उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
आशीर्वचन
भारतीय धर्मगगन के सर्वोज्ज्वल ग्रह कृष्ण, बुद्ध व शङ्कर हैं, इस बात को सारा संसार स्वीकारता है। वर्तमान हिन्दू धर्म के संस्थापक होने के नाते हिन्दू धर्म के तो शङ्कर ही सर्वस्व हैं ❀। गत बारह सौ वर्षों में उनके द्वारा प्रदत्त संकेतों को ही विस्तृत कर अनेक सम्प्रदाय निर्मित हुए हैं। उनके भाष्यग्रन्थ जटिल व दार्शनिक युक्तियों से भरपूर होने से सामान्य व्यक्ति न केवल उन्हें पढ़ने पर घबड़ा उठता है वरन् उनके भावों को समझना भी उसके लिये असम्भव हो उठता है। कई बार तो पूर्वपक्ष की युक्तियों से प्रभावित हो उसे ही ठीक मान बैठता है। आचार्य शङ्कर की शैली है कि विरोधी की बातों को विस्तार से रख कर उनकी आधारशिला को अपनी एक या दो युक्तियों से ऐसा ध्वस्त कर देना कि उसकी सारी अट्टालिका भूमिगत हो जावे। अतः उन्होंने अनुग्रह करके मध्यमाधिकारियों के लिये ऐसे प्रकरण-ग्रन्थों की रचना की, जिनमें इतना काठिन्य न हो एवं सिद्धान्त-पक्ष को पूर्ण रूप से उपस्थित कर दिया जाय। जो पूर्व में ही भिन्न दर्शनों से प्रभावित न हुआ हो उसकी ज्ञाननिष्ठार्थ इतना ही पर्याप्त है। ऐसे ग्रन्थों में कई तो इतने छोटे हैं कि बिना टीका के उनका अर्थ ही तिरोहित रहता है। इसके दो उदाहरण श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र व दशश्लोकी हैं। सुरेश्वराचार्य के वार्तिक के बिना प्रथम एवं मधुसूदन व ब्रह्मानन्द सरस्वती के बिना द्वितीय का अर्थ कभी भी उजागर न हो सकता था। परन्तु वर्तमान ग्रंथ ‘उपदेशसाहस्री' स्वयं अपने में स्पष्ट है। इसको सुरेश्वराचार्य ने अपनी नैष्कर्म्यसिद्धि में तथा वार्तिकामृत में उद्धृत किया है। आचार्य के सिद्धान्त को ठीक-ठीक समझाने वाले ग्रन्थों में यह श्रेष्ठ है। श्रीमत्परमहंस स्वामी आनन्दगिरि जी की भव्य टीका के साथ इसे पूर्व में प्रकाशित किया गया है। रामतीर्थ टीका भी निर्णयसागर प्रेस से प्रकाशित हो चुकी है। इन्हीं के आधार पर श्री गजाननशास्त्री मुसलगाँवकर जी ने इसकी विस्तृत टीका लिखकर इसे हिन्दी मात्र जानने वालों के लिये सुलभ कर दिया है। विद्वान् लेखक ने अनेक अन्य ग्रन्थों के अनुवाद भी प्रकाशित किये हैं, जो उनकी दार्शनिक परि- पक्वता के द्योतक हैं। हमें आशा है कि वे वेदान्त के अन्य ग्रन्थों के अनुवाद भी समय-समय पर उपस्थित करते रहेंगे। इनके अनुवादों की विशेषता यही है कि स्पष्टतया आवश्यक पदार्थों को वहीं उपस्थित कर जो दर्शनों से अपरिचित हैं, उनके लिये भी ग्रन्थों को सुगम कर देते हैं।
वेदान्त-धर्म का प्रधान विषय ईश्वर है। वस्तुतः संसार के सभी धर्मों का प्रतिपादन अन्ततोगत्वा ईश्वर ही है। जो संसार का मूल कारण हो व संसार का अन्तिम उद्देश्य हो, वही ईश्वर है। अतः माध्यमिकों का शून्य व विज्ञानवादियों का विज्ञान भी ईश्वर ही है। मीमांसकों का कर्ता भी ईश्वर ही है। सांख्यशास्त्र का पुरुष भी ईश्वर ही है। योगियों ने तो उसे विशेष पुरुष कहा भी है। ईश्वर के विशेष रूप के विषय में अनेक मतभेद हैं। इसका कारण ईश्वर के अनुभव- काल में संस्कारों की झिल्ली का बने रहना है। अनुभूत्यनन्तर पुनः अन्तःकरण के माध्यम से ही उसे प्रकट करने को बाध्य होना पड़ता है अतः अन्तःकरण की कारणता भी प्रविष्ट हो जाती है। वाणी में प्रकट करने पर तत्तद्भाषाओं की सीमाएँ भी प्रविष्ट हो जाती हैं। अनेक अनुभवियों का स्वतः न लिखना एवं उनके उपदेश को सुनकर जैसा समझा वैसा लिखने का प्रयत्न उनके शिष्यों द्वारा होना भी एक कारण है। अतः शिष्यों की समझ व प्रकाशन-सामर्थ्य की सीमाएँ भी आ ही जाती हैं। इन सब सीमाओं के पार जाने पर निर्विशेष प्रत्यगात्मा ही बचता है। औपनिषद् पुरुष भी इसे ही कहा
- “In the history of Hinduism, the establishment of Shankara’s Advaita System of Philosophy is a great landmark. The ancient period ends with the establishment of Shankara’s System, the final triumph of Hinduism over Buddhism and Jainism in the ninth century”. — Kenneth W. Morgan’s The Religion of the Hindus, p. 27.
( viii ) जा सकता है। एक बार इसको समझ लेने पर सभी ईश्वर-विषयक मान्यताएँ संगत हो जाती हैं और सभी साम्प्रदायिक व धार्मिक विरोधों का अन्त हो जाता है। आचार्य शङ्कर ने इसी को आधार बनाकर तत्कालीन सभी सम्प्रदायों को एक हिन्दू-धर्म में अन्तर्भूत किया। आज भी उनकी दृष्टि से देखकर सभी विश्वधर्मों को सनातन धर्म में अन्तर्भूत करने की आवश्यकता है। अन्य धर्मावलम्बी प्रायः एक साम्प्रदायिक मान्यता को सभी पर लागू करने को धर्म-परिवर्तन मानकर लोगों को अपने झण्डे के नीचे लाने में विश्वास करते हैं। वेदान्ती उन्हें अपने धर्म में रहते हुए, अपनी सनातन कुल- मर्यादाओं को मानते हुए, सभी मान्यताओं को व्यावहारिक दृष्टि से एक-जैसी मान कर उन्हें पारमार्थिक दृष्टि से निर्विशेष प्रत्यगात्मा से अभिन्न स्वीकारने को ही वास्तविक धर्म-परिवर्तन एवं सनातन धर्म के झण्डे के नीचे आना मानता है। युग की पुकार है कि इस दृष्टि का प्रचार कर कम-से-कम प्रारम्भ में भारत के सभी धार्मिक समूहों में शान्ति व सौहार्द की स्थापना की जा सके एवं चूंकि भारत में विश्व के सभी धर्म पुष्कलरूपेण मौजूद हैं अतः इस प्रयोग के सफल होने पर विश्व भर में इसी सौहार्द की स्थापना की जा सके। सभी धर्म किसी माध्यम से ही ईश्वर की प्राप्ति मानते हैं। वेदान्त स्वयं जीव के वास्तविक स्वरूप प्रत्यगात्मा को ही माध्यम मानता है। चूंकि दूसरे माध्यम भी अन्ततोगत्वा प्रत्यगात्मा रूप से ही माध्यम सिद्ध होते हैं, अतः उनसे अविरोध ही आचार्य शङ्कर को मान्य है। उपदेशसाहस्री में प्रत्यगात्मा के माध्यम का जितना स्पष्ट व सटीक विवेचन हुआ है, अन्यत्र दुर्लभ है। अतः इसका आज के युग में विशेष महत्त्व है। ब्रह्मसूत्र को सर्वज्ञ शङ्कर 'शारीरिक मीमांसा' कहते हैं। उनकी दृष्टि में ब्रह्म का विचार शरीर में स्थित चेतना से प्रारम्भ होता है एवं सर्वशरीररूप में सर्व में स्थित ब्रह्म रूप की प्राप्ति में समाप्त होता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि संसार में किसी भी दर्शन या धर्म में मनुष्य उतना मूल्यवान नहीं है जितना अधिक मूल्य उसे शाङ्कर वेदान्त में प्राप्त है। सर्वज्ञ शङ्कर मानते हैं कि अविचार से जो जीव है, विचार से वही ब्रह्म है। 'अशनायादिनिर्मुक्तः सिद्धो मोक्षस्त्वमेव सः' (उ० सा० तत्त्वमसि० २०६)। विचार से पूर्व जीव के कष्टों को स्वीकार करते हुए भी उसकी वास्तविकता को आचार्य ने अस्वीकारा है। आचार्य के समस्त दृष्टिकोण को समझने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य का जो चित्र वे खींचते हैं, उसमें उसका परम-प्रयोजन या अन्त अत्यन्त सुरक्षित है। उसकी पूर्णता (integrity) व असामान्य अभिव्यक्तियों का विस्तार अनुपम है। बीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण का जो निराशा का माहौल है, उसको मानो आचार्य शङ्कर चुनौती देते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य की जो शारीरिक सीमाएँ उसे अनगिनत कमजोरियों व दुःखों का घर बना रही हैं, वे केवल क्षणिक हैं। मनुष्य का मूल्य उन कमजोरियों से नहीं लगाना है वरन् हमें तो उसको उसके ब्रह्मरूप से आंकना है, जो उसकी अन्तिम अपितु सहज पूर्णता है। यही उसका निश्चित् रूप है। वर्तमान जीवनक्रम व उसके भिन्न रूप तभी मूल्यवान् लगते हैं जब उन्हें उन्नति के सोपान के रूप में, व विकासशील रूप में समझा जाता है। इसी से इसे दिशा-निर्देश भी प्राप्त होता है। यह सत्य है कि आपाततः मनुष्य-जीवन एक पहेली है। पहेली को समझे बिना मनुष्य क्रिया व निष्क्रियता के बीच डोलता रहता है। संशय में पड़ा रहता है कि वह पशु है या देव। विवेक व कामनाओं के बीच अपने को झुंझलाता हुआ पाता है। इस असीम विश्व की विस्तृति उसकी समझ के परे लगती है। वह अपने को अति तुच्छ रूप में देखता है। उसे आत्मज्ञान व्यर्थ-सा लगता है। परन्तु इतने पर भी वह पाता है कि वह ऐसा यन्त्र है जिसमें विश्व के पदार्थों की ज्ञानरूप आहुति डालते हैं। ये पदार्थ अर्थशून्य हैं, अनर्ह हैं। परन्तु मनुष्य में जाकर इन्हें प्रयोजनवत्ता की नवीन गुणवत्ता प्राप्त हो जाती है। ये अर्ह हो जाते हैं। यह जो मानव की आध्यात्मिक शक्ति है कि विश्व को समझ कर विश्वातीत्त का दर्शन कर सके, यही उसकी वास्तविकता है क्योंकि वह स्वयं ही विश्वातीत तत्त्व है। निरन्तर परिवर्द्धमान, विकासशील और सप्रयोजन जिज्ञासा ही इसे 'प्रज्ञानं ब्रह्म' का साक्षात्कार कराती है। 'अज्ञानं कल्पनामूलं संसारस्य नियामकम् । छित्वाऽऽत्मानं परं ब्रह्म विद्यान्मुक्तं सदाऽभयम्' (उ० सा० पार्थिव० १७)। विश्वधर्म को उपनिषद् की सबसे बड़ी देन है जीव, जगत् व ईश्वर की अधिष्ठानदृष्ट्या एकरूपता। यह बात दूसरी है कि जगत् का स्वरूप से बाध होता है व जीव तथा ईश्वर की उपाधिमात्र का। 'आत्माभासाश्रयाच्चैवं मुखा- भासाश्रया यथा। गम्यन्ते शास्त्रयुक्तिभ्यामाभासासत्त्वमेव च (उ० सा० तत्त्वमसि० ४३)। यह आभास बनना या अनुप्रवेश क्या है? सदाशिव का स्थूल-सूक्ष्म देहों के साथ अभिन्नतया प्रतीत होना ही प्रवेश है। असंभव होने से यह
