उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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है। मानवों में भी कोई-कोई ही आध्यात्मिक जगत् में साहसिक बनकर साधनों का जुगाड़ पाते हैं। पूर्ण स्वतन्त्रता की इच्छा मानव के मन में अत्यन्त देर से आती है। इसके प्रति अप्रमाद एवं ब्रह्मज्ञान के साधनों से अतिरिक्त सभी का त्याग करने की तैयारी भी आवश्यक है। विश्व के अन्तःपाती ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, स्वर्ग, राज्य, धन, पुत्र आदि सभी पदार्थों की प्रातीतिक सुखदता का खोखलापन जानने के बाद ही चरित्र में वह प्रौढता आती है, जो अद्वैतापरोक्षता के लिये उद्दाम वासना बनकर आत्मज्ञान के साधनों में एकाग्रता से प्रवृत्ति कराती है। सामान्यतः मानव अनुकूल की प्राप्ति के निमित्त प्रवृत्त होता है व प्रतिकूल से निवृत्त। पर शनैः शनैः समझ में आता है कि इससे तृष्णा सर्वथा शान्त नहीं होती। कर्ममात्र निश्चित लक्ष्य को पूरा करने में पर्याप्त नहीं हैं। इस स्थिति पर आकर वह शास्त्र के आदेश को समझ पाता है कि अपने अन्दर ही खोजा जाय। जबतक अपने तात्त्विक रूप का पता न लगे, सारे प्रयोजन अनिर्णीत ही रहेंगे। ‘कर्माणि देहयोगाथं देहयोगे प्रियाप्रिये ध्रुवे स्यातां, ततो रागो, द्वेषश्चैव ततः क्रियाः’ (उ. सा. उपोद्० ३) एवं ‘विविच्यस्मात्स्वमात्मानं विद्याच्छुद्धं परं पदं’ (उ. सा. नान्यदन्यत्० ३६)। अन्दर अन्वेषण करने के लिये शान्त चित्त आवश्यक है क्योंकि चित्त का ही सहारा भीतर के ज्ञान के लिये है। इसलिये तो इसे अन्तःकरण कहा है। परन्तु इन्द्रियाँ चञ्चल होने पर बलपूर्वक वे चित्त को अशान्त कर देती हैं, अतः उनका संयमन भी आवश्यक है। इस अन्वेषण में गुरूपसत्ति अनिवार्य है क्योंकि यह अध्यात्मयात्रा अति दुरूह है एवं अनुभवसम्पन्न गुरू के बिना रास्ते में भटक कर अपने उद्देश्य पर न पहुँच कहीं अन्यत्र पहुँचा जा सकता है। अतः गुरु की आज्ञा का पालन व उनके अनुगत होने का अभ्यास आवश्यक है, अन्यथा ब्रह्मज्ञानी गुरू का उपदेश ही सम्भव नहीं होगा। स्वभावतः जितने गुणों से सम्पन्न शिष्य होगा उतना ही वह गुरू के उपदेश को जीवन में उतारने में सक्षम होगा। ‘प्रशान्तचित्ताय जितेन्द्रियाय च प्रहीणदोषाय यथोक्तकारिणे गुणान्वितायानुगताय सर्वदा प्रदेयमेतत्सततं मुमुक्षवे’ (उ. सा. पार्थिव० ७२)। परन्तु ये अधिकार प्राप्त कैसे हों ? यह तो स्पष्ट ही है कि बहुत कम मानव ही इन अधिकारों को प्राप्त करने के योग्य होते हैं। इसके लिये यम, नियम, शिवार्पण किये हुए यज्ञ, पूजन, तप, जप, देवोपासन आदि कर्तव्य हैं। ‘यमैर्नित्यैश्च यज्ञैश्च तपोभिस्तस्य शोधनम् शारीरादि तपः कुर्यात्तद्विशुद्धयर्थ- मुत्तमम्’ (उ. सा. साम्यङ्मति० २३)।
यम का वर्णन करके हुए सुरेश्वराचार्य मनकी प्रसन्नता, सन्तोष, मौन, इन्द्रियसंयम, दया, दक्षता, आस्तिकता, सरलता, स्वभाव की कोमलता, क्षमा, मनकी सफाई, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, ईश्वर-स्मरण, धृति आदि मनके धर्मों का सामूहिक वर्णन करते हैं जिनको न करने पर साधक पतित हो जाता है। स्नान, सफाई, यज्ञ, सत्य, जप, होम, तर्पण, तप, दान, कष्टसहन, ईश्वर-नमस्कार, प्रदक्षिणा, व्रत, उपवास आदि शरीर से होनेवाले धर्मसमूह नियम कहे जाते हैं। इस प्रकार दीर्घकाल तक आचरण करने पर मनमें वह योग्यता आती है जिसमें ब्रह्मज्ञान धारण किया जा सके। कहा जाता है कि शेरनी का दूध स्वर्णपात्र में ही धारण किया जा सकता है, अन्यथा दूध विकृत हो जाता है। इसी प्रकार योग्य चित्त में ही ब्रह्मविद्या धारण की जा सकती है अन्यथा काम आदि विकारों से वह विकृत हो जाती है। ‘सभयादभयं प्राप्तं तदर्थं यतते च यः स पुनः सभयं गन्तुं स्वतन्त्रश्चेन्न हीच्छति’ (उ. सा. तत्त्व० २२८)। यहाँ स्वतंत्र का अर्थ भी समझने लायक है। आइन्स्टाइन कहते हैं कि निरपेक्ष स्वतन्त्रता अर्थहीन है। प्रत्येक व्यक्ति अपने बाह्य एवं आभ्यन्तर दबावों से ही जो करता है, सो करता है *। इसीको गीता मे स्वभाव कहा है, जिसके द्वारा परमेश्वर अन्तर्यामी कहा जाता है। अतः यदि कामनाओं आदि के संस्कारों से रहित नहीं हो गया है तो अस्वतन्त्र की तरह प्रवृत्त होकर अपने को बद्ध या परतन्त्र अनुभव करेगा। अतः ब्रह्मविद्या का उदय होने के लिये बाह्य व आभ्यन्तर परतंत्रता दूर होना आवश्यक है। यह ठीक है कि जीवन रहते प्रारब्धवशात् कुछ न कुछ स्वभाव तो बना ही रहेगा। परन्तु उतना आवश्यक मात्र बचा रहने पर परतंत्रता का अनुभव नहीं हो पायगा। कामनाओं की आज्ञा के अनुसार अदम्य प्रवृत्ति की इच्छा ही मानव की परतन्त्रता का व्यक्त रूप है। साधनाएं इस इच्छा को इस रोग से मुक्त करने के लिये ही हैं। कामना से निर्मुक्त होने पर मानव का
- ‘I do not at all believe in human freedom in the philosophical sense. Everybody acts not only under external compulsions, but also in accordance with inner necessity’.-Einstein in Window on the world. Published by Oxford University Press 1972.