उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरणम् ३०५ हृदयस्पर्शिनी यत्पुनरुक्तमिति—तुमने कहा है कि देहादि को आत्मा में अध्यस्त मानने पर उसकी असत्ता (अत्यन्ताभाव) होगी तो प्रत्यक्षादि प्रमाणों से विरोध होगा। किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है। क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से आत्मा में देह की सत्ता नहीं देखी गई है। अर्थात् चक्षु से अथवा स्पर्श से देह का ग्रहण होने पर भी उनसे आत्मा का ग्रहण किसी को नहीं होता है। उस आत्मा का उनके द्वारा ग्रहण न हो सकने से 'तत्र इदम्' उसमें यह है, इस प्रकार ग्रहण अनुपपन्न है। "पराञ्चि खानि¹"—इस श्रुति के अनुसार आत्मा, इन्द्रिय का विषय नहीं है, अतः उसमें देह के सम्बन्ध का प्रत्यक्ष नहीं है। वह सम्बन्ध, प्रत्यक्ष का ही जब विषय नहीं बन पाता, तब वह अनुमानादि प्रमाणों का भी विषय नहीं बन पाता, यह अर्थात् सिद्ध हो जाता है, क्योंकि अनुमानादि प्रमाणों की प्रवृत्ति प्रत्यक्षमूलक ही हुआ करती है। गमले में ही बेर का पौधा, दूध में ही घी, तिल में ही तैल, और भित्ति में ही चित्र इत्यादि व्यतिरेक दृष्टान्तों को देकर उसकी (देह की) आत्मा में अनुपलब्धि को बताया गया है। पहला उदाहरण प्रत्यक्ष प्रमाण का है, दूसरा उदाहरण अनुमान का है, तीसरा उदाहरण अर्थापत्ति का है। गमले में बेरी के तुल्य देह और आत्मा एक देश (एक जगह) में संलग्न हुए नहीं उपलब्ध होते हैं। तथापि भित्ति और चित्र की भेदेन उपलब्धि न होने पर भी जैसे उनमें आधाराधेयभाव रहता है, वैसा ही आत्मा और देह में क्यों न मान लिया जाय, यह शंका हो सकती है। तथापि चित्रांकित भित्ति की उपलब्धि के समान देहाकारांकित आत्मा की उपलब्धि नहीं हुआ करती। यदि वैसी उपलब्धि हो तो 'मयि मनुष्यो देहोऽयमस्ति' मुझमें मनुष्यरूप यह देह है—ऐसा व्यवहार होता, 'मनुष्योऽहम्, स्थूलोऽहम्'-मैं मनुष्य हूँ, मैं स्थूल हूँ—यह व्यवहार न होता, किन्तु व्यवहार तो ऐसा ही होता है। अतः प्रत्यक्षादि प्रमाणों से आत्मा में देह नहीं देखा गया है। इस कारण प्रत्यक्षादि प्रमाणों से भी कोई विरोध नहीं है। अतः प्रत्यक्षादि प्रमाणों से आत्मा में देह की सत्ता नहीं है ॥ ५९ ॥ कथं तर्हि प्रत्यक्षाद्यप्रसिद्धात्मनि देहाध्यारोपणा*, देहे चात्मारोपणा* ? ॥६०॥ हृदयस्पर्शिनी कथमिति—इसपर पुनः शिष्य अपनी शंका प्रकट कर रहा है कि किसी भी विषय का सामान्यतः ग्रहण होने पर और विशेषतः ग्रहण न होने पर ही विषयान्तर का अध्यास होता देखा गया है। परन्तु आत्मा तो प्रत्यक्षादि प्रमाणों का अविषय है, ऐसी स्थिति में इसपर अनात्मा का अध्यारोप कैसे किया जा रहा है? तथा अनात्मापर आत्मा का आरोप कैसे किया जा रहा है ? ॥ ६० ॥ नायं दोषः, स्वभावप्रसिद्धत्वादात्मनः। नहि कादाचित्कसिद्धावेवाध्यारोपणा, न नित्यसिद्धौ- इति नियन्तुं शक्यम् आकाशे तलमलाद्यध्यारोपणदर्शनात् ॥६१॥ हृदयस्पर्शिनी नायमिति—शिष्य की आशंका को स्पष्ट करने के लिये तीन विकल्प किये जा सकते हैं। (१) क्या आत्मा का स्फुरण न होने से उसमें अध्यास का संभव नहीं हो सकता ? अथवा (२) विषयत्वेन स्फुरण न होने से अध्यास नहीं हो सकता ? किंवा (३) सामान्यांश का ग्रहण होने से किन्तु विशेष अंश का ग्रहण न हो पाने से अध्यास का संभव नहीं है ? इन तीन विकल्पों में से प्रथम विकल्प तो बन नहीं सकता, क्योंकि आत्मा तो स्वभाव से ही प्रसिद्ध है, अर्थात् स्वप्रकाश आत्मा का अपनी महिमा से ही सदा स्फुरण होता रहता है। दूसरा विकल्प भी ठीक नहीं है, क्योंकि यह कोई नियम नहीं है कि केवल कदाचित् अर्थात् कभी-कभी सिद्ध होनेवाली वस्तु में ही आरोप हुआ करता है, नित्यसिद्ध वस्तु में आरोप नहीं होता। क्योंकि अनैन्द्रियक आकाश में (आकाश के अप्रत्यक्ष होने पर) भी ऐन्द्रियक होने का भ्रम होता ही है, अर्थात् आकाश के प्रत्यक्ष होने का भ्रम होता ही है अर्थात् स्वतः स्फुरित होने वाला आत्मा स्वयं अविषय रहने पर भी उसमें विषयाध्यास का होना असंभव नहीं है। आकाश में तलमलिनता (नीलत्व) का अध्यारोप १. ( कठ उ. ४।१)
- पर्णं—पणम्—पाठान्तरम् । ३९