( ix ) आविद्यक ही हो सकता है। देह आपस में भिन्न हैं, पर उन सभी में वह तो एक जैसा ही प्रविष्ट है। 'विविच्यस्मात्स्वमात्मानं विद्याच्छुद्धं परं पदं । द्रष्टारं सर्वभूतस्थ समं सर्वभयातिगम् ( उ० सा० नात्यदन्यत्० ३६) । तात्पर्य है कि हार्दाकाश में निरुपाधिक साक्षात्कार होने के निमित्त से ही अनुप्रवेश कहा गया है। जीव स्थूल-सूक्ष्म उपाधि में वर्तमान परब्रह्म ही है एवं वही व्यावहारिक अनुभूतियों का प्रमाता है। 'तस्मात्पर एवैकः सर्वेषां भूतानां अन्तर्रात्मा जीवभावेन अवस्थितः'। तत्त्वमीमांसा करने पर महेश्वर ही उपाधि द्वारा मनुष्य कहा जाता है। इससे अधिक श्रेष्ठता मनुष्य की क्या बतायी जा सकती है ? यह सत्य है कि उपाधि अविद्या का ही कार्य है। अविद्या ही शिव, विश्व और जीव का भेद उपस्थापित करती है। मानव के स्थूल-सूक्ष्म शरीर रूपी उपाधि की भौतिकता वेदान्तमान्य है। मन भी भौतिक है एवं दृश्य के अन्तःपाती है, द्रष्टा के अन्तःपाती नहीं। उपाधियों की आविद्यकता महत्त्वपूर्ण है। आत्मज्ञान उनका बाधक इसीलिए है कि वे आविद्यक हैं। परन्तु वे व्यावहारिक सत्य हैं एवं वही प्रति जीव के विशेष भाव का हेतु हैं। श्रीडिङ्कर अपने 'किञ्जीवनम्' नामक ग्रन्थ में बताते हैं कि जैसे हम कई मटके या मकान देखते हैं, वैसे हमें कभी भी कई चेतन नहीं दीखते । 'मैं' चेतन ही एकमात्र प्रतीत होता है। वे आगे कहते हैं कि आकाश व काल ही बहुत्व निर्माण करने वाले हैं। अतः दिक्कालातीत होने से चैतन्य कभी बहुत्व को प्राप्त नहीं कर सकता। इसीलिये 'ज्ञातेवाहम्विज्ञेयः शुद्धो मुक्तः सदेत्यपि । विवेकी प्रत्ययो बुद्धेर्हृष्टत्वान्नाशवान्यतः ( उ० सा० प्रकाश० १४) । जीव में ईश्वर का अन्तर्यामित्व अभेद से है, दो चैतन्य भिन्न होकर नहीं। अतः वेदादि सच्छास्त्रों में जहाँ इस प्रकार के वचन हैं, वे भेदप्रतिपादनार्थ नहीं हैं। भेदसिद्धि के लिए उनका प्रयोग करने पर चैतन्य के बहुत्व का अनुभव तथा युक्तिविरोध प्राप्त होकर वेदार्थ ही सन्दिग्ध या अविश्वस्त हो जायगा। अतः द्वैतवादियों के 'द्वा सुपर्णा' या अन्तर्यामी ब्राह्मण के द्वारा जीव व ईश्वर के भेद का प्रतिपादन सर्वथा असंगत है। अयौक्तिक, अननुभूत अथच अविचारित भेद का अनुवाद श्रुति करे यह तो सम्भव है, पर उसका प्रतिपादन करे यह सम्भव नहीं। परमतत्त्व के तीन प्रकार के वर्णन उपनिषद् में प्राप्त होते हैं। निर्विशेष ब्रह्म का ज्ञेयार्थ निरूपण एवं सविशेष ब्रह्म का ध्यान करने के लिए प्रतिपादन श्रुतियों में तात्पर्य से किया गया है। कर्म व कर्मफल का कर्ता व भोक्ता रूप जिज्ञासु को अनुभवसिद्ध होने से उसका अनुवाद किया है एवं उसका तात्पर्य जीव के वास्तविक स्वरूप का विवेक करके उसकी ब्रह्म से अभिन्नता प्रतिपादन करना है। ब्रह्म की चेतनता श्रुति बताती है परन्तु चेतनता क्या चीज है, यह तो जीव को अपने स्वरूप में ही अनुभूत है। अतः ब्रह्म जीव से अभिन्नरूप न हो तो सदा ही परोक्ष रहेगा, ब्रह्मसाक्षात्कार असम्भव हो जायगा। वेदादि शास्त्र मुमुक्षु के लिए रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक हो जावेंगे। अतः जीव ही, जो चेतन का एकमात्र अपरोक्ष रूप है, ब्रह्मापरोक्षता का स्थल हो सकता है। जीव की उपाधियों से ही वह जीव है अन्यथा ब्रह्म ही है। ईश्वरश्चेदनात्मा स्यान्नासावस्मीति धारयेत् । ......... अज्ञेयत्वेऽस्य किन्तैस्स्यादात्मत्वे त्वन्यधीहुतिः' ( उ० सा० ईश्वर० १,२) । अतः चेतन में भेद केवल उपाधिनिष्ठ है। तीन प्रकार के वर्णनों से तीन प्रकार के भिन्न चेतनों का कथन न होकर एक चेतन के तीन प्रकार की उक्ति अविचारित प्राप्त भेद की निवृत्ति के लिये ही है। कर्म व कर्मफल की व्यवस्था के बिना मानव के समग्र यत्न निरर्थक हो जावेंगे। यह शास्त्रीय उपासना रूप कर्म के लिए भी उतना ही सत्य है। अतः कर्मफलदाता ईश्वर ही ध्येय ब्रह्म होने से ध्यान का विषय भी है व ध्यान का फल देनेवाला भी। कर्म के द्वारा भी वही आराध्य है व वही फलदाता भी। इतना निश्चय होने पर वही ईश्वर लौकिक कर्मों के फलदाता रूप से भी स्वीकारा जाता है। इस प्रकार ईश्वर व जीव का सम्बन्ध स्वामी व सेवक भाववाला है। इसी भाव की भक्ति वेदान्तसम्मत है। ईश्वरत्व के भाव से रहित जिस भक्ति का प्रतिपादन किया जाता है, वह तो मूल को काटकर पत्ते को सींचने की तरह व्यर्थ है। पत्ते की चमक की तरह मन की एकाग्रता तो वहाँ भी उपलब्ध हो ही जायगी। 'ओमित्येवं सदात्मानं सर्वं शुद्धं प्रपद्यथ । सेतुं सर्वव्यवस्थानां अहोरात्रादि- वर्जितम्' ( उ० सा० सम्यङ्मति० ७७) ।
सच्चिदानन्द परब्रह्म ही सारी साधनाओं का लक्ष्य वेदान्त के अनुसार स्वीकृत है। यह सत्य है कि उसका किसी भी प्रकार से निरूपण अशक्य है, परन्तु यह भी सत्य है कि 'सत्यं ज्ञानं अनन्तम्', 'आनन्दं प्रपञ्चोपशमं शान्तम्', 'अद्वैतं शिवं' आदि के द्वारा स्वयं श्रुति ने उसका निरूपण भी किया है एवं उस निरूपण से साधक स्वकीय प्रज्ञा के द्वारा अन्वेषण करके कृतार्थ भी हुए हैं और हो रहे हैं। जितना यह सत्य है कि असंस्कृत पुरुष को इन सभी शब्दों में त्रुटि प्रतीत होती है, उतना ही सत्य यह भी है कि गुरु द्वारा संस्कार को प्राप्त शिष्य को इन्हीं के द्वारा पूर्णता की प्राप्ति होती है। अन्तिम गुरुक्ति 'तत्त्वमसि' इन्हीं पर आधारित है। सभी सप्रयोजन उद्बुद्ध कर्म शिवकेन्द्रित ही हों, सभी भावनाओं व स्नेहों का एकमात्र उद्देश्य शिव ही हो, सभी बौद्धिक गवेषणाओं का लक्ष्य शिव ही हो, यही वेदान्त सम्प्रदाय है। 'आत्मलाभात्परो नान्यो लाभः कश्चन विद्यते । यदर्था वेदवादाश्च स्मार्ताश्चापि तु याः क्रियाः' ( उ० स० सम्यङ्मति० ४)। इसीलिए वेद मानवदेह को ब्रह्मपुर कहता है। ब्रह्म की उपलब्धि के लिए प्राप्त यह देह जब इस उद्देश्य से प्रवृत्त होता है तो ब्रह्म ही सर्वोच्च अर्हा व परमसत्य होने से मानव का समग्र जीवन दिव्य हो पड़ता है। इसमें जीवन के किसी भी पक्ष का निरास नहीं है। जीवन के सभी पक्षों को उच्च व अधिकतम क्रियाशील स्तर पर पूर्ण दीप्ति से कार्य करना जरूरी हो जाता है। 'सत्यं ज्ञानं अनन्तं च रसादेः पञ्चकात्परम् । स्यामहंश्चादि- शास्त्रोक्तमहं ब्रह्मेति निर्भयः ॥ यस्माद्भीताः प्रवर्तन्ते वाङ्मनः पावकादयः । तदात्मानन्दतत्त्वज्ञो न बिभेति कुतश्चन ( उ० सा० सम्यङ्मति० ६२-६३)। दैवी सम्पत्ति उसमें स्वभावतः प्रतिष्ठित है अतः वह दिव्य है। दैवी सम्पत्ति उसके लिए साधनरूप नहीं है। आचार्य शङ्कर के पट्टशिष्य सुरेश्वर अपनी प्रसिद्ध कृति नैष्कर्म्यसिद्धि में कहते हैं— 'अमानित्वादिनिष्ठो यो यश्चाद्वेष्ट्रादिसाधनः ज्ञानमुत्पद्यते तस्य न बहिर्मुखचेतसः (नैष्कर्म्यसिद्धि ४.६८)। साधक व सिद्ध में केवल यही भेद है कि सिद्ध में यह जीवन की दिव्यता या क्रियाशील दीप्ति अप्रयत्न से ही प्रकट होती है जब कि साधक में प्रयत्न से । 'उत्पन्नात्मप्रबोधस्य स्वद्वेष्टृत्वादयो गुणाः अयत्नतो भवन्त्यस्य न तु साधनरूपिणः' (नैष्कर्म्यसिद्धि ४.६९)। ईशावास्योपनिषद् का प्रथम मन्त्र, जो अद्वैत के साधक के लिये है, स्पष्टतः ईश्वर से सारे परिदृश्यमान अर्थात् कार्य-कारणसंघात और उसकी क्रियास्थली को आच्छादन करने का आदेश देता है। धर्म व दर्शन दोनों का संश्लिष्ट लक्ष्य शिवज्ञान ही है। यहाँ और अभी वह ज्ञान सम्भव है, क्योंकि मानव के अन्तस्तल में वह कालातीत भाव से उपस्थित है। सर्वज्ञ शङ्कर ब्रह्म को ही लक्ष्य स्वीकारते हैं, जो सोपाधिक व निरुपाधिक रूप से उपनिषद् द्वारा प्रतिपाद्य है। यह ब्रह्म साधक की तात्त्विक वास्तविकता (metaphysical reality) है। यह शरीरी नहीं है पर शरीरभाव में शरीरी रूप से प्रतीत होता है। व्हाइटहेड ने विज्ञान व साम्प्रत जगत् में धर्म का लक्षण करते हुए कहा है, 'विश्वातीत, विश्वसंचालक एवं विश्व का आधार ऐसा सत्य है, जिसका सत्यापन ज्ञान द्वारा करना है। इसका परोक्ष ज्ञान धर्म का प्रारम्भ है एवं अपरोक्ष ज्ञान लक्ष्य है। यह सुदूर सत्य भी है एवं अतिसन्निहित तत्त्व भी। यही सभी प्रवह्रित अनुभूतियों को सार्थक करता है पर स्वयं अज्ञात बना रहता है। यही अन्तिम सत्य भी है और अप्रकट भी है, जिसे पकड़ना या जानना असम्भव लगता है।' इसे ही शङ्कर 'ब्रह्म' कहते हैं, जो नित्यसिद्ध होने पर भी जिज्ञासु जीव को साध्य लगता है। इसीलिए साधना व ईश्वरदर्शन आवश्यक हो जाता है। 'नित्यमुक्तः सदेवास्मीत्येवं चेन्न भवेन्मतिः । किमर्थं श्रावयत्येवं मातृवच्छू तिरादृता ( उ० सा० तत्त्वमसि० ३)। व्हाइटहेड व आचार्य शङ्कर की दृष्टि में एक बड़ा भारी भेद यह है कि व्हाइटहेड की दृष्टि में अन्वेषण का उद्देश्य कभी पूरा नहीं होगा परन्तु शङ्कर की दृष्टि में अवश्य पूर्ण होगा क्योंकि वह हृदयाकाश में आत्मरूप से सदा मौजूद है। अतः धर्म चाहे अदृष्ट फल हो, परन्तु परमधर्मस्वरूप शिव तो दृष्टफल ही है।
इसकी प्राप्ति के लिये शङ्कर ने अधिकारमीमांसा को प्रधानता दी है। अधिकारवाद के द्वारा ही हमें पता चलता है कि अद्वैत के आचार्य की पकड़ विश्व की अनन्त उलझनों के विषय में कितनी गहरी है। धर्म-विचार वैसा सरल नहीं है, जैसा कई आधुनिक लोग समझते हैं। जीव व ब्रह्म की तात्त्विक एकता का अर्थ है कि प्रत्येक जीव ब्रह्मभाव का अनुभव करे, मानवयोनि को छोड़ इस बन्धन का अनुभव एवं बन्धन को बन्धन समझने की योग्यता भी नहीं आती। मानवों में भी सभी लोग तड़पन के साथ बन्धनिवृत्ति की कामना नहीं करते। इसीलिये मनुष्यता व मुमुक्षुता की आवश्यकता होती
