भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 364 में से

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पृष्ठ 80

५४ उपदेशसाहस्री महाराजादयो लोका मयि यद्वत्प्रकल्पिताः । स्वप्ने, तद्वद्द्वयं विद्याद्रूपं वासनया सह ॥१३॥ महाराजेति—जिस प्रकार स्वप्नकाल में राजा-महाराजा आदि लोक मुझमें ही कल्पित होते हैं अर्थात् मैं राजा हूँ, महाराजा हूँ ऐसी कल्पना निद्रादोष के कारण मेरे ही चित्त में होती है, उसी प्रकार वासनाओं के सहित इस द्वैत दृश्य को भी मुझमें ही कल्पित जानो ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी हाथ से दबाने पर१ प्रतिबुद्ध हुआ 'ज्ञ' आत्मा, प्राण आदि से विलक्षण है। इस प्रकार कल्पित संसार के निषेधक वचन से कल्पित संसार, 'आत्मा' पर आरोपित है, यह बताया गया है। अर्थात् 'नेति नेति' इत्यादि शास्त्रवचन से निषिध्यमान संसार कल्पित है, यह श्रुति ने ही बता दिया है। स्वप्नावस्था में महाराजा आदि लोगों की कल्पना मुझ दृगात्मा में जैसे की जाती है, उसी तरह लिङ्ग शरीर के आश्रय से रहनेवाली वासना के साथ मूर्त और अमूर्त दो रूपों की मुझमें कल्पना की गई है२। श्रुति ने भी स्वप्नदृश्य (महाराजत्वादि की आभासता) का निर्देश कर उपसंहार में शरीर के भीतर ही महाराजा आदि के रूप में प्राणशब्दवाच्य लिङ्गरूप उपाधिका ग्रहण कर यह स्वप्नद्रष्टा, व्यवहार करता है—यह प्रदर्शित किया है। अर्थात् स्वप्न में महाराजा आदि निर्दिष्ट लोग भोग्यविशेष होते हुए भी स्वप्नद्रष्टा में कल्पित हैं। अतः स्वप्न में उपलब्ध हुई कोई भी वस्तु वास्तविक नहीं है। एवञ्च वासना के आश्रयभूत लिङ्ग- शरीर के सहित मूर्तामूर्तरूप स्थूल पदार्थ भी दृगात्मा में कल्पित ही हैं, क्योंकि दृगात्मा के द्वारा वह दृश्य हैं ॥ १३ ॥ देहलिङ्गात्मना कार्या वासनारूपिणा क्रियाः । नेति नेत्यात्मरूपत्वान्न मे कार्या क्रिया क्वचित् ॥१४॥ देहेति—वासनाओं [ संस्कारों ] का संचय करनेवाले तथा स्थूल-सूक्ष्म शरीर का अभिमान रखनेवाले आत्मा को ही कर्मानुष्ठान कर्तव्य रहता है। यह स्थूल देह आत्मा नहीं है, यह सूक्ष्म देह आत्मा नहीं है इत्यादि वाक्यों द्वारा लक्षित 'मैं' तो आत्मस्वरूप हूँ। अतः मेरे लिये कभी कोई कर्म कर्तव्य नहीं है ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी स्वप्नप्रपञ्च के समान जाग्रत्प्रपञ्च भी प्रत्यगात्मा में कल्पित है यह सिद्ध ( ज्ञात ) हो जानेपर प्रत्यक्तत्त्व को जाननेवाले ( आत्मज्ञानसम्पन्न ) के लिये कर्म करने की संभावना ही नहीं रहती, क्योंकि कर्म ( क्रिया ) तो उसे करने होते हैं, जो स्थूल-सूक्ष्म देह का अभिमान करता हो, किन्तु जिसे अपने स्थूल-सूक्ष्म शरीर का कोई अभिमान न हो, उसके लिये कर्मानुष्ठान कैसे संभव हो सकता है ? यह स्थूल-सूक्ष्मदेहाभिमानी आत्मा वासनारूपी है अर्थात् संस्कारों ( वासनाओं ) का संचय करते रहने का इसका स्वभाव है। ये संस्कार कर्मप्रवृत्ति कराने में निमित्त ( कारण-हेतु ) होते हैं। अर्थात् कर्म से संस्कार, और संस्कार से पुनः कर्म, पुनः उससे संस्कार, पुनः उससे कर्म इस प्रकार अविच्छिन्न परम्परा चलती रहती है। किन्तु जब 'नेति नेति' श्रुति के द्वारा अपने स्वरूप ( आत्मस्वरूप ) का साक्षात्कार ( ज्ञान ) हो जाता है, तब दोनों देहों का अभिमान न रहने से स्वप्न में या जाग्रत् अवस्था में स्वाभाविक रूप से और विधि के बलपर ही कोई कर्म ( क्रिया ) उसके लिये कर्तव्य नहीं रह जाती है ॥ १४ ॥ न ततोऽमृतताऽऽशास्ति कर्मणोऽज्ञानहेतुतः । मोक्षस्य ज्ञानहेतुत्वान्न तदन्यदपेक्षते ॥१५॥ नेति—कर्म की उत्पत्ति अज्ञान से है, इस कारण उससे अमृतत्व की आशा नहीं की जा सकती। मोक्ष का कारण तो एकमात्र ज्ञान ही है, इसलिये वह किसी अन्य कर्म आदि की अपेक्षा नहीं रखता ॥ १५ ॥ १. “तं पाणिनाऽऽपेषं बोधयाञ्चकार” इत्यारभ्य “स होत्तस्थौ” –( बृ. उ. २।१ ) २. “यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः” इत्युपक्रम्य “स यत्रैतत्स्वप्नया चरति ते हास्य लोकास्तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण उतेवोच्चावचं निगच्छति” इति इवशब्देन स्वप्नदृश्यस्य आभासतां मध्ये निर्दिश्य “एवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते” इत्युपसंहारः । ( बृ. उ. २।१।१८ )