उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 346, कुल 364 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्तर नहीं है। जैसे 'स्था' आदि धातु के अर्थ (गति, निवृत्ति आदि) में गत्यादिपूर्वकता के कारण अनित्यता होने पर अथवा पूर्वगति आदि की शून्यता रहने से नित्यता होने पर कोई विशेषता नहीं होती। उसी से (धात्वर्थ से) 'मनुष्य स्थित है' 'पर्वत स्थित है' इस प्रकार समान व्यपदेश होता देखा गया है। 'मनुष्य स्थित है' इस उदाहरण में गत्यादिपूर्वकता के कारण अनित्य स्थिति का प्रदर्शन है, तथा 'पर्वत स्थित है' इसमें जिसके पहले भी गति आदि नहीं थी, ऐसी नित्य स्थिति प्रदर्शित की गयी है। किन्तु इस प्रकार अर्थ में भेद होने पर भी व्यपदेश (व्यवहार) में कोई भेद नहीं है। उसी प्रकार प्रमाता चेतन के नित्यज्ञानस्वरूप होने पर भी उसे प्रमाता कहने में कोई विरोध नहीं है। क्योंकि नित्य-अनित्य द्विविध ज्ञान के फल तो समान ही हैं। अभिप्राय यह है कि प्रमाण के फल को ही प्रमा कहते हैं। वह चित्प्रकाशरूप है, अतः उसे प्रमातृगत ही कहना होगा। अन्यथा उसे विषयगत मानने पर 'मया इदं विदितम्'—मैंने यह जाना इस प्रकार स्वात्मा में ज्ञान-ज्ञेय सम्बन्ध का अनुभव अनुपपन्न होगा। और अन्तःकरणादि जड़ पदार्थ में व्यापाराश्रयता के रहने पर भी चिदाश्रयत्व नहीं रहता है, उस कारण उसमें प्रमातृत्व उपपन्न नहीं होता है। किन्तु चिदात्मा तो कूटस्थ है, उस कारण उसमें व्यापारवत्ता के न रहने से प्रमा के प्रति उसका कर्तृत्व अनुपपन्न है। मुख्य वृत्ति से जड़-अजड़ दोनों में भी प्रमातृत्व व्यपदेश की योग्यता नहीं है। परस्पराध्यास के कारण व्यवहार चलता रहता है, अतः बाह्य विषय में भी आत्मा का प्रमातृत्व मिथ्या ही है। ऐसी स्थिति में स्वयंप्रकाश स्वभाववाले आत्मा में प्रमातृत्व की शंका करने का अवकाश ही कहाँ है? और उसके अनवभास का प्रसंग ही कहाँ है? तथा प्रमाण की अपेक्षा भी कहाँ और कैसे है? ॥१०३॥
अत्राह शिष्यः-नित्यावगतिस्वरूपस्यात्मनोऽविक्रियत्वात्कार्यकरणे संहृत्य* तक्षादीनामिव वास्यादिभिः कर्तृत्वं नोपपद्यते । असंहतस्वभावस्य च कार्यकारणोपादानेऽनवस्था प्रसज्येत । तक्षादीनां तु कार्यकारणैर्नित्यमेव संहतत्वमिति वास्याद्युपादाने नानवस्था स्यादिति ॥१०४॥
हृदयस्पर्शिनी अत्रेति—इस प्रकार से कूटस्थ नित्य चैतन्य स्वप्रकाश आत्मा में अन्तःकरणरूप उपाधि के सम्बन्ध से प्राप्त औपाधिक प्रमातृत्व का उपपादन करके, अब कर्तृत्व भी उसी प्रकार है, यह बताने के लिये प्रश्न उपस्थित कराते हैं। गुरु का उपर्युक्त कथन सुनकर शिष्य कहता है—जिस प्रकार बसूल आदि साधनों (औजारों) से युक्त हुए बिना काष्ठ- वर्धक (तक्षा, बढ़ई) का कर्तृत्वसम्बन्ध नहीं हो पाता, उसी प्रकार नित्यज्ञानस्वरूप आत्मा का भी देह और इन्द्रियों से सम्बन्ध हुए बिना कर्तृत्व उपपन्न नहीं है। क्योंकि वह निर्विकार है। असंहत स्वभाववाला आत्मा यदि शरीर और इन्द्रिय का ग्रहण करता है ऐसा कहें तो अनवस्था दोष का प्रसंग उपस्थित होता है। तक्षा (बढ़ई) का तो देह, इन्द्रियों से सर्वदा ही संहतत्व है, इस कारण वह बसुला आदि साधनों का जो ग्रहण करता है, उसमें अनवस्था नहीं आने पाती। 'तक्षादीनामिव' यह व्यतिरेक दृष्टान्त है ॥ १०४ ॥
इह तु असंहतस्वभावस्य करणानुपदाने कर्तृत्वं नोपपद्यत इति करणमुपादेयम्, तदुपादानमपि विक्रियैवेति तत्कर्तृत्वे करणान्तरमुपादेयम्, तदुपादानेऽप्यन्यदिति प्रमातुः स्वातन्त्र्येऽनवस्थाऽपरिहार्या स्यादिति । न च क्रियैवात्मानं कारयति, अनिर्वर्तितायाः स्वरूपाभावात् । अथान्यदात्मानमुपेत्य क्रियां कारयतीति चेत्--न, अन्यस्य स्वतःसिद्धत्वाविषयत्वाद्यनुपपत्तेः न ह्यात्मनोऽन्यदचेतनं वस्तु स्वप्रमाणकं दृष्टम् । शब्दादि सर्वमेवावगतिफलावसानप्रत्ययप्रमितं सिद्धं स्यात् । अवगतिश्चेदात्मनोऽन्यस्य स्यात्, सोऽप्यात्मैवासंहतः स्वार्थः स्यात्, न परार्थः । न च देहेन्द्रियविषयाणां स्वार्थतामवगन्तुं शक्नुमोऽवगत्य- वसानप्रत्ययापेक्षसिद्धिदर्शनात् ॥१०५॥
हृदयस्पर्शिनी इहेति—गुरु कहते हैं कि आत्मा में कर्तृत्व वास्तविक नहीं है। कर्तृत्व दो प्रकार का होता है। एक तो करण के द्वारा साध्य होने वाला, और दूसरा सान्निध्यमात्र से निष्पन्न होनेवाला। बढ़ई के समान आत्मा में करणोपादान-
- संहतस्य-पाठान्तरम् ।