भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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( xii ) व्यक्तित्व संश्लिष्ट हो जाता है। अधिकारसम्पन्नता पर जोर देकर नैतिक शिक्षण व जीवन में उसे उतारने पर आचार्य जोर देते हैं। 'नैतद्देयमशान्ताय रहस्यं ज्ञानमुक्तमं (उ. सा. सम्यङ्मति० ८६)। इस संश्लिष्ट व्यक्तित्व की प्राप्ति के बिना दिया ज्ञान भी निष्ठा नहीं बन पाता। ऐसे ही किसी साधक को लक्ष्य करके स्वामी विद्यारण्य जी कहते हैं कि तत्त्वज्ञान को प्राप्त करके तुम ग्रामशूकर बनने की इच्छा मत करो। थोड़ा-सा प्रयास करने पर ही तुम देवताओं की तरह पूज्य हो सकोगे। विड्वराहादितुल्यत्वं माकांक्षीस्तत्त्वविद्द्वान् सर्वधीदोषसन्त्यागाल्लोकैः पूज्यस्व देववत् (पंचदशी ४।५७)। यद्यपि यह सत्य है कि तत्त्वसाक्षात्कार होने पर देवता की तरह पूज्य होना भी साधक नहीं चाहेगा। उसे तो लगेगा कि प्रतिष्ठा भी शूक़री विष्ठा की तरह अनुपादेय है। पर जो जगत् में कामना से प्रवृत्त हो रहा है, उसकी कामना को उच्चतर नैतिकता की ओर ले जाकर उसे अधिकारसम्पन्न करने में ही तात्पर्य है। अनैतिकता का मूल व्यक्तिमूलक कामनाएँ ही है। वे भूख की तरह हैं व भूख को बृहदारण्यक उपनिषद् में मृत्यु ही कहा है। कामना मन को भविष्य की ओर न देखने देकर उसे संकीर्ण व क्षणिक वर्त्तमान पर केन्द्रित कर देती है। अतः जीव अपनी उच्चतर संभावनाओं को व्यक्त करने पर ध्यान नहीं दे पाता। अतः अन्यत्र उपनिषद् ऐसे मानव को कृपण कहती है। अपनी पूर्णात्मा को प्रकट किये बिना, उसका साक्षात्कार किये बिना, इस संसार से जाना ही कृपण बनकर जाना है। इसी को जीतने का तरीका नैतिक जीवन का निर्माण है। इच्छा के उत्पन्न होने पर उसे नियंत्रित कर उपयुक्त मार्ग में बहाकर उपयोगी बनाना साधना के प्रथम सोपान हैं। पर यह केवल किसी की आज्ञा से नहीं करना है वरन् अपनी शुद्ध वास्तविक आत्मा की अभिव्यक्ति के लिये करना है। इसके लिये अपनी वर्त्तमान प्रतीतिक आत्मा के साथ समझौता करना आवश्यक है, अन्यथा वह ऐसा विप्लव मचायेगी कि साधक निराश हो जायगा। अन्ततः नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त आत्मा के व्यक्त होने पर संघर्ष समाप्त हो जायगा क्योंकि प्रतीतिक आत्मा का बाध हो जायगा। परन्तु तब तक बुद्धि से समझी शुद्धरूपता की तरह इस कामनापुंज का प्रवाह आवश्यक होगा। वेदान्त के विद्वान् शर्मण्यदेशवासी डायसन का कहना है कि मानवता की एकता, उनके सह- अस्तित्व के लिये आवश्यक उनकी आवश्यकताओं और कामनाओं की तरफ आचार्य ने ध्यान नहीं दिया है। परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि उन्होंने वेदान्त साधना का अभिन्न अंग कर्मयोग को माना है, जिसमें हिन्दू सामाजिक जीवन के रूप वर्णाश्रमधर्म में इन सबका समावेश हो जाता है। गीता भाष्य में यह और स्फुट हो जाता है। 'देहाद्यैरविशेषेण देहिनो ग्रहणं निजम्, प्राणिनां तदविद्योत्थं तावत्कर्मविधिर्भवेत्' (उ. सा. उपोद्० १६)। चूंकि धर्मशास्त्र में इसका विस्तृत वर्णन है, आचार्य ने इसका अलग से प्रतिपादन करना आवश्यक नहीं समझा। व्यक्ति की उन्नति और जिस समाज में वह रहता है, उसकी उन्नति व्यष्टि और समष्टि की उपाधि की एकता के द्वारा शङ्कर ने ऐसे दार्शनिक धरातल पर रख दी है जो अभेद्य है। किंच उनका जीवन, जो किसी भी वेदान्त अनुयायी के लिये अजस्र प्रेरणा का स्रोत है, स्पष्ट कर देता है कि वे समाज के प्रति कितने संवेदनशील थे। वर्णाश्रमव्यवस्था को स्वीकारने का अर्थ है व्यक्तिगत कामना को समाज की स्थिति के साथ समन्वित करना। सामाजिक अर्हाओं के साथ मिलकर चलने से ही उस दृष्टि को प्राप्त किया जा सकता है, जिससे निष्कामावस्था में समाज को अधिकतम उन्नति की प्रेरणा दी जा सके। लोकसंग्रह आचार्य शंकर के जीवन-दर्शन में विशिष्ट स्थान रखता है। वेदान्त का नैतिक दर्शन मानव की स्वतंत्रता को ऐसे मार्ग से स्फुट करने का प्रयत्न है जो उसकी कामनाओं को रुद्ध करके उसकी परतंत्रता को और अधिक न उलझा दे। विश्व में क्रिया अत्यन्त गहन है, जिस जंगल में से सीधा मार्ग निकालना जरूरी हैं। इसी मार्ग से कर्त्ता स्वतंत्रता के खुले वातावरण में प्रवेश करके शुद्ध पार- मेश्वरी वायु को ग्रहण कर सकेगा। पहला सोपान तो इस बात को समझना है कि सारे कर्म बन्धन का कारण नहीं है। फलप्राप्ति की इच्छा से किया कर्म ही बन्धन का कारण है। इच्छाप्रेरित कर्म क्यों बाँधते हैं? वे कर्त्ता को फल देने के लिये उसे जन्म-मरण के चक्र में डालकर बाँधते हैं। किंच उनसे उत्पन्न वासना पुनः कर्मेच्छा उत्पन्न कर इस चक्र को निरन्तर चलाती रहती है। कर्म का व्यापक कानून इसकी व्यवस्था करता है। 'यत्कामस्तत्क्रतुर्भूत्वा कृतं त्वज्ञः प्रपद्यते' (उ. सा. सम्यङ्० ४८)। निष्फलता की दृष्टि से काम करने वाले को ये बन्धन नहीं हो सकते। तब ईश्वर की प्रेरणा के अनुकूल ही कर्म करना आरम्भ हो जाता है जो अन्ततः नैष्कर्म्य पद की प्राप्ति करा देता है। ईश्वरेच्छा में जीव की इच्छा का विलीन हो

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