भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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८४ उपदेशसाहस्री परलोकभयं यस्य नास्ति मृत्युभयं तथा। तस्यात्मज्ञस्य शोच्याः स्युः सब्रह्मेन्द्रा अपीश्वराः ॥२७॥ परलोकेति—जिस आत्मज्ञानी मनुष्य को परलोक का भय नहीं है और न मृत्यु का ही भय है, उस आत्म- ज्ञानी की दृष्टि में तो ब्रह्मा और इन्द्रादि देवता तथा लोकपाल-गण भी शोचनीय ही हैं ॥ २७ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा को अहंकारादि से भिन्न (समस्त प्रमाताओं का साक्षिभूत) बताकर उसकी ब्रह्मरूपता को सिद्ध करने से क्या लाभ है ? इस आशंका का समाधान करने के लिये 'योऽन्यथाज्ञः स आत्मवित्' १ श्लोक में उक्त 'आत्मवित्' को स्पष्ट किया है—जिसे परलोक का भय नहीं है और न मृत्यु का ही भय है। श्रुति कह रही है—'किमहं साधु नाकरवम्', 'किमहं पापमकरवम्'२—क्या मैंने अच्छा काम नहीं किया ? तथा क्या मैंने पाप किया ?—इस प्रकार परलोकनिमित्त भय नहीं है। श्रुति कहती है—'नैनं कृताऽकृते तपतः' ३। उसी प्रकार जिसे मृत्युभय (मरणभय) नहीं है, श्रुति कहती है— 'न जीवो म्रियते'४। आत्मा से अतिरिक्त दूसरा उसकी दृष्टि में कोई है ही नहीं। यदि दूसरा कोई हो तो उससे भय हो। श्रुति कहती है—'द्वितीयाद्वै भयं भवति'५। उस आत्मवित् की दृष्टि में तो ब्रह्मा एवं इन्द्रादि और ज्ञान-ऐश्वर्यसम्पन्न ईश्वर (लोकपालादि) भी शोचनीय हैं। आत्मवित् सोचता है कि ये सब ऐश्वर्य में आसक्त हैं, अतः निरन्तर व्यग्र रहते हैं। ये बेचारे कैसे स्वस्थ हो पायेंगे ? तस्मात् जो पुरुष परलोक और मरण के कारण होनेवाली व्यग्रता के हेतुभूत अहंकारादि से शून्य हो, वही ब्रह्मनिष्ठ आत्मवित् है। इससे जो विपरीत हो, वह आत्मवित् नहीं है ॥ २७ ॥ ईश्वरत्वेन किं तस्य ब्रह्मेन्द्रत्वेन वा पुनः । तृष्णा चेत्सर्वतश्छिन्ना सर्वदैन्योद्भवाऽशुभा ॥२८॥ ईश्वरत्वेनेति—सभी प्रकार की दीनता को उत्पन्न करनेवाली अशुभ तृष्णा का यदि क्षय हो गया है तो उस मुमुक्षु पुरुष को ईश्वरत्व या ब्रह्मत्व की प्राप्ति से क्या प्रयोजन है ? अर्थात् वह निःस्पृह रहता है ॥ २८ ॥ हृदयस्पर्शिनी ब्रह्मभाव, इन्द्रभाव, ईश्वरभाव की इच्छा सभी लोग किया करते हैं, तब वे ब्रह्मेन्द्रादि शोचनीय कैसे कहलायेंगे ? इसका समाधान यह है कि ब्रह्मात्मैक्यज्ञान होने पर कुछ भी प्रार्थनीय नहीं रहता। सब प्रकार की दीनता उत्पन्न करनेवाली पापवृत्ति की द्वार होने से अशुभरूपिणी तृष्णा का सर्वथा समूल क्षय हो जाने के कारण उस आत्मवित् पुरुष को ब्रह्मत्व, इन्द्रत्व, ईश्वरत्व से क्या प्रयोजन है ? श्रुति कहती है— 'यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते'६ ॥ ॥ २८ ॥ अहमित्यात्मधीर्या च ममेत्यात्मीयधीरपि । अर्थशून्ये यदा यस्य स आत्मज्ञो भवेत्तदा ॥२९॥ अहमिति—जिस समय मनुष्य 'अहम्' इस आत्म बुद्धि को तथा 'मम' इस आत्मीय बुद्धि को व्यर्थ ( निष्प्रयो- जन ) समझने लगे, तभी उसे 'आत्मज्ञ' समझना चाहिये ॥ २९ ॥ १. ( उ० सा० १४।२४ ) २. ( तै. उ. २।९ ) ३. ( बृ. उ. ४।४।२२ ) ४. ( छां. उ. ६।११।६ ) ५. ( बृ. उ. १।४।२ ) ६. ( बृ. उ. ४।४।७ )