उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरण ३०७ नैव, भगवान् शक्नोमि न कर्तुम् । अन्येन केनचित्प्रयुक्तोऽहं, न स्वतन्त्र इति ॥६६॥ हृदयस्पर्शिनी नैवेति—शिष्य कहता है—नहीं भगवन् ! देहाद्यात्मभावना के न करने में मैं समर्थ (स्वतन्त्र) नहीं हूँ । मैं किसी अन्य के द्वारा प्रेरित हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ । मैं नहीं चाहता हूँ, तथापि मेरी उससे निवृत्ति नहीं हो पाती । ऐसा लगता है, जैसे मुझे कोई प्रेरित कर रहा हो । गीता में कहा ही है कि "अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः१” ॥ ६६ ॥ न र्तार्ह अचितिमित्त्वात्स्वार्थस्त्वम् । येन प्रयुक्तोऽस्वतन्त्रः प्रवर्तसे, स चितिमान् स्वार्थः । संघात एव त्वम् ॥६७॥ हृदयस्पर्शिनी न तर्हीति—गुरु कहते हैं कि यदि तू अन्य के द्वारा प्रेरित हो रहा है तो तू अचेतन है, तब तू स्वार्थ नहीं है, अपितु परार्थ ही है। जिसके द्वारा प्रेरित होकर तू अस्वतन्त्रता से प्रवृत्त होता है, वह चेतन ही स्वार्थ (स्वतन्त्र) है, तू तो संघात ही है ॥ ६७ ॥ यद्यचेतनोऽहम्, कथं सुखदुःखवेदनां भवदुक्तं च जानामि ? ॥६८॥ हृदयस्पर्शिनी यदीति—शिष्य कहता है कि यदि मैं अचेतन हूँ, तो सुख-दुःख के अनुभव को या आपकी बात को कैसे समझ रहा हूँ ? ॥ ६८ ॥ गुरुरुवाच--किं सुखदुःखवेदनाया मदुक्त ञ्चान्यस्त्वम्, किंवाऽनन्य एव इति ॥६९॥ हृदयस्पर्शिनी गुरुरिति—गुरु बोले—तू सुख-दुःख के अनुभवात्मक ज्ञान से और मेरे कथन से भिन्न है, अथवा उनसे अभिन्न ही है ? ॥ ६९ ॥ शिष्य उवाच--नाहं तावदनन्यः । कस्मात् ? यस्मात्तदुभयं कर्मभूतं घटादिकमिव जानामि । यद्यनन्योऽहम्, तेन तदुभयं न जानीयाम्, किंतु जानामि, तस्मादन्यः । सुखदुःखवेदनाविक्रिया च स्वार्थैव प्राप्नोति, त्वदुक्तं च स्यात्, अनन्यत्वे । नच तयोः स्वार्थता युक्ता । नहि चन्दनकण्टककृते सुखदुःखे चन्दनकण्टकार्यै, घटोपयोगो वा घटार्थः । तस्मात्तद्विज्ञातुर्मम चन्दनादिकृतोऽर्थः । अहं हि ततोऽन्यः समस्तमर्थं जानामि बुद्धचारूढम् ॥७०॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य इति—शिष्य ने कहा—मैं उनसे अभिन्न (अनन्य) तो हूँ नहीं । अभिन्न क्यों नहीं हूँ ? क्योंकि मैं घटादि के समान कर्मभूत उन दोनों को जानता हूँ । यदि मैं उनसे अनन्य (अभिन्न) होता तो उन दोनों को जान नहीं सकता था, किन्तु जानता हूँ । यदि उनसे मेरा अभेद होता तो सुख-दुःख का अनुभवरूप विकार स्वार्थ ही सिद्ध होता और फिर आपके कहे हुए अनित्यत्व आदि दोष भी प्राप्त होते । किन्तु उनका स्वार्थ होना ठीक नहीं है । क्योंकि चन्दन और कण्टक से उत्पन्न होनेवाले सुख और दुःख, चन्दन और कण्टक के ही लिए नहीं होते, उसी तरह घट का उपयोग भी घट के लिए ही नहीं होता । अतः चन्दन आदि से उत्पन्न हुआ कार्य, उसके जाननेवाले मुझ ज्ञाता के लिए ही है। और मैं तो उससे भिन्न हूँ तथा अपनी बुद्धिवृत्ति पर आरूढ़ हुए समस्त कार्य को जानता हूँ ॥ ७० ॥ १. ( भग. गी. ३।३६ )