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है। मानवों में भी कोई-कोई ही आध्यात्मिक जगत् में साहसिक बनकर साधनों का जुगाड़ पाते हैं। पूर्ण स्वतन्त्रता की इच्छा मानव के मन में अत्यन्त देर से आती है। इसके प्रति अप्रमाद एवं ब्रह्मज्ञान के साधनों से अतिरिक्त सभी का त्याग करने की तैयारी भी आवश्यक है। विश्व के अन्तःपाती ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, स्वर्ग, राज्य, धन, पुत्र आदि सभी पदार्थों की प्रातीतिक सुखदता का खोखलापन जानने के बाद ही चरित्र में वह प्रौढता आती है, जो अद्वैतापरोक्षता के लिये उद्दाम वासना बनकर आत्मज्ञान के साधनों में एकाग्रता से प्रवृत्ति कराती है। सामान्यतः मानव अनुकूल की प्राप्ति के निमित्त प्रवृत्त होता है व प्रतिकूल से निवृत्त। पर शनैः शनैः समझ में आता है कि इससे तृष्णा सर्वथा शान्त नहीं होती। कर्ममात्र निश्चित लक्ष्य को पूरा करने में पर्याप्त नहीं हैं। इस स्थिति पर आकर वह शास्त्र के आदेश को समझ पाता है कि अपने अन्दर ही खोजा जाय। जबतक अपने तात्त्विक रूप का पता न लगे, सारे प्रयोजन अनिर्णीत ही रहेंगे। ‘कर्माणि देहयोगाथं देहयोगे प्रियाप्रिये ध्रुवे स्यातां, ततो रागो, द्वेषश्चैव ततः क्रियाः’ (उ. सा. उपोद्० ३) एवं ‘विविच्यस्मात्स्वमात्मानं विद्याच्छुद्धं परं पदं’ (उ. सा. नान्यदन्यत्० ३६)। अन्दर अन्वेषण करने के लिये शान्त चित्त आवश्यक है क्योंकि चित्त का ही सहारा भीतर के ज्ञान के लिये है। इसलिये तो इसे अन्तःकरण कहा है। परन्तु इन्द्रियाँ चञ्चल होने पर बलपूर्वक वे चित्त को अशान्त कर देती हैं, अतः उनका संयमन भी आवश्यक है। इस अन्वेषण में गुरूपसत्ति अनिवार्य है क्योंकि यह अध्यात्मयात्रा अति दुरूह है एवं अनुभवसम्पन्न गुरू के बिना रास्ते में भटक कर अपने उद्देश्य पर न पहुँच कहीं अन्यत्र पहुँचा जा सकता है। अतः गुरु की आज्ञा का पालन व उनके अनुगत होने का अभ्यास आवश्यक है, अन्यथा ब्रह्मज्ञानी गुरू का उपदेश ही सम्भव नहीं होगा। स्वभावतः जितने गुणों से सम्पन्न शिष्य होगा उतना ही वह गुरू के उपदेश को जीवन में उतारने में सक्षम होगा। ‘प्रशान्तचित्ताय जितेन्द्रियाय च प्रहीणदोषाय यथोक्तकारिणे गुणान्वितायानुगताय सर्वदा प्रदेयमेतत्सततं मुमुक्षवे’ (उ. सा. पार्थिव० ७२)। परन्तु ये अधिकार प्राप्त कैसे हों ? यह तो स्पष्ट ही है कि बहुत कम मानव ही इन अधिकारों को प्राप्त करने के योग्य होते हैं। इसके लिये यम, नियम, शिवार्पण किये हुए यज्ञ, पूजन, तप, जप, देवोपासन आदि कर्तव्य हैं। ‘यमैर्नित्यैश्च यज्ञैश्च तपोभिस्तस्य शोधनम् शारीरादि तपः कुर्यात्तद्विशुद्धयर्थ- मुत्तमम्’ (उ. सा. साम्यङ्मति० २३)।
यम का वर्णन करके हुए सुरेश्वराचार्य मनकी प्रसन्नता, सन्तोष, मौन, इन्द्रियसंयम, दया, दक्षता, आस्तिकता, सरलता, स्वभाव की कोमलता, क्षमा, मनकी सफाई, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, ईश्वर-स्मरण, धृति आदि मनके धर्मों का सामूहिक वर्णन करते हैं जिनको न करने पर साधक पतित हो जाता है। स्नान, सफाई, यज्ञ, सत्य, जप, होम, तर्पण, तप, दान, कष्टसहन, ईश्वर-नमस्कार, प्रदक्षिणा, व्रत, उपवास आदि शरीर से होनेवाले धर्मसमूह नियम कहे जाते हैं। इस प्रकार दीर्घकाल तक आचरण करने पर मनमें वह योग्यता आती है जिसमें ब्रह्मज्ञान धारण किया जा सके। कहा जाता है कि शेरनी का दूध स्वर्णपात्र में ही धारण किया जा सकता है, अन्यथा दूध विकृत हो जाता है। इसी प्रकार योग्य चित्त में ही ब्रह्मविद्या धारण की जा सकती है अन्यथा काम आदि विकारों से वह विकृत हो जाती है। ‘सभयादभयं प्राप्तं तदर्थं यतते च यः स पुनः सभयं गन्तुं स्वतन्त्रश्चेन्न हीच्छति’ (उ. सा. तत्त्व० २२८)। यहाँ स्वतंत्र का अर्थ भी समझने लायक है। आइन्स्टाइन कहते हैं कि निरपेक्ष स्वतन्त्रता अर्थहीन है। प्रत्येक व्यक्ति अपने बाह्य एवं आभ्यन्तर दबावों से ही जो करता है, सो करता है *। इसीको गीता मे स्वभाव कहा है, जिसके द्वारा परमेश्वर अन्तर्यामी कहा जाता है। अतः यदि कामनाओं आदि के संस्कारों से रहित नहीं हो गया है तो अस्वतन्त्र की तरह प्रवृत्त होकर अपने को बद्ध या परतन्त्र अनुभव करेगा। अतः ब्रह्मविद्या का उदय होने के लिये बाह्य व आभ्यन्तर परतंत्रता दूर होना आवश्यक है। यह ठीक है कि जीवन रहते प्रारब्धवशात् कुछ न कुछ स्वभाव तो बना ही रहेगा। परन्तु उतना आवश्यक मात्र बचा रहने पर परतंत्रता का अनुभव नहीं हो पायगा। कामनाओं की आज्ञा के अनुसार अदम्य प्रवृत्ति की इच्छा ही मानव की परतन्त्रता का व्यक्त रूप है। साधनाएं इस इच्छा को इस रोग से मुक्त करने के लिये ही हैं। कामना से निर्मुक्त होने पर मानव का
- ‘I do not at all believe in human freedom in the philosophical sense. Everybody acts not only under external compulsions, but also in accordance with inner necessity’.-Einstein in Window on the world. Published by Oxford University Press 1972.
( xii ) व्यक्तित्व संश्लिष्ट हो जाता है। अधिकारसम्पन्नता पर जोर देकर नैतिक शिक्षण व जीवन में उसे उतारने पर आचार्य जोर देते हैं। 'नैतद्देयमशान्ताय रहस्यं ज्ञानमुक्तमं (उ. सा. सम्यङ्मति० ८६)। इस संश्लिष्ट व्यक्तित्व की प्राप्ति के बिना दिया ज्ञान भी निष्ठा नहीं बन पाता। ऐसे ही किसी साधक को लक्ष्य करके स्वामी विद्यारण्य जी कहते हैं कि तत्त्वज्ञान को प्राप्त करके तुम ग्रामशूकर बनने की इच्छा मत करो। थोड़ा-सा प्रयास करने पर ही तुम देवताओं की तरह पूज्य हो सकोगे। विड्वराहादितुल्यत्वं माकांक्षीस्तत्त्वविद्द्वान् सर्वधीदोषसन्त्यागाल्लोकैः पूज्यस्व देववत् (पंचदशी ४।५७)। यद्यपि यह सत्य है कि तत्त्वसाक्षात्कार होने पर देवता की तरह पूज्य होना भी साधक नहीं चाहेगा। उसे तो लगेगा कि प्रतिष्ठा भी शूक़री विष्ठा की तरह अनुपादेय है। पर जो जगत् में कामना से प्रवृत्त हो रहा है, उसकी कामना को उच्चतर नैतिकता की ओर ले जाकर उसे अधिकारसम्पन्न करने में ही तात्पर्य है। अनैतिकता का मूल व्यक्तिमूलक कामनाएँ ही है। वे भूख की तरह हैं व भूख को बृहदारण्यक उपनिषद् में मृत्यु ही कहा है। कामना मन को भविष्य की ओर न देखने देकर उसे संकीर्ण व क्षणिक वर्त्तमान पर केन्द्रित कर देती है। अतः जीव अपनी उच्चतर संभावनाओं को व्यक्त करने पर ध्यान नहीं दे पाता। अतः अन्यत्र उपनिषद् ऐसे मानव को कृपण कहती है। अपनी पूर्णात्मा को प्रकट किये बिना, उसका साक्षात्कार किये बिना, इस संसार से जाना ही कृपण बनकर जाना है। इसी को जीतने का तरीका नैतिक जीवन का निर्माण है। इच्छा के उत्पन्न होने पर उसे नियंत्रित कर उपयुक्त मार्ग में बहाकर उपयोगी बनाना साधना के प्रथम सोपान हैं। पर यह केवल किसी की आज्ञा से नहीं करना है वरन् अपनी शुद्ध वास्तविक आत्मा की अभिव्यक्ति के लिये करना है। इसके लिये अपनी वर्त्तमान प्रतीतिक आत्मा के साथ समझौता करना आवश्यक है, अन्यथा वह ऐसा विप्लव मचायेगी कि साधक निराश हो जायगा। अन्ततः नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त आत्मा के व्यक्त होने पर संघर्ष समाप्त हो जायगा क्योंकि प्रतीतिक आत्मा का बाध हो जायगा। परन्तु तब तक बुद्धि से समझी शुद्धरूपता की तरह इस कामनापुंज का प्रवाह आवश्यक होगा। वेदान्त के विद्वान् शर्मण्यदेशवासी डायसन का कहना है कि मानवता की एकता, उनके सह- अस्तित्व के लिये आवश्यक उनकी आवश्यकताओं और कामनाओं की तरफ आचार्य ने ध्यान नहीं दिया है। परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि उन्होंने वेदान्त साधना का अभिन्न अंग कर्मयोग को माना है, जिसमें हिन्दू सामाजिक जीवन के रूप वर्णाश्रमधर्म में इन सबका समावेश हो जाता है। गीता भाष्य में यह और स्फुट हो जाता है। 'देहाद्यैरविशेषेण देहिनो ग्रहणं निजम्, प्राणिनां तदविद्योत्थं तावत्कर्मविधिर्भवेत्' (उ. सा. उपोद्० १६)। चूंकि धर्मशास्त्र में इसका विस्तृत वर्णन है, आचार्य ने इसका अलग से प्रतिपादन करना आवश्यक नहीं समझा। व्यक्ति की उन्नति और जिस समाज में वह रहता है, उसकी उन्नति व्यष्टि और समष्टि की उपाधि की एकता के द्वारा शङ्कर ने ऐसे दार्शनिक धरातल पर रख दी है जो अभेद्य है। किंच उनका जीवन, जो किसी भी वेदान्त अनुयायी के लिये अजस्र प्रेरणा का स्रोत है, स्पष्ट कर देता है कि वे समाज के प्रति कितने संवेदनशील थे। वर्णाश्रमव्यवस्था को स्वीकारने का अर्थ है व्यक्तिगत कामना को समाज की स्थिति के साथ समन्वित करना। सामाजिक अर्हाओं के साथ मिलकर चलने से ही उस दृष्टि को प्राप्त किया जा सकता है, जिससे निष्कामावस्था में समाज को अधिकतम उन्नति की प्रेरणा दी जा सके। लोकसंग्रह आचार्य शंकर के जीवन-दर्शन में विशिष्ट स्थान रखता है। वेदान्त का नैतिक दर्शन मानव की स्वतंत्रता को ऐसे मार्ग से स्फुट करने का प्रयत्न है जो उसकी कामनाओं को रुद्ध करके उसकी परतंत्रता को और अधिक न उलझा दे। विश्व में क्रिया अत्यन्त गहन है, जिस जंगल में से सीधा मार्ग निकालना जरूरी हैं। इसी मार्ग से कर्त्ता स्वतंत्रता के खुले वातावरण में प्रवेश करके शुद्ध पार- मेश्वरी वायु को ग्रहण कर सकेगा। पहला सोपान तो इस बात को समझना है कि सारे कर्म बन्धन का कारण नहीं है। फलप्राप्ति की इच्छा से किया कर्म ही बन्धन का कारण है। इच्छाप्रेरित कर्म क्यों बाँधते हैं? वे कर्त्ता को फल देने के लिये उसे जन्म-मरण के चक्र में डालकर बाँधते हैं। किंच उनसे उत्पन्न वासना पुनः कर्मेच्छा उत्पन्न कर इस चक्र को निरन्तर चलाती रहती है। कर्म का व्यापक कानून इसकी व्यवस्था करता है। 'यत्कामस्तत्क्रतुर्भूत्वा कृतं त्वज्ञः प्रपद्यते' (उ. सा. सम्यङ्० ४८)। निष्फलता की दृष्टि से काम करने वाले को ये बन्धन नहीं हो सकते। तब ईश्वर की प्रेरणा के अनुकूल ही कर्म करना आरम्भ हो जाता है जो अन्ततः नैष्कर्म्य पद की प्राप्ति करा देता है। ईश्वरेच्छा में जीव की इच्छा का विलीन हो
