भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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स्वप्नस्मृतिनप्रकरणम् ८५ हृदयस्पर्शिनी 'निर्ममं निरहंकारं यः पश्यति स पश्यति' इस पूर्व श्लोक के द्वारा जो कहा गया है, उसी को स्पष्ट करते हुए आत्मज्ञ का लक्षण बता रहे हैं। अर्थात् 'ब्रह्मात्मज्ञ' कब होता है ? जिस समय शास्त्र और आचार्य से अनुगृहीत मनुष्य की दृष्टि में 'अहम्' इस प्रकार की आत्मबुद्धि और 'मम' इस प्रकार की आत्मीय विषयबुद्धि निष्प्रयोजन (व्यर्थ) हो जाय, अर्थात् आदमी तत्प्रयुक्त व्यवहार से रहित हो जाय, तब उसे आत्मवित् समझना चाहिए अर्थात् देह और तदनुबन्ध में व्यवहारकाल में भी पूर्वावस्था की तरह वस्तुत्वोल्लेख से रहित होने के कारण वह आत्ममात्रदर्शी अर्थात् पूर्णतया आत्मवित् हो जाता है ॥ २९ ॥ बुद्ध्यादौ सत्युपाधौ च तथाऽसत्यविशेषता । यस्य चेदात्मनो ज्ञाता तस्य कार्यं कथं भवेत् ॥३०॥ बुद्ध्यादाविति—जाग्रत् और स्वप्नावस्था में बुद्धि आदि उपाधियों के विद्यमान रहते हुए तथा सुषुप्ति अवस्था में उन उपाधियों के विद्यमान न रहने पर भी जिस पुरुष को आत्मा के एकत्व (एकरूपता) का बोध हो गया हो, उस पुरुष के लिये किसी प्रकार का भी कोई कर्तव्य कार्य कैसे शेष रह सकता है ? ॥ ३० ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मबुद्धि और आत्मीयबुद्धि दोनों की प्रवर्तकत्व शक्ति जब समाप्त हो जाती है, तब वेदान्तवाक्य से यथोक्त विद्या का उदय उस पुरुष में होता है। उस समय वह कृतकृत्य हो जाता है, तब उसमें कार्यशेषता का होना संभव नहीं, अतः पूर्वकथित अकार्यशेषता ही उसमें रहती है। जाग्रत् और स्वप्नावस्था में बुद्धि आदि उपाधियों के रहने पर तथा सुषुप्ति अवस्था में उन उपाधियों के न रहने पर जिस पुरुष को आत्मा की अविशेषता (एकरूपता) का ज्ञान हो जाता है, उस पुरुष के लिए कोई कर्तव्य कैसे रह सकता है ? अर्थात् उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता । यद्यपि आत्मा की एकरूपता (अविशेषता) में कोई सन्देह नहीं है, तथापि पद्य में 'चेत्' इस सन्देहवाचक शब्द को 'वेदाच्चेत्प्रमाणम्' की तरह समझना चाहिए ॥ ३० ॥ प्रसन्ने विमले व्योम्नि प्रज्ञानैकरसेऽद्वये । उत्पन्नात्मधियो ब्रूत किमन्यत्कार्यमिष्यते ॥३१॥ प्रसन्न इति—स्वाभाविक तथा आगन्तुक दोषों से शून्य (रहित) आकाशस्वरूप, विज्ञानैकरस, अद्वितीय परब्रह्म में जिसे आत्मबुद्धि उत्पन्न हो गई है, उस पुरुष के लिये आत्मस्वरूप-ज्ञान के अतिरिक्त तुम ही बताओ कि अन्य कर्तव्य क्या हो सकता है ? ॥ ३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मवित् के लिये कोई भी कार्य, कर्तव्यरूप में शेष नहीं है। क्योंकि आगन्तुक तथा स्वाभाविक दोषों से रहित, आकाश की तरह निरवयव, विज्ञानैकरस, अद्वितीय अर्थात् कार्य-कारणविभागशून्य परब्रह्म में 'अहमस्मि' इस प्रकार जिसे आत्मबुद्धि उत्पन्न हो गई है, उस पुरुष के लिये, बताओ, कोई अन्य कर्तव्य कैसे रह सकता है ? अर्थात् आत्मस्वरूपज्ञान के अतिरिक्त कोई भी कार्य उसके लिये नहीं है ॥ ३१ ॥ आत्मानं सर्वभूतस्थममित्रं चात्मनोऽपि यः । पश्यन्निच्छत्यसौ नूनं शीतीकर्तुं विभावसुम् ॥३२॥ आत्मानमिति—जो मनुष्य, समस्त प्राणियों (प्राणिमात्र) में आत्मा को देखता है, अर्थात् अनुभव करता है, उसी प्रकार किसी को वह अपना शत्रु भी समझता है, तो उसकी वह समझ अग्नि को शीतल करने के समान ही है। अर्थात् जैसे अग्नि का शीतल होना असंभव है, उसी प्रकार आत्मज्ञानी की दृष्टि में अपना कोई शत्रु दिखाई देना भी सर्वथा असंभव है ॥ ३२ ॥ १. ( उ. शा. १४।२२ )

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