भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

९२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी पूर्वोक्त श्लोकों से आत्मा का द्रष्टृत्व सिद्ध किये जाने पर भी शंकाकुल मन में पुनरपि शंका हो रही है कि आत्मा के द्वारा शरीर और बुद्धि यदि दृश्य हों तो पूर्वोक्त कथन सुसंगत हो सकेगा, किन्तु उनकी (शरीर और बुद्धि की) आत्मदृश्यता ही सिद्ध नहीं है। तब उसे (आत्मा को) द्रष्टा कैसे समझा जाय ? अभिप्राय यह है कि यद्यपि द्विविध शरीर का ग्राहक होने से उन दोनों शरीरों से भिन्न, नित्य सद्रूप आत्मा है, तथापि दृश्य के संसर्ग से उत्पन्न होनेवाले दोषों का परिहार कैसे किया जा सकता है ? अपने स्वरूपभूत चैतन्य से दृश्यावच्छिन्न चैतन्य का भेद न होने से वह दृश्य को अवभासित करता है, उसी कारण वह द्रष्टा कहलाता है। यदि इस तरह अवभासित न करे (द्रष्टा न हो) तो दृश्य वस्तु का प्रत्यक्ष ही नहीं हो पायेगा। दृश्य वस्तु को प्रकाशित करने पर ही किसी को द्रष्टा कहा जाता है। यदि मन और उसकी वृत्तियाँ आत्मा के द्वारा प्रकाशित न हों तो आत्मा को द्रष्टा नहीं कहा जा सकेगा । एवंच उनका प्रकाशक होने से उसमें (आत्मा में) उनके संसर्ग से होनेवाले दोषों की संभावना है, इस कारण उसे शुद्ध नहीं कह सकते। पद्य का शब्दार्थ इस प्रकार होगा—यदि अपनी वृत्तियों से घटा-पटादि अनेक आकारों में परिणत होनेवाला मन, उससे (आत्मा से) ग्रहण किया जाता है, तो दृश्य के साथ सम्बन्ध होने से उस (मन) के तुल्य उस आत्मा की भी (विषय-सम्पर्कजनित) अशुद्धि, जड़रूपता (अचिद्रूपता) एवं विकारिता आदि दोषता (दोषों) का निवारण नहीं किया जा सकता। जैसे चैतन्य के संसर्ग से बुद्धि की चिच्छायता (चिच्छायापत्ति) का निवारण नहीं किया जा सकता। इस व्याख्या में 'तेन' यह तृतीयान्त पद रहेगा। अथवा दूसरी व्याख्या—शरीर और बुद्धि को आत्मदृश्य न मानने में बाधा है। अतः दोनों में आत्म- दृश्यता माननी ही होगी। यदि तुम्हारे मत में अपनी वृत्तियों के कारण अनेक प्रकार से प्रवृत्त होकर घट-पटादि विषयाकार बने हुए मन को उससे अतिरिक्त ज्ञात होनेवाले आत्मा के द्वारा गृहीत (प्रकाशित) नहीं किया जाता, तब आत्मा को मन से भिन्न नहीं कहा जा सकेगा। तब उसमें भी मन के समान ही अशुद्धि, अचिद्रूप विकार-दोष मानने होंगे, जिनका निवारण करना शक्य नहीं होगा, और उसे साक्षी मानने पर मन-बुद्धि से पृथक् रहने के कारण मन-बुद्धि के दोषों का उसमें आना संभव ही नहीं है। किन्तु उसे साक्षी न मानने पर बुद्धिगत दोषों का उसमें आना अनिवार्य है, तब उसका कभी मोक्ष ही नहीं हो सकेगा। इस व्याख्या में 'ते' और 'न' पृथक् पद होंगे ॥ ४६ ॥ यथा विशुद्धं गगनं निरन्तरं न सज्जते नापि च लिप्यते तथा । समस्तभूतेषु सदैव तेष्वयं समः सदात्मा ह्यजरोऽमरोऽभयः ॥४७॥ यथेति—जिस प्रकार विशुद्ध और अपरिच्छिन्न आकाश किसी के साथ संलग्न या लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार समस्त भूतों में सर्वदा समान भाव से स्थित रहने वाला यह आत्मा जरा, मरण और भय से रहित रहता है ॥४७॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में मन-बुद्धि के दोष तब आ सकते हैं, यदि वह बुद्धि (मति) के समान सावयव, परिच्छिन्न, परिणामी हो, किन्तु आत्मा का स्वरूप तो ऐसा नहीं है, अतः आत्मा में अशुद्धि आदि दोषों के होने की शंका करने का अवसर ही नहीं है। इसी बात को दृष्टान्त के द्वारा बताते हुए उत्तर दे रहे हैं—जिस प्रकार परिणामरूप विकारात्मक मल से रहित (शुद्ध), और अपरिच्छिन्न (निरन्तर) अतएव निरवयव आकाश, काष्ठ से जतु की तरह किसी के साथ संलग्न अथवा भल्लातक (बिब्वा, भिलावा) रस से वस्त्र के समान लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा भी विशुद्ध, निरन्तर, निरवयव है, यह शास्त्र से सुनिश्चित हो चुका है, अतः वह भी बुद्धि आदिकों में संलग्न नहीं होता अर्थात् उसके दोष से लिप्त नहीं होता। क्योंकि अपने-अपने अभिमानी देवताओं के सहित विद्यमान समस्त भूतों में वह सर्वदा समान भाव से स्थित रहता है, अतः वह अजर, अमर, अभय है। अर्थात् जरा, मरण और भय से रहित है, यानी नित्य शुद्ध है। तथाच श्रुति ने भी यही बताया है—'जो समस्त भूतों में स्थित रहने वाला समस्त भूतों के भीतर है, जिसे समस्त भूत नहीं जानते, समस्त भूत जिसके शरीर हैं, और जो भीतर रहकर समस्त भूतों का