( xiii ) जाना ही कर्म का उद्देश्य है। इसी को अन्यत्र संसिद्धि शब्द से कहा गया है। परन्तु कर्म मोक्ष का कारण नहीं ही हो सकता है। कर्म में कर्तृत्वाभिमान अवश्यंभावी है। 'मैं ईश्वर के नौकर की तरह करता हूँ' में प्रेरकता ईश्वर में होने पर भी कर्तृता तो मैं में रहेगी ही। 'विद्यायाः प्रतिकूलं हि कर्म स्यात्साभिमानतः.........अहं कर्त्ता ममेदं स्यादिति कर्म प्रवर्त्तते' उ. सा. उपोद्० १२-१३ । ) अगले सोपान में समझना पड़ता है कि ईश्वर मानव-कल्पना की उच्चतम कोटि है। ईश्वर के माया से प्राकट्य होने को समझना ईश्वर की कृपा से ही संभव है। इसी में जीव का शिव से प्रेम व शिवका जीव पर अनुग्रह छिपा हुआ है। अवतार का उद्देश्य धर्म व साधुओं का रक्षण ही है। इसके लिये असाधु अधर्मी आसुरी प्रकृतिवालों का नाश आवश्यक होने से वह भी अवतार-जीवन का आवश्यक अंग हो जाता है। धर्म में अप्रवृत्ति के दो कारण होते हैं। युगानुरूप जो कार्य असंभव हो जाते हैं उनमें असामर्थ्य के कारण दूसरे धर्मकार्यों के प्रति भी अश्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। धर्म के नियम एक अगाध जंगल हैं। उनमें से किसी भी देश, काल आदि परिस्थितियों का विचार करके किन धर्मसमूहों का पालन संभव है एवं किनको छोड़ना ही पड़ेगा इसका निर्णय साधारण व्यक्ति के बूते का नहीं है। भीष्म पितामह जैसे वसु भी युधिष्ठिर के समक्ष सभी धर्मों व मोक्षसाधनों का प्रतिपादन करके भी द्रौपदी वस्त्रपहरण के समय धर्माधर्म का निर्णय करने में अक्षम ही रहे। अतः अवतार का प्रयोजन धर्मव्यवस्था के द्वारा संभव धर्मों को उपदिष्ट व प्रचारित करना है। 'विमथ्य वेदो दधितः समुद्धृतं' ( उ० सा० तृष्णा० २८)। इसी के फलस्वरूप लोगों में धर्मप्रवृत्ति सुलभ हो जाती। ज्ञान होने पर भी सर्वस्व बलिदान करके धर्मपालन भी सबके बूते का नहीं है। अधार्मिक लोग संगठित होकर धार्मिकों का उत्पीड़न करते हैं। यह आज के समाज व राज्य में स्पष्ट है। जब तक इस प्रकार के संगठित अधर्मियों का नाश न हो तब तक धार्मिक आचरण कठिन हो जाता है। अतः यह भी अवतार का कार्य हो जाता है। कई बार अधर्म का प्रचार धर्म के नाम से होता है। ऐसो परिस्थिति में जिन युक्तिजालों से अधर्म को धर्म कहा जा रहा है, उसका खण्डन भी संगठित अधर्मियों का नाश ही है। ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति के नाश से अधर्म का नाश संभव न होकर विचार का नाश ही अधर्मियों का नाश हो सकता है। 'अगुणग्रहोऽगुणं न याति मोहं ग्रहदोषमुक्तितः' ( उ० सा० तृष्णा० २६)। इस प्रकार परमेश्वर की कृपा को इतिहास में प्रत्यक्ष देखकर परमेश्वर पर अपूर्व प्रेम उत्पन्न हो जाता है। यहाँ अवतार का अर्थ केवल पूर्णावतार नहीं समझना चाहिये। पूर्ण जीवन अर्थात् बचपन आदि सारी अवस्थाओं में जो अवतार प्रकट हो वह पूर्णावतार है, जैसे कृष्ण, शंकर आदि। भक्तानुग्रह के लिए थोड़े समय के लिये प्रकट होने वाले अंशावतार भी अवतार ही हैं। उनसे भी प्रभु का जीवों के प्रति प्रेम प्रकट होता है। गुरु भी ज्ञानोपदेश के समय ऐसा ही अवतार है। 'सर्वज्ञेभ्यो नमस्तेभ्यो गुरुभ्योऽज्ञानसंकुलम्' ( उ० सा० सम्यग्दृ० ८९)। प्रेम मानवहृदय की सौन्दर्य के प्रति उद्भूत भावना है। स्वरूपतः यह निष्काम सुख है। सौन्दर्य का मूल समन्वय है। शिव में सभी समन्वित होने से वही परम निरतिशय सौन्दर्य का आश्रय है। अतः पूर्ण प्रेम भी वहीं संभव है। प्रकृति का सौन्दर्य निखर कर आत्मा के अपूर्ण सन्तुष्टि का कारण होने से ही त्याज्य है। इससे होने वाला सुख भी निष्काम तो है पर इसका विषय पूर्ण समन्वित न होने से प्रेम की पूर्णता का बाधक बना रहता है। वस्तुतः शिव का सौन्दर्य ही अविद्या से परिच्छिन्न होकर प्राकृत पदार्थों में उल्लसित होता है। अतः शिवातिरिक्त सभी कुछ शिव पर अध्यस्त होकर ही सुन्दर होता है। सौन्दर्य के अन्वेषण को शिव की प्रकृति से हटाकर शिव में केन्द्रित करना ही शिवभक्ति है। बगीचे की सुन्दरता से बागवान की सुन्दरता देखना है। 'आरामं अस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चन' ( बृ० ३.४.३.१४ ) ज्ञानेच्छा भी ईश्वर को ही विषय करे यह ज्ञानमार्ग है। इसी प्रकार भक्ति भी ईश्वर को ही विषय करने की इच्छा है। भक्ति व ज्ञान में भेद विषय को लेकर नहीं; साधन को लेकर है। एक में बुद्धि व दूसरे में मन साधन है। फल में भी दोनों में ईश्वरज्ञान की प्राप्ति होने पर भी एक में प्रमा होने से अज्ञाननिवृत्ति होती है, तो दूसरे में अप्रमा होने पर भी आनन्द की अभिव्यक्ति होती है। ज्ञान में कोटियाँ संभव नहीं हैं तो भक्ति में अनन्त कोटियाँ संभव हैं। एक का फल मोक्ष है तो दूसरे का रसास्वादन। 'सदस्मीति प्रमाणोत्था धीः' ( उ० सा० तत्त्वमसि० ७) 'ओमित्येवं स्वमात्मानं सर्वं शुद्धं प्रपद्यथ सेतुं सर्वव्यवस्थानामहोरात्रादिवर्जितम्' ( उ० सा० सम्यङ्मति० ७७) । शिवानन्दलहरी में आचार्य शंकर ने
( xiv ) इस भक्ति के रहस्य का उद्घाटन करते हुए सौन्दर्य-निखार पर जोर दिया है। जगत् के प्रति वैराग्य व शिव के प्रति राग एक ही सिक्के के दो पीठ हैं। यह ईश्वर का प्रेम शनैः शनैः पकता है। प्रकृति का सौन्दर्य भी उसके विकास का सोपान बनाया जा सकता है, बशर्ते उसको उद्दीपक रखा जा सके, तर्पक नहीं। पर यह मार्ग कठिन है। जैसे फलाशा से रहित होकर कर्म करना कठिन हैं, वैसे ही माया को छोड़कर मायी का चिन्तन कठिन है। उपाधि के बिना उपहित का कथन जितना सरल है, अनुभूति उतनी ही क्लिष्ट है। सामान्यतः उपाधिगत सौन्दर्य चित्त को विक्षिप्त ही करता है एवं आध्यात्मिक साधना की प्रतिरोधता का कारण ही बनता है। आचार्य स्पष्ट करते हैं कि जो वासुदेव की तरह पीपल व अपने शरीर में समान रूप से चैतन्य सत्ता की उपस्थिति को अनुभव करता है वही उसे वस्तुतः जानता है। जबतक ध्याता व ध्येय का भेद रहेगा, ध्येयानुसार ही प्राप्ति होगी। यही प्रेम का रूप है। ज्ञान में यह सापेक्षता नहीं है। 'यन्मनास्तन्मयोऽन्यत्वे नात्मत्वाप्तौ क्रियाऽत्मनि' (उ० सा० नाट्य० १४)। मुमुक्षा की तीव्रता में ज्ञानयोग की सफलता छिपी है। यहाँ ज्ञान व प्राप्ति में (Knowing and Being) भेद नहीं है। सत्य, जो वेदान्त शास्त्र में ईश्वर का पर्याय है, वस्तुतः सारे विश्व की समन्वय भूमि है। ऐसा न हो तो वह 'एकमेवाद्वितीयं' हो ही नहीं सकता। इसका अज्ञान ही तो जगत् का जनक है। यह न किसी के किसी कर्म की अपेक्षा रखता है, न किसी के किसी भावना की अपेक्षा रखता है। कर्म की अपेक्षा वहीं संभव है, जहाँ विकृति संभव हो। अविकारी में कर्म की गति नहीं। जो सर्वरूप न हो, वहाँ किसी भावना से अतिशय का आधान न हो सकेगा। अध्यास अधिष्ठान में परिवर्तन नहीं लाता, यह सर्ववादिसम्मत है। अतः कर्म व भावना से निरपेक्ष ही सत्य का साक्षात्कार है। 'वस्तवधीना भवेद्विद्या' (उ० सा० उपो० १३)। वस्तुतस्तु ज्ञान उत्पन्न होते ही भावना व कर्म के साधनों को ही समाप्त कर देता है जैसे मृगतृष्णा की अधिष्ठान बालू का ज्ञान मृगतृष्णा को ही समाप्त कर देता है। 'कारकाण्युप- मृद्नाति विद्या बुद्धि इव ऊषरे' । (उ० सा० उपो० १४) ब्रह्म ही ब्रह्मज्ञान का निरूपक है, ज्ञाता नहीं, यह पारमार्थिक सत्य है। ज्ञाता को दैवी संपत्तियुक्त व ज्ञानसाधनों से सम्पन्न होना चाहिये। बस, यही अपेक्षित है। जैसे आँख का ठीक होना विष्णुमित्र के दर्शन में अपेक्षित है, पर विष्णुमित्र के ज्ञान का निरूपक तो विष्णुमित्रदेह ही है, वैसे ही यहाँ समझना चाहिये। प्रश्न हो सकता है कि ज्ञान भी तो अन्तःकरण की वृत्ति ही है। यह भी तो मानसक्रियारूप है। परन्तु ऐसा इसीलिये लगता है कि क्रिया के रूप को नहीं समझा जा रहा है। जहाँ उत्पत्ति, प्राप्ति, विकार या संस्कार रूपी फल हो, वहीं क्रिया मानी जा सकती है। 'उत्पाद्याप्यविकार्याणि संस्कार्यं च क्रियाफलम् नातोऽन्यत्कर्मणा कार्य' (उ० सा० सम्व० ५०)। ज्ञान ऐसा कोई फल उत्पन्न नहीं करता। यद्यपि घड़ा इत्यादि जानने में घड़ा ज्ञात हो गया ऐसी उत्पत्ति प्रतीत भी हो जाती है, पर ब्रह्म ज्ञात हो गया, ऐसी प्रतीति भी नहीं होती। 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसी ही प्रतीति होती है। अतः ज्ञान ही सीधा अज्ञाननाशक होने से मोक्ष का एकमात्र साक्षात् कारण हो सकता है। अन्य साधन तो ज्ञानोत्पत्ति के साधनों को उपलब्ध कराकर गतार्थ हो जाते हैं। अध्यास की निवृत्ति लोक में भी जप, ध्यान, पूजा, यज्ञ, देवताराधन आदि किसी साधन से न होकर अधिष्ठान के ज्ञान से ही होती है। अध्यास ही सभी बन्धनों की प्रतीति का स्वरूप है। जो लोग कहते हैं कि ज्ञानमार्ग कठिन है, वे वस्तुतः ज्ञान को उपाय मानते ही नहीं। ज्ञान अज्ञान को हटाने के अतिरिक्त कुछ भी करने में असमर्थ है। अतः बन्धन अज्ञानप्रसूत होगा तो ही ज्ञानमार्ग मोक्ष के लिये संभव होगा। यदि कर्म से मोक्ष संभव हो भी जाय तो वह बन्धन अज्ञानप्रसूत नहीं रह जायगा। अतः वैकल्पिक मार्ग तो असंभव है। कर्म व भक्ति या उपासना तो क्रियारूप होने से विकल्प बन सकते हैं, पर ज्ञान क्रियारूप होने से विकल्प नहीं हो सकता। बन्धन को अज्ञानप्रसूत न मानने से मोक्ष आदि में जन्यता एवं तज्जन्य अनित्यता आदि को ब्रह्मा भी नहीं मिटा सकेंगे। अतः ज्ञानमार्ग एकमात्र मोक्षोपाय होने से कठिनता का प्रश्न ही नहीं उठता। भोजन बनाना जितना भी कठिन हो, भूखनिवृत्ति का एकमात्र उपाय होने से, भूखे व्यक्ति को मार्गान्तर से लक्ष्य प्राप्ति न होने से, कठिन वा सरल नहीं कहा जा सकता। कठिन और सरल सापेक्षिक शब्द हैं, अतः दो या अधिक संभव होने पर ही प्रयुक्त हो सकते हैं। सावधानी के लिये शास्त्रों में कहीं कठिनता का वर्णन किया है। उससे केवल सावधान रहने का ही निर्देश सच्छास्त्रों का इष्ट है। 'ज्ञेयस्यातिसूक्ष्मत्वाज्ज्ञानमार्गस्य दुःसंपाद्यत्वं वदन्ति' (क० भा० )
