उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंईक्षितृत्वप्रकरणम् ५५ हृदयस्पर्शिनी अज्ञानविलसित देहाभिमान से ही कर्म होता है, अतः कर्म अज्ञानमूलक है, इस कारण उससे (कर्म से) मोक्ष की आशा रखना व्यर्थ है। ज्ञान और अज्ञान का विवेक न होनेपर ही कर्म करने की ओर प्रवृत्ति होती है। अज्ञान और कर्म दोनों जड़ पदार्थ हैं, अतः उनमें परस्पर कोई विरोध नहीं है। एवं च 'अज्ञाननिवृत्तिरूप मोक्ष' की निष्पत्ति में कर्म की सहायता की आशा करना व्यर्थ है। यदि मोक्ष को 'ब्रह्मात्मना अवस्थान' (ब्रह्मरूप होकर रहना) अर्थात् परमानन्दाविर्भाव रूप मानें तब भी उत्पाद्य, आप्य, विकार्य, संस्कार्य इन चतुर्विध क्रियाफलों से उक्त मोक्ष, विलक्षण होनेसे उसमें भी कर्म की कोई अपेक्षा नहीं है। शंका--कर्म, स्वयं मोक्ष में कारण (हेतु) न होनेपर भी मोक्ष में हेतुभूत जो ज्ञान, उसके सहायक के रूप में कर्म को भी कारण क्यों न माना जाय ? समा०--अज्ञान की निवृत्ति में ज्ञान ही एकमात्र पर्याप्त है, उसे कर्म आदि अन्य किसी की सहायता की अपेक्षा नहीं होती। अन्यत्र भी नहीं, क्योंकि अज्ञान के निवृत्त होनेपर ब्रह्मात्मना अवस्थान अर्थात् परमानन्दाविर्भाव का होना तो स्वयं (स्वतः) सिद्ध है ॥ १५ ॥ अमृतं चाभयं नातं नेतीत्यात्मा प्रियो मम । विपरीतमतोऽन्यद्यत् त्यजेत्तत्सक्रियं ततः ॥१६॥ अमृतमिति- 'नेति नेति' इत्यादि वाक्य से निषेधमुखेन प्रतिपादित आत्मा, अमृत और अभयरूप है। वह नाशवान् नहीं है तथा मेरा प्रिय है। उससे भिन्न जो अनात्मा है, वह इससे विपरीत स्वभाववाला है। अतः उस सक्रिय अनात्मा का त्याग ही करना चाहिये ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शिनी शंका-यदि अमृतत्व (मोक्ष) को कर्मसाध्य माना जाय तो स्वर्गादि फल की तरह तथा कृषि आदि के फल की तरह वह अनित्य और सभय कहलायेगा। समा०-किन्तु अभयरूपत्व श्रुति१ के साथ तथा मोक्ष से भिन्न यच्चयावत् पदार्थों में आर्तत्व कहकर मोक्ष में अनार्तत्व२ बतानेवाली श्रुति के साथ विरोध उपस्थित होने के भय से वैसा नहीं मान सकते। शंका-ब्रह्म यद्यपि अभय, अनार्त है, और कर्मसाध्य नहीं है तथापि भोक्ता जीवके के लिये अमृतत्व तो कर्म से ही साध्य होगा। समा०-जो मेरा प्रिय है, जिसे हम भोक्ता समझ रहे हैं, अर्थात् जाया आदि जो प्रिय (प्रीत्यास्पद) ज्ञात हो रहे हैं, वह सब मेरा ही स्वरूप है३। उसे 'नेति' श्रुति ने अशेष-विशेषरहित बताया है। इसलिये वह सब मद्रूप ही है अर्थात् निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप ही है, उससे भिन्न (अतिरिक्त) नहीं है। अतः उसे भी अमृतत्व, कर्म से प्राप्य नहीं है। अतः उक्त आत्मस्वरूप से भिन्न, जिसे हम भेदबुद्धि से ग्रहण करते हैं (अपने से भिन्न समझते हैं), उस अनात्मभूत (विपरीत) दृश्य का क्रिया सहित त्याग करे अर्थात् उसका अभिमान न करे। क्योंकि हमने अज्ञानवशात् आत्मापर संसार को अध्यस्त कर लिया है। अतः ब्रह्मात्मा से भिन्न जो भी विरुद्धस्वरूप हो, और जो क्रियासहित हो, उस सब का अभिमान छोड़ दे, क्योंकि ब्रह्मात्मज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति हो जाती है। 'क्रियासहित उस अनात्मभूत दृश्य का त्याग करे'-यह आत्मज्ञ के लिये विधान (विधि) नहीं किया गया है, क्योंकि वह आत्मज्ञ तो अविनियोज्य है, किन्तु उसके प्रति यह केवल अनुवादमात्र है। तथापि साधक के लिये विधि का उपयोग हो सकता है, अतः 'त्यजेत्' यह विधिप्रत्यय (नियोग) निर्देश, साधक को दृष्टि में रखकर किया गया है। तस्मात् ब्रह्मात्मा के अज्ञान के कारण होने- वाला यह संसार, केवल ब्रह्मात्मज्ञान से ही निवृत्त हो जाता है, यह ठीक ही कहा गया है ॥ १६ ॥ ॥ इति एकादशमीक्षितृत्वप्रकरणं समाप्तम् ॥ १. (तै. उ. २।७) २. (बृ. उ. ३।४।२) ३. 'अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य'-(छां. उ. ६।३।२)