भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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सच्चिदानन्द परब्रह्म ही सारी साधनाओं का लक्ष्य वेदान्त के अनुसार स्वीकृत है। यह सत्य है कि उसका किसी भी प्रकार से निरूपण अशक्य है, परन्तु यह भी सत्य है कि 'सत्यं ज्ञानं अनन्तम्', 'आनन्दं प्रपञ्चोपशमं शान्तम्', 'अद्वैतं शिवं' आदि के द्वारा स्वयं श्रुति ने उसका निरूपण भी किया है एवं उस निरूपण से साधक स्वकीय प्रज्ञा के द्वारा अन्वेषण करके कृतार्थ भी हुए हैं और हो रहे हैं। जितना यह सत्य है कि असंस्कृत पुरुष को इन सभी शब्दों में त्रुटि प्रतीत होती है, उतना ही सत्य यह भी है कि गुरु द्वारा संस्कार को प्राप्त शिष्य को इन्हीं के द्वारा पूर्णता की प्राप्ति होती है। अन्तिम गुरुक्ति 'तत्त्वमसि' इन्हीं पर आधारित है। सभी सप्रयोजन उद्बुद्ध कर्म शिवकेन्द्रित ही हों, सभी भावनाओं व स्नेहों का एकमात्र उद्देश्य शिव ही हो, सभी बौद्धिक गवेषणाओं का लक्ष्य शिव ही हो, यही वेदान्त सम्प्रदाय है। 'आत्मलाभात्परो नान्यो लाभः कश्चन विद्यते । यदर्था वेदवादाश्च स्मार्ताश्चापि तु याः क्रियाः' ( उ० स० सम्यङ्मति० ४)। इसीलिए वेद मानवदेह को ब्रह्मपुर कहता है। ब्रह्म की उपलब्धि के लिए प्राप्त यह देह जब इस उद्देश्य से प्रवृत्त होता है तो ब्रह्म ही सर्वोच्च अर्हा व परमसत्य होने से मानव का समग्र जीवन दिव्य हो पड़ता है। इसमें जीवन के किसी भी पक्ष का निरास नहीं है। जीवन के सभी पक्षों को उच्च व अधिकतम क्रियाशील स्तर पर पूर्ण दीप्ति से कार्य करना जरूरी हो जाता है। 'सत्यं ज्ञानं अनन्तं च रसादेः पञ्चकात्परम् । स्यामहंश्चादि- शास्त्रोक्तमहं ब्रह्मेति निर्भयः ॥ यस्माद्भीताः प्रवर्तन्ते वाङ्मनः पावकादयः । तदात्मानन्दतत्त्वज्ञो न बिभेति कुतश्चन ( उ० सा० सम्यङ्मति० ६२-६३)। दैवी सम्पत्ति उसमें स्वभावतः प्रतिष्ठित है अतः वह दिव्य है। दैवी सम्पत्ति उसके लिए साधनरूप नहीं है। आचार्य शङ्कर के पट्टशिष्य सुरेश्वर अपनी प्रसिद्ध कृति नैष्कर्म्यसिद्धि में कहते हैं— 'अमानित्वादिनिष्ठो यो यश्चाद्वेष्ट्रादिसाधनः ज्ञानमुत्पद्यते तस्य न बहिर्मुखचेतसः (नैष्कर्म्यसिद्धि ४.६८)। साधक व सिद्ध में केवल यही भेद है कि सिद्ध में यह जीवन की दिव्यता या क्रियाशील दीप्ति अप्रयत्न से ही प्रकट होती है जब कि साधक में प्रयत्न से । 'उत्पन्नात्मप्रबोधस्य स्वद्वेष्टृत्वादयो गुणाः अयत्नतो भवन्त्यस्य न तु साधनरूपिणः' (नैष्कर्म्यसिद्धि ४.६९)। ईशावास्योपनिषद् का प्रथम मन्त्र, जो अद्वैत के साधक के लिये है, स्पष्टतः ईश्वर से सारे परिदृश्यमान अर्थात् कार्य-कारणसंघात और उसकी क्रियास्थली को आच्छादन करने का आदेश देता है। धर्म व दर्शन दोनों का संश्लिष्ट लक्ष्य शिवज्ञान ही है। यहाँ और अभी वह ज्ञान सम्भव है, क्योंकि मानव के अन्तस्तल में वह कालातीत भाव से उपस्थित है। सर्वज्ञ शङ्कर ब्रह्म को ही लक्ष्य स्वीकारते हैं, जो सोपाधिक व निरुपाधिक रूप से उपनिषद् द्वारा प्रतिपाद्य है। यह ब्रह्म साधक की तात्त्विक वास्तविकता (metaphysical reality) है। यह शरीरी नहीं है पर शरीरभाव में शरीरी रूप से प्रतीत होता है। व्हाइटहेड ने विज्ञान व साम्प्रत जगत् में धर्म का लक्षण करते हुए कहा है, 'विश्वातीत, विश्वसंचालक एवं विश्व का आधार ऐसा सत्य है, जिसका सत्यापन ज्ञान द्वारा करना है। इसका परोक्ष ज्ञान धर्म का प्रारम्भ है एवं अपरोक्ष ज्ञान लक्ष्य है। यह सुदूर सत्य भी है एवं अतिसन्निहित तत्त्व भी। यही सभी प्रवह्रित अनुभूतियों को सार्थक करता है पर स्वयं अज्ञात बना रहता है। यही अन्तिम सत्य भी है और अप्रकट भी है, जिसे पकड़ना या जानना असम्भव लगता है।' इसे ही शङ्कर 'ब्रह्म' कहते हैं, जो नित्यसिद्ध होने पर भी जिज्ञासु जीव को साध्य लगता है। इसीलिए साधना व ईश्वरदर्शन आवश्यक हो जाता है। 'नित्यमुक्तः सदेवास्मीत्येवं चेन्न भवेन्मतिः । किमर्थं श्रावयत्येवं मातृवच्छू तिरादृता ( उ० सा० तत्त्वमसि० ३)। व्हाइटहेड व आचार्य शङ्कर की दृष्टि में एक बड़ा भारी भेद यह है कि व्हाइटहेड की दृष्टि में अन्वेषण का उद्देश्य कभी पूरा नहीं होगा परन्तु शङ्कर की दृष्टि में अवश्य पूर्ण होगा क्योंकि वह हृदयाकाश में आत्मरूप से सदा मौजूद है। अतः धर्म चाहे अदृष्ट फल हो, परन्तु परमधर्मस्वरूप शिव तो दृष्टफल ही है।

इसकी प्राप्ति के लिये शङ्कर ने अधिकारमीमांसा को प्रधानता दी है। अधिकारवाद के द्वारा ही हमें पता चलता है कि अद्वैत के आचार्य की पकड़ विश्व की अनन्त उलझनों के विषय में कितनी गहरी है। धर्म-विचार वैसा सरल नहीं है, जैसा कई आधुनिक लोग समझते हैं। जीव व ब्रह्म की तात्त्विक एकता का अर्थ है कि प्रत्येक जीव ब्रह्मभाव का अनुभव करे, मानवयोनि को छोड़ इस बन्धन का अनुभव एवं बन्धन को बन्धन समझने की योग्यता भी नहीं आती। मानवों में भी सभी लोग तड़पन के साथ बन्धनिवृत्ति की कामना नहीं करते। इसीलिये मनुष्यता व मुमुक्षुता की आवश्यकता होती