( xv ) इस सावधानी के लिए ही गुरु की अत्यन्त आवश्यकता होती है। गुरु वही हो सकता है जो ब्रह्मसाक्षात्कारवान् हो एवं शिक्षा देने में समर्थ हो। उसमें शिष्य के हृदय में शूलवत् चुभने वालो शंकाओं को समझने की व उनका हृदय- ग्राही युक्तियों से निराकरण करने की सामर्थ्य आवश्यक है। जिस गुरु से अपनी शंका निवृत्त न हो वह अपना गुरु नहीं हो सकता। दुःखी के दुःखकी निवृत्ति करने की इच्छा व प्रवृत्ति गुरु में उपस्थित होनी चाहिये । जिसने स्वयं परम्परा से ज्ञान प्राप्त नहीं किया है उसका दूसरे को उपदेश करने का अधिकार नहीं है क्योंकि उसका ज्ञान कभी प्रामाणिक नहीं हो सकेगा। ‘आचार्यश्वोहापोहग्रहण .........दयानुग्रहादिसम्पन्नो लब्धागमो .......ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः’ (उ० सा० शिष्या० ६)। शुकदेव ने साक्षात् वेदव्यास के पुत्र होने से उनसे आगम प्राप्त किया व गौडपाद ने घोर तपस्या व उपासना करके साक्षात् शुक से बद्रिकाश्रम में यह ज्ञान प्राप्त किया। गौडपाद के ही प्रशिष्य शंकर होने से उनकी लब्धागमता निःशंक है। शंकर से आज तक परमहंसों में यह परम्परा अविच्छिन्न चल ही रही है। अतः परमहंस ही अद्वैत वेदान्त के उपदेष्टा रहे हैं व आज भी हैं। स्वयं जो मार्ग पर चल चुका है व लक्ष्य का साक्षात्कार कर चुका है, वही दूसरे को भी ठीक मार्गदर्शन करा सकता है व लक्ष्य पर पहुँचा या नहीं इसे निश्चित बता सकता है। यह लोकसिद्ध भी है। आचार्य शंकर स्वयं इस सम्प्रदाय के प्रति अति विनम्र थे एवं अपने गुरु के प्रति उनकी श्रद्धा अपार थी। ‘यद्वाक्सूर्यां- शुसन्तापप्रणष्टध्वान्तकल्मषः । प्रणम्य तान् गुरून् वक्ष्ये ब्रह्मविद्याविनिश्चयम् (उ० सा० सम्य० ३)। जिनकी वाणी रूप सूर्यकिरणों से अज्ञानान्धकार व उससे जनित शोकमोहादि समूल नष्ट हो गये, उनके सामने विनत रहते हुए ही मैं ब्रह्मज्ञान के परमार्थस्वरूप को निःसन्दिग्ध रूप से प्रतिपादित करूँगा—कहकर वे इसे स्पष्ट करते हैं। अद्वैत दर्शन में ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मरूप ही है अतः वस्तुतः गुरुरूप से साक्षात् परब्रह्म ही जीव की मुक्ति करता है। ज्ञानमार्ग में ईश्वर व गुरु अभिन्न हैं व गुरु की सेवा ही ईश्वरसेवा है तथा गुरु में प्रेम ही ईश्वरप्रेम है। यही निवृत्ति मार्ग का हृदय है। गुरु में श्रद्धा व उसकी आज्ञा का बिना किसी विचार के पालन ही विधिनिषेधों का स्थान ले लेता है। फलोत्पादक कर्मों का सर्वथा त्याग करना आवश्यक है। गुरु का अनुग्रह ही ईश्वरानुग्रह है। आत्मा का अज्ञाननाश ही उपेय है। इसके सिवाय किसी भी अन्य उद्देश्यार्थ उपाय का अवलम्बन ही नहीं, उपाय की संभावना वाले साधनों का त्याग भी आवश्यक है। ‘तच्चैतत्परमार्थदर्शनम्प्रतिपत्तिमिच्छता ............सर्वकर्मणां तत्साधनानाञ्च यज्ञोपवीतादीनां त्यागः कर्त्तव्यः’ (उ० सा० शिष्या० ४४)। यद्यपि ज्ञान तो सभी को हो सकता है परन्तु ब्रह्मनिष्ठा या साक्षात्कार तो सर्वथा सर्वदा सर्वतः लगने पर ही संभव है। एल्डस हक्सली कहते हैं कि ईश्वर को ढूँढ कर पाना सब समय लगकर थकानेवाला काम है*। कई बार प्रश्न उठता है कि ऐसा निवृत्तिमार्गी क्या जीवन को नकार नहीं रहा है ? वस्तुतः जीवन का अर्थ सभी के लिए एक ही नहीं है। जिसको जो सर्वाधिक अर्ह प्रतीत होती है उसके लिए अन्य सभी को छोड़ पूर्णरूपेण उसमें लग जाना ही तो जीवन को सकारना है। अतः सहजता व आनन्दपूर्वक ब्रह्मान्वेषण में लगना ही ब्रह्मान्वेषी का जीवन सकारना है। इससे भिन्न किसी कार्य में रत होना ही उसके लिए जीवन नकारना है। हम प्रायः अपने जीवन में द्वन्द्वों से इसीलिए परेशान रहते हैं कि हममें अपनी इष्ट देवता की प्राप्ति में सभी कुछ झोंकने का साहस नहीं हो पाता। हम कई इष्ट देवताओं को स्वीकार लेते हैं। यह बहुदेवतावाद ही हमारे लक्ष्यप्राप्ति में सर्वाधिक बाधक है। बिना एकदेवतावादी हुए कभी भी सफलता या सन्तोष और शान्ति सम्भव नहीं है। ‘कर्मनाशभयाज्जन्तोरात्मज्ञानाग्रहस्तथा ( उ० सा० बुद्धय० १)। अतः यह झूठा आरोप है कि वेदान्त जीवन को नकारता है। वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति अपनी मान्यतानुसार जो नहीं चलता, उसे जीवन को नकारनेवाला मानता है। चार्वाक ऋण से भी घी पीने को कहता है तो उसे देशभक्त कर्त्तव्यच्युत मानता है, और देशभक्त को चार्वाक मूर्खता से जीवन को नकारनेवाला बताता है, अतः ब्रह्म को साक्षात् जानने में प्रवृत्त अन्य सभी को मानव जीवन के सर्वोत्तम लक्ष्य का परित्याग करके जीवन को नकारनेवाला ही मानता है। योगवासिष्ठ को पढ़ने से ऐसे लोगों का अपनी मूर्खता से अपना व समाज का नाश करना स्पष्ट हो जाता है। करुणामूर्त्ति होने से आचार्य शंकर ऐसी कठोर भाषा का प्रयोग नहीं करते पर अपने प्रसन्न-गम्भीर शब्दों से साधक को सावधान तो करते ही हैं। इस
- ‘The seeking of God is a tiresome, wholetime job !’—Aldous Huxley in Perennial Philosophy.
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जीवन को सकारने की प्रक्रिया में गुरु का विशेष स्थान है क्योंकि इह वा पारलौकिक फलेच्छा के त्याग से लौकिक व शास्त्रीय विधि-निषेध उसे प्रवृत्त नहीं कर सकते। दृष्ट फल के लिए गुरु ही उसे श्रवणादि सब साधनों को बताकर प्रवृत्त करेगा व प्रत्येक शिष्य के संस्कारानुसार उसके विशेष मार्ग का प्रतिपादन कर सकेगा। शिष्यों के अनन्त संस्कारों के भेद होने से यहाँ नियतता ( Codification ) सम्भव ही नहीं है। अतः गुरुशरण के बिना निवृत्तिमार्ग पेंदी से रहित लोटा हो जायगा। 'यो हि यस्माद् विरक्तः स्यात् नासौ तस्मै प्रवर्तते । लोकत्रयाद्विरक्तत्वान्मुमुक्षुः किमितीहते ( उ० सा० तत्त्वमसि० २३०)। 'स गुरुस्तारयेद्युक्तं शिष्यं शिष्यगुणान्वितम् ब्रह्मविद्याप्लवेनाशु स्वान्तध्वान्त- महोदधिम्' ( उ० सा० सम्यङ्मति० ५३ ) । ब्रह्मज्ञान का वास्तविक फल तो सद्योमुक्ति ही है। 'सद्योमुक्तिकारणमात्मज्ञानम् ( ब्र० सू० भा० १-१-६)। इस अनुभव का स्पष्ट रूप से प्रतिपादन कटे हाथ का दृष्टान्त है। काट कर फेंक दिये हाथ के साथ अपने को हाथवाला जैसे नहीं मानते वैसे ही विवेक की तलवार से सभी अनात्म विशेषणों को त्याग देने पर निर्विशेष ज्ञानी रह जाता है। 'छित्त्वा त्यक्तेन हस्तेन स्वयं नात्मा विशेष्यते…………अनात्मत्वेन तस्माज्ज्ञो मुक्तः सर्वविशेषणैः ( उ० सा० विशेषापोह० १, २)। पर यह ज्ञान आत्मा का है, बुद्धि का नहीं। बुद्धि में ही विद्या व अविद्या हैं, यह साङ्ख्य की मान्यता है। पर अद्वैत ज्ञानी के स्वानुभव में बुद्धि भी स्वरूप से आत्मा से अभिन्न ही है। इसे बड़े सुन्दर रूप से आचार्य ने बुद्धि व आत्मा के संवाद के द्वारा निरूपित किया है। बुद्धि कहती है कि आपके किसी सम्बन्धी का ही शायद मेरे से उपकार हो जाय, तो आत्मा कहती है कि मैं एकाकी हूँ, अतः मेरा न कोई अंश, गुण या सम्बन्धी है और न मैं किसी का अङ्ग या सम्बन्धी हूँ और असङ्ग होने से मुझे तेरा कोई प्रयोजन नहीं। अतः अब तुम निवृत्त ही हो जाओ। पर तुम्हें भी घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि तुम स्वयं भी तो मेरे अज्ञान से ही कल्पित होने से मुझ में अध्यस्त हो। अतएव मैं ही तुम्हारी वास्तविकता या अधिष्ठाता हूँ। 'अहं ममैको न मदन्यदिष्यते तथा न कस्यापि अहमस्म्यसङ्गतः । असङ्गरूपोऽहमतो न मे त्वया कृतेन कार्यं तव चाद्यवत्त्वतः' ( उ० सा० मतिविलापन० ४)। अतः भौतिक रूप से देह को छोड़ना आवश्यक नहीं है। उसकी प्रातिभासिकता से मुक्ति में विघ्न नहीं होता। इसकी दृढ़ता के लिये ही परिसंख्यानप्रकरण है। इसमें 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' न्याय से अपने शत्रु-मित्र या उदासीन का भाव नष्ट हो जाता है। शत्रु आदि इस संघात पर ही क्रिया या चिन्तन करते हैं और संघातारूप न होने से मैं उनकी शत्रुता का विषय नहीं। परम कारण तो अनात्मा की तुच्छता ही है। यह अद्वैत का विश्व को परम शान्ति का सन्देश है। इसको यदि बुद्धि में संस्कार रूप से किञ्चित् भी स्थान मिल जाय तो युद्ध, हिंसा, संघर्ष, प्रतियोगिता आदि को स्थान ही न रह जाय। स्थितप्रज्ञ, गुणातीत, भगवद्भक्त, तुरीयातीत, अतिवर्णाश्रमी आदि शब्दों से ऐसे ज्ञानी के शरीर का व्यवहार निरूपित किया गया है। इसका उद्देश्य ज्ञानी के लिये विधि करना नहीं है परन्तु साधकों को जीवन-प्रणाली बतलाना है। वेदान्त धर्म का यही प्राण है क्योंकि यह ऐसी वास्तविकता है, जो जीवन्मुक्त के बाह्याचरणों से उपलक्षित होती है और यज्ञादि अन्य धर्मों के पारलौकिक फल का स्थान ले लेती है। पर स्वर्गादि फल कभी अपरोक्ष नहीं होते, लेकिन ज्ञान की यह अवस्था ज्ञानियों में अपरोक्ष रूप से प्रकट है। वह मानो खिड़की है, जिससे ईश्वर का प्रत्यक्ष होता है। अप्पर का स्पष्ट कथन है कि शिवभक्त व शिव में कोई भेद नहीं है। ईसा के विषय में भी यही कहा जाता है कि वहाँ आदमियत व देवभाव युगपत् मौजूद है। परन्तु ईसाई धर्म की मान्यता है कि केवल ईसा में ही यह सम्भव है, जब कि वेदान्त मानता है कि प्रत्येक मानव में यह सम्भव है। हिन्दू धर्म का इतिहास इस बात में प्रमाण है कि यह युगलभाव सभी कालों में किसी-किसी में व्यक्त होता ही रहता है। जैसे वर्तमान ईसाई मान्यताओं से ईसा का परीक्षण नहीं हो सकता वैसे ही उन ज्ञानियों के सम्प्रदायविशेषों से उनका परीक्षण नहीं हो सकता। परन्तु उसकी आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि हमें तो अपने युग के प्रत्यक्ष ज्ञानियों से ही मतलब होना चाहिये। विट्- जेन्सटाइन ( Wittgenstein ) अपने दर्शनान्वेषण ( Philosophical Investigation ) नामक ग्रन्थ में कहते हैं कि भाषा एक ऐसा चित्र है जो हमको मोह में डालकर रखता है। इसे ही वेदान्त माया कहता है। नामरूपात्मक सृष्टि में नाम की प्रधानता को मानना ही पड़ता है। वेदान्त का एक पक्ष तो शब्दस्फोट या नाद को ही रूप का कारण स्वीकारता है। पर जब तक मोह रहता है तब तक हम मोहक की अवास्तविकता को नहीं जान सकते। उसे किसी भी नाम से कहा
( xvii ) जाय, वह वास्तविक ज्ञान का विषय नहीं हो सकता। अतः उसे अज्ञान या माया या अविद्या नाम से कह दिया जाता है। वस्तुतः हम अपने को मोह में पड़ने देते हैं अतः हम ही मोहक हैं पर लगता है कि कोई और हमें भेद में डाल रहा है। इस मोह को भंग करना ही जीवन का लक्ष्य है। विट्जेन्स्टाइन कहता है कि दर्शन हमारे बुद्धि के मोह को भंग करने का युद्ध मात्र है ( a battle against the bewitchment of our intelligence ) । जिनका यह मोह भंग हो गया है, वे ही अद्वैत सिद्धान्त के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि आत्मज्ञानी शोक-मोह से परे हो जाता है। ‘श्रुतिस्तत्त्वमसीत्याह श्रौतुर्मोहापनुत्तये ( उ० सा० तत्त्वमसि० ९९ ) । अद्वैत उस आत्मज्ञान को प्राप्त करना ही मानव-जीवन का लक्ष्य मानता है। कई आचार्य तो समग्र सृष्टि-प्रक्रिया को भी इसी उद्देश्य के लिये ही स्वीकारते हैं। शिव और जीव को अलग करने वाला सकारण प्रपञ्च ही है। प्रपञ्च की सकारण उपशान्ति ( प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतम् ) ही जीव के काल्पनिक भेद को निवृत्त कर उसे शिवस्थिति का बोध करा देती है और यह श्रवण के द्वारा ही सम्भव है। इस प्रकार उपदेशसाहस्री किसी भी मोक्षमार्ग के पथिक के लिए दृढ़ सम्बल है। इस एक ही ग्रन्थ को भली प्रकार विचारपूर्वक समझ कर तदनुकूल साधना करने से साधक निश्चित् ही अपने लक्ष्य पर पहुँच जायगा। वर्त्तमानकाल में संस्कृत का पठन-पाठन विरल होता जा रहा है। यद्यपि यह सत्य है कि संस्कृत में दार्शनिक विषय को स्पष्ट करने की जो सामर्थ्य है, वह अभी हिन्दी में नहीं आ पायी है। परन्तु इतने मात्र से असंस्कृतज्ञ को वेदान्त के प्रवेश से वंचित रखना उपयुक्त न समझ कर गत दो सौ वर्षों से हिन्दी में उत्कृष्ट वेदान्त ग्रन्थों की रचना की परम्परा प्रारम्भ करने में संन्यासी अग्रगामी बने । 'महेश अनुसन्धान' इसी कड़ी में आगे बढ़ रहा है। हम उसके संचालक व प्रबन्धकों को आशीर्वाद देते हैं कि वे स्वयं भी पूर्ण निष्ठा प्राप्त कर सकें व इस प्रकार के ग्रन्थों को अनूदित करके जनसामान्य को इस भीषण काल में वेदान्त की ओर प्रवृत्त कर उन्हें शान्ति देने में समर्थ हो सकें। जनता से भी अनुरोध है कि जीवन में प्रतिदिन न्यूनतम २४ मिनट ( १ घड़ी ) अर्थात् १/६० या षष्ट्यंश वेदान्त-ग्रंथों के स्वाध्याय में लगावें। सर्वज्ञ शङ्कर की भाषा व युक्ति इतनी सरल व जीवन में व्यावहारिक है कि कल्याण हुए बिना रह ही नहीं सकता। उमामहेश्वर से प्रार्थना है कि यह ग्रन्थ भारत के अशान्त वातावरण में सभी को शान्ति पहुँचा कर सफल हो। शङ्कर मठ भगवत्पादीयो अर्बुदाचल महेशानन्दगिरिः
