भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 336

३१० उपदेशसाहस्री तं गुरुर्वाच-न युक्तस्तव संशयः, यतस्तेषां प्रत्ययानां नियमेनाशेषत उपलब्धेरेवापरिणा- मित्वात्कूटस्थत्वसिद्धौ निश्चयहेतुमेवाशेषचित्तप्रचारोपलब्धिं संशयहेतुमात्थ । यदि हि तव परिणामित्वं स्यात्, अशेष-स्वविषयचित्तप्रचारोपलब्धिर्न स्यात्, चित्तस्य* स्वविषये, यथा चेन्द्रियाणां स्वविषयेषु; न च तथाऽऽत्मनस्तव स्वविषयैकदेशोपलब्धिः । अतः कूटस्थतैव तवेति ।।७५।। हृदयस्पर्शिनी तं गुरुरिति-यदि तुम दृश्य और दर्शन का विवेचन करोगे तो तुम्हें संशय नहीं होगा, यह मन में रखकर गुरु उससे बोले-तुम्हारा यह संशय उचित नहीं है। क्योंकि उन प्रत्ययों की नियमेन पूर्णतया जो अपरिणामिनी उपलब्धि होती है, उसीसे आत्मा के कूटस्थत्व की सिद्धि का निश्चय हो जाता है, अर्थात् कूटस्थत्व के निश्चय करने में यह अपरिणामिनी उपलब्धि ही हेतु है। उन समस्त चित्तवृत्तियों की उपलब्धि को ही तुम अपने संशय का कारण समझ रहे हो। यदि तुम परिणामी होते तो, तुम्हें अपने विषय के प्रति चित्त की सम्पूर्ण गतियों का ज्ञान न हो पाता । जैसे चित्त को अपने विषय का तथा इन्द्रियों को अपने विषयों का केवल एकदेशीय ज्ञान हो पाता है, उन्हीं के समान तुझ आत्मा को अपने विषय के केवल एक देश की ही उपलब्धि (ज्ञान) नहीं होती, अपितु सार्वदेशिक उपलब्धि होती है। अतः तेरी (तुझ आत्मा की) कूटस्थता ही सिद्ध होती है। यह जो तुम समझ रहे हो कि अन्तःकरण की वृत्तियाँ परस्पर व्यावृत्त- स्वरूप की होने से जड़ हैं, अतः उन सभी का कोई अन्य प्रकाशक होना चाहिये, और वह 'आत्मा' ही हो सकता है, इसलिये 'आत्मा' विकारी है। किन्तु यही कथन उस आत्मा की कूटस्थता को सिद्ध कर देता है, क्योंकि 'आत्मा' उन वृत्तियों के केवल किसी अंशविशेष का ही प्रकाशक नहीं है, अपितु अन्तःकरण की जितनी भी ज्ञात-अज्ञात वृत्तियाँ हैं; उन सभी का एकरूप से प्रकाशक है। जो विकारी प्रकाशक होते हैं, वे विषय के केवल अंशमात्र को प्रकाशित करते हैं। जैसे नेत्र, घर का जितना भाग सामने रहता है, उतने भाग को ही देख सकता है, पीछे के भाग को नहीं देख सकता । किन्तु आत्मा ऐसा नहीं है। वह ज्ञात-अज्ञात रूप से रहने वाली सभी वृत्तियों का अखण्ड प्रकाशक है। इस कारण वह आत्मा नित्य निर्विकार है ॥ ७५ ॥ तत्राह-उपलब्धिर्नाम धात्वर्थो विक्रियैव, उपलब्धुः कूटस्थात्मता चेति विरुद्धम् ।।७६।। हृदयस्पर्शिनी तत्रेति-इस पर शिष्य कहता है-प्रकृति-प्रत्ययार्थ के पर्यालोचन से उपलब्ध को कूटस्थ कहना विरुद्ध प्रतीत हो रहा है। क्योंकि 'उप' उपसर्गवाले 'लभ्' धातु से 'कर्तरि' 'तृच्' का विधान किया है। और 'उपलब्धि' रूप धात्वर्थ ही क्रिया है। और क्रिया तो उत्पत्ति-विनाशवती हुआ करती है, अतः वह विकाररूपा है। ऐसी स्थिति में उपलब्धारूप कर्ता को निर्विकार, कूटस्थ कैसे बता रहे हैं ? ॥ ७६ ॥ न, धात्वर्थविक्रियायामुपलब्ध्युपचारात् । यो हि बौद्धः प्रत्ययः, स धात्वर्थो विक्रियात्मकः आत्मनः उपलब्ध्याभासफलावसान इत्युपलब्धिशब्देनोपचर्यते, यथा छिदिक्रिया द्वैधीभावफलावसानेति धात्वर्थत्वेनोपचर्यते तद्वत् ॥७७॥ हृदयस्पर्शिनी नेति-इस पर गुरु कहते हैं-प्रकृतिभूत धात्वर्थ क्रिया ही हो और प्रत्ययार्थ कर्ता ही सर्वत्र मुख्य हो, ऐसा कोई नियम नहीं है। क्योंकि "गडि वदनैकदेशे", "सविता प्रकाशते", "सविता प्रकाशयति" यहाँ व्यभिचार दिखाई देता है। अतः प्रकृत में धात्वर्थ तत्कर्तृवाचक उपलब्ध शब्द को गौणार्थक मानना ही उचित होगा। अर्थात् धातु के अर्थरूप विकार में 'उपलब्धि' का गौण प्रयोग (उपचार) है। बुद्धिपरिणाम (बौद्ध) अर्थात् बुद्धिजनित ज्ञान ही विकाररूप धात्वर्थ हुआ करता है। अर्थात् धात्वर्थ ही विक्रियारूप (विशिष्ट क्रियारूप) है। अतः बुद्धि (अन्तःकरण) द्रव्य होने से उसका परिणाम मृत्परिणाम घटादि की तरह द्रव्य ही है, वह क्रियारूप नहीं है, ऐसा समझना ठीक नहीं है। मृदादि के समान अपने आकार को तिरोहित करके अन्तःकरण का परिणाम नहीं हुआ करता, किन्तु जलूका या आलोक की

  • स्येव