उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१८ | उपदेशसाहस्री ही आत्मा में रहती है, यह पहले ही हम बता चुके हैं, जिससे तुम्हारी शंका का निवारण हो जाता है। अभिप्राय यह है कि असंहत ही संघात का साक्षी है, वही चितिमान् है, यह उपपादन कर चुके हैं। अथवा 'आत्मसिद्धिः प्रमाणं नापेक्षते' आत्मसिद्धि में प्रमाण की अपेक्षा नहीं होती, यह कहने से यही निष्कर्ष निकलता है कि आत्मसिद्धि में प्रमाणाभाव की अपेक्षा होती है। किन्तु आत्मसिद्धि के नित्य होने से उसकी अपेक्षा भी नहीं होनी चाहिए- यह अभिप्राय शंका करनेवाले शिष्य का है। उस शंका का परिहार गुरु करते हैं कि 'स्वतःसिद्धि' और 'प्रमाणनिरपेक्ष्य' इन दो शब्दों से सर्वनिरपेक्ष प्रकाशमान आत्मस्वरूप की ही विवक्षा रहने से तुम्हारी शंका के लिये कोई अवकाश ही नहीं रह जाता। यदि प्रमाता की सिद्धि, प्रमाण के अधीन हो तो बताओ, प्रमाण की अपेक्षा किसे होगी ? जिसे प्रमाण की अपेक्षा रहती है, उसे ही प्रमाता मानते हैं। निष्कर्ष यह है कि जितनी भी यच्चयावत् वस्तुएँ हैं, वे सभी ज्ञात या अज्ञात रूप से प्रमातृ चैतन्य की ही विषय हुआ करती हैं। यह वस्तुस्थिति है। तब यदि कभी अज्ञात समझकर उस निर्विकल्प साक्षी चैतन्य को जानने की इच्छा होती है तो उसके ज्ञातृत्व की सिद्धि के लिये जिसे वह इच्छा होगी, वही प्रमाण का आश्रयभूत प्रमाता कहलायेगा । उस समय प्रमाता की स्वरूपसिद्धि के लिये प्रमाण की अपेक्षा होगी। किन्तु वह होगी किसे ? उसी प्रमाता को या किसी अन्य को ? और वह किसे जानने के लिये होगी ? अपने को ही जानने के लिये होगी या किसी दूसरे के जानने के लिये होगी ? एवं च किसी भी प्रकार से प्रमाता को जानने की इच्छा उत्पन्न नहीं हो रही है। अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि जो इच्छा का आश्रय है, वह उसका विषय नहीं हो सकता। तथापि एक यह शंका हो सकती है कि आत्मा स्वयं ही अपना प्रमाता क्यों नहीं है ? इस शंका का समाधान यह है कि प्रमाणेच्छा हमेशा प्रमेयविषयिणी ही हुआ करती है, प्रमातृविषयिणी नहीं। यदि उसे प्रमातृविषयिणी मानेंगे तो प्रमाता और उसकी इच्छा का कोई अन्य प्रमाता स्वीकार करना होगा, और उसका अन्य कोई दूसरा, इस प्रकार अनवस्था-प्रसंग उपस्थित होगा। इसी प्रकार इच्छा को यदि प्रमातृ-विषयिणी मानेंगे तो प्रमाता आत्मा अव्यवहित होने के कारण उसे प्रमेय नहीं कह सकते। लोकव्यवहार में हम देखते हैं कि 'प्रमेय' सर्वदा प्रमाता से इच्छा, स्मृति एवं प्रमाण के जन्म द्वारा व्यवहित ही रहता है। उसके रहने का और कोई प्रकार नहीं है। अर्थात् इच्छा का विषयभूत प्रमेय इच्छा के जन्म (उत्पत्ति) से व्यवहित रहता है, स्मृति का विषयभूत प्रमेय स्मृति की उत्पत्ति से व्यवहित रहता है, प्रयत्न का विषयभूत प्रमेय प्रयत्न की उत्पत्ति से व्यवहित रहता है, उसी तरह प्रमाण का विषयभूत प्रमेय प्रमाण की उत्पत्ति से व्यवहित रहता है। अन्य कोई प्रकार उसके रहने का नहीं है। अवगति भी प्रमेयविषयिणी ही देखी गयी है। स्वयं प्रमाता अपने स्वयं की ही इच्छा आदि में से किसी के द्वारा व्यवहित हो ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। स्मृति भी स्मर्यमाण पदार्थ को ही विषय करती है। स्वयं स्मरण करनेवाले स्मर्ता को नहीं। उसी प्रकार इच्छा भी इष्ट वस्तु की ही हुआ करती है, अर्थात् इष्टवस्तु- विषयिणी ही होती है। वह इच्छा करनेवाले को अपना विषय नहीं बनाती। यदि स्मृति, स्मरणकर्ता को और इच्छा, इच्छा करने वाले को विषय करे तो पहले की तरह उन दोनों की अनवस्था होने लगेगी, जिसका परिहार नहीं हो सकेगा।। ९९ ।। ननु प्रमातृविषयावगत्यनुत्पत्तौ, अनवगत एव प्रमाता स्यादिति चेत् ।।१००।। हृदयस्पशिनी नन्विति-यहाँ तक यह बताया गया कि आत्मसिद्धि में प्रमाण-व्यापार की अपेक्षा नहीं है, क्योंकि प्रमाता में स्वविषयप्रमाणक्रियाश्रयत्व नहीं है, और अन्य प्रमाता की कल्पना करें तो अनवस्था होगी। अतः आत्मा अप्रमेय ही है, यह सिद्ध हुआ। बाह्य विषय (पदार्थ) के अवच्छेदार्थ उसे प्रमाणव्यापार की अपेक्षा रहती है, अतः प्रमाणव्यापार को व्यर्थ भी नहीं कह सकते, इस कथन से अवगति में स्वतः नित्यत्व सिद्ध किया गया। अब प्रकारान्तर से उसी के साधनार्थ पुनः पूर्व पक्ष कर रहे हैं। जिस विषय की अवगति होती है, उसी को अवगत और सिद्ध आदि शब्दों से कहा जाता है। किन्तु आपके कथनानुसार प्रमाता को विषय करनेवाला ज्ञान उत्पन्न न होने से प्रमाता तो अज्ञात ही रहेगा अर्थात् प्रमाता सर्वदा सुपुप्त ही रहेगा ।। १०० ।। न, अवगन्तुरवगतेरवगन्तव्यविषयत्वात्, अवगन्तृविषयत्वे चानवस्था पूर्ववत्स्यात् । अवगति- श्चात्मनि कूटस्थनित्यात्मज्योतिरन्यतोऽनपेक्षैव सिद्धा, अग्न्यादित्याद्युष्णप्रकाशवत् इति पूर्वमेव प्रसाधितम् ।