भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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कूटस्थाद्वयात्मबोधप्रकरण ३१५ चित्स्वरूप को आगन्तुक कह रहे हो ? यदि प्रथम पक्ष के अनुसार चैतन्यस्वरूप को ही आगन्तुक समझते हो तो तुम अलौकिक बुद्धिमान् हो। अच्छा; देखो, हम तो न्यायप्रमाणकुशल होते हुए भी किसी युक्ति से सौ वर्ष में भी ऐसी कल्पना नहीं कर सकते और न ही कोई अन्य मूढ (मूर्ख) पुरुष भी ऐसा कह सकता है, जैसा तुम कह रहे हो। अभिप्राय यह है—पहले यह विचार करो कि चैतन्य का आगन्तुकत्व, चैतन्य के द्वारा ही ग्रहण किया जाता है? या अचैतन्य के द्वारा ? इसमें प्रथम पक्ष तो ठीक नहीं होगा, क्योंकि स्वग्राह्यत्व मानने पर स्ववृत्तिविरोध होगा । किसी अंगुली के अग्र भाग से उसी अंगुलि को स्पर्श कर पाना कभी संभव नहीं होता। अथवा असिधारा से उसी असिधारा को नहीं काटा जाता। और न ही किसी अन्य चैतन्य से अन्य चैतन्य की आगन्तुकता को ग्रहण किया जा सकता है। क्योंकि अद्यापि अन्यत्व सिद्ध नहीं हो पाया है। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है क्योंकि स्वयं जड़ का प्रकाश, चित् (चैतन्य) के ही अधीन रहता है, अतः वह जड़, चित् का प्रकाशक कैसे होगा? क्योंकि वह स्वयं ही अप्रकाश है, पराधीन होकर ही वह प्रकाशित हो पाता है। अतः चैतन्य आगन्तुक नहीं है। श्रुति भी इस बात को पुष्ट कर रही है—‘‘यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते अविनाशित्वात् । न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यत् पश्येत्१।” इस प्रकार अनुपपत्ति दिखलाकर प्रथम विकल्प का निराकरण किया। अब अचैतन्य के आपादन बताकर द्वितीय विकल्प का निराकरण कर रहे हैं। संहत होने के कारण (नेत्रादि इन्द्रियद्वारक बुद्धि- वृत्तिरूप उपाधिग्रस्त जो पदार्थ होता है, वह संहत होता है) उसकी परार्थता, अनेकता, और नाशशीलता को भी कोई पुरुष युक्ति के द्वारा निवृत्त नहीं कर सकता, क्योंकि जो स्वार्थ नहीं है, उसकी स्वतःसिद्धि नहीं हो सकती, यह हम पहले ही कह चुके हैं। बात को श्रुति भी पुष्ट कर रही है। “न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुया न न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः २।” चैतन्यस्वरूप आत्मा स्वतः सिद्ध है, अतः वह, अन्य की अपेक्षा नहीं करता, क्योंकि वह अव्यभिचारी है, इस तथ्य का निवारण कोई नहीं कर सकता। उपर्युक्त श्रुति में षष्ठ्यन्त शब्दवाच्य दृष्टि आदि, अन्य द्रष्टा से व्याप्य होने के कारण वे अचैतन्यस्वरूप (जड़) बताये गये हैं। और उनसे भिन्न दृष्टि आदि पदार्थों के स्वरूप का प्रकाशक होने से द्रष्टृ आदि शब्दों से निर्दिष्ट साक्षी नित्यचैतन्यस्वभाव है, यह सिद्ध होता है ॥ ९१ ॥ ननु व्यभिचारो दर्शितो मया—सुषुप्ते न पश्यामीति ॥९२॥ हृदयस्पर्शिनी नन्विति—इस पर शिष्य ने कहा कि मैंने पहले ही व्यभिचार दिखा दिया है कि “मैं सुषुप्ति में नहीं देखता हूँ” ॥ ९२ ॥ न, व्याहतत्वात् कथं व्याघातः ? पश्यतस्तव न पश्यामीति व्याहतं वचनम् । न हि कदाचिद्भगवन्, सुषुप्ते मया चैतन्यमन्यद्वा किंचिद्दृष्टम् । पश्यँस्तर्हि सुषुप्ते त्वम्; यस्माद्दृष्टमेव प्रतिषेधसि, न दृष्टिम् । या तव दृष्टिः, तच्चैतन्यम्, इति मयोक्तम् । यया त्वं विद्यमानया न किंचिद्- दृष्टमिति प्रतिषेधसि, सा दृष्टिस्त्वच्चैतन्यम् । तर्हि सर्वत्राव्यभिचारात्कूटस्थनित्यत्वं सिद्धं स्वत एव, न प्रमाणापेक्षम् । स्वतःसिद्धस्य हि प्रमातुरन्यस्य प्रमेयस्य परिच्छित्तिं प्रति प्रमाणापेक्षा । या त्वन्या नित्या परिच्छित्तिरपेक्ष्यतेऽन्यस्यापरिच्छित्तिरूपस्य परिच्छेदाय, सा हि नित्यैव कूटस्था, स्वयंज्योतिःस्वभावा आत्मनि प्रमाणत्वे प्रमातृत्वे वा न तां प्रति प्रमाणापेक्षा, तत्स्वभावत्वात्, यथा प्रकाशनमुष्णत्वं वा लोहोदकादिषु परतोऽपेक्ष्यते अग्न्यादित्यादिभ्यः, अतत्स्वभावत्वात्, नाग्न्यादित्यादीनां तदपेक्षा, सदा तत्स्वभावत्वात् ॥९३॥ १. (बृ. उ. ४।३।२३) २. (बृ. उ. ३।४।२)