उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०६ उपदेशसाहस्री होता ही है। आकाश तो नीरूपद्रव्य है, और सर्वगत (सर्वत्र व्याप्त) है, इस कारण उसके साथ इन्द्रिय संयोग न हो सकने पर भी उसे साक्षिसिद्ध माना जाता है, अतः तलमलिनता का अध्यास उसपर किया जाता है, इसलिये तुम्हारा उक्त नियम उचित नहीं है। अब तृतीय विकल्प भी ठीक नहीं है, क्योंकि बाह्य पदार्थों में सामान्यांश और विशेषांश के विद्यमान रहने पर भी अग्नि की पिंगलता जैसे धूमादि में अध्यास के प्रति कारण नहीं होती, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिये। इसलिये आत्मा का स्वरूपतः स्फुरण रहने पर भी अनृत, जड़, दुःखान्त अनात्मपदार्थव्यावृत्ताकार से अर्थात् वेदान्तजनित ज्ञान के न रहने पर अध्यासविरोधी स्फुरण के अभाव में अध्यास बन सकता है। इसलिये कोई दोष नहीं है ।। ६१ ।। किं भगवन्, देहात्मनोरितरेतराध्यारोपणा देहादिसंघातकृता; अथवाऽस्मत्कृतेति ? ।। ६२ ।। हृदयस्पर्शिनी किमिति—शिष्य पुनः शंका करता है कि यह अध्यासज्ञानाकार परिणाम क्या आत्मा का है ? या अनात्मा का है ? किंवा दोनों का है ? इन तीनों विकल्पों में से प्रथम विकल्प ठीक नहीं है, क्योंकि उसे आत्मा का मानने पर उसे विकारी और अनित्य कहना होगा। द्वितीय विकल्प भी ठीक नहीं है क्योंकि अचेतन का वह हो नहीं सकता। अतएव तृतीय विकल्प भी उचित नहीं है। शिष्य के पूछने का अभिप्राय यह है कि हे भगवन् गुरुदेव ! देह और आत्मा का परस्पराध्यारोप (अन्योन्याध्यास) देहादि संघात (अनात्म जड़ पदार्थ) कृत है या आत्मा का किया हुआ है ? ।।६२।। गुरूवाच--यदि देहादिसंघातकृता, यदि चात्मकृता, किं *तव स्यात् ? ।।६३।। हृदयस्पर्शिनी गुरुरिति—शिष्य का अभिप्राय जानने की इच्छा से गुरु, शिष्य से पूछता है कि देहादि संघात का किया हुआ हो, अथवा आत्मा का किया हुआ हो, किसी का भी हो, उससे क्या हुआ ? सन्देह को जैसे प्रकट करते हो, वैसे ही प्रयोजन को भी प्रकट करना चाहिये। अतः उक्त दोनों पक्षों में प्रयोजन बताओ ।। ६३ ।। इत्युक्तः शिष्य आह--यद्यहं देहादिसंघातमात्रः, ततो ममाचेतनत्वात्परार्थत्वमिति न मत्कृता देहात्मनोरितरेतराध्यारोपणा । अथाहमात्मा परोऽन्यः संघातात्, चितिमत्त्वात्स्वार्थ इति मयैव चिति- मताऽऽत्मन्यध्यारोपणा क्रियते सर्वानर्थबीजभूता ।।६४।। हृदयस्पर्शिनी इत्युक्त इति — गुरु के द्वारा पूछे जाने पर शिष्य अपने बताये गये दोनों पक्षों में क्रमशः प्रयोजन को प्रका- शित कर रहा है। शिष्य कहता है—यदि मैं देहादि संघातमात्र हूँ तो अचेतन होने के कारण मेरा परार्थत्व सिद्ध होता है, इसलिये देह-आत्मा का यह अन्योन्याध्यास मेरा किया हुआ नहीं हो सकता। और यदि मैं इस संघात से भिन्न पर-आत्मा हूँ, तो चेतन होने के कारण मैं स्वार्थ (अपने ही प्रयोजन के लिये ) हूँ, अर्थात् परार्थ नहीं हूँ। तब सम्पूर्ण अनर्थों का बीजभूत यह अध्यास, मुझ चेतन के द्वारा अपने में ही किया जाता है। इस रीति से मैं स्वयं ही अपने आप को बन्धन में डालने वाला सिद्ध होऊँगा। किन्तु कोई भी सामर्थ्यसम्पन्न जानबूझ कर अपना अनर्थ नहीं कर सकता। इसलिये मेरे द्वारा ही यह अनिष्ट व्यापार कैसे संभव हो सकता है ? ।। ६४ ।। इत्युक्तो गुरुरुवाच--अनर्थबीजभूतां चेन्मिथ्याध्यारोपणां †जानीषे, तां मा कार्षीस्तर्हि ।।६५।। हृदयस्पर्शिनी इत्युक्तो गुरुरिति—शिष्य के इस प्रकार कहने पर गुरु ने कहा—देहाद्यात्मभावना को यदि अनर्थकरी समझते हो तो उसका त्याग क्यों नहीं करते ? क्योंकि तुम तो स्वतन्त्र हो ।। ६५ ।।
- तत्र—पाठान्तरम् । † मन्यसे—पाठान्तरम्