम् । स्वतःसिद्धस्य हि प्रमातुरन्यस्य प्रमेयस्य परिच्छित्तिं प्रति प्रमाणापेक्षा । या त्वन्या नित्या परिच्छित्तिरपेक्ष्यतेऽन्यस्यापरिच्छित्तिरूपस्य परिच्छेदाय, सा हि नित्यैव कूटस्था, स्वयंज्योतिःस्वभावा आत्मनि प्रमाणत्वे प्रमातृत्वे वा न तां प्रति प्रमाणापेक्षा, तत्स्वभावत्वात्, यथा प्रकाशनमुष्णत्वं वा लोहोदकादिषु परतोऽपेक्ष्यते अग्न्यादित्यादिभ्यः, अतत्स्वभावत्वात्, नाग्न्यादित्यादीनां तदपेक्षा, सदा तत्स्वभावत्वात् ॥९३॥ १. (बृ. उ. ४।३।२३) २. (बृ. उ. ३।४।२)
३१६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनो नेति—गुरु कहते हैं-अरे, जैसा तुम समझ रहे हो, वैसा नहीं है। क्योंकि तुमने अभी जो कहा, उसमें विरोध (व्याघात) है। शिष्य ने पूछा-व्याघात किस प्रकार है ? गुरु ने कहा- तुम जो कह रहे हो कि 'मैं नहीं देखता', यही व्याघात है, क्योंकि देखते हुए भी 'मैं नहीं देखता हूँ' कह रहे हो। तुमने अभी कहा था कि 'भगवन् ! मैंने सुषुप्ति में चैतन्य अथवा कोई अन्य वस्तु कभी नहीं देखी' इसी से यह सिद्ध हो जाता है कि सुषुप्ति में भी तुम देखते रहते हो, तुम दृश्य वस्तु का ही निषेध कर रहे हो, देखने का तो नहीं कर रहे हो। अतः वह जो देखना अर्थात् दृष्टि (ज्ञान) है, वही तो चैतन्य है, यह मैं पहले बता चुका हूँ। जिस दृष्टि के विद्यमान रहने से ही तुम 'मैंने कुछ नहीं देखा' इस प्रकार निषेध कर पा रहे हो, वह जो दृष्टि (ज्ञान) है, वह तुम्हारा 'चैतन्य' ही है। तब तो सर्वत्र अव्यभिचार होने के कारण तुम्हारा कूटस्थत्व, नित्यत्व स्वतः सिद्ध ही है। उसमें किसी प्रमाण की अपेक्षा नहीं है। वह तो प्रमाण के प्रवृत्त होने के पूर्व से ही प्रकाशमान है। इस प्रकार के प्रमाता का दृश्य जो अन्य प्रमेय है, उसकी स्फूर्ति (परिच्छित्ति) के लिये उसे प्रमाण की अपेक्षा रहती है। अपने प्रमातृस्वरूप की परिच्छित्ति (स्फूर्ति) के प्रति उसे प्रमाण की अपेक्षा नहीं होती। किन्तु जिस नित्य परिच्छित्ति (संवित्, ज्ञान) की, अन्य अचेतन वस्तुओं के प्रकाशनार्थ अपेक्षा रहती है, वह तो नित्या, कूटस्था, स्वयंप्रकाशस्वरूपा ही है। आत्मा के प्रमाणत्व अथवा प्रमातृत्व में उस परिच्छित्ति को किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा नहीं हुआ करती, क्योंकि वे तो उसके स्वभाव ही हैं। जिस प्रकार लोहे और जल आदि में प्रकाशन अथवा उष्णत्व के लिये अग्नि और आदित्य की अपेक्षा होती है, क्योंकि वे उनके स्वभाव नहीं हैं। परन्तु अग्नि या सूर्य को प्रकाशन या उष्णत्व के लिये किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती है, क्योंकि वे उनके स्वभाव ही हैं। अभिप्राय यह है कि अन्तःकरणवृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्य ही 'प्रमाण' शब्द से कहा जाता है, और वृत्तिमत् अन्तःकरणप्रतिविम्बित चैतन्य 'प्रमातृ' शब्द से कहा जाता है। वे दोनों प्रमेय के अवभासकाल में विविध प्रकार से अवभासित होते हैं। तब ऐसा प्रतीत होने लगता है कि प्रमेय ही स्वतः स्फुरित हो रहा है, इस प्रकार प्रमेय के स्वतः स्फुरण की शंका होने लगती है। किन्तु वस्तुस्थिति वैसी नहीं है। चैतन्य का जो अवभास होता है, उसके लिये किसी अन्य प्रमाता की या अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं पड़ती, अन्यथा अनवस्था प्रसंग आवेगा, और वैसा मानने में कोई उपपत्ति (युक्ति) भी नहीं है। अतः प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय का अवभासक स्वप्रकाश आत्मा है, यह स्पष्ट हो जाता है। नित्यस्वप्रकाश कूटस्थ चिदात्मता उसी की है। अप्रकाश स्वभाववाली वस्तुओं को ही प्रकाशित होने के लिये प्रकाशान्तर की अपेक्षा होती है, किन्तु प्रकाशस्वभाव वाली वस्तु को नहीं ॥ ९३ ॥ अनित्यत्व एव प्रमा स्यात्, न नित्यत्व इति चेत् ॥९४॥ हृदयस्पर्शिनो अनित्यत्व इति-इस पर पुनः शंका होती है कि संवित् (ज्ञान) रूप प्रमा तो प्रमाण का फल है, तब उसे नित्य कैसे कह सकते हैं ? अर्थात् प्रमा तो अनित्य ज्ञान होने पर ही होती है, नित्य ज्ञान होने पर तो नहीं होती। अभिप्राय यह है कि अनधिगत, अबाधित अर्थविषयक ज्ञान को 'प्रमा' कहते हैं। अर्थात् जिस ज्ञान का पहले कभी अनुभव नहीं हुआ है और जिसका कभी बाध भी नहीं होता उसे 'प्रमा' कहते हैं। 'स्मृति' ज्ञान, पूर्वानुभव से होने के कारण वह पूर्वानुभवपूर्वक है, उसका 'अनधिगत' कहने से व्यावर्तन हो गया। और रज्जु में सर्पज्ञानरूप भ्रम, अथवा शुक्ति में रजतज्ञानरूप भ्रम का कालान्तर में बाध हो जाता है। अतः 'अबाधित' कहने से भ्रमज्ञान का निरास हो जाता है। इस प्रकार की 'प्रमा' को प्रमाण का फल हो कहा जाता है। जैसे यथार्थ घट में घटबुद्धि होना ही 'प्रमा' है। वह प्रमाणजन्य है, अतः वह अनित्य है। क्योंकि जो जन्य होता है, वह अनित्य होता है। 'प्रमा' भी जन्य है, अतः उसे अनित्य ही कहा जायगा। तब आत्मज्ञान यदि नित्यसिद्ध है तो उसे 'प्रमा' कैसे कह सकते हैं ॥ ९४ ॥ न, अवगतेर्नित्यत्वाऽनित्यत्वयोर्विशेषाऽनुपपत्तेः- नहि अवगतेः प्रमात्वेऽनित्यावगतिः प्रमा, न नित्या इति विशेषोऽवगम्यते ॥९५॥