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प्राक्कथन संसार में प्राणिमात्र को सुख और दुःख की अनुभूति हुआ करती है। शीतोष्णादि द्वंद्व व्यक्ति की सहनशक्ति अथवा केवल भावना के अनुरूप अनुकूल या प्रतिकूल संवेदन का रूप धारण करते हैं। अनुकूल संवेदन को सुख कहते हैं और प्रतिकूल संवेदन ही दुःख कहलाता है। लोक और वेद—दोनों में संसारियों के सुख-दुःख का यही स्वरूप प्रसिद्ध है। प्रत्येक विषय अन्तःकरण में अनुकूल या प्रतिकूल संवेदन प्रसारित करता है। इन संवेदनों का केवल प्रकाशक और साक्षी होता हुआ भी अविद्यावशात् आत्मा स्वयं को सुखी या दुःखी मान लेता है। मन्त्र, औषधि अथवा सुषुप्ति के संबंध से प्रसुप्त हुआ पुरुष विषय-संस्पर्श का एवं उनसे होनेवाले सुख-दुःखादि का अनुभव नहीं करता क्योंकि सुखदुःखादि वृत्तियों को उत्पन्न करनेवाली मनोवृत्ति और उन्हें आत्मसात् कर स्वयं को सुखी या दुःखी बनानेवाली अहंवृत्ति उस अवस्था में निष्किय हो जाती है। परन्तु अविद्यावृत्ति से युक्त हुए प्राज्ञ का उस समय भी अभाव नहीं रहता। अतः सुषुप्ति में भी अहंवृत्तिनिरपेक्ष शान्तवृत्तिरूप आनन्दानुभूति सबको मान्य ही है। आनन्द ही आत्मा का स्वरूप है। समस्त चेष्टाओं की निवृत्ति ही उसके प्रकाशित होने का स्थान है। सुखरूप अनुकूल संवेदन में प्राप्त इस आनन्द के आभासमात्र के सम्पादन की प्रवृत्ति सभी पुरुषों में दिखायी देती है। परन्तु यह सुख की अनुभूति विषयसापेक्ष ही होती है। किसी भी सांसारिक वस्तु का संयोग आत्मा के लिये वस्तुतः सुखप्रद हो नहीं सकता क्योंकि आत्मा का स्वरूपभूत आनन्द इतरनिरपेक्ष होता है। अतः यह आनन्द ही जिज्ञास्य है। ईश्वर अथवा ब्रह्म को ही सुखस्वरूप जानकर और स्वयं को उससे पृथक् समझकर उसके संयोग हेतु किया गया प्रयास ही आत्मशुद्धि में हेतु बनता है। आत्मा अपरिच्छिन्न, नित्य और अद्वय है। श्रुतियों ने भी इसी तथ्य का समर्थन किया है। ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व को जानना ही अध्यात्मज्ञान है। इस अद्वितीय आत्मा में कार्य-कारण, द्रष्टा-दृश्य, अधिष्ठान-अध्यस्त, व्याप्य- व्यापक आदि भेद कल्पित ही हैं। असत्, अचित् और असुख का बाध करने के अभिप्राय से ही इस आत्मतत्त्व की 'सच्चिदानन्द' संज्ञा प्रसिद्ध है। आत्मा में जन्म-मरण, काम-क्रोध, संयोग-वियोग आदि का सर्वथैव अभाव है। इस प्रकार सुदृढ़ बोध होने पर आत्मज्ञ पुरुष को किसी से किसी प्रकार का भय और कामक्रोधादि से क्षति नहीं हुआ करती। आत्मतत्त्वज्ञान की इस प्रक्रिया को विषद रूप से स्पष्ट कर अविद्याग्रस्त मनुष्यों का मार्गदर्शन करने हेतु भगवत्पूज्यपाद श्रीमच्छङ्कराचार्य ने इस उपदेशसाहस्त्री की रचना कर मानवमात्र को अनुगृहीत किया है। जब तक मनुष्य अपने को ही विस्मृत किये रहता है, तब तक वह इस जन्म-मरणरूप संघर्षात्मक संसार में फँसा रहता है। परमकारुणिक शंकरावतार आचार्यचरणों ने मानव की इस दुर्दशा को देखकर उनके उद्धारार्थ मानो यह संजीवनी औषधि प्रदान की है, जिससे भाग्यशाली लोगों ने लाभ उठाया और भवरोग से मुक्त भी हुए हैं। आज समय बहुत परिवर्तित हो रहा है। लोग शास्त्रों से तो दूर होते ही जा रहे हैं, यहाँ तक कि संस्कृत भाषा से भी परिचित नहीं रहे हैं। तथापि अपने उद्धार की इच्छा उन्हें भी रहती है और उनको भी तो शास्त्रसम्मत विद्या से वंचित नहीं रखना है। इस दृष्टि से आचार्यचरण के इस अद्भुत ग्रन्थ का हिन्दी रूपान्तर विस्तृत व्याख्या के साथ प्रकाशित करने का 'महेश अनुसंधान संस्थान' का प्रयास स्तुत्य है। प्राचीन विद्या के प्रचार-प्रसार एवं इस
( viii ) प्रकाशन के प्रेरक अनन्तश्रीसमलंकृत दक्षिणामूर्तिपीठाधिप श्रीमत्स्वामी महेशानन्द गिरि जी महाराज एक सत्पुरुष होने के नाते स्वयं ही धन्य हैं। उनकी दिनचर्या एवं व्यक्तित्व को देखकर यह अनुभव हो जाता है कि उन्होंने अपने जीवन को आचार्यचरणों के उपदेशानुसार कृतार्थ कर लिया है। अतः उनके विषय में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान ही होगा, इसलिये सूर्य को अर्घ्य प्रदान करने के समान हम उनके चरणों में अपना प्रणामार्घ्य प्रदान करते हैं। इस ग्रंथ के मुद्रण के समय इसे शीघ्रातिशीघ्र ग्रंथ का आकार प्रदान करने के लिये पुनः पुनः प्रूफ-संशोधन, अर्थानुसन्धानपूर्वक शुद्धाशुद्धि का निर्णय आदि परिश्रम का कार्य श्री स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी ने बड़े ही मनोयोग के साथ किया है। ऐसे यति को धन्यवाद ज्ञापन कैसे करें, वे तो प्रणाम और अभिनन्दन के ही पात्र हैं। तारा प्रिंटिंग वर्क्स के श्री पण्ड्या पिता-पुत्र के सहयोग से ही ग्रंथ का मुद्रणकार्य समयानुसार हो सका, अतः वे धन्यवाद के पात्र हैं। भाषानुवाद एवं विस्तृत व्याख्या के साथ इस ग्रंथ का अध्ययन कर अधिकाधिक लोग लाभान्वित होते रहें, तभी सभी का परिश्रम सार्थक होगा। श्रीमच्छङ्करभगवत्पादैर्मथितः सरित्पतिर्वेदः । तत उद्गता च सहसा साहस्त्री समुपदेशानाम् ॥ सततं चिन्तनमस्याः संसृतिबन्धाद्विमोचकं नूनम् । भवदुःखपीडितानां सत्यं सत्यं विजानीयात् ॥ भवदीय गजाननशास्त्री मुसलगांवकर
पद्यभाग १: उपोद्घातप्रकरणम्
श्रीशङ्करभगवत्-पादाचार्यविरचिता उपदेशसाहस्री उपोद्घातप्रकरणम् चैतन्यं सर्वगं सर्वं सर्वभूतगुहाशयम् । यत्सर्वविषयातीतं तस्मै सर्वविदे नमः ॥ १ ॥ चैतन्यमिति—जो चैतन्य आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त और नित्य है¹, तथा जो समस्त प्रपञ्च का उपादान- कारण होने से सर्वस्वरूप है² और स्थावर जङ्गमादि सकल प्राणियों की बुद्धि में अन्तःसाक्षी होता हुआ निर्विकाररूप में स्थित रहता है³, एवं अविद्या और उसके कार्यों से परे है⁴, तथा त्रैकालिक जगत् को सूर्य के समान अपनी सत्तामात्र से प्रकाशित करता है, उस चित्स्वरूप⁵ (ज्ञानस्वरूप) चैतन्य (ब्रह्म) के लिये (मेरा) प्रणाम है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्'⁶—'जो सर्वज्ञ है और सर्ववित् है'—इस श्रुति, तथा 'सर्वं वेत्तीति सर्ववित्'—जो सब जानता है उसे 'सर्ववित्' कहा जाता है—इस व्युत्पत्ति के बलपर वह सर्वप्रसिद्ध सर्ववित् ब्रह्म है । उसके लिये वाणी, मन तथा शरीर से हम प्रणाम करते हैं । ग्रन्थ के प्रारम्भ में मङ्गलाचरण करना भारतीय शिष्टों की परम्परा है । मंगलाचरण करने से ग्रन्थ की निर्विघ्न परिसमाप्ति होती है, तथा उसके प्रचार-प्रसारात्मक दृष्टफल की प्राप्ति के साथ ही अदृष्टफल (पुण्य) की भी प्राप्ति होती है । अतः अपनी भारतीय-परम्परा के अनुसार प्रस्तुत ग्रन्थ के रचयिता भगवत् पूज्यपाद् शंकर स्वामिचरण भी प्रस्तुत ग्रन्थ के आरम्भ में प्रथम पद्य (श्लोक) के द्वारा अपने विशिष्ट इष्टदेवता (ब्रह्म) का स्मरण करते हुए नमस्कार (अभिवादन) के रूप में मंगल कर रहे हैं । 'एका क्रिया द्व्यर्थकरी प्रसिद्धा' इस अभियुक्तोक्ति के अनुसार जिज्ञासुजनों को, प्रस्तुत ग्रन्थ की ओर प्रवृत्त कराने के लिये, इसी मंगलाचरण रूप पद्य के द्वारा अनुबन्धचतुष्टय की भी सूचना दे रहे हैं । भगवत्पूज्यपाद आचार्य शंकरस्वामिचरण के द्वारा विरचित—ब्रह्मसूत्रभाष्य के जो अनुबन्धचतुष्टय हैं, वे ही इस ग्रन्थ के भी हैं, क्योंकि उसी का यह 'प्रकरणग्रन्थ' है । ब्रह्म में केवल तटस्थकारणता की शंका करनेवाले वैशेषिकों, नैयायिकों, पाशुपतों आदि को उत्तर देने के लिए उपर्युक्त पद्य में "चैतन्यम्" कहा गया है । चेतन ही चैतन्य है । 'चैतन्य' चेतन से भिन्न नहीं है । वह कूटस्थ ज्ञप्तिरूप है । १. 'नित्यं विभुं सर्वगतम्'—[मुं० उ० १-१-६] । २. 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'—[छां० उ० ३-१४-१], तथा 'इदं सर्वं यदयमात्मा'—[बृ० उ० २-४-६, ४-५-७], तथा 'आत्मैवेदं सर्वम्'—[छां० उ० ७-२५-२] । ३. 'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्'—[तै० उ० २-१], तथा 'हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तं हृदयम्'—[छां० उ० ८-३-३] । ४. 'नेति नेति'—[बृ० उ० २-३-६], तथा 'नेह नानास्ति किञ्चन'—[बृ० उ० ४-४-१९], तथा 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह'—[तै० उ० २-४] । ५. 'विज्ञानमानन्दम्ब्रह्म'—[बृ० उ० ३-९-२८], तथा 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्ब्रह्म'—[तै० उ० २-१] । ६. [मुं०—१-९] ।
