भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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आशीर्वचन

भारतीय धर्मगगन के सर्वोज्ज्वल ग्रह कृष्ण, बुद्ध व शङ्कर हैं, इस बात को सारा संसार स्वीकारता है। वर्तमान हिन्दू धर्म के संस्थापक होने के नाते हिन्दू धर्म के तो शङ्कर ही सर्वस्व हैं ❀। गत बारह सौ वर्षों में उनके द्वारा प्रदत्त संकेतों को ही विस्तृत कर अनेक सम्प्रदाय निर्मित हुए हैं। उनके भाष्यग्रन्थ जटिल व दार्शनिक युक्तियों से भरपूर होने से सामान्य व्यक्ति न केवल उन्हें पढ़ने पर घबड़ा उठता है वरन् उनके भावों को समझना भी उसके लिये असम्भव हो उठता है। कई बार तो पूर्वपक्ष की युक्तियों से प्रभावित हो उसे ही ठीक मान बैठता है। आचार्य शङ्कर की शैली है कि विरोधी की बातों को विस्तार से रख कर उनकी आधारशिला को अपनी एक या दो युक्तियों से ऐसा ध्वस्त कर देना कि उसकी सारी अट्टालिका भूमिगत हो जावे। अतः उन्होंने अनुग्रह करके मध्यमाधिकारियों के लिये ऐसे प्रकरण-ग्रन्थों की रचना की, जिनमें इतना काठिन्य न हो एवं सिद्धान्त-पक्ष को पूर्ण रूप से उपस्थित कर दिया जाय। जो पूर्व में ही भिन्न दर्शनों से प्रभावित न हुआ हो उसकी ज्ञाननिष्ठार्थ इतना ही पर्याप्त है। ऐसे ग्रन्थों में कई तो इतने छोटे हैं कि बिना टीका के उनका अर्थ ही तिरोहित रहता है। इसके दो उदाहरण श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र व दशश्लोकी हैं। सुरेश्वराचार्य के वार्तिक के बिना प्रथम एवं मधुसूदन व ब्रह्मानन्द सरस्वती के बिना द्वितीय का अर्थ कभी भी उजागर न हो सकता था। परन्तु वर्तमान ग्रंथ ‘उपदेशसाहस्री' स्वयं अपने में स्पष्ट है। इसको सुरेश्वराचार्य ने अपनी नैष्कर्म्यसिद्धि में तथा वार्तिकामृत में उद्धृत किया है। आचार्य के सिद्धान्त को ठीक-ठीक समझाने वाले ग्रन्थों में यह श्रेष्ठ है। श्रीमत्परमहंस स्वामी आनन्दगिरि जी की भव्य टीका के साथ इसे पूर्व में प्रकाशित किया गया है। रामतीर्थ टीका भी निर्णयसागर प्रेस से प्रकाशित हो चुकी है। इन्हीं के आधार पर श्री गजाननशास्त्री मुसलगाँवकर जी ने इसकी विस्तृत टीका लिखकर इसे हिन्दी मात्र जानने वालों के लिये सुलभ कर दिया है। विद्वान् लेखक ने अनेक अन्य ग्रन्थों के अनुवाद भी प्रकाशित किये हैं, जो उनकी दार्शनिक परि- पक्वता के द्योतक हैं। हमें आशा है कि वे वेदान्त के अन्य ग्रन्थों के अनुवाद भी समय-समय पर उपस्थित करते रहेंगे। इनके अनुवादों की विशेषता यही है कि स्पष्टतया आवश्यक पदार्थों को वहीं उपस्थित कर जो दर्शनों से अपरिचित हैं, उनके लिये भी ग्रन्थों को सुगम कर देते हैं।

वेदान्त-धर्म का प्रधान विषय ईश्वर है। वस्तुतः संसार के सभी धर्मों का प्रतिपादन अन्ततोगत्वा ईश्वर ही है। जो संसार का मूल कारण हो व संसार का अन्तिम उद्देश्य हो, वही ईश्वर है। अतः माध्यमिकों का शून्य व विज्ञानवादियों का विज्ञान भी ईश्वर ही है। मीमांसकों का कर्ता भी ईश्वर ही है। सांख्यशास्त्र का पुरुष भी ईश्वर ही है। योगियों ने तो उसे विशेष पुरुष कहा भी है। ईश्वर के विशेष रूप के विषय में अनेक मतभेद हैं। इसका कारण ईश्वर के अनुभव- काल में संस्कारों की झिल्ली का बने रहना है। अनुभूत्यनन्तर पुनः अन्तःकरण के माध्यम से ही उसे प्रकट करने को बाध्य होना पड़ता है अतः अन्तःकरण की कारणता भी प्रविष्ट हो जाती है। वाणी में प्रकट करने पर तत्तद्भाषाओं की सीमाएँ भी प्रविष्ट हो जाती हैं। अनेक अनुभवियों का स्वतः न लिखना एवं उनके उपदेश को सुनकर जैसा समझा वैसा लिखने का प्रयत्न उनके शिष्यों द्वारा होना भी एक कारण है। अतः शिष्यों की समझ व प्रकाशन-सामर्थ्य की सीमाएँ भी आ ही जाती हैं। इन सब सीमाओं के पार जाने पर निर्विशेष प्रत्यगात्मा ही बचता है। औपनिषद् पुरुष भी इसे ही कहा

  • “In the history of Hinduism, the establishment of Shankara’s Advaita System of Philosophy is a great landmark. The ancient period ends with the establishment of Shankara’s System, the final triumph of Hinduism over Buddhism and Jainism in the ninth century”. — Kenneth W. Morgan’s The Religion of the Hindus, p. 27.