भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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३१६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनो नेति—गुरु कहते हैं-अरे, जैसा तुम समझ रहे हो, वैसा नहीं है। क्योंकि तुमने अभी जो कहा, उसमें विरोध (व्याघात) है। शिष्य ने पूछा-व्याघात किस प्रकार है ? गुरु ने कहा- तुम जो कह रहे हो कि 'मैं नहीं देखता', यही व्याघात है, क्योंकि देखते हुए भी 'मैं नहीं देखता हूँ' कह रहे हो। तुमने अभी कहा था कि 'भगवन् ! मैंने सुषुप्ति में चैतन्य अथवा कोई अन्य वस्तु कभी नहीं देखी' इसी से यह सिद्ध हो जाता है कि सुषुप्ति में भी तुम देखते रहते हो, तुम दृश्य वस्तु का ही निषेध कर रहे हो, देखने का तो नहीं कर रहे हो। अतः वह जो देखना अर्थात् दृष्टि (ज्ञान) है, वही तो चैतन्य है, यह मैं पहले बता चुका हूँ। जिस दृष्टि के विद्यमान रहने से ही तुम 'मैंने कुछ नहीं देखा' इस प्रकार निषेध कर पा रहे हो, वह जो दृष्टि (ज्ञान) है, वह तुम्हारा 'चैतन्य' ही है। तब तो सर्वत्र अव्यभिचार होने के कारण तुम्हारा कूटस्थत्व, नित्यत्व स्वतः सिद्ध ही है। उसमें किसी प्रमाण की अपेक्षा नहीं है। वह तो प्रमाण के प्रवृत्त होने के पूर्व से ही प्रकाशमान है। इस प्रकार के प्रमाता का दृश्य जो अन्य प्रमेय है, उसकी स्फूर्ति (परिच्छित्ति) के लिये उसे प्रमाण की अपेक्षा रहती है। अपने प्रमातृस्वरूप की परिच्छित्ति (स्फूर्ति) के प्रति उसे प्रमाण की अपेक्षा नहीं होती। किन्तु जिस नित्य परिच्छित्ति (संवित्, ज्ञान) की, अन्य अचेतन वस्तुओं के प्रकाशनार्थ अपेक्षा रहती है, वह तो नित्या, कूटस्था, स्वयंप्रकाशस्वरूपा ही है। आत्मा के प्रमाणत्व अथवा प्रमातृत्व में उस परिच्छित्ति को किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा नहीं हुआ करती, क्योंकि वे तो उसके स्वभाव ही हैं। जिस प्रकार लोहे और जल आदि में प्रकाशन अथवा उष्णत्व के लिये अग्नि और आदित्य की अपेक्षा होती है, क्योंकि वे उनके स्वभाव नहीं हैं। परन्तु अग्नि या सूर्य को प्रकाशन या उष्णत्व के लिये किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती है, क्योंकि वे उनके स्वभाव ही हैं। अभिप्राय यह है कि अन्तःकरणवृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्य ही 'प्रमाण' शब्द से कहा जाता है, और वृत्तिमत् अन्तःकरणप्रतिविम्बित चैतन्य 'प्रमातृ' शब्द से कहा जाता है। वे दोनों प्रमेय के अवभासकाल में विविध प्रकार से अवभासित होते हैं। तब ऐसा प्रतीत होने लगता है कि प्रमेय ही स्वतः स्फुरित हो रहा है, इस प्रकार प्रमेय के स्वतः स्फुरण की शंका होने लगती है। किन्तु वस्तुस्थिति वैसी नहीं है। चैतन्य का जो अवभास होता है, उसके लिये किसी अन्य प्रमाता की या अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं पड़ती, अन्यथा अनवस्था प्रसंग आवेगा, और वैसा मानने में कोई उपपत्ति (युक्ति) भी नहीं है। अतः प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय का अवभासक स्वप्रकाश आत्मा है, यह स्पष्ट हो जाता है। नित्यस्वप्रकाश कूटस्थ चिदात्मता उसी की है। अप्रकाश स्वभाववाली वस्तुओं को ही प्रकाशित होने के लिये प्रकाशान्तर की अपेक्षा होती है, किन्तु प्रकाशस्वभाव वाली वस्तु को नहीं ॥ ९३ ॥ अनित्यत्व एव प्रमा स्यात्, न नित्यत्व इति चेत् ॥९४॥ हृदयस्पर्शिनो अनित्यत्व इति-इस पर पुनः शंका होती है कि संवित् (ज्ञान) रूप प्रमा तो प्रमाण का फल है, तब उसे नित्य कैसे कह सकते हैं ? अर्थात् प्रमा तो अनित्य ज्ञान होने पर ही होती है, नित्य ज्ञान होने पर तो नहीं होती। अभिप्राय यह है कि अनधिगत, अबाधित अर्थविषयक ज्ञान को 'प्रमा' कहते हैं। अर्थात् जिस ज्ञान का पहले कभी अनुभव नहीं हुआ है और जिसका कभी बाध भी नहीं होता उसे 'प्रमा' कहते हैं। 'स्मृति' ज्ञान, पूर्वानुभव से होने के कारण वह पूर्वानुभवपूर्वक है, उसका 'अनधिगत' कहने से व्यावर्तन हो गया। और रज्जु में सर्पज्ञानरूप भ्रम, अथवा शुक्ति में रजतज्ञानरूप भ्रम का कालान्तर में बाध हो जाता है। अतः 'अबाधित' कहने से भ्रमज्ञान का निरास हो जाता है। इस प्रकार की 'प्रमा' को प्रमाण का फल हो कहा जाता है। जैसे यथार्थ घट में घटबुद्धि होना ही 'प्रमा' है। वह प्रमाणजन्य है, अतः वह अनित्य है। क्योंकि जो जन्य होता है, वह अनित्य होता है। 'प्रमा' भी जन्य है, अतः उसे अनित्य ही कहा जायगा। तब आत्मज्ञान यदि नित्यसिद्ध है तो उसे 'प्रमा' कैसे कह सकते हैं ॥ ९४ ॥ न, अवगतेर्नित्यत्वाऽनित्यत्वयोर्विशेषाऽनुपपत्तेः- नहि अवगतेः प्रमात्वेऽनित्यावगतिः प्रमा, न नित्या इति विशेषोऽवगम्यते ॥९५॥