२ उपदेशसाहस्री अतः ब्रह्म में केवल तटस्थ्य कारणता (तटस्थता) की शंका करना उचित नहीं है। एवञ्च 'ब्रह्म' चेतन (चैतन्य) रूप है। किन्तु उस चेतनरूप ब्रह्म के परिमाण के सम्बन्ध में दिगम्बर जैन तथा स्वयूथ्य अर्थात् कतिपय वेदान्ती व्याख्यातागण और आधुनिक मध्व, रामानुज आदि लोग उसका मध्यमपरिमाण, अणुपरिमाण बताते हैं। उन सबके लिये उत्तर रूप में पद्य में—"सर्वगम्" पद है। अर्थात् ब्रह्म (चैतन्य) सर्व व्यापक है। अतः वह केवल तटस्थ नहीं, कार्यरूप में परिणत होने से उपादान कारण भी है। परिणाम विवर्तरूप है यह बात दूसरी है। अतः ब्रह्म की अभिन्न निमित्तोपादान कारणता बताई गई। सांख्यदर्शनकार का कथन है कि चेतन, सर्वगत (सर्वव्यापक) रहने पर भी अनेक है, एक नहीं है। उन्हें उत्तर देने के लिये पद्य में 'सर्वम्' कहा है, अर्थात् ब्रह्म (चैतन्य) सर्वात्मक होने से एक है, अनेक नहीं है। कतिपय एकदेशीय वेदान्ती कहते हैं कि ब्रह्म सर्वात्मक रहने पर भी उसका और जीवात्मा का जल और तरंग या अग्नि और स्फुलिङ्ग की तरह अंशांशिभाव से अभेद है अर्थात् 'ब्रह्म' अंशी है और 'जीवात्मा' अंश है। उन्हें उत्तर देने के लिये पद्य में 'सर्वभूतगुहाशयम्' कहा है, अर्थात् समस्त प्राणियों की बुद्धियों (गुहाओं) में वह (ब्रह्म) साक्षी के रूप में स्थित रहता है। अतः उसमें न्यूनता की प्रतीति करानेवाला अंशांशिभाव जो प्रतीत होता है, वह वास्तविक नहीं है। शंका—'ब्रह्म' यदि सर्वभूतगुहाशय और सर्वात्मक है, तो क्या उसे 'मनोवेद्य' और सप्रपञ्च समझा जाय ? समा०—सर्वभूतों में स्थित तथा सर्वरूप होने पर भी ब्रह्म, अविद्या तथा उसके कार्यरूप समस्त विषयों से परे व्यवस्थित है। अतः उसे मनोवेद्य कैसे कह सकते हैं, क्योंकि वह विषयों से परे होने के कारण स्वयं अर्थात् निर्विशेष रूप से अविषय है। एवं कार्य-कारण भाव से यह स्पष्ट न होने से उसे सप्रपञ्च भी कैसे कहा जायगा ? अर्थात् वह ब्रह्म मनोवेद्य एवं सप्रपञ्च भी नहीं है। प्रस्तुत पद्य में 'चैतन्यं', 'सर्वगं' और 'सर्वम्' ये तीनों विशेषण 'तत् त्वमसि' इस महावाक्य के 'तत्' और 'त्वम्' दोनों पदार्थों के लिये साधारण (तुल्य) हैं। 'सर्वभूतगुहाशयम्' विशेषण के द्वारा 'त्वम्' पद का लक्ष्यार्थ, जो बुद्धि आदि का साक्षी है, उसे बताया गया है। तथा 'सर्ववित्' विशेषण से सगुण, परमेश्वर को बताया गया है, जो 'तत्' पद का वाच्यार्थ है, लक्ष्यार्थ नहीं। 'सर्वविषयातीतम्' विशेषण से 'तत्' पद का लक्ष्यार्थ निर्गुण ब्रह्म बताया गया है। यहाँ पर (यत्) सर्व- भूतगुहाशयं, विषयातीतम्' इस प्रकार 'यत्'—'तत्' पदों का सामानाधिकरण्य अर्थात् दोनों के द्वारा निर्दिष्टों की एकता (एकाधिकरणवृत्तित्व) होने से 'तत्' और 'त्वम्' पदों के द्वारा लक्षित अर्थों की 'एकता' सूचित की गई है, अर्थात् सभी विशेषणों का एक ही पदार्थ में तात्पर्य है। अतः प्रतिपाद्य जो 'तत्त्वम्पदार्थैक्य' है, वही इस ग्रन्थ का 'विषय' है। उस विषय के साथ प्रस्तुत प्रकरण ग्रन्थ का 'विषय-विषयिभाव-सम्बन्ध' ध्वनित होता है अर्थात् ग्रंथ जीव व ईश्वर की एकता बताता है। यह द्वितीय अनुबन्ध हुआ। 'चैतन्यं सर्वविषयातीतम्' पदों से चिदात्मा की सर्वानर्थ रूप विषयों से शून्यता को बताते हुए समस्त अनर्थों की निःशेष निवृत्ति के साथ ही 'निरतिशयानन्दाविर्भावरूप प्रयोजन' की सूचना दी गई है, यह तृतीय अनुबन्ध हुआ। उस प्रयोजन की इच्छा रखनेवाला 'मुमुक्षु' प्रस्तुत प्रकरण ग्रन्थ के अध्ययन का 'अधिकारी' है। इस प्रकार विषय, सम्बन्ध, प्रयोजन और अधिकारी इन चारों अनुबन्धों (अनुबन्धचतुष्टय) को उक्त मंगलाचरण के द्वारा ध्वनित किया गया है ॥ १ ॥ समापय्य क्रियाः सर्वा दारानग्न्याधानपूर्विकाः । ब्रह्मविद्यामथेदानीं वक्तुं वेदः प्रचक्रमे ॥ २ ॥ समापय्येति—पाणिग्रहण (विवाह), अग्नि का आधान जैसे विहित समस्त कर्मों के अनुष्ठान से सम्पन्न हुए व्यक्ति के लिए वेदभगवान् अब ब्रह्मविद्या के प्रतिपादन का आरम्भ करते हैं ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में देवताप्रणामरूप मङ्गलाचरण के व्याज से वेदान्तप्रतिपाद्य देवतातत्त्व का निरूपण संक्षेप में किया गया। अब वेदान्तवाक्यों का तात्पर्य भी उसी (देवतातत्त्व) में है, यह बताने के लिये कर्मकाण्ड प्रतिपादित अर्थ का अनुवाद
उपोद्घातप्रकरणम् ३ कर उसके साथ वेदान्त वाक्यों ( ज्ञानकाण्ड ) की संगति ( सम्बन्ध ) तथा उनकी ( वेदान्त वाक्यों की ) कर्मकाण्ड वाक्यों से अगतार्थता ( भिन्नार्थप्रतिपादकता ) और अनन्यशेषता ( किसी दूसरे का अंगभूत न होना ) को इस द्वितीय श्लोक के द्वारा प्रस्तुत कर रहे हैं। अभिप्राय यह है कि विवेक-वैराग्य-शमादि साधनों से सम्पन्न मुमुक्षु व्यक्ति के लिये मोक्षप्राप्ति में उपायभूत ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन करने के उद्देश से वेद का ज्ञानकाण्ड प्रवृत्त हो रहा है। उपर्युक्त साधन-सम्पत्ति का लाभ, कर्मकाण्डोक्त कर्मों के अनुष्ठान से बुद्धि [ अन्तःकरण ] की शुद्धि का होना है। नित्य-निरतिशय पुरुषार्थ ( मोक्ष ) प्राप्ति की कामना से उसके उपाय का अन्वेषण सर्वत्र करने पर भी जब साधक को वह नहीं मिलता, तब वेद में उसे ( उस उपाय को ) बताते हैं। वह उपाय समग्र वेद का वास्तविक तात्पर्य आत्मा के प्रतिपादन में ही मिलता है।१ आत्मतत्त्वज्ञान ही मोक्ष का उपाय है।२ उस आत्मतत्त्वज्ञान का उपदेश, अशुद्ध ( अपवित्र ) अन्तःकरण वाले व्यक्ति को करना उचित नहीं है, क्योंकि आत्मतत्त्वज्ञान के ग्रहण करने का सामर्थ्य उसमें नहीं होता।३ अतः ज्ञानोत्पत्ति में प्रतिबन्धक उसके दुरितक्षय के लिये वेद के कर्मकाण्ड भाग में नित्य कर्मों को प्रथमतः बताया गया है। वह ( कर्मकाण्ड भाग ) संयोग ( फल ) रूप ( द्रव्य-देवता ) चोदना और समाख्या ( नाम ) के एकरूप होने के कारण सर्वशाखाप्रत्ययन्यायसे४ इतिकर्तव्यतारूप अंगकलापपरिमाण, अधिकारी, विशेषोक्ति के द्वारा कर्म के अनुष्ठान की सबको शिक्षा देता है।५ धर्म ( कर्म ) नुष्ठान से दुरित क्षय होता है। अतः परम्परया कर्मानुष्ठान का उपयोग परमपुरुषार्थ की प्राप्ति में होता है।६ 'कर्मणा पितृलोकः' इत्यादि श्रुति से प्रतिपादित पितृलोक आदि की प्राप्ति होना कर्म का मुख्य फल नहीं है, वह तो आनुषङ्गिक फल है। पितृलोकादि फल तो कालान्तर से क्षीण हो जाते हैं। अतः क्षय ( क्षीणता ) आदि दोष से दूषित होने के कारण वे हेय हैं। उन्हें मुख्य फल नहीं कह सकते। यदि उन्हें मुख्य फल मानने का आग्रह ही हो तो भी वे चित्तशुद्धि में प्रतिबन्धक नहीं हैं।७ उसी प्रकार काम्यकर्मों का विधान पुरुष को अपनी ओर आकर्षित कर उसे स्वाभाविक कुप्रवृत्ति की ओर से निवृत्त करने के लिये है। एवं च मोक्ष के उपायस्वरूप तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लिये चित्तशुद्धि प्रथम अपेक्षित होती है। अतः चित्तशुद्धि के लिये प्रथमतः कर्म- विधान प्रवृत्त होता है, तब पश्चात् ज्ञानोपदेश किया जाता है। कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड में अर्थ दृष्ट्या ( फल की दृष्टि से ) हेतु-हेतुमद्भाव होने से यह क्रम (पौर्वापर्यसम्बन्ध) बताया गया है। ज्ञानकाण्ड का विषय साक्षात् परमपुरुषार्थरूप फल है। जिसकी प्राप्ति कर्म से नहीं होती। इससे ज्ञानकाण्ड की अगतार्थता व अनन्यशेषता भी स्पष्ट हो जाती है ॥ २ ॥ कर्माणि देहयोगार्थं देहयोगे प्रियाप्रिये । ध्रुवे स्यातां ततो रागो द्वेषश्चैव ततः क्रियाः ॥ ३ ॥ कर्माणीति—देह से सम्बन्ध प्राप्ति में किये हुये कर्म कारण होते हैं, और देह के साथ सम्बन्ध होने पर निश्चय हो प्रिय तथा अप्रिय की अनुभूति होती है। उससे राग और द्वेष होते हैं, तब उनसे प्रवृत्त होकर पुनः क्रियाएँ (कर्म) होतो हैं ॥ ३ ॥ १. 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।'—[ कठ० उ० २।१५ ], 'सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति ...........स मानसीन आत्मा जनानाम् ।'— [ तै० आ० ३।११।१ ], 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः ।'—[ भ० गी० १५।१५ ] । २. 'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।'—[ श्वे० उ० ३।८ ] । ३. 'नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ।'—[ कठ० उ० २।२४ ] । ४. [ जै० सू०-२।४।९ ] । ५. 'धर्मेण पापमपनुदति'—[ महाना० उ० ७९ ], 'न कर्म लिप्यते नरे'—[ ई० उ० २।११ ], वहीं पर 'अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा०' । ६. [ बृ० उ० १।५।१६ ] । ७. 'नित्येषु शुद्धिप्राधान्याद् भोगोऽप्यप्रतिबन्धकः । भोगं भङ्गुरमीक्षन्ते बुद्धिशुद्धिस्तु रोचते ॥' सं० वाति० १।१३१-- [ सुरेश्वराचार्य ]
उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी कर्मकाण्ड प्रतिपादित नानाविद्यकर्मानुष्ठान से होनेवाली बुद्धिशुद्धि के अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासु के प्रति ब्रह्मविद्या का उपदेश देने के लिये वेदान्त की प्रवृत्ति है, यह पूर्वश्लोक के द्वारा बताया गया है। किन्तु मुमुक्षु को उसकी अपेक्षित मोक्षप्राप्ति यदि कर्म से ही हो जाय तो ब्रह्मविद्या की कोई आवश्यकता नहीं, तब तदङ्गत्वेन (मोक्षप्राप्ति के अंगरूप से) वेदान्त की प्रवृत्ति का होना कैसे उपपन्न होगा? शंका करने वाले किसो कर्मजडव्यक्ति का अभिप्राय यह है कि लोक- व्यवहार में हम देखते हैं कि किये गये कर्म ही कर्ता को फल देते हैं। जैसे पिता के द्वारा उपदिष्ट कर्मों से इष्ट फल तथा उसके द्वारा निषिद्ध किये गये कर्मों से अनिष्ट फल, और ऐसे भी कर्म हैं जो न उपदिष्ट हैं और न निषिद्ध ही हैं, केवल दैववशात् हो जाते हैं, उनसे इष्टानिष्ट दोनों प्रकार के फल प्राप्त होते हैं। वैसे ही वेद से विहित कर्मों का इष्टफल और वेद से निषिद्ध किये गये कर्मों का अनिष्ट फल तथा व्यामिश्र (विहित-प्रतिषिद्ध) कर्मों से व्यामिश्र (इष्टानिष्ट) फल होगा। इसी अभिप्राय का शास्त्रवचन भी है—"अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्"—[ भ० गी० १८–१२]। एवं च कर्म से फल होना चाहिये। उस मोक्षरूप फल के लिये विद्या (ज्ञान) की आवश्यकता नहीं और न उनके लिये मुमुक्षु को ज्ञानकाण्ड के विचार करने की आवश्यकता है। किन्तु अक्षयफल के लिये चातुर्मास्यादि किसी कर्म का ही अनुष्ठान करना चाहिये। इस आशंका का निरास इस तृतीय व चतुर्थ श्लोक के द्वारा किया गया है। कर्मानुष्ठान करनेवाले अज्ञ व्यक्ति को कर्म के द्वारा शरीरादि- परम्परया पुनः पुनः संसाररूप अनर्थ की प्राप्ति अवश्यंभावी रहने से कर्मों को मोक्षप्राप्ति का साधन (उपाय) नहीं कहा जा सकता। जाति, आयु और भोग—ये कर्म के फल हैं, इनका होना देहसंबंध के विना संभव नहीं। अतः यह कहना होगा कि कर्म तो देह से सम्बन्ध कराने के लिये ही होते हैं। देह सम्बन्ध होने पर प्रिय अप्रिय, सुख-दुःख आदि संसार का होना अनिवार्य है।