भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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( xiv ) इस भक्ति के रहस्य का उद्घाटन करते हुए सौन्दर्य-निखार पर जोर दिया है। जगत् के प्रति वैराग्य व शिव के प्रति राग एक ही सिक्के के दो पीठ हैं। यह ईश्वर का प्रेम शनैः शनैः पकता है। प्रकृति का सौन्दर्य भी उसके विकास का सोपान बनाया जा सकता है, बशर्ते उसको उद्दीपक रखा जा सके, तर्पक नहीं। पर यह मार्ग कठिन है। जैसे फलाशा से रहित होकर कर्म करना कठिन हैं, वैसे ही माया को छोड़कर मायी का चिन्तन कठिन है। उपाधि के बिना उपहित का कथन जितना सरल है, अनुभूति उतनी ही क्लिष्ट है। सामान्यतः उपाधिगत सौन्दर्य चित्त को विक्षिप्त ही करता है एवं आध्यात्मिक साधना की प्रतिरोधता का कारण ही बनता है। आचार्य स्पष्ट करते हैं कि जो वासुदेव की तरह पीपल व अपने शरीर में समान रूप से चैतन्य सत्ता की उपस्थिति को अनुभव करता है वही उसे वस्तुतः जानता है। जबतक ध्याता व ध्येय का भेद रहेगा, ध्येयानुसार ही प्राप्ति होगी। यही प्रेम का रूप है। ज्ञान में यह सापेक्षता नहीं है। 'यन्मनास्तन्मयोऽन्यत्वे नात्मत्वाप्तौ क्रियाऽत्मनि' (उ० सा० नाट्य० १४)। मुमुक्षा की तीव्रता में ज्ञानयोग की सफलता छिपी है। यहाँ ज्ञान व प्राप्ति में (Knowing and Being) भेद नहीं है। सत्य, जो वेदान्त शास्त्र में ईश्वर का पर्याय है, वस्तुतः सारे विश्व की समन्वय भूमि है। ऐसा न हो तो वह 'एकमेवाद्वितीयं' हो ही नहीं सकता। इसका अज्ञान ही तो जगत् का जनक है। यह न किसी के किसी कर्म की अपेक्षा रखता है, न किसी के किसी भावना की अपेक्षा रखता है। कर्म की अपेक्षा वहीं संभव है, जहाँ विकृति संभव हो। अविकारी में कर्म की गति नहीं। जो सर्वरूप न हो, वहाँ किसी भावना से अतिशय का आधान न हो सकेगा। अध्यास अधिष्ठान में परिवर्तन नहीं लाता, यह सर्ववादिसम्मत है। अतः कर्म व भावना से निरपेक्ष ही सत्य का साक्षात्कार है। 'वस्तवधीना भवेद्विद्या' (उ० सा० उपो० १३)। वस्तुतस्तु ज्ञान उत्पन्न होते ही भावना व कर्म के साधनों को ही समाप्त कर देता है जैसे मृगतृष्णा की अधिष्ठान बालू का ज्ञान मृगतृष्णा को ही समाप्त कर देता है। 'कारकाण्युप- मृद्नाति विद्या बुद्धि इव ऊषरे' । (उ० सा० उपो० १४) ब्रह्म ही ब्रह्मज्ञान का निरूपक है, ज्ञाता नहीं, यह पारमार्थिक सत्य है। ज्ञाता को दैवी संपत्तियुक्त व ज्ञानसाधनों से सम्पन्न होना चाहिये। बस, यही अपेक्षित है। जैसे आँख का ठीक होना विष्णुमित्र के दर्शन में अपेक्षित है, पर विष्णुमित्र के ज्ञान का निरूपक तो विष्णुमित्रदेह ही है, वैसे ही यहाँ समझना चाहिये। प्रश्न हो सकता है कि ज्ञान भी तो अन्तःकरण की वृत्ति ही है। यह भी तो मानसक्रियारूप है। परन्तु ऐसा इसीलिये लगता है कि क्रिया के रूप को नहीं समझा जा रहा है। जहाँ उत्पत्ति, प्राप्ति, विकार या संस्कार रूपी फल हो, वहीं क्रिया मानी जा सकती है। 'उत्पाद्याप्यविकार्याणि संस्कार्यं च क्रियाफलम् नातोऽन्यत्कर्मणा कार्य' (उ० सा० सम्व० ५०)। ज्ञान ऐसा कोई फल उत्पन्न नहीं करता। यद्यपि घड़ा इत्यादि जानने में घड़ा ज्ञात हो गया ऐसी उत्पत्ति प्रतीत भी हो जाती है, पर ब्रह्म ज्ञात हो गया, ऐसी प्रतीति भी नहीं होती। 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसी ही प्रतीति होती है। अतः ज्ञान ही सीधा अज्ञाननाशक होने से मोक्ष का एकमात्र साक्षात् कारण हो सकता है। अन्य साधन तो ज्ञानोत्पत्ति के साधनों को उपलब्ध कराकर गतार्थ हो जाते हैं। अध्यास की निवृत्ति लोक में भी जप, ध्यान, पूजा, यज्ञ, देवताराधन आदि किसी साधन से न होकर अधिष्ठान के ज्ञान से ही होती है। अध्यास ही सभी बन्धनों की प्रतीति का स्वरूप है। जो लोग कहते हैं कि ज्ञानमार्ग कठिन है, वे वस्तुतः ज्ञान को उपाय मानते ही नहीं। ज्ञान अज्ञान को हटाने के अतिरिक्त कुछ भी करने में असमर्थ है। अतः बन्धन अज्ञानप्रसूत होगा तो ही ज्ञानमार्ग मोक्ष के लिये संभव होगा। यदि कर्म से मोक्ष संभव हो भी जाय तो वह बन्धन अज्ञानप्रसूत नहीं रह जायगा। अतः वैकल्पिक मार्ग तो असंभव है। कर्म व भक्ति या उपासना तो क्रियारूप होने से विकल्प बन सकते हैं, पर ज्ञान क्रियारूप होने से विकल्प नहीं हो सकता। बन्धन को अज्ञानप्रसूत न मानने से मोक्ष आदि में जन्यता एवं तज्जन्य अनित्यता आदि को ब्रह्मा भी नहीं मिटा सकेंगे। अतः ज्ञानमार्ग एकमात्र मोक्षोपाय होने से कठिनता का प्रश्न ही नहीं उठता। भोजन बनाना जितना भी कठिन हो, भूखनिवृत्ति का एकमात्र उपाय होने से, भूखे व्यक्ति को मार्गान्तर से लक्ष्य प्राप्ति न होने से, कठिन वा सरल नहीं कहा जा सकता। कठिन और सरल सापेक्षिक शब्द हैं, अतः दो या अधिक संभव होने पर ही प्रयुक्त हो सकते हैं। सावधानी के लिये शास्त्रों में कहीं कठिनता का वर्णन किया है। उससे केवल सावधान रहने का ही निर्देश सच्छास्त्रों का इष्ट है। 'ज्ञेयस्यातिसूक्ष्मत्वाज्ज्ञानमार्गस्य दुःसंपाद्यत्वं वदन्ति' (क० भा० )