उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 19, कुल 364 में से
संदर्भ में पढ़ें( xiii ) जाना ही कर्म का उद्देश्य है। इसी को अन्यत्र संसिद्धि शब्द से कहा गया है। परन्तु कर्म मोक्ष का कारण नहीं ही हो सकता है। कर्म में कर्तृत्वाभिमान अवश्यंभावी है। 'मैं ईश्वर के नौकर की तरह करता हूँ' में प्रेरकता ईश्वर में होने पर भी कर्तृता तो मैं में रहेगी ही। 'विद्यायाः प्रतिकूलं हि कर्म स्यात्साभिमानतः.........अहं कर्त्ता ममेदं स्यादिति कर्म प्रवर्त्तते' उ. सा. उपोद्० १२-१३ । ) अगले सोपान में समझना पड़ता है कि ईश्वर मानव-कल्पना की उच्चतम कोटि है। ईश्वर के माया से प्राकट्य होने को समझना ईश्वर की कृपा से ही संभव है। इसी में जीव का शिव से प्रेम व शिवका जीव पर अनुग्रह छिपा हुआ है। अवतार का उद्देश्य धर्म व साधुओं का रक्षण ही है। इसके लिये असाधु अधर्मी आसुरी प्रकृतिवालों का नाश आवश्यक होने से वह भी अवतार-जीवन का आवश्यक अंग हो जाता है। धर्म में अप्रवृत्ति के दो कारण होते हैं। युगानुरूप जो कार्य असंभव हो जाते हैं उनमें असामर्थ्य के कारण दूसरे धर्मकार्यों के प्रति भी अश्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। धर्म के नियम एक अगाध जंगल हैं। उनमें से किसी भी देश, काल आदि परिस्थितियों का विचार करके किन धर्मसमूहों का पालन संभव है एवं किनको छोड़ना ही पड़ेगा इसका निर्णय साधारण व्यक्ति के बूते का नहीं है। भीष्म पितामह जैसे वसु भी युधिष्ठिर के समक्ष सभी धर्मों व मोक्षसाधनों का प्रतिपादन करके भी द्रौपदी वस्त्रपहरण के समय धर्माधर्म का निर्णय करने में अक्षम ही रहे। अतः अवतार का प्रयोजन धर्मव्यवस्था के द्वारा संभव धर्मों को उपदिष्ट व प्रचारित करना है। 'विमथ्य वेदो दधितः समुद्धृतं' ( उ० सा० तृष्णा० २८)। इसी के फलस्वरूप लोगों में धर्मप्रवृत्ति सुलभ हो जाती। ज्ञान होने पर भी सर्वस्व बलिदान करके धर्मपालन भी सबके बूते का नहीं है। अधार्मिक लोग संगठित होकर धार्मिकों का उत्पीड़न करते हैं। यह आज के समाज व राज्य में स्पष्ट है। जब तक इस प्रकार के संगठित अधर्मियों का नाश न हो तब तक धार्मिक आचरण कठिन हो जाता है। अतः यह भी अवतार का कार्य हो जाता है। कई बार अधर्म का प्रचार धर्म के नाम से होता है। ऐसो परिस्थिति में जिन युक्तिजालों से अधर्म को धर्म कहा जा रहा है, उसका खण्डन भी संगठित अधर्मियों का नाश ही है। ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति के नाश से अधर्म का नाश संभव न होकर विचार का नाश ही अधर्मियों का नाश हो सकता है। 'अगुणग्रहोऽगुणं न याति मोहं ग्रहदोषमुक्तितः' ( उ० सा० तृष्णा० २६)। इस प्रकार परमेश्वर की कृपा को इतिहास में प्रत्यक्ष देखकर परमेश्वर पर अपूर्व प्रेम उत्पन्न हो जाता है। यहाँ अवतार का अर्थ केवल पूर्णावतार नहीं समझना चाहिये। पूर्ण जीवन अर्थात् बचपन आदि सारी अवस्थाओं में जो अवतार प्रकट हो वह पूर्णावतार है, जैसे कृष्ण, शंकर आदि। भक्तानुग्रह के लिए थोड़े समय के लिये प्रकट होने वाले अंशावतार भी अवतार ही हैं। उनसे भी प्रभु का जीवों के प्रति प्रेम प्रकट होता है। गुरु भी ज्ञानोपदेश के समय ऐसा ही अवतार है। 'सर्वज्ञेभ्यो नमस्तेभ्यो गुरुभ्योऽज्ञानसंकुलम्' ( उ० सा० सम्यग्दृ० ८९)। प्रेम मानवहृदय की सौन्दर्य के प्रति उद्भूत भावना है। स्वरूपतः यह निष्काम सुख है। सौन्दर्य का मूल समन्वय है। शिव में सभी समन्वित होने से वही परम निरतिशय सौन्दर्य का आश्रय है। अतः पूर्ण प्रेम भी वहीं संभव है। प्रकृति का सौन्दर्य निखर कर आत्मा के अपूर्ण सन्तुष्टि का कारण होने से ही त्याज्य है। इससे होने वाला सुख भी निष्काम तो है पर इसका विषय पूर्ण समन्वित न होने से प्रेम की पूर्णता का बाधक बना रहता है। वस्तुतः शिव का सौन्दर्य ही अविद्या से परिच्छिन्न होकर प्राकृत पदार्थों में उल्लसित होता है। अतः शिवातिरिक्त सभी कुछ शिव पर अध्यस्त होकर ही सुन्दर होता है। सौन्दर्य के अन्वेषण को शिव की प्रकृति से हटाकर शिव में केन्द्रित करना ही शिवभक्ति है। बगीचे की सुन्दरता से बागवान की सुन्दरता देखना है। 'आरामं अस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चन' ( बृ० ३.४.३.१४ ) ज्ञानेच्छा भी ईश्वर को ही विषय करे यह ज्ञानमार्ग है। इसी प्रकार भक्ति भी ईश्वर को ही विषय करने की इच्छा है। भक्ति व ज्ञान में भेद विषय को लेकर नहीं; साधन को लेकर है। एक में बुद्धि व दूसरे में मन साधन है। फल में भी दोनों में ईश्वरज्ञान की प्राप्ति होने पर भी एक में प्रमा होने से अज्ञाननिवृत्ति होती है, तो दूसरे में अप्रमा होने पर भी आनन्द की अभिव्यक्ति होती है। ज्ञान में कोटियाँ संभव नहीं हैं तो भक्ति में अनन्त कोटियाँ संभव हैं। एक का फल मोक्ष है तो दूसरे का रसास्वादन। 'सदस्मीति प्रमाणोत्था धीः' ( उ० सा० तत्त्वमसि० ७) 'ओमित्येवं स्वमात्मानं सर्वं शुद्धं प्रपद्यथ सेतुं सर्वव्यवस्थानामहोरात्रादिवर्जितम्' ( उ० सा० सम्यङ्मति० ७७) । शिवानन्दलहरी में आचार्य शंकर ने