कूटस्थाऽद्वैतात्मबोधप्रकरण ३१७ हृदयस्पर्शिनी नेति—इस पर गुरु कहते हैं कि ऐसी बात नहीं है ।—'अर्थावगतिर्हि प्रमा'—अर्थावबोध को 'प्रमा' कहते हैं। उसको स्वरूपतः अनित्य मानने में कोई युक्ति नहीं है। चक्षुरादि इन्द्रियद्वारक बुद्धिवृत्ति से व्यक्त होने वाली अवगति(ज्ञान)रूप प्रमा के नित्य रहने पर उसमें 'प्रमात्व' नहीं रहता और उसके अनित्य रहने पर 'प्रमात्व' रहता है— ऐसा विशेष मानने में कोई विनिगमक नहीं है। अर्थात् 'ज्ञान' के नित्य या अनित्य होने से उसके प्रमात्व में कोई विशेषता नहीं होती ॥ ९५॥ नित्यायां प्रमातुरपेक्षाभावः, अनित्यायां तु यत्नान्तरितत्वादवगतिरपेक्षत इति विशेषः स्यादिति चेत् ॥९६॥ हृदयस्पर्शिनी नित्यायामिति—इस पर शिष्य 'विनिगमनाभाव नहीं है', ऐसी शंका कर रहा है। क्योंकि अवगति (संविद्) को नित्य मानने पर कारकव्यापार व्यर्थ हो जायगा, यह विशेष ही विनिगमक है। अर्थात् नित्य ज्ञान में प्रमाता की अपेक्षा नहीं होगी, क्योंकि अनित्य ज्ञान में ही प्रमाता के यत्न की अपेक्षा होती है। अर्थात् प्रमाता के यत्न से अनित्य ज्ञान ही साध्य होता है, इसलिये उसमें अवगति (प्रतीति) की अपेक्षा हुआ करती है। यह विशेषता यदि कही जाय तो विनिगम का भाव नहीं है ॥ ९६ ॥ सिद्धा तर्ह्यात्मनः प्रमातुः स्वतःसिद्धिः प्रमाणनिरपेक्षतयैवेति ॥९७॥ हृदयस्पर्शिनी सिद्धेति—गुरु कहते हैं कि नित्यज्ञान के पक्ष में प्रमाण की अपेक्षा नहीं है, ऐसा यदि तुम समझते हो तो प्रमाता आत्मा के स्वरूप की स्वतः सिद्धि अर्थात् स्वप्रकाशता उसी से अर्थात् प्रमाणनिरपेक्षता से ही सिद्ध हो जाती है। अनित्य और अस्वप्रकाश की जड़ता के कारण उसे आत्मा कहना अनुपपन्न है ॥ ९७ ॥ अभावेऽप्यपेक्षाऽभावः, नित्यत्वादेवेति चेत् ॥९८॥ हृदयस्पर्शिनी अभाव इति—उसपर शिष्य कहता है कि आत्मप्रभा के नित्य होने से यदि प्रमाण की अपेक्षा नहीं है, तो प्रमा का अभाव होने पर भी नित्य होने के कारण उसे प्रमाण की अपेक्षा नहीं है, ऐसा यदि कहें तो क्या हानि है ? ॥९८॥ न, अवगतेरेवात्मनि सद्भावादिति परिहृतमेतत् । प्रमातुश्चेत्प्रमाणापेक्षा सिद्धिः, कस्य प्रमित्सा स्यात् ? यस्य प्रमित्सा, स एव प्रमाताऽभ्युपगम्यते । तदीया च प्रमित्सा प्रमेयविषयैव, न प्रमातृविषया, प्रमातृविषयत्वेऽनवस्थाप्रसङ्गात्प्रमातुस्तदिच्छायाश्च तस्याप्यन्यः प्रमाता तस्याप्यन्य इति । एवमेवेच्छायाः । प्रमातृविषयत्वे प्रमातुरात्मनोऽव्यवहितत्वाच्च प्रमेयत्वानुपपत्तिः । लोके हि प्रमेयं नाम प्रमातुरिच्छास्मृतिप्रयत्नप्रमाणजन्मव्यवहितं सिद्ध्यति, नान्यथा अवगतिः प्रमेयविषया दृष्टा । न च प्रमातुः प्रमाता स्वस्य स्वयमेव केनचिद्व्यवहितः कल्पयितुं शक्यः इच्छादीनामप्यतमेनापि । स्मृतिश्च स्मर्तव्यविषया, न स्मर्तृविषया । तथेच्छाया इष्टविषयत्वमेव, नेच्छावद्विषयत्वम्, स्मर्त्रिच्छावद्विषयत्वेऽपि ह्युभयोरनवस्था पूर्ववदपरिहार्या स्यात् ॥९९॥ हृदयस्पर्शिनी नेति—गुरु कहते हैं कि ऐसी बात न कहो। क्योंकि आत्मा में अवगति (ज्ञान) के सद्भाव के कारण ही उसे प्रमाण की अपेक्षा नहीं होती। अवगति (प्रमा) के अभाव की आशंका ही नहीं की जा सकती। अर्थात् स्वयं अवगति
३१८ | उपदेशसाहस्री ही आत्मा में रहती है, यह पहले ही हम बता चुके हैं, जिससे तुम्हारी शंका का निवारण हो जाता है। अभिप्राय यह है कि असंहत ही संघात का साक्षी है, वही चितिमान् है, यह उपपादन कर चुके हैं। अथवा 'आत्मसिद्धिः प्रमाणं नापेक्षते' आत्मसिद्धि में प्रमाण की अपेक्षा नहीं होती, यह कहने से यही निष्कर्ष निकलता है कि आत्मसिद्धि में प्रमाणाभाव की अपेक्षा होती है। किन्तु आत्मसिद्धि के नित्य होने से उसकी अपेक्षा भी नहीं होनी चाहिए- यह अभिप्राय शंका करनेवाले शिष्य का है। उस शंका का परिहार गुरु करते हैं कि 'स्वतःसिद्धि' और 'प्रमाणनिरपेक्ष्य' इन दो शब्दों से सर्वनिरपेक्ष प्रकाशमान आत्मस्वरूप की ही विवक्षा रहने से तुम्हारी शंका के लिये कोई अवकाश ही नहीं रह जाता। यदि प्रमाता की सिद्धि, प्रमाण के अधीन हो तो बताओ, प्रमाण की अपेक्षा किसे होगी ? जिसे प्रमाण की अपेक्षा रहती है, उसे ही प्रमाता मानते हैं। निष्कर्ष यह है कि जितनी भी यच्चयावत् वस्तुएँ हैं, वे सभी ज्ञात या अज्ञात रूप से प्रमातृ चैतन्य की ही विषय हुआ करती हैं। यह वस्तुस्थिति है। तब यदि कभी अज्ञात समझकर उस निर्विकल्प साक्षी चैतन्य को जानने की इच्छा होती है तो उसके ज्ञातृत्व की सिद्धि के लिये जिसे वह इच्छा होगी, वही प्रमाण का आश्रयभूत प्रमाता कहलायेगा । उस समय प्रमाता की स्वरूपसिद्धि के लिये प्रमाण की अपेक्षा होगी। किन्तु वह होगी किसे ? उसी प्रमाता को या किसी अन्य को ? और वह किसे जानने के लिये होगी ? अपने को ही जानने के लिये होगी या किसी दूसरे के जानने के लिये होगी ? एवं च किसी भी प्रकार से प्रमाता को जानने की इच्छा उत्पन्न नहीं हो रही है। अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि जो इच्छा का आश्रय है, वह उसका विषय नहीं हो सकता। तथापि एक यह शंका हो सकती है कि आत्मा स्वयं ही अपना प्रमाता क्यों नहीं है ? इस शंका का समाधान यह है कि प्रमाणेच्छा हमेशा प्रमेयविषयिणी ही हुआ करती है, प्रमातृविषयिणी नहीं। यदि उसे प्रमातृविषयिणी मानेंगे तो प्रमाता और उसकी इच्छा का कोई अन्य प्रमाता स्वीकार करना होगा, और उसका अन्य कोई दूसरा, इस प्रकार अनवस्था-प्रसंग उपस्थित होगा। इसी प्रकार इच्छा को यदि प्रमातृ-विषयिणी मानेंगे तो प्रमाता आत्मा अव्यवहित होने के कारण उसे प्रमेय नहीं कह सकते। लोकव्यवहार में हम देखते हैं कि 'प्रमेय' सर्वदा प्रमाता से इच्छा, स्मृति एवं प्रमाण के जन्म द्वारा व्यवहित ही रहता है। उसके रहने का और कोई प्रकार नहीं है। अर्थात् इच्छा का विषयभूत