भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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कूटस्थाद्वयात्मबोधप्रकरणम् ३११ तरह संकोच-विकास के साथ उसका परिणाम हुआ करता है। वह परिणाम परिणामिचेष्टारूप है। अतः उसे क्रिया कहना ही उचित है। उस क्रिया में 'उपलब्धि' शब्द का गौण प्रयोग करने में निमित्त यह है कि "सत्यं ज्ञानम्"१, "विज्ञान- घन एव"२ इत्यादि श्रुतियों से सिद्ध जो आत्मा की स्वरूपभूता उपलब्धि है, वह तो अपने आभासरूप फल तक ही है। अतः उसका 'उपलब्धि' शब्द से वैसे ही उपचार किया जाता है, जैसे किसी वस्तु के दो खण्ड होने में समाप्त हो जानेवाली छेदनक्रिया का धात्वर्थ के रूप में उपचार किया जाता है। अर्थात् जैसे किसी वस्तु के दो टुकड़े हो जाने में छेदन क्रिया का उपचार (गौण प्रयोग) किया जाता है, वैसे ही तप्त हुए लोहपिण्ड में अग्नि के व्याप्त होने के समान चिदाभासरूप से बुद्धिवृत्ति में व्याप्त होने के कारण चेतन आत्मा में 'उपलब्धि क्रिया' का उपचार (गौण प्रयोग) हुआ करता है। जिस प्रकार लोहपिण्ड में व्याप्त हुआ अग्नि सर्वथा निष्क्रिय और निर्विकार होता हुआ भी जलता है, प्रकाश करता है, इत्यादि रूप से क्रियावान्-सा बताया जाता है, उसी प्रकार यद्यपि चिदाभासविशिष्ट अन्तःकरण ही सभी पदार्थों का उपलब्धा है, तथापि अपने स्वाभाविक चैतन्य से अन्तःकरण में वस्तु की उपलब्धि की शक्ति प्रदान करने के कारण उस आत्मा को ही 'उपलब्धा' कह देते हैं। 'उपलब्धि' शब्द का अर्थ तो 'अर्थप्रकाश' है। वह अर्थ (वस्तु, पदार्थ) का धर्म तो हो नहीं सकता, क्योंकि अर्थ (वस्तु, पदार्थ) जड़ है। वह अन्तःकरण का भी धर्म नहीं हो सकता, क्योंकि वह करण होने से उसमें चैतन्यप्रकाशाश्रयत्व हो नहीं सकता। तथापि स्वयं प्रकाशमान नित्य चैतन्य आत्मा में बिना व्यवधान के 'अहं' रूप से अध्यास होने के कारण, अपनी सत्ता में प्रकाश का अव्यतिरेक रहने से, आत्म चैतन्य व्याप्त हुई तत्तदर्थाकार वृत्तियों को उत्पन्न करता हुआ अन्तःकरण ही उपलब्धा, कर्ता, प्रमाता, भोक्ता होने के कारण वही प्रमातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, अनुभवितृत्व आदि व्यवहार के योग्य होता है। यह व्यवहार 'अयःपिण्डो दहति, प्रकाशयति' के समान ही समझना चाहिये। और आत्मा आकाश के समान अविक्रिय होने से कूटस्थ रहता हुआ भी उस प्रकार के अन्तःकरण में स्थित अपने आभास का विवेक न हो पाने से उस अन्तःकरण के धर्म और अवस्थाओं से युक्त हुआ-सा मिथ्या ही समझा जाता है, जैसे अयःपिण्डगत आभास के अविवेक से अग्नि को ही चतुष्कोण, वर्तुल, कृश, स्थूल, उत्पन्न, नष्ट समझा जाता है। तस्मात् विकारी अन्तःकरण में कर्तृत्व रहने पर भी उपलब्धि में क्रियमाणता के न होने से उपलब्धिस्वरूप आत्मा की कूटस्थता सिद्ध हो जाती है ॥ ७७ ॥

इत्युक्तः शिष्य आह—ननु भगवन् मम कूटस्थत्वप्रतिपादनं प्रत्यसमर्थो दृष्टान्तः ? कथम् ? छिदिः छेद्यविक्रियावसाना उपचर्यते यथा धात्वर्थत्वेन, तथोपलब्धिशब्दोपचरितोऽपि धात्वर्थो बौद्धः प्रत्ययः आत्मन उपलब्धिविक्रियावसानश्चेत्, नात्मनः कूटस्थतां प्रतिपादयितुं समर्थः ॥७८॥

हृदयस्पर्शिनी इत्युक्त इति—उक्त अर्थ को ही और अधिक विशद करने के लिये शिष्य की शंका को उपस्थित करते हैं। शिष्य कहता है कि आपका बताया हुआ दृष्टान्त, दार्ष्टान्त के अनुरूप नहीं है। अर्थात् आपका दिया हुआ दृष्टान्त, मेरी (आत्मा) कूटस्थता को बताने में असमर्थ है। गुरु पूछते हैं—किस प्रकार असमर्थ है ? तब शिष्य कहता है कि जिस प्रकार छेद्य वस्तु के विकार में छिदिक्रिया का गौण प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार 'उपलब्धि' शब्द के गौण प्रयोगात्मक धात्वर्थरूप बौद्ध प्रत्यय का फल भी यदि आत्मा के उपलब्धिरूप विकार में ही है तो वह आत्मा की कूटस्थता का प्रतिपादन करने में असमर्थ है। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार छेदन क्रिया के द्वारा निष्पन्न होनेवाला किसी वस्तु का द्वैधीभाव एक विकार है, उसी प्रकार 'उपलब्धि' भी एक विकार है। अतः बौद्ध-प्रत्ययरूप उपलब्धि का आत्मा में भले ही उपचार होता हो, तथापि साध्य होने के कारण उपलब्धि भी विकार ही है। क्योंकि साध्यमात्र अनित्य होता है। अतः उसका कर्ता आत्मा कूटस्थ नहीं हो सकता है ॥ ७८ ॥


१. (तै. उ. २।१) २. (बृ. उ. २।४।१२)