१ तदनन्तर उनके साधनों के प्रति वासनाएँ (राग-द्वेष) भी होंगी। उस वासनात्मकनिमित्त से वाचिक, मानसिक, शारीरिक क्रियाएँ होंगी ॥ ३ ॥ धर्माधर्मौ ततोऽज्ञस्य देहयोगस्तथा पुनः । एवं नित्यप्रवृत्तोऽयं संसारश्चक्रवद्भृशम् ॥ ४ ॥ धर्माधर्माविति—उन कर्मों के अनुष्ठान से अज्ञानी व्यक्ति को धर्माधर्म की प्राप्ति होती है, उससे पुनः शरीर की प्राप्ति होती है, इस रीति से यह संसार, चक्र की तरह सतत चल रहा है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्यगात्मतत्त्व ब्रह्म को न जानने के कारण अहंकार के अधीन रहनेवाला अज्ञ व्यक्ति विहितप्रतिषिद्ध कर्मों को करता रहता है। उनसे धर्माधर्म की निष्पत्ति होती है, उनसे पुनः शरीर की प्राप्ति होती है। इस प्रकार जन्म-मरण-कर्मकरण तत्फलभोगलक्षणसंसार, कुलाल के चक्र की तरह अनादिकाल से निरन्तर चल रहा है यह सभी देख रहे हैं। अतः कर्मों के ऐहिकफल अनित्य हुआ करते हैं यह अनुभव सभी को है। उसी तरह पारलौकिकफलसम्पादक कर्म भी, कर्म होने के नाते उनके फल भी नित्य कैसे हो सकते हैं ? अर्थात् उनके फल भी अनित्य हैं। इसके समर्थन में वस्तुबलावलम्बी श्रुति कह रही है—'तद्यथेहकर्मजितो लोकःक्षीयते, एवमेवामुत्र पुण्यजितोलोकःक्षीयते'। अतः २अर्थवादश्रुति का अवलम्ब लेकर कर्मजडव्यक्ति का कर्मफल को नित्य समझ बैठना उचित नहीं हैं ॥ ४ ॥ अज्ञानं तस्य मूलं स्यादिति तद्धानमिष्यते । ब्रह्मविद्याऽत आरब्धा ततो निःश्रेयसं भवेत् ॥ ५ ॥ अज्ञानमिति—अज्ञान ही उस संसार का मूल है, अतः उसका त्याग करना सभी को अभीष्ट है, इसलिए ब्रह्मविद्या का आरम्भ किया जा रहा है, उसीसे वास्तविक कल्याण हो सकता है ॥ ५ ॥ १. ‘न वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति ।’—[छां० उ० ८।१२।१] २. ‘अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतम् ।'— [श० ब्रा० २।६।३।१]
उपोद्घातप्रकरणम् हृदयस्पर्शिनी जिस प्रकार कर्म संसार के कारण हैं उसी प्रकार वे मोक्ष के भी कारण हैं। अतः भोगों का त्याग करनेपर अर्थात् अपने किए हुए कर्म ही संसार की प्राप्ति कराने में निमित्त हैं, उन निमित्तभूत कर्मों के फलों का उपभोग कर चुकने पर उन निमित्तभूत कर्मों का विनाश हो ही जायगा और संसार की निवृत्ति हो जायगी, क्योंकि ‘निमित्ताभावे नैमित्तिकाभावः' यह नियम है। एवंच मोक्ष तो प्रयत्नलभ्य है, उसके लिए ब्रह्मविद्या की कौन आवश्यकता ? किन्तु इस प्रकार की आशंका करना उचित नहीं है। कारण यह है कि कर्म और तत्फलस्वरूप संसारवृक्ष का मूल कारण अज्ञान है। एवंच कर्म अज्ञानकृत है, अतः कर्म के रहते संसार का उपरम नहीं होगा, तब मोक्ष को प्रयत्नलभ्य कैसे कह सकते हैं ? अथवा उक्त शंका का समाधान इस प्रकार भी किया जा सकता है कि अज्ञानी की कर्म करने की प्रवृत्ति कभी न रुक सकने से संसार की समाप्ति (निवृत्ति) तो कभी हो ही नहीं सकती। अपने कृतकर्म के फलभोग के समय में भी कर्मप्रवृत्ति के अवश्य रहने से पुनः फलभोग की धारा निरन्तर चलती ही रहेगी। ऐसी स्थिति में कर्मनिवृत्ति से मोक्ष की सिद्धि अनायास कैसे हो सकती है ? अतः संसार की निवृत्ति (आत्यन्तिक उपरम) के लिए अज्ञान का त्याग करना आवश्यक है, किन्तु उसका (अज्ञान का) त्याग, ब्रह्मज्ञान हुए बिना हो ही नहीं सकता। एवञ्च ब्रह्मज्ञान (ब्रह्मविद्या) से ही अज्ञान की निवृत्ति होने से संसार की निवृत्ति ( निरतिशयानन्दाविर्भावरूप कैवल्य = मोक्ष ) रूप वास्तविक कल्याण का होना सम्भव है ॥ ५ ॥
विद्यैवाऽज्ञानहानाय न कर्माप्रतिकूलतः । नाज्ञानस्याप्रहाणे हि रागद्वेषक्षयो भवेत् ॥ ६ ॥ विद्यैवेति-ज्ञान ही अज्ञान की निवृत्ति कराने में समर्थ है, कर्म नहीं, क्योंकि कर्म का अज्ञान से कोई विरोध नहीं है। और अज्ञान की निवृत्ति (विनाश) के बिना राग-द्वेष का क्षय (अभाव) नहीं हो सकेगा ॥ ६॥ हृदयस्पर्शिनी कतिपय कर्मठ (कर्म में ही नितान्त श्रद्धा रखनेवाले) लोग यह कहते पाये जाते हैं कि कर्मों की अपनी निजी विचित्र शक्ति होती है', उसके बल पर उन कर्मों के द्वारा ही अज्ञान की निवृत्ति भी कर दी जा सकती है, विद्या (ज्ञान) की क्या आवश्यकता ? किन्तु कर्मठों का यह कथन उचित प्रतीत नहीं हो रहा है क्योंकि प्रकाश से अप्रकाश का नष्ट (निवृत्त) होना तो समझ में आता है। विद्या (ज्ञान) प्रकाशात्मक है। अतः वही संसार की मूलभूत अप्रकाशरूप अविद्या और उसके कार्य को नष्ट (निवृत्त) कर सकती है। क्योंकि दोनों में परस्पर विरोध है, किन्तु अज्ञान जैसे अप्रकाशात्मक है वैसे ही कर्म भी अप्रकाशरूप (अप्रकाशात्मक) है, अतः दोनों (अज्ञान और कर्म) में कोई विरोध ही नहीं है, जिससे वह (कर्म) अज्ञान को निवृत्त कर सके। मोक्ष प्राप्ति के लिए विद्या (ब्रह्मविद्या, तत्त्वज्ञान) की आवश्यकता न समझनेवाले लोगों ने अपने पक्ष के समर्थन में जो 'हिरण्यदाः' श्रुति उपस्थित की थी, उसका पर्यवसान (तात्पर्य) आपेक्षिक अमृतत्व में समझना चाहिए। अन्यथा अनुमान २ तथा 'नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय³' इत्यादि श्रुति के साथ विरोध होगा। उसी तरह 'कर्मणैव हि'४ स्मृति का तात्पर्य भी कर्म के द्वारा अज्ञान की निवृत्ति होने में नहीं है। अन्यथा 'न कर्मणा न प्रजया' श्रुति के साथ विरोध होगा।
१. 'हिरण्यदा अमृतत्वं भजन्ते'- [ऋ० सं० ८।६।३।२], 'कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः' - [भ० गी० ३।२०] २. 'रज्ज्वावरणाविद्यातमसो तत्कल्पितसर्पाद्याकारं च रज्जुतत्त्वज्ञान-प्रदीपो निवर्तयतः, स्वभावविरोधात् । कर्म तु नाज्ञानतमोन्निवर्तकं, तदविरोधित्वात्, अप्रकाशात्मकत्वाद्वा, नीहारस्तोमवत् ।' ३. श्वे० उ० ३।८ ४. भ० गी० ३।२
६ उपदेशसाहस्री शंका—विद्या के बिना अज्ञान का क्षय (निवृत्ति) यदि नहीं होता है, तो अज्ञानक्षय के लिए ही विद्या को समझा जाय; प्रपञ्च की निवृत्ति उससे नहीं होगी, क्योंकि अज्ञान के कार्यभूत संसार (प्रपञ्च) की पारमार्थिकता (सत्यता) होने से विद्या के द्वारा उसका नाश होना संभव नहीं है । अतः उसके नाश (निवृत्ति) के लिये किसी अन्य हेतु (कारण) को सोचा जाय । समा—अज्ञान की निवृत्ति (नाश) हुए बिना रागादि दोषों का क्षय (नाश) नहीं हो पायगा, क्योंकि 'अविवेक रहने पर रागादिदोष होते हैं, और अविवेक के न रहने पर रागादिदोष नहीं होते' इस अन्वय—व्यतिरेक के बलपर यह सिद्ध हो जाता है कि रागादिदोष अविवेकपूर्वक हैं, अर्थात् अविवेक ही रागादिदोषों के होने में कारण है। ये रागादि अज्ञानमय हैं, पारमार्थिक (वास्तविक) नहीं हैं। इस कारण इनकी निवृत्ति अज्ञान की निवृत्ति से ही हो सकती है। अतः उनकी निवृत्ति के लिये किसी अन्य हेतु (कारण) के सोचने की आवश्यकता नहीं है ॥ ६ ॥ रागद्वेषक्षयाभावे कर्म दोषोद्भवं ध्रुवम् । तस्मिन्निःश्रेयसार्थाय विद्यैवात्र विधीयते ॥ ७ ॥ रागेति—राग-द्वेष का क्षय (अभाव) न होने पर उन दोषों के कारण पुनः कर्म की उत्पत्ति होना भी सुनिश्चित है। अतः श्रेय प्राप्ति (कल्याण की प्राप्ति) के लिये यहाँ ज्ञान का ही विधान किया जा रहा है ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी कुछ लोगों के मन में यह शंका होती है कि रागादि दोषों की निवृत्ति यदि न हो तो क्या हानि है ? इस शंका के समाधानार्थ श्री आचार्यचरण कहते हैं कि रागादि दोषों की निवृत्ति न होनेपर उन राग, द्वेष, मोहादि दोषों से कर्म की उत्पत्ति का होना सुनिश्चित है, क्योंकि कर्म की उत्पत्ति में रागादि दोष ही कारण (हेतु) होते हैं। तब कर्म के होने पर कर्माधीन इस संसार का होना भी निश्चित ही है, उसे कोई रोक नहीं सकता । एवञ्च कर्म से मोक्ष (मुक्ति) नहीं हो सकता । अतः मोक्षप्राप्त्यर्थ वेदान्त-सिद्धान्त को प्रकाशित किया जा रहा है कि 'निःश्रेयस (मोक्ष) के लिये एक मात्र विद्या (ज्ञान) ही समर्थ है' १ ॥ ७ ॥ ननु कर्म तथा नित्यं कर्तव्यं जीवने सति । विद्यायाः सहकारित्वं मोक्षं प्रति हि तद् व्रजेत् ॥ ८ ॥ 'ज्ञान ही अज्ञान का निवर्तक है, कर्म नहीं'—यह सुनकर ज्ञान-कर्म समुच्चयवादी कह रहा है— नन्विति—ज्ञान के समान कर्म भी यावज्जीवन (सदा-सर्वदा) करते रहना चाहिये, क्योंकि (यद्यपि स्वतन्त्र रूप से कर्म अज्ञान का विरोधी नहीं है, तथापि) वह (कर्म) मोक्षसाधन करने में ज्ञान सहायक (सहकारी) तो बन ही सकता है ॥ ८ ॥ १. नैष्कर्म्यसिद्धि के प्रारम्भ में कहा गया है कि दुःख का एकमात्र कारण देह ही है, और देहप्राप्ति का कारण पूर्वोपचित (पूर्वसञ्चित) धर्माऽधर्म हैं, और धर्माऽधर्म के कारण विहित-प्रतिषिद्ध कर्म हैं, कर्म के कारण राग-द्वेष हैं, राग-द्वेष में कारण शोभन, अशोभन अध्यास है, अध्यास में कारण अविचारित सिद्ध द्वैत वस्तु है, और द्वैत में शुक्ति-रजतादि के तुल्य स्वतः सिद्ध अद्वितीय आत्मा का अज्ञान कारण है । निष्कर्ष यह है कि सम्पूर्ण अनर्थप्राप्ति में हेतु (कारण) आत्मा का अज्ञान ही है । पारमार्थिक सुख आगमाऽपायी नहीं हैं। वह तो परतन्त्र स्वात्मस्वरूप है, उसका अज्ञान ही उसका आवरण है। उस सुख का यदि अत्यन्त उच्छेद (नाश) हो जाय तो अशेष (सम्पूर्ण) पुरुषार्थ की ही समाप्ति हो जायगी । सम्यग्ज्ञान (यथार्थ तत्त्वज्ञान के स्वरूप का लाभ) अज्ञान की निवृत्ति से ही हो सकता है। अतः अज्ञान की निवृत्ति करना अत्यन्त आवश्यक है। अशेष अनर्थ की प्राप्ति में हेतुभूत अज्ञान को निवृत्ति, प्रत्यक्षादि लौकिक प्रमाणों से हो नहीं सकती, उसकी निवृत्ति तो वेदान्तागमप्रतिपादित वाक्यों से होने वाले सम्यग् ज्ञान से ही हो सकती है ।