प्रमेय इच्छा के जन्म (उत्पत्ति) से व्यवहित रहता है, स्मृति का विषयभूत प्रमेय स्मृति की उत्पत्ति से व्यवहित रहता है, प्रयत्न का विषयभूत प्रमेय प्रयत्न की उत्पत्ति से व्यवहित रहता है, उसी तरह प्रमाण का विषयभूत प्रमेय प्रमाण की उत्पत्ति से व्यवहित रहता है। अन्य कोई प्रकार उसके रहने का नहीं है। अवगति भी प्रमेयविषयिणी ही देखी गयी है। स्वयं प्रमाता अपने स्वयं की ही इच्छा आदि में से किसी के द्वारा व्यवहित हो ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। स्मृति भी स्मर्यमाण पदार्थ को ही विषय करती है। स्वयं स्मरण करनेवाले स्मर्ता को नहीं। उसी प्रकार इच्छा भी इष्ट वस्तु की ही हुआ करती है, अर्थात् इष्टवस्तु- विषयिणी ही होती है। वह इच्छा करनेवाले को अपना विषय नहीं बनाती। यदि स्मृति, स्मरणकर्ता को और इच्छा, इच्छा करने वाले को विषय करे तो पहले की तरह उन दोनों की अनवस्था होने लगेगी, जिसका परिहार नहीं हो सकेगा।। ९९ ।। ननु प्रमातृविषयावगत्यनुत्पत्तौ, अनवगत एव प्रमाता स्यादिति चेत् ।।१००।। हृदयस्पशिनी नन्विति-यहाँ तक यह बताया गया कि आत्मसिद्धि में प्रमाण-व्यापार की अपेक्षा नहीं है, क्योंकि प्रमाता में स्वविषयप्रमाणक्रियाश्रयत्व नहीं है, और अन्य प्रमाता की कल्पना करें तो अनवस्था होगी। अतः आत्मा अप्रमेय ही है, यह सिद्ध हुआ। बाह्य विषय (पदार्थ) के अवच्छेदार्थ उसे प्रमाणव्यापार की अपेक्षा रहती है, अतः प्रमाणव्यापार को व्यर्थ भी नहीं कह सकते, इस कथन से अवगति में स्वतः नित्यत्व सिद्ध किया गया। अब प्रकारान्तर से उसी के साधनार्थ पुनः पूर्व पक्ष कर रहे हैं। जिस विषय की अवगति होती है, उसी को अवगत और सिद्ध आदि शब्दों से कहा जाता है। किन्तु आपके कथनानुसार प्रमाता को विषय करनेवाला ज्ञान उत्पन्न न होने से प्रमाता तो अज्ञात ही रहेगा अर्थात् प्रमाता सर्वदा सुपुप्त ही रहेगा ।। १०० ।। न, अवगन्तुरवगतेरवगन्तव्यविषयत्वात्, अवगन्तृविषयत्वे चानवस्था पूर्ववत्स्यात् । अवगति- श्चात्मनि कूटस्थनित्यात्मज्योतिरन्यतोऽनपेक्षैव सिद्धा, अग्न्यादित्याद्युष्णप्रकाशवत् इति पूर्वमेव प्रसाधितम् ।
कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरण ३१९ अवगतेश्चैतन्यात्मज्योतिषः स्वात्मन्यनित्यत्वे, आत्मनः स्वार्थतानुपपत्तिः कार्यकारणसंघातवत्संहतत्वात्पारार्थ्यं दोषवत्त्वं चावोचाम । कथं ? चैतन्यात्मज्योतिषः स्वात्मन्यनित्यत्वे स्मृत्यादिव्यवधानात्सान्तरत्वम् । ततश्च तस्य चैतन्यज्योतिषः प्रागुत्पत्तेः; प्रध्वंसाच्चोर्ध्वमात्मन्येवाभावात्, चक्षुरादीनामिव संहतत्वात्, पारार्थ्यं स्यात् । यदा च तदुत्पन्नमात्मनि विद्यते, *न तदाऽऽत्मनः स्वार्थत्वम्, तद्भावाभावापेक्षा ह्यात्मानात्मनोः स्वार्थत्वपरार्थत्वसिद्धिः । तस्मादात्मनोऽन्यनिरपेक्षमेव नित्यचैतन्यज्योतिष्ट्वं सिद्धम् ।।१०१।। हृदयस्पशिंनी नेति—शिष्य से उसका अभिप्राय स्पष्ट कराने के लिये गुरु उस से पूछते हैं कि क्या तुम, सुषुप्त की समानता का परिहार करने के लिये आत्मा को अवगति (ज्ञान) का विषय कहना चाहते हो, या केवल सुषुप्तसमानता का परिहार मात्र कहना चाह रहे हो ? इन दो विकल्पों में से प्रथम विकल्प तो उचित नहीं है। क्योंकि ज्ञाता (अवगन्ता) का जो ज्ञान है, वह ज्ञेय को ही विषय करता है। यदि वह ज्ञाता को विषय करे तो पूर्ववत् अनवस्था प्राप्त होगी। यह तो हम पहले ही बता चुके हैं कि अग्नि और सूर्य की उष्णता एवं प्रकाश के तुल्य, आत्मा में अन्य किसी की अपेक्षा से रहित कूटस्थ नित्य स्वयंप्रकाश ज्ञान स्वतः सिद्ध है। आत्मा में यदि चैतन्यात्मप्रकाशरूप ज्ञान अनित्य हो तो आत्मा की स्वार्थता अनुपपन्न होती है। ऐसी अवस्था में देहेन्द्रिय के समान संहत होने से हमने उसका पारार्थ्य तथा दोषयुक्त होना भी बताया था। शिष्य ने पूछा 'किस प्रकार' तो उसी उक्त अनुपपत्ति को पुनः याद करा रहे हैं। यदि आत्मा का चैतन्यरूप ज्ञान अनित्य हो तो स्मृति, इच्छा आदि का व्यवधान (विच्छेद) रहने से वह चैतन्य ज्योतिरूप ज्ञान व्यवहीत (सान्तर) होगा। अर्थात् वह इच्छादिवृत्त्यन्तरपूर्वक होगा। उससे क्या होगा ? तब तो उस चैतन्यरूप ज्ञान का अपनी उत्पत्ति से पूर्व और विनाश के पश्चात् आत्मा में ही अभाव हो जाने से चक्षुरादि के तुल्य संहत होने से उसका (आत्मा का) पारार्थ्य सिद्ध होगा। चैतन्यरूप ज्ञान पैदा होकर आत्मा में रहता है, अतः आत्मा की स्वार्थता सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि उसमें संहतत्व का अभाव होने से स्वार्थत्व और स्वार्थत्व के होने से ही अनात्मा के परार्थत्व की सिद्धि हो जाती है। अतः आत्मा का अन्यनिरपेक्ष रहना ही उसकी नित्य चैतन्य प्रकाशरूपता है, यह सिद्ध हो जाता है ।। १०१ ।। नन्वेवं सति, असति प्रमाश्रयत्वे, कथं प्रमातुः प्रमातृत्वम् ? ।।१०२।। हृदयस्पशिंनी नन्विति—शिष्य कहता है कि आत्मा यदि प्रमा का आश्रय नहीं है तो प्रमातारूप चेतन का प्रमातृत्व कैसे संभव हो पायगा ? ।। १०२ ।। उच्यते—प्रमाया नित्यत्वेऽनित्यत्वे च रूपविशेषाभावात् । अवगतिर्हि प्रमा, तस्याः स्मृती- च्छादिपूर्विकाया अनित्यायाः कूटस्थनित्याया वा, न स्वरूपविशेषो विद्यते, यथा धात्वर्थस्य तिष्ठत्यादेः फलस्य गत्यादिपूर्वकस्यानित्यस्यागतिपूर्वकस्य नित्यस्य वा रूपविशेषो नास्तीति तुल्यो व्यपदेशो दृष्टः— “तिष्ठन्ति मनुष्याः” “तिष्ठन्ति पर्वताः” इत्यादिः । तथा नित्यावगतिस्वरूपेऽपि, प्रमातरि प्रमातृत्व- व्यपदेशो न विरुध्यते, फलसामान्यादिति ।।१०३।। हृदयस्पशिंनी उच्यत इति—गुरु कहते हैं कि जन्य प्रमा का आश्रय न होने पर भी उसमें प्रमातृत्व का व्यवहार उपपन्न हो सकता है। प्रमा चाहे नित्य हो या अनित्य हो, उसमें स्वरूप का कोई भेद नहीं है क्योंकि अवगति (ज्ञान) को ही 'प्रमा' शब्द से कहते हैं। वह प्रमा स्मृतिपूर्वक या इच्छा आदि पूर्वक अनित्य हो अथवा कूटस्थ नित्य हो, उसके स्वरूप में कोई
