भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ९३ नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।' इति। श्रीमद्भगवद्गीता का भी यही अभिप्राय है— “नाम, रूप, जाति आदि भेदों से परस्पर विभक्त भूतों में एक रूप से विद्यमान तथा भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट न होने वाले परमेश्वर को जो साक्षात् देखता है, वह ब्रह्मविद् यति ही अपने को विमुक्त देखता है²।” कठोपनिषद् ने भी इसी का समर्थन किया है—“सम्पूर्ण भूतों का एक ही आत्मा संसार के दुःख से लिप्त नहीं होता, बल्कि उनसे बाहर रहता है³ ॥ ४७ ॥ अमूर्तंमूर्तानि च कर्मवासना दृशित्वरूपस्य बहिः प्रकल्पिता । अविद्यया ह्यात्मनि मूढदृष्टिभिरपोह्य नेतीत्यवशेषितो दृशिः ॥४८॥ अमूर्तंमूर्तानीति—मूढदृष्टि प्राकृत मनुष्य के द्वारा अविद्यावश आत्मा में वायु और आकाश जैसे अमूर्त एवं अग्नि, जल और पृथिवी जैसे मूर्त भूतों तथा कर्मवासनाओं का आरोप कर लिया जाता है। किन्तु चैतन्यस्वरूप आत्मा से भिन्न बाह्य वस्तुओं का 'नेति-नेति' इत्यादि वाक्य से निषेध (निराकरण) कर देने पर 'साक्षी' ही शेष रह जाता है। अतः उसमें किसी भी प्रकार के दोष का स्पर्श तक नहीं है ॥ ४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी किंच दृश्य के बाधित होने पर भी तत्कृत दोषसम्बन्ध का होना आत्मा में संभव नहीं। क्योंकि मिथ्या पदार्थ (वस्तु) के साथ सत्य वस्तु का सम्बन्ध नहीं हुआ करता। तब दृश्य को बाधित कैसे समझा जाय ? रज्जु-सर्प की तरह प्रतिपन्न उपाधि में निषेध किये जाने के कारण दृश्य को बाधित समझना चाहिये। (उप समीपवर्तिनि स्वधर्मम् आदधाति संक्रामयति इति उपाधिः।) मूढ़ दृष्टिवाले पुरुषों द्वारा मोहरूप अविद्या के कारण दृशित्वरूप प्रत्यगात्मब्रह्मरूप आत्मा में वायु और आकाश रूप अमूर्त, तथा अग्नि, जल और पृथिवीरूप मूर्त भूतों तथा कर्म- वासनाओं का आरोप कर लिया गया है। चैतन्यस्वरूप आत्मा में उन बाह्य वस्तुओं का 'नेति नेति' इत्यादि वाक्य से निराकरण (निषेध) किये जाने पर निषेध का परमावधिरूप साक्षी ही अवशिष्ट रह जाता है⁴। अतः उस आत्मा में किसी प्रकार का दोषसंसर्ग नहीं है। 'अमूर्तंमूर्तानि' यहाँपर 'अमूर्ते च मूर्तानि च अमूर्तंमूर्तानि' अर्थात् पञ्चमहा- भूतात्मक स्थूल पदार्थ⁵ और कर्मवासना का आश्रयभूत लिङ्ग पदार्थ⁶ इस प्रकार अमूर्तादि पदार्थों का निराकरण करते हुए श्रुति ने आत्मस्वरूप का प्रतिपादन किया है। अतः आत्मा की विशुद्धता में कोई सन्देह नहीं है ॥ ४८ ॥ प्रबोधरूपं मनसोऽर्थयोगजं स्मृतौ च सुप्तस्य च *दृश्यतेऽर्थवत् । तथैव देहप्रतिमानतः पृथग् दृशेः शरीरं च मनश्च दृश्यतः ॥४९॥ प्रबोधरूपमिति—जैसे जाग्रत् अवस्था, 'मन' कि विषयाकार वृत्तिस्वरूप है, क्योंकि वह विषयाकार मनो- वृत्ति, विषय के संसर्ग से उत्पन्न हुई है। तथा स्वप्न और स्मृति के समय भी मन की वृत्ति विषयाकार प्रतीत होती है, यद्यपि उस समय विषय का अभाव रहता है। उसी प्रकार दृश्य होने के कारण, 'शरीर, मन और दोनों शरीरों' का जो १. “यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।”—(बृ. उ. ३।७।१५) २. “समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ।”—(भ. गी. १३।२७) ३. “न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः”—(कठ. उ. २।२।११) ४. “सत्यस्य सत्यम्”—(बृ. उ. २।३।६), “अधिष्ठानावशेषो हि नाशः कल्पितवस्तुनः”—(सूत सं. ४।२।८) ‘यथा शुक्तौ आरोपितस्य रजतस्य अधिष्ठानशुक्तियाथात्म्यज्ञानेन निवृत्तौ सत्याम् अधिष्ठानभूता शुक्तिरेव केवलमवशिष्यते, नतु अन्य- द्रजतं तदभावलक्षणं किमपि। तद्वदेव सकलजगदधिष्ठानब्रह्मस्वरूपयाथात्म्यज्ञानेन समारोपितजगन्निवृत्तौ अधिष्ठानमात्रा- वशेषोऽवतिष्ठते।' ५. “द्वे वा व ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च”—(बृ. उ. २।३।१) ६. “तस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपं यथा महारजनं वासः”—(बृ. उ. २।३।६)

  • दृश्यतोऽर्थ०—पाठान्तरम् ।