उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें॥ अथ परिसङ्ख्यानप्रकरणम् ॥ ३ ॥ मुमुक्षूणामुपात्तपुण्यापुण्यक्षपणपराणामपूर्वानुपचयार्थिनां* परिसंख्यानमिदमुच्यते--अविद्याहेतवो दोषा वाङ्मनःकायप्रवृत्तिहेतवः; प्रवृत्तेश्चेष्टानिष्टमिश्रफलानि कर्माण्युपचीयन्ते इति-तन्मोक्षार्थम् ॥११२॥ हृदयस्पर्शिनी मुमुक्षूणामिति—पूर्व प्रकरण में तत्त्वज्ञान का निरूपण किया गया है। जीव के परम कल्याण का हेतु वही है। जिसे उस तत्त्वज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, वही कृतकृत्य है। तब उसके लिये विधि रूप से कुछ भी कर्तव्य नहीं है। किन्तु भेद (द्वैत) दर्शन की दृढ़ वासना के कारण जिनकी उसमें स्थिरता नहीं होती अर्थात् निर्वातस्थ प्रदीप के समान जिनका ज्ञान निश्चल नहीं है, उनके ज्ञान की दृढ़ता के लिये यह 'परिसंख्यान' (अनात्म वस्तुओं का निषेध) प्रकरण प्रारंभ किया जा रहा है। यह परिसंख्यान उन मुमुक्षुओं (नितान्त उपशम चाहने वालों) के लिये कहा जा रहा है, जो अपने सञ्चित पुण्य-पाप का क्षय करने में तत्पर हैं, क्योंकि कर्म तो अविद्यामूलक होते हैं, अतः उसकी निवृत्ति हुए बिना आत्यन्तिक निवृत्ति का होना संभव नहीं है। तथा पूर्वोपार्जित कर्मों का उच्छेद और अपूर्वो- त्पादक कर्म का अननुष्ठान ये दोनों अविद्या की निवृत्ति से ही उपपन्न होंगे। इसलिये अविद्या की निवृत्ति के द्वारा उन दोनों की इच्छा रखने वाले अर्थात् जिन्हें क्रियमाण कर्मजनित धर्माधर्मरूप अपूर्व की वासना नहीं है, उन मुमुक्षुओं के लिये यह परिसंख्यान कहा जा रहा है। इस प्रकार अधिकारी को बताया गया है। अब परिसंख्यान का प्रयोजन बताते हैं—अविद्याजनित राग-द्वेषादि दोष, वाणी, मन और शरीर की प्रवृत्ति होने में कारण होते हैं। वाणी, मन और शरीर के व्यापार (प्रवृत्ति कर्म) द्विविध होते हैं—एक शास्त्रीय और दूसरा स्वाभाविक। ये ही देव-तिर्यक् मनुष्यत्वप्रापक हुआ करते हैं। इस प्रकार की प्रवृत्ति से इष्ट-अनिष्ट एवं मिश्र फल वाले कर्मों का संचय होता है। उनकी निवृत्ति के लिये अर्थात् अविद्यारागादिनिबन्धन कर्म और उसके फलसम्बन्ध के निवृत्त्यर्थ यह 'परिसंख्यान' कहा जा रहा है ॥ ११२ ॥ तत्र शब्दस्पर्शरूपरसगन्धानां विषयाणां श्रोत्रादिग्राह्यत्वात्, स्वात्मनि परेषु वा विज्ञानाभावः, तेषामेव परिणतानां यथा लोष्टादीनाम् । श्रोत्रादिद्वारैश्च ज्ञायन्ते । येन च ज्ञायन्ते, स विज्ञातृत्वाद- तज्जातीयः । ते हि शब्दादयोऽन्योन्यसंसर्गित्वाज्जन्मवृद्धिपरिणामापक्षयनाशसंयोगावियोगाविर्भावतिरो- भावविकारविकारिक्षेत्रबीजाद्यनेकधर्माणः, सामान्येन च सुखदुःखाद्यनेककर्माणः । तद्विज्ञातृत्वादेव स विज्ञाता सर्वशब्दादिधर्मविलक्षणः ॥११३॥ हृदयस्पर्शिनी तत्रेति—अब उसके उपस्कर के सहित परिसंख्यान प्रकार को बता रहे हैं। प्रथमतः अनात्म वस्तुओं से आत्मा को विविक्त समझकर उसका अनुसन्धान करें, इस प्रकार उपदेश देते हुए उसके विवेक करने का प्रकार बताते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये विषय हैं, क्योंकि श्रोत्रादि इन्द्रियों से ग्राह्य होते हैं। अतः अपने द्वारा अथवा घटादि किसी अन्य पदार्थ के द्वारा उनका ज्ञान होना संभव नहीं है। जिस प्रकार लोष्ट (मिट्टी के ढेले) आदि को कोई ज्ञान नहीं हो पाता, उसी प्रकार शरीरादि रूप में परिणत हुए उन सूक्ष्मभूत रूप-शब्दादि विषयों को भी कोई ज्ञान नहीं होता। अनुमान का आकार इस प्रकार होगा—'विमता देहादयो न चेतनावन्तः विज्ञानकर्मत्वात् लोष्टादिवत्।' इस अनुमान में कोई हेत्वसिद्धि की शंका न कर सके, एतदर्थ उस हेत्वसिद्धि का परिहार करने के लिये कहा कि देहादि आकार में परिणत हुए शब्दादि विषय, श्रोत्रादि इन्द्रियों के द्वारा ही जाने जाते हैं। इस प्रकार देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण, अहंकार पर्यन्त जितना भी साक्ष्य पदार्थ है, वह सब अनात्म पदार्थ है, इसलिये वह हेय (त्याज्य) है, ऐसा उपदेश
- र्थानां, थिनः—पाठौ ।