- नैवं सम्भवति—पाठान्तरम् ।
अन्तर नहीं है। जैसे 'स्था' आदि धातु के अर्थ (गति, निवृत्ति आदि) में गत्यादिपूर्वकता के कारण अनित्यता होने पर अथवा पूर्वगति आदि की शून्यता रहने से नित्यता होने पर कोई विशेषता नहीं होती। उसी से (धात्वर्थ से) 'मनुष्य स्थित है' 'पर्वत स्थित है' इस प्रकार समान व्यपदेश होता देखा गया है। 'मनुष्य स्थित है' इस उदाहरण में गत्यादिपूर्वकता के कारण अनित्य स्थिति का प्रदर्शन है, तथा 'पर्वत स्थित है' इसमें जिसके पहले भी गति आदि नहीं थी, ऐसी नित्य स्थिति प्रदर्शित की गयी है। किन्तु इस प्रकार अर्थ में भेद होने पर भी व्यपदेश (व्यवहार) में कोई भेद नहीं है। उसी प्रकार प्रमाता चेतन के नित्यज्ञानस्वरूप होने पर भी उसे प्रमाता कहने में कोई विरोध नहीं है। क्योंकि नित्य-अनित्य द्विविध ज्ञान के फल तो समान ही हैं। अभिप्राय यह है कि प्रमाण के फल को ही प्रमा कहते हैं। वह चित्प्रकाशरूप है, अतः उसे प्रमातृगत ही कहना होगा। अन्यथा उसे विषयगत मानने पर 'मया इदं विदितम्'—मैंने यह जाना इस प्रकार स्वात्मा में ज्ञान-ज्ञेय सम्बन्ध का अनुभव अनुपपन्न होगा। और अन्तःकरणादि जड़ पदार्थ में व्यापाराश्रयता के रहने पर भी चिदाश्रयत्व नहीं रहता है, उस कारण उसमें प्रमातृत्व उपपन्न नहीं होता है। किन्तु चिदात्मा तो कूटस्थ है, उस कारण उसमें व्यापारवत्ता के न रहने से प्रमा के प्रति उसका कर्तृत्व अनुपपन्न है। मुख्य वृत्ति से जड़-अजड़ दोनों में भी प्रमातृत्व व्यपदेश की योग्यता नहीं है। परस्पराध्यास के कारण व्यवहार चलता रहता है, अतः बाह्य विषय में भी आत्मा का प्रमातृत्व मिथ्या ही है। ऐसी स्थिति में स्वयंप्रकाश स्वभाववाले आत्मा में प्रमातृत्व की शंका करने का अवकाश ही कहाँ है? और उसके अनवभास का प्रसंग ही कहाँ है? तथा प्रमाण की अपेक्षा भी कहाँ और कैसे है? ॥१०३॥
अत्राह शिष्यः-नित्यावगतिस्वरूपस्यात्मनोऽविक्रियत्वात्कार्यकरणे संहृत्य* तक्षादीनामिव वास्यादिभिः कर्तृत्वं नोपपद्यते । असंहतस्वभावस्य च कार्यकारणोपादानेऽनवस्था प्रसज्येत । तक्षादीनां तु कार्यकारणैर्नित्यमेव संहतत्वमिति वास्याद्युपादाने नानवस्था स्यादिति ॥१०४॥
हृदयस्पर्शिनी अत्रेति—इस प्रकार से कूटस्थ नित्य चैतन्य स्वप्रकाश आत्मा में अन्तःकरणरूप उपाधि के सम्बन्ध से प्राप्त औपाधिक प्रमातृत्व का उपपादन करके, अब कर्तृत्व भी उसी प्रकार है, यह बताने के लिये प्रश्न उपस्थित कराते हैं। गुरु का उपर्युक्त कथन सुनकर शिष्य कहता है—जिस प्रकार बसूल आदि साधनों (औजारों) से युक्त हुए बिना काष्ठ- वर्धक (तक्षा, बढ़ई) का कर्तृत्वसम्बन्ध नहीं हो पाता, उसी प्रकार नित्यज्ञानस्वरूप आत्मा का भी देह और इन्द्रियों से सम्बन्ध हुए बिना कर्तृत्व उपपन्न नहीं है। क्योंकि वह निर्विकार है। असंहत स्वभाववाला आत्मा यदि शरीर और इन्द्रिय का ग्रहण करता है ऐसा कहें तो अनवस्था दोष का प्रसंग उपस्थित होता है। तक्षा (बढ़ई) का तो देह, इन्द्रियों से सर्वदा ही संहतत्व है, इस कारण वह बसुला आदि साधनों का जो ग्रहण करता है, उसमें अनवस्था नहीं आने पाती। 'तक्षादीनामिव' यह व्यतिरेक दृष्टान्त है ॥ १०४ ॥
इह तु असंहतस्वभावस्य करणानुपदाने कर्तृत्वं नोपपद्यत इति करणमुपादेयम्, तदुपादानमपि विक्रियैवेति तत्कर्तृत्वे करणान्तरमुपादेयम्, तदुपादानेऽप्यन्यदिति प्रमातुः स्वातन्त्र्येऽनवस्थाऽपरिहार्या स्यादिति । न च क्रियैवात्मानं कारयति, अनिर्वर्तितायाः स्वरूपाभावात् । अथान्यदात्मानमुपेत्य क्रियां कारयतीति चेत्--न, अन्यस्य स्वतःसिद्धत्वाविषयत्वाद्यनुपपत्तेः न ह्यात्मनोऽन्यदचेतनं वस्तु स्वप्रमाणकं दृष्टम् । शब्दादि सर्वमेवावगतिफलावसानप्रत्ययप्रमितं सिद्धं स्यात् । अवगतिश्चेदात्मनोऽन्यस्य स्यात्, सोऽप्यात्मैवासंहतः स्वार्थः स्यात्, न परार्थः । न च देहेन्द्रियविषयाणां स्वार्थतामवगन्तुं शक्नुमोऽवगत्य- वसानप्रत्ययापेक्षसिद्धिदर्शनात् ॥१०५॥
हृदयस्पर्शिनी इहेति—गुरु कहते हैं कि आत्मा में कर्तृत्व वास्तविक नहीं है। कर्तृत्व दो प्रकार का होता है। एक तो करण के द्वारा साध्य होने वाला, और दूसरा सान्निध्यमात्र से निष्पन्न होनेवाला। बढ़ई के समान आत्मा में करणोपादान-
- संहतस्य-पाठान्तरम् ।
