भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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३२६ उपदेशसाहस्री करने के पश्चात् अब अवशिष्ट जो आत्मतत्त्व है, वही अदेय है, वही सब का साक्षी है। अर्थात् जिसके द्वारा ये विषय जाने जाते हैं, वह ज्ञाता होने के कारण उन विषयों से विजातीय है। अर्थात् भूतसंघात से विलक्षण स्वभाव को बता रहे हैं कि वे शब्दादि परस्पर एक दूसरे से मिल जाने के कारण अर्थात् उनमें अन्योन्यसंसर्गिता होने के कारण जन्म, वृद्धि, विपरिणाम, क्षय, नाश, संयोग, वियोग, आविर्भाव, तिरोभाव, विकार, विकारी, क्षेत्र और बीज आदि अनल्प (अनेक) धर्मोंवाले तथा सामान्यरूप से सुख-दुःखादि अनेक कर्मोंवाले हैं। अभिप्राय यह है कि किसी जड़ वस्तु की उत्पत्ति (जन्म) होनेपर ही उसका 'अस्तित्व' गृहीत होता है। सभी जड़ पदार्थों के जन्मादि छह विकार होते हैं, जो स्वरूपनिबन्धन हैं, जैसे संयोग-वियोग पुत्राद्यनुबन्ध निबन्धन हैं। आविर्भाव-तिरोभाव शब्द आगन्तुक प्रकाश के विषय होने से जड़ता के द्योतक हैं। विकार-विकारी शब्द व्रण-गण्ड-विस्फोटकादि अवस्थाओं को बताते हैं। क्षेत्र-बीज शब्द से स्त्री-पुं-प्रकृत्यात्मक परिणामभेद को बताया गया है। 'आदि' पद से अनुक्त अवान्तर भेदों को समझना चाहिये। शब्दादि विषयों का अनुभव होनेपर सुख-दुःख-मोह-रोगादि की उत्पत्ति तो प्रसिद्ध ही है। इन विषयों के विज्ञातृत्व के कारण ही उनका ज्ञाता (आत्मा) शब्दादि सभी विषयों के धर्मों से विलक्षण है॥ ११३॥ तत्र शब्दादिभिरुपलभ्यमानैः पीड्यमानो विद्वानेवं परिसंचक्षीत ॥११४॥ हृदयस्पर्शनी तत्रशब्दादिभिरिति—इस रीति से साक्षी और साक्ष्य इनके अन्वय-व्यतिरेक से आत्मा-अनात्मा का विवेक कर 'अहं ब्रह्मास्मि' ऐसा शुद्ध आत्मा का ही अनवरत अनुसन्धान करे, जब अन्यप्रयुक्त शब्दाद्युपलम्भ से विक्षेप उपस्थित हो जाय, तब अवकृपा, नैष्ठुर्यादि विकारों की उत्पत्ति के भय का परिहार करने के लिये अपने को उपलब्ध होनेवाले शब्दादि विषयों से पीडित होता हुआ विद्वान् इस प्रकार ज्ञानाभ्यास करे ॥ ११४॥ शब्दस्तु ध्वनिसामान्यमात्रेण, विशेषधर्मर्वा षड्जादिभिः, प्रियैः स्तुत्यादिभिरिष्टैरनिष्टैश्चासत्य- बीभत्सपरिभवाक्रोशादिभिर्वचनैर्वा मां दृक्स्वभावमसंसर्गिणमविक्रियमचलमनिधनमभयमत्यन्तसूक्ष्ममविषयं गोचरीकृत्य, स्प्रष्टुं नैवार्हति, असंसर्गित्वादेव मम* । †अत एव न शब्दनिमित्ता हानिवृद्धिर्वा । अतो मां किं करिष्यति स्तुतिनिन्दादिप्रियाप्रियत्वादिलक्षणः शब्दः ? अविवेकिनं हि शब्दमात्मत्वेन गतं प्रियः शब्दो वर्धयेत्, अप्रियश्च क्षपयेत्, अविवेकिस्वात् । नतु मम विवेकिनो बालाग्रमात्रमपि कर्तुमुत्सहते इति । एवमेव स्पर्शसामान्येन तद्विशेषैश्च शीतोष्णमृदुकर्कशादिज्वरोदरशूलादिलक्षणैश्चाप्रियैः प्रियैश्च कैश्चिच्छ- रीरसमवायिभिर्बाह्यागन्तुकनिमित्तैश्च न मम काचिद्विक्रिया वृद्धिहानिलक्षणा अस्पर्शतवात्क्रियते, व्योम्न इव मुष्टिघातादिभिः । तथा रूपसामान्येन तद्विशेषैश्च प्रियाप्रियैः स्त्रीव्यञ्जनादिलक्षणैररूपत्वान्न मम काचिद्धानिर्वृद्धिर्वा क्रियते । तथा रससामान्येन तद्विशेषैश्च प्रियाप्रियैः मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायैमूढ- बुद्धिभिः परिगृहीतैः अरसात्मकस्य मम न काचिद्धानिर्वृद्धिर्वा क्रियते । तथा गन्धसामान्येन तद्विशेषैश्च प्रियाप्रियैः पुष्पाद्यनुलेपनादिलक्षणैरगन्धात्मकस्य न मम काचिद्धानिर्वृद्धिर्वा क्रियते, "अशब्दमस्पर्शस- रूपमव्ययं तथारसन्नित्यमगन्धवच्च यत्" इति श्रुतेः ॥११५॥ हृदयस्पर्शनी शब्द इति—ध्वनिरूप (अव्यक्त वर्णविशेष, नाद मात्र) सामान्य धर्म के द्वारा षड्जादि, प्रियस्तुति आदि और इष्ट, अनिष्ट तथा असत्य, बीभत्स, अपमानसूचक और निन्दात्मक वचनरूप विशेष धर्मों के द्वारा मुझ दृक्- स्वरूप, संसर्गशून्य, अविकारी, अविचल, अविनाशी, अभय, अत्यन्त सूक्ष्म और अविषय को अपना विषय बनाकर

  • मां—पाठभेदः । † यत—पाठभेदः ।