भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 364 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 345

कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरण ३१९ अवगतेश्चैतन्यात्मज्योतिषः स्वात्मन्यनित्यत्वे, आत्मनः स्वार्थतानुपपत्तिः कार्यकारणसंघातवत्संहतत्वात्पारार्थ्यं दोषवत्त्वं चावोचाम । कथं ? चैतन्यात्मज्योतिषः स्वात्मन्यनित्यत्वे स्मृत्यादिव्यवधानात्सान्तरत्वम् । ततश्च तस्य चैतन्यज्योतिषः प्रागुत्पत्तेः; प्रध्वंसाच्चोर्ध्वमात्मन्येवाभावात्, चक्षुरादीनामिव संहतत्वात्, पारार्थ्यं स्यात् । यदा च तदुत्पन्नमात्मनि विद्यते, *न तदाऽऽत्मनः स्वार्थत्वम्, तद्भावाभावापेक्षा ह्यात्मानात्मनोः स्वार्थत्वपरार्थत्वसिद्धिः । तस्मादात्मनोऽन्यनिरपेक्षमेव नित्यचैतन्यज्योतिष्ट्वं सिद्धम् ।।१०१।। हृदयस्पशिंनी नेति—शिष्य से उसका अभिप्राय स्पष्ट कराने के लिये गुरु उस से पूछते हैं कि क्या तुम, सुषुप्त की समानता का परिहार करने के लिये आत्मा को अवगति (ज्ञान) का विषय कहना चाहते हो, या केवल सुषुप्तसमानता का परिहार मात्र कहना चाह रहे हो ? इन दो विकल्पों में से प्रथम विकल्प तो उचित नहीं है। क्योंकि ज्ञाता (अवगन्ता) का जो ज्ञान है, वह ज्ञेय को ही विषय करता है। यदि वह ज्ञाता को विषय करे तो पूर्ववत् अनवस्था प्राप्त होगी। यह तो हम पहले ही बता चुके हैं कि अग्नि और सूर्य की उष्णता एवं प्रकाश के तुल्य, आत्मा में अन्य किसी की अपेक्षा से रहित कूटस्थ नित्य स्वयंप्रकाश ज्ञान स्वतः सिद्ध है। आत्मा में यदि चैतन्यात्मप्रकाशरूप ज्ञान अनित्य हो तो आत्मा की स्वार्थता अनुपपन्न होती है। ऐसी अवस्था में देहेन्द्रिय के समान संहत होने से हमने उसका पारार्थ्य तथा दोषयुक्त होना भी बताया था। शिष्य ने पूछा 'किस प्रकार' तो उसी उक्त अनुपपत्ति को पुनः याद करा रहे हैं। यदि आत्मा का चैतन्यरूप ज्ञान अनित्य हो तो स्मृति, इच्छा आदि का व्यवधान (विच्छेद) रहने से वह चैतन्य ज्योतिरूप ज्ञान व्यवहीत (सान्तर) होगा। अर्थात् वह इच्छादिवृत्त्यन्तरपूर्वक होगा। उससे क्या होगा ? तब तो उस चैतन्यरूप ज्ञान का अपनी उत्पत्ति से पूर्व और विनाश के पश्चात् आत्मा में ही अभाव हो जाने से चक्षुरादि के तुल्य संहत होने से उसका (आत्मा का) पारार्थ्य सिद्ध होगा। चैतन्यरूप ज्ञान पैदा होकर आत्मा में रहता है, अतः आत्मा की स्वार्थता सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि उसमें संहतत्व का अभाव होने से स्वार्थत्व और स्वार्थत्व के होने से ही अनात्मा के परार्थत्व की सिद्धि हो जाती है। अतः आत्मा का अन्यनिरपेक्ष रहना ही उसकी नित्य चैतन्य प्रकाशरूपता है, यह सिद्ध हो जाता है ।। १०१ ।। नन्वेवं सति, असति प्रमाश्रयत्वे, कथं प्रमातुः प्रमातृत्वम् ? ।।१०२।। हृदयस्पशिंनी नन्विति—शिष्य कहता है कि आत्मा यदि प्रमा का आश्रय नहीं है तो प्रमातारूप चेतन का प्रमातृत्व कैसे संभव हो पायगा ? ।। १०२ ।। उच्यते—प्रमाया नित्यत्वेऽनित्यत्वे च रूपविशेषाभावात् । अवगतिर्हि प्रमा, तस्याः स्मृती- च्छादिपूर्विकाया अनित्यायाः कूटस्थनित्याया वा, न स्वरूपविशेषो विद्यते, यथा धात्वर्थस्य तिष्ठत्यादेः फलस्य गत्यादिपूर्वकस्यानित्यस्यागतिपूर्वकस्य नित्यस्य वा रूपविशेषो नास्तीति तुल्यो व्यपदेशो दृष्टः— “तिष्ठन्ति मनुष्याः” “तिष्ठन्ति पर्वताः” इत्यादिः । तथा नित्यावगतिस्वरूपेऽपि, प्रमातरि प्रमातृत्व- व्यपदेशो न विरुध्यते, फलसामान्यादिति ।।१०३।। हृदयस्पशिंनी उच्यत इति—गुरु कहते हैं कि जन्य प्रमा का आश्रय न होने पर भी उसमें प्रमातृत्व का व्यवहार उपपन्न हो सकता है। प्रमा चाहे नित्य हो या अनित्य हो, उसमें स्वरूप का कोई भेद नहीं है क्योंकि अवगति (ज्ञान) को ही 'प्रमा' शब्द से कहते हैं। वह प्रमा स्मृतिपूर्वक या इच्छा आदि पूर्वक अनित्य हो अथवा कूटस्थ नित्य हो, उसके स्वरूप में कोई

  • नैवं सम्भवति—पाठान्तरम् ।