कूटस्थाद्वयात्मबोधप्रकरण ३२१ साध्य कर्तृत्व नहीं हो सकता, इस कारण परमार्थतः उसमें कर्तृत्व का अभाव है। तथापि लौकिक मायावी अथवा चुम्बक के समान अविवेकवश माया से उत्पन्न अन्तःकरणरूप विकार के सन्निधिमात्र से उसमें कर्तृत्व की प्रतीति होना संभव है। यदि यह कहा जाय कि क्रिया ही उससे कर्म करा लेती है, तो क्रिया की निष्पत्ति तो कर्ता के ही द्वारा होती है। अतः जिस प्रकार उत्पन्न होने से पूर्व घट के द्वारा जलानयन का कार्य नहीं होता, उसी प्रकार अपनी निष्पत्ति के पूर्व कोई भी क्रिया, किसी दूसरे के प्रति किसी प्रकार भी उपकारक नहीं हो सकती। इसी अभिप्राय को ग्रन्थकार कह रहे हैं कि यहाँ करण को लिये बिना असंहत स्वभाववाले आत्मा का कर्तृत्व नहीं बन सकता, इसलिये उसे करण का ग्रहण करना ही चाहिये। किन्तु करण का ग्रहण करना भी एक विकार ही है। अतः उसके कर्तृत्व के लिये भी उसे दूसरे करण को ग्रहण करने की आवश्यकता होगी, तथा उसे ग्रहण करने के लिये एक अन्य करण को ग्रहण करना होगा, इस प्रकार से प्रमाता की स्वतन्त्रता (कर्तृत्व) के सिद्ध होने में अनवस्था दोष का निवारण नहीं हो सकेगा। यह भी नहीं कह सकते कि क्रिया ही आत्मा से कर्म करा लेती है। क्योंकि किसी भी क्रिया की निष्पत्ति (उत्पत्ति) हुए बिना उसका कोई स्वरूप नहीं हुआ करता। यह भी नहीं कह सकते कि कोई वस्तु, आत्मा के समीप (सन्निध) पहुँचकर उससे कर्म (क्रिया) करा लेती है। किन्तु यह कथन भी उचित न होगा। क्योंकि आत्मा के अतिरिक्त किसी भी अन्य वस्तु का स्वतःसिद्धत्व और अविषयत्व सम्भव नहीं है। आत्मा से भिन्न कोई अन्य जड़ वस्तु स्वतःसिद्ध नहीं देखी है। शब्दादि यच्चयावत् सभी विषय अवगतिफलावसान प्रत्यय से ही प्रमित हुआ करते हैं। यदि अवगति (ज्ञान) आत्मा के अतिरिक्त किसी अन्य की हो तो वह भी असंहत और स्वार्थ आत्मा ही होगा, वह परार्थ नहीं होगा। देह और इन्द्रियों की स्वार्थता को हम समझ नहीं सकते, क्योंकि वे भी अवगतिफलावसान प्रत्यय से ही सिद्ध होते देखे जाते हैं। तात्पर्य यह है कि वस्तुतः ईश्वर, आत्मभिन्न नहीं है, क्योंकि प्रत्यगात्मा की तरह वह अवगति (ज्ञान) का आश्रय है- 'ईश्वरः वस्तुतः आत्मभिन्नो न भवति, अवगत्याश्रयत्वात् प्रत्यगात्मवत्' इस प्रकार अनुमान से अनुगृहीत हुई “अयमात्मा ब्रह्म”१ इत्यादि श्रुति से आत्मा से अन्य कोई चेतन नहीं है। वह आत्मभूत ईश्वर, देहादिकों से असंहत, स्वार्थ, स्वतन्त्र है; परतन्त्र नहीं है, इसलिए वह क्रिया का शेष नहीं है। एवं च आत्मा में जो कर्तृत्व की प्रतीति होती है, वह केवल भ्रममात्र ही है। ईश्वरस्वरूप आत्मा में जगत्कर्तृत्व भी माया के द्वारा ही है। तात्पर्य यह है कि कहीं भी कर्तृत्व, पारमार्थिक नहीं है। लोकायतमत (चार्वाक मत) से शंका करते हैं कि आत्मा अवगत्याश्रय होने से उसमें असंहत्व कैसे है? क्योंकि संहत देहादि में भी अवगत्याश्रयत्व देखा जाता है। इसके उत्तर में यह अनुमान होगा कि 'देहादिः न अवगत्याश्रयः अवगम्यमानत्वात् घटादिवत् ।' देहादि, अवगति के आश्रय नहीं हैं, क्योंकि वे तो घटादि की तरह अवगम्यमान हैं। अवगति का आश्रय तो आत्मा ही है ॥ १०५ ॥ ननु देहस्यावगतौ न कश्चित्प्रत्यक्षादिप्रत्ययान्तरमपेक्षते ॥१०६ ॥ हृदयस्पशिनी नन्विति-देहादि में अव गत्यवसानप्रत्ययापेक्षसिद्धिकत्व कैसे है? क्योंकि 'मैं मनुष्य हूँ, मैं जानता हूँ' इस प्रकार का ज्ञान तो सभी को स्वतःएव होता है। अर्थात् वह ज्ञान स्वसंवेद्य है। देहादि का ज्ञान होने के लिए किसी प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाण की अपेक्षा नहीं रहती ॥ १०६ ॥ बाढम्, *जाग्रत्येवं स्यात् । मृतिसुषुप्तयोस्तु देहस्यापि प्रत्यक्षादिप्रमाणापेक्षैवा† सिद्धिः, तथैवेन्द्रियाणाम्—बाह्या एव हि शब्दादयो देहेन्द्रियाकारपरिणताः — इति ‡प्रत्यक्षादिप्रमाणापेक्षैव हि सिद्धिः । सिद्धिरिति च प्रमाणफलमवगतिमवोचाम । सा चावगतिः कूटस्था स्वयंसिद्धा आत्मज्योतिः स्वरूपेति च ॥१०७॥ हृदयस्पशिनी बाढमिति-गुरु ने कहा-ठीक है। किन्तु यह अनुभव स्वनिबन्धन नहीं है, अपितु देह और आत्मा के अविवेक से है। क्योंकि जाग्रत्-अवस्था में वैसा अनुभव होता है। मृत्यु और सुषुप्ति के समय में देह की सिद्धि भी प्रत्यक्षादि प्रमाण की अपेक्षा रखती है। यदि देह स्वयं प्रकाशस्वभाव होता तो अपनी सत्ता में प्रमाणनिरपेक्ष स्वभाव १. (बृ. उ. २।५।१९) * जाग्रत्येवैवं - पाठान्तरम् । † णापेक्षयैव - पाठान्तरम् । ‡ पेक्ष्यैव - पाठान्तरम् । ४१
३२२ उपदेशसाहस्री के कारण सुषुप्ति-मरणावस्था भी प्रमाणनिरपेक्ष सिद्धिवाली होती । किन्तु ऐसी बात नहीं है, तस्मात् 'देह' अचेतन है। इसी प्रकार इन्द्रियों की सिद्धि भी प्रमाण के अधीन है। इस प्रकार देह में बताये गये न्याय का इन्द्रिय के सिद्धि में अतिदेश किया गया है। देह और इन्द्रियों के आकार में परिणत हुए शब्दादि विषय बाह्य ही हैं। अतः उनकी सिद्धि में प्रत्यक्षादि प्रमाण की अपेक्षा होती ही है। इस विषय में अनुमान इस प्रकार किया जायेगा- 'देहादिः अनात्मा भौतिकत्वात् बाह्यवत्' । ग्राह्य, ग्राहक, करण उनके आयन के रूप में भूतों का ही परिणाम होता है। क्योंकि 'उपकार्योपकारक भाव से परस्पर संहत हुए पदार्थ समानयोनि हुआ करते हैं, ऐसा नियम है। 'सिद्धि' का अर्थ निष्पत्ति नहीं है। यदि 'निष्पत्ति' अर्थ होता, तो उसे प्रत्यक्षादि की अपेक्षा न होती । 'सिद्धि' का अर्थ है प्रमाण की फलभूता अवगति, यह हम पूर्व कह चुके हैं। वह अवगति कूटस्थ, स्वयंसिद्ध, एवं स्वयंप्रकाशरूप है। यह कहकर अर्थात् अवगति का स्वरूप बताकर लोकायतिकों की शंका का निरसन कर दिया गया है। लोकायतिक का कहना था कि देहादि के आकार में भूतों के परिणत होने पर उनमें मदशक्ति की तरह अवगति उत्पन्न होती है, अतः उसे भी देह की तरह भौतिक ही समझ लेना चाहिये। इस शंका का निरसन हो जाने से अवगति की कूटस्थता ही स्थिर रहती है ॥ १०७ ॥
अत्राह चोदकः--अवगतिः प्रमाणानां फलं कूटस्थनित्यात्मज्योतिःस्वरूपेति च विप्रति- षिद्धम् । इत्युक्तवन्तमाह--न विप्रतिषिद्धम् । कथं तर्हि* ? कूटस्था नित्यापि सति प्रत्यक्षादिप्रत्ययान्ते लक्ष्यते तादर्थ्यात् । प्रत्यक्षादिप्रत्ययस्य अनित्यत्वे, अनित्येव †भवति । प्रमाणानां फलमित्युपचर्यते ॥१०८॥
हृदयस्पर्शिनी अत्रेति-इस पर प्रश्नकर्ता कहता है-'अवगति' को प्रमाणों का फल बताना और उसे कूटस्थ, नित्य एवं स्वयंप्रकाश कहना तो परस्परविरुद्ध है। इस प्रकार कहनेवाले शिष्य से गुरु कहते हैं-हमारा कथन परस्परविरुद्ध नहीं है। तब शिष्य ने पूछा कि आपने अवगति को प्रमाणों का फल कैसे कहा था ? गुरु कहते हैं-यद्यपि 'अवगति'- अकार्यरूप है, तथापि कृपाकाशाकार्यत्ववत् उसमें कार्यत्व का उपचार किया जाता है। अतः उसके फलत्वप्रसिद्धि में कोई विरोध नहीं है। उपचार करने में निमित्त क्या है ? तो उत्तर दे रहे हैं कि वह अवगति, कूटस्थ और नित्य रहने पर भी वह अपनी अभिव्यक्ति के लिये प्रत्यक्षादि ज्ञान के फलरूप से लक्षित होती है और प्रत्यक्षादि ज्ञान अनित्य होने के कारण वह भी अनित्य-सी होती है। यही कारण है कि वह अवगति उपचार के लक्षण के (लक्षणा के) द्वारा प्रमाणों के फलस्वरूप कही जाती है। तस्मात् कूटस्थावगतिरूप आत्मा में प्रमातृत्व, कर्तृत्व, फलत्व यह सब कल्पना मात्र है। देहादि संहत पदार्थों में परार्थता, जाड्य, पराधीनसिद्धिता रहती है ॥ १०८ ॥
यद्येवं भगवन्, कूटस्थनित्यावगतिरात्मज्योतिःस्वरूपैव स्वयंसिद्धा, आत्मनि प्रमाणनिरपेक्षत्वात् ततोऽन्यदचेतनं संहत्यकारित्वात्परार्थम् । येन च सुखदुःखमोहहेतुप्रत्ययावगतिरूपेण परार्थ्यं, तेनैव स्वरूपेणानात्मनोऽस्तित्वं, नान्येन रूपान्तरेण । अतो नास्तित्वमेव परमार्थतः । यथा हि लोके रज्जुसर्प- मरीच्युदकादीनां तदवगतिव्यतिरेकेणाभावो दृष्टः, एवं जाग्रत्स्वप्नद्वैतभावस्यापि तदवगतिव्यतिरेकेणाभावो युक्तः । एवमेव परमार्थतः भगवन्, अवगतेरात्मज्योतिषो नैरन्तर्यभावात्कूटस्थनित्यताऽद्वैतभावश्च, सर्वप्रत्ययभेदेष्वव्यभिचारात् । प्रत्ययभेदाश्चावगतिं व्यभिचरन्ति । यथा स्वप्ने नीलपीताद्याकारभेदरूपाः प्रत्ययास्तदवगतिं व्यभिचरन्तः परमार्थतो न सन्तीत्युच्यन्ते, एवं जाग्रत्यपि नीलपीतादिप्रत्ययभेदास्ता- मेवावगतिं व्यभिचरन्तोऽसत्यरूपा भवितुमर्हन्ति । तस्याश्चावगतेरन्योऽवगन्ता नास्तीति न स्वेन स्वरूपेण स्वयमुपादातुं हातुं वा शक्यते, अन्यस्य चाभावात् ॥१०९॥
* तर्हि अवगतेः फलत्वं ? तत्त्वोपचारात्-अधिकः पाठः । † तेन प्रमा०-पाठान्तरम् ।
कूटस्थाद्वयात्मबोधप्रकरणम् ३२३ हृदयस्पर्शिनी यद्येवमिति-इस प्रकार अब आत्मा और अनात्मा के यथार्थ स्वरूप को समझकर वह शिष्य, अवगत किये अर्थ को गुरु के प्रति निवेदन करता हुआ आत्मा के अद्वैतत्व को संभावित करने के लिए द्वैत के मृषात्व को प्रकट कर रहा है। शिष्य निवेदन करता है कि हे भगवन् ! यदि ऐसी बात है तो कूटस्थ, नित्य अवगति (ज्ञान) स्वयंप्रकाश- स्वरूप और स्वयं सिद्ध ही है, क्योंकि आत्मा में अन्य किसी प्रमाण की अपेक्षा नहीं है। और उससे जो भिन्न है, वह अचेतन और मिलकर कार्यकारी होने से परार्थ है अर्थात् चेतनार्थ (चेतन के लिये) है। चैतन्य के प्रतिभासमात्र से उसकी सिद्धि होने से स्वप्नदृष्ट की तरह वह अनृत (मिथ्या) है। इसपर सांख्यवादी शंका करता है कि जितना भी दृश्य है, वह सब सुख-दुःख-मोहान्वयी रहता है, अतः वह सत्त्व-रजस्तमोरूप प्रकृति का कार्य है, यह स्पष्ट प्रतीत होता है। ऐसी स्थिति में उसे अनृत (मिथ्या) कैसे समझा जाय ? गुरु समाधान करते हैं कि जिस सुख, दुःख और मोह अर्थात् सत्त्व-रजस्तमोहेतुक प्रत्ययावगतिरूप से जड़ वस्तु, परार्थ (भोक्तृशेषवत्) प्रतीत होती है, उसी रूप से उस जड़ वस्तु (दृश्य वस्तु) की सत्ता (अस्तित्व) भी है, किसी अन्य रूप से (सत्त्वादि रूप से) नहीं है। क्योंकि उसमें कोई प्रमाण नहीं है। अतः परमार्थतः उसकी (जड़ वस्तु की) सत्ता ही नहीं है। किञ्च-जिस प्रकार लोकव्यवहार में रज्जु-सर्प एवं मृगमरीचिका आदि की प्रतीति के अतिरिक्त उनका अभाव ही दृष्टिगोचर होता है। इसी को हम अनुमान के आकार में इस प्रकार कह सकते हैं— 'विमतं जाग्रत्स्वप्नावस्थं दृश्यं नावगतिव्यतिरेकेण क्वचिदपि परमार्थसत्, दृश्यत्वाज्जडत्वाद्वा, रज्जुसर्पादिवत्' । इस प्रकार दृश्य पदार्थ सापेक्ष होने से उसके मायामय होने की सम्भावना है, अतः द्रष्टृत्व ही अद्वैत है, वही मेरे अनुभव में अब आरूढ़ हो गया है। इसी का अब निरन्तर अनुभव हो रहा है। जाग्रत् और स्वप्नावस्था के द्वैतरूप दृश्य का उसकी प्रतीति के अतिरिक्त परमार्थतः अभाव ही युक्तियुक्त प्रतीत हो रहा है। उसी प्रकार हे भगवन् ! अवगतिरूप प्रत्यक् प्रकाश की कूटस्थ नित्यता और अद्वैत भाव का मेरे द्वारा अनुभव किया जा रहा है। वह स्वयंप्रकाश अवगति निरन्तर वर्तमान रहती है, उस कारण वह कूटस्था, नित्या और द्वैतरहिता है। क्योंकि समस्त प्रत्ययभेदों में उसका अव्यभिचार है। किन्तु प्रत्यय भेदों का अपनी अवगति में व्यभिचार रहता है। जिस प्रकार स्वप्नावस्था में नील-पीताद्याकार भेदरूप प्रत्ययों का परस्पर अपनी अवगति में व्यभिचार होने के कारण 'वे परमार्थतः नहीं हैं' ऐसा कहा जाता है, उसी प्रकार जाग्रदवस्था में भी नील-पीतादि प्रत्ययभेदों का उस अवगति में व्यभिचार होने से वे असत्यरूप ही होने चाहिए। इसी को हम अनुमान के आकार में इस प्रकार कह सकते हैं—'विमता जाग्रत्प्रत्ययाः परमार्थतो न विद्यन्ते, चैतन्यप्रकाशव्यभिचारित्वात्, ये एवं, ते एवं, यथा स्वप्नप्रत्ययाः तथा चेमे, तस्मात्तथा' । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार स्वप्नावस्था में देखते हैं कि नीलाकार ज्ञान में पीताकार ज्ञान नहीं रहता, तथा पीताकार ज्ञान में नीलाकार ज्ञान नहीं रहता किन्तु ज्ञान उन सभी में रहता है, केवल उसकी उपाधि का व्यभिचार होता है। उसी प्रकार जाग्रत् ज्ञान में भी है। इसलिए आपस में व्यभिचारी होने के कारण जिस प्रकार वे स्वप्न में मिथ्या हैं, उसी प्रकार जाग्रत् में भी हैं। इतना ही नहीं, संपूर्ण स्वप्नावस्था का जाग्रत् अवस्था में और जाग्रत् अवस्था का स्वप्नावस्था में भी व्यभिचार है। इससे भी उनका मिथ्यात्व स्पष्ट हो जाता है। किन्तु उनके साक्षी का किसी भी अवस्था में व्यभिचार नहीं दिखाई देता। इस कारण परमार्थतः वही कूटस्थ, नित्य, सद्वस्तु है। क्योंकि जो परमार्थतः सत्य हो अर्थात् जिसका किसी काल में भी अभाव न हो, उसी को 'वस्तु' शब्द से कहना उचित है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा है— “नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥” (२।१५) सद्वस्तु से विलक्षण असद्रूप इस जगत् की सत्ता (अस्तित्व) नहीं हो सकती और सत्स्वरूप ब्रह्म की असत्ता (अभाव) नहीं हो सकती, इस प्रकार तत्त्वदर्शियों ने सत् और असत् के विषय में निश्चय किया है। स्वप्न, जाग्रत् आदि अवस्थाओं में होने वाली अवगति का कोई अन्य ज्ञाता नहीं है। उस कारण अन्य वस्तु का अभाव होने के कारण अपने स्वरूप से उसका न तो ग्रहण ही किया जा सकता है और न त्याग ही किया जा सकता है। अवगन्ता (ज्ञाता) के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु के न होने के कारण 'मैं पूर्ण हूँ' यह अनुभव आपके प्रसाद से अब हो रहा है॥ १०९॥
३२४ उपदेशसाहस्री तथैवेति। एषाऽविद्या, यन्निमित्तः संसारो जाग्रत्स्वप्नलक्षणः। तस्या अविद्याया विद्या निवर्तिका। इत्येवं त्वमभयं प्राप्तोऽसि*। नातः परं जाग्रत्स्वप्नदुःखमनुभविष्यसि। संसारदुःखात् मुक्तोऽसीति ॥११०॥ हृदयस्पर्शिनी तथैवेति—इस प्रकार से जब शिष्य ने कहा तब गुरु उसकी बात का समर्थन कर रहे हैं। प्रकरण के प्रारम्भ में शिष्य ने विद्या और अविद्या का स्वरूप, उसका विभाग पूछा था, उसे विस्तार के साथ बता चुके हैं। अब प्रकरण का उपसंहार करने जा रहे हैं। गुरु ने शिष्य से कहा कि अब जो तुम्हें अपनी पूर्णता का अनुभव हो रहा है, वह ठीक ही हो रहा है। जिसके कारण जाग्रत्-स्वप्नरूप संसार की प्रतीति होती है, वह तो 'अविद्या' है अर्थात् 'अज्ञान' है। और वेदान्तमहावाक्यजन्य प्रत्यय से अभिव्यक्त होनेवाला कूटस्थ जो आत्मप्रकाश है, वह 'विद्या' है। पूर्वोक्त उस अज्ञान (अविद्या) की निवृत्ति करनेवाला ज्ञान (विद्या) ही है। अब तुम्हें विद्या (ज्ञान) प्राप्त हो गया है। इसलिए अब तुमने अभय प्राप्त कर लिया है। अब से भविष्य में तुम जाग्रत्-स्वप्नजन्य दुःख का अनुभव नहीं करोगे। तुम अब संसाररूप दुःख से मुक्त हो गये हो। अतः तुम कृतकृत्य हो गये हो ॥ ११० ॥ ओमिति ॥१११॥ हृदयस्पर्शिनी ओमिति—गुरु ने जो कहा उसे शिष्य ने भी 'ॐ' शब्द से स्वीकृति दे दी। अर्थात् आपने जो कहा, वह सत्य है ॥ १११ ॥ ॥ इति द्वितीयम् कूटस्थाद्वयात्मबोधप्रकरणम् समाप्तम् ॥
- प्राप्नोषि—पाठभेदः ।
॥ अथ परिसङ्ख्यानप्रकरणम् ॥ ३ ॥ मुमुक्षूणामुपात्तपुण्यापुण्यक्षपणपराणामपूर्वानुपचयार्थिनां* परिसंख्यानमिदमुच्यते--अविद्याहेतवो दोषा वाङ्मनःकायप्रवृत्तिहेतवः; प्रवृत्तेश्चेष्टानिष्टमिश्रफलानि कर्माण्युपचीयन्ते इति-तन्मोक्षार्थम् ॥११२॥ हृदयस्पर्शिनी मुमुक्षूणामिति—पूर्व प्रकरण में तत्त्वज्ञान का निरूपण किया गया है। जीव के परम कल्याण का हेतु वही है। जिसे उस तत्त्वज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, वही कृतकृत्य है। तब उसके लिये विधि रूप से कुछ भी कर्तव्य नहीं है। किन्तु भेद (द्वैत) दर्शन की दृढ़ वासना के कारण जिनकी उसमें स्थिरता नहीं होती अर्थात् निर्वातस्थ प्रदीप के समान जिनका ज्ञान निश्चल नहीं है, उनके ज्ञान की दृढ़ता के लिये यह 'परिसंख्यान' (अनात्म वस्तुओं का निषेध) प्रकरण प्रारंभ किया जा रहा है। यह परिसंख्यान उन मुमुक्षुओं (नितान्त उपशम चाहने वालों) के लिये कहा जा रहा है, जो अपने सञ्चित पुण्य-पाप का क्षय करने में तत्पर हैं, क्योंकि कर्म तो अविद्यामूलक होते हैं, अतः उसकी निवृत्ति हुए बिना आत्यन्तिक निवृत्ति का होना संभव नहीं है। तथा पूर्वोपार्जित कर्मों का उच्छेद और अपूर्वो- त्पादक कर्म का अननुष्ठान ये दोनों अविद्या की निवृत्ति से ही उपपन्न होंगे। इसलिये अविद्या की निवृत्ति के द्वारा उन दोनों की इच्छा रखने वाले अर्थात् जिन्हें क्रियमाण कर्मजनित धर्माधर्मरूप अपूर्व की वासना नहीं है, उन मुमुक्षुओं के लिये यह परिसंख्यान कहा जा रहा है। इस प्रकार अधिकारी को बताया गया है। अब परिसंख्यान का प्रयोजन बताते हैं—अविद्याजनित राग-द्वेषादि दोष, वाणी, मन और शरीर की प्रवृत्ति होने में कारण होते हैं। वाणी, मन और शरीर के व्यापार (प्रवृत्ति कर्म) द्विविध होते हैं—एक शास्त्रीय और दूसरा स्वाभाविक। ये ही देव-तिर्यक् मनुष्यत्वप्रापक हुआ करते हैं। इस प्रकार की प्रवृत्ति से इष्ट-अनिष्ट एवं मिश्र फल वाले कर्मों का संचय होता है। उनकी निवृत्ति के लिये अर्थात् अविद्यारागादिनिबन्धन कर्म और उसके फलसम्बन्ध के निवृत्त्यर्थ यह 'परिसंख्यान' कहा जा रहा है ॥ ११२ ॥ तत्र शब्दस्पर्शरूपरसगन्धानां विषयाणां श्रोत्रादिग्राह्यत्वात्, स्वात्मनि परेषु वा विज्ञानाभावः, तेषामेव परिणतानां यथा लोष्टादीनाम् । श्रोत्रादिद्वारैश्च ज्ञायन्ते । येन च ज्ञायन्ते, स विज्ञातृत्वाद- तज्जातीयः । ते हि शब्दादयोऽन्योन्यसंसर्गित्वाज्जन्मवृद्धिपरिणामापक्षयनाशसंयोगावियोगाविर्भावतिरो- भावविकारविकारिक्षेत्रबीजाद्यनेकधर्माणः, सामान्येन च सुखदुःखाद्यनेककर्माणः । तद्विज्ञातृत्वादेव स विज्ञाता सर्वशब्दादिधर्मविलक्षणः ॥११३॥ हृदयस्पर्शिनी तत्रेति—अब उसके उपस्कर के सहित परिसंख्यान प्रकार को बता रहे हैं। प्रथमतः अनात्म वस्तुओं से आत्मा को विविक्त समझकर उसका अनुसन्धान करें, इस प्रकार उपदेश देते हुए उसके विवेक करने का प्रकार बताते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये विषय हैं, क्योंकि श्रोत्रादि इन्द्रियों से ग्राह्य होते हैं। अतः अपने द्वारा अथवा घटादि किसी अन्य पदार्थ के द्वारा उनका ज्ञान होना संभव नहीं है। जिस प्रकार लोष्ट (मिट्टी के ढेले) आदि को कोई ज्ञान नहीं हो पाता, उसी प्रकार शरीरादि रूप में परिणत हुए उन सूक्ष्मभूत रूप-शब्दादि विषयों को भी कोई ज्ञान नहीं होता। अनुमान का आकार इस प्रकार होगा—'विमता देहादयो न चेतनावन्तः विज्ञानकर्मत्वात् लोष्टादिवत्।' इस अनुमान में कोई हेत्वसिद्धि की शंका न कर सके, एतदर्थ उस हेत्वसिद्धि का परिहार करने के लिये कहा कि देहादि आकार में परिणत हुए शब्दादि विषय, श्रोत्रादि इन्द्रियों के द्वारा ही जाने जाते हैं। इस प्रकार देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण, अहंकार पर्यन्त जितना भी साक्ष्य पदार्थ है, वह सब अनात्म पदार्थ है, इसलिये वह हेय (त्याज्य) है, ऐसा उपदेश
- र्थानां, थिनः—पाठौ ।
३२६ उपदेशसाहस्री करने के पश्चात् अब अवशिष्ट जो आत्मतत्त्व है, वही अदेय है, वही सब का साक्षी है। अर्थात् जिसके द्वारा ये विषय जाने जाते हैं, वह ज्ञाता होने के कारण उन विषयों से विजातीय है। अर्थात् भूतसंघात से विलक्षण स्वभाव को बता रहे हैं कि वे शब्दादि परस्पर एक दूसरे से मिल जाने के कारण अर्थात् उनमें अन्योन्यसंसर्गिता होने के कारण जन्म, वृद्धि, विपरिणाम, क्षय, नाश, संयोग, वियोग, आविर्भाव, तिरोभाव, विकार, विकारी, क्षेत्र और बीज आदि अनल्प (अनेक) धर्मोंवाले तथा सामान्यरूप से सुख-दुःखादि अनेक कर्मोंवाले हैं। अभिप्राय यह है कि किसी जड़ वस्तु की उत्पत्ति (जन्म) होनेपर ही उसका 'अस्तित्व' गृहीत होता है। सभी जड़ पदार्थों के जन्मादि छह विकार होते हैं, जो स्वरूपनिबन्धन हैं, जैसे संयोग-वियोग पुत्राद्यनुबन्ध निबन्धन हैं। आविर्भाव-तिरोभाव शब्द आगन्तुक प्रकाश के विषय होने से जड़ता के द्योतक हैं। विकार-विकारी शब्द व्रण-गण्ड-विस्फोटकादि अवस्थाओं को बताते हैं। क्षेत्र-बीज शब्द से स्त्री-पुं-प्रकृत्यात्मक परिणामभेद को बताया गया है। 'आदि' पद से अनुक्त अवान्तर भेदों को समझना चाहिये। शब्दादि विषयों का अनुभव होनेपर सुख-दुःख-मोह-रोगादि की उत्पत्ति तो प्रसिद्ध ही है। इन विषयों के विज्ञातृत्व के कारण ही उनका ज्ञाता (आत्मा) शब्दादि सभी विषयों के धर्मों से विलक्षण है॥ ११३॥ तत्र शब्दादिभिरुपलभ्यमानैः पीड्यमानो विद्वानेवं परिसंचक्षीत ॥११४॥ हृदयस्पर्शनी तत्रशब्दादिभिरिति—इस रीति से साक्षी और साक्ष्य इनके अन्वय-व्यतिरेक से आत्मा-अनात्मा का विवेक कर 'अहं ब्रह्मास्मि' ऐसा शुद्ध आत्मा का ही अनवरत अनुसन्धान करे, जब अन्यप्रयुक्त शब्दाद्युपलम्भ से विक्षेप उपस्थित हो जाय, तब अवकृपा, नैष्ठुर्यादि विकारों की उत्पत्ति के भय का परिहार करने के लिये अपने को उपलब्ध होनेवाले शब्दादि विषयों से पीडित होता हुआ विद्वान् इस प्रकार ज्ञानाभ्यास करे ॥ ११४॥ शब्दस्तु ध्वनिसामान्यमात्रेण, विशेषधर्मर्वा षड्जादिभिः, प्रियैः स्तुत्यादिभिरिष्टैरनिष्टैश्चासत्य- बीभत्सपरिभवाक्रोशादिभिर्वचनैर्वा मां दृक्स्वभावमसंसर्गिणमविक्रियमचलमनिधनमभयमत्यन्तसूक्ष्ममविषयं गोचरीकृत्य, स्प्रष्टुं नैवार्हति, असंसर्गित्वादेव मम* । †अत एव न शब्दनिमित्ता हानिवृद्धिर्वा । अतो मां किं करिष्यति स्तुतिनिन्दादिप्रियाप्रियत्वादिलक्षणः शब्दः ? अविवेकिनं हि शब्दमात्मत्वेन गतं प्रियः शब्दो वर्धयेत्, अप्रियश्च क्षपयेत्, अविवेकिस्वात् । नतु मम विवेकिनो बालाग्रमात्रमपि कर्तुमुत्सहते इति । एवमेव स्पर्शसामान्येन तद्विशेषैश्च शीतोष्णमृदुकर्कशादिज्वरोदरशूलादिलक्षणैश्चाप्रियैः प्रियैश्च कैश्चिच्छ- रीरसमवायिभिर्बाह्यागन्तुकनिमित्तैश्च न मम काचिद्विक्रिया वृद्धिहानिलक्षणा अस्पर्शतवात्क्रियते, व्योम्न इव मुष्टिघातादिभिः । तथा रूपसामान्येन तद्विशेषैश्च प्रियाप्रियैः स्त्रीव्यञ्जनादिलक्षणैररूपत्वान्न मम काचिद्धानिर्वृद्धिर्वा क्रियते । तथा रससामान्येन तद्विशेषैश्च प्रियाप्रियैः मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायैमूढ- बुद्धिभिः परिगृहीतैः अरसात्मकस्य मम न काचिद्धानिर्वृद्धिर्वा क्रियते । तथा गन्धसामान्येन तद्विशेषैश्च प्रियाप्रियैः पुष्पाद्यनुलेपनादिलक्षणैरगन्धात्मकस्य न मम काचिद्धानिर्वृद्धिर्वा क्रियते, "अशब्दमस्पर्शस- रूपमव्ययं तथारसन्नित्यमगन्धवच्च यत्" इति श्रुतेः ॥११५॥ हृदयस्पर्शनी शब्द इति—ध्वनिरूप (अव्यक्त वर्णविशेष, नाद मात्र) सामान्य धर्म के द्वारा षड्जादि, प्रियस्तुति आदि और इष्ट, अनिष्ट तथा असत्य, बीभत्स, अपमानसूचक और निन्दात्मक वचनरूप विशेष धर्मों के द्वारा मुझ दृक्- स्वरूप, संसर्गशून्य, अविकारी, अविचल, अविनाशी, अभय, अत्यन्त सूक्ष्म और अविषय को अपना विषय बनाकर
- मां—पाठभेदः । † यत—पाठभेदः ।