उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( xv ) इस सावधानी के लिए ही गुरु की अत्यन्त आवश्यकता होती है। गुरु वही हो सकता है जो ब्रह्मसाक्षात्कारवान् हो एवं शिक्षा देने में समर्थ हो। उसमें शिष्य के हृदय में शूलवत् चुभने वालो शंकाओं को समझने की व उनका हृदय- ग्राही युक्तियों से निराकरण करने की सामर्थ्य आवश्यक है। जिस गुरु से अपनी शंका निवृत्त न हो वह अपना गुरु नहीं हो सकता। दुःखी के दुःखकी निवृत्ति करने की इच्छा व प्रवृत्ति गुरु में उपस्थित होनी चाहिये । जिसने स्वयं परम्परा से ज्ञान प्राप्त नहीं किया है उसका दूसरे को उपदेश करने का अधिकार नहीं है क्योंकि उसका ज्ञान कभी प्रामाणिक नहीं हो सकेगा। ‘आचार्यश्वोहापोहग्रहण .........दयानुग्रहादिसम्पन्नो लब्धागमो .......ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः’ (उ० सा० शिष्या० ६)। शुकदेव ने साक्षात् वेदव्यास के पुत्र होने से उनसे आगम प्राप्त किया व गौडपाद ने घोर तपस्या व उपासना करके साक्षात् शुक से बद्रिकाश्रम में यह ज्ञान प्राप्त किया। गौडपाद के ही प्रशिष्य शंकर होने से उनकी लब्धागमता निःशंक है। शंकर से आज तक परमहंसों में यह परम्परा अविच्छिन्न चल ही रही है। अतः परमहंस ही अद्वैत वेदान्त के उपदेष्टा रहे हैं व आज भी हैं। स्वयं जो मार्ग पर चल चुका है व लक्ष्य का साक्षात्कार कर चुका है, वही दूसरे को भी ठीक मार्गदर्शन करा सकता है व लक्ष्य पर पहुँचा या नहीं इसे निश्चित बता सकता है। यह लोकसिद्ध भी है। आचार्य शंकर स्वयं इस सम्प्रदाय के प्रति अति विनम्र थे एवं अपने गुरु के प्रति उनकी श्रद्धा अपार थी। ‘यद्वाक्सूर्यां- शुसन्तापप्रणष्टध्वान्तकल्मषः । प्रणम्य तान् गुरून् वक्ष्ये ब्रह्मविद्याविनिश्चयम् (उ० सा० सम्य० ३)। जिनकी वाणी रूप सूर्यकिरणों से अज्ञानान्धकार व उससे जनित शोकमोहादि समूल नष्ट हो गये, उनके सामने विनत रहते हुए ही मैं ब्रह्मज्ञान के परमार्थस्वरूप को निःसन्दिग्ध रूप से प्रतिपादित करूँगा—कहकर वे इसे स्पष्ट करते हैं। अद्वैत दर्शन में ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मरूप ही है अतः वस्तुतः गुरुरूप से साक्षात् परब्रह्म ही जीव की मुक्ति करता है। ज्ञानमार्ग में ईश्वर व गुरु अभिन्न हैं व गुरु की सेवा ही ईश्वरसेवा है तथा गुरु में प्रेम ही ईश्वरप्रेम है। यही निवृत्ति मार्ग का हृदय है। गुरु में श्रद्धा व उसकी आज्ञा का बिना किसी विचार के पालन ही विधिनिषेधों का स्थान ले लेता है। फलोत्पादक कर्मों का सर्वथा त्याग करना आवश्यक है। गुरु का अनुग्रह ही ईश्वरानुग्रह है। आत्मा का अज्ञाननाश ही उपेय है। इसके सिवाय किसी भी अन्य उद्देश्यार्थ उपाय का अवलम्बन ही नहीं, उपाय की संभावना वाले साधनों का त्याग भी आवश्यक है। ‘तच्चैतत्परमार्थदर्शनम्प्रतिपत्तिमिच्छता ............सर्वकर्मणां तत्साधनानाञ्च यज्ञोपवीतादीनां त्यागः कर्त्तव्यः’ (उ० सा० शिष्या० ४४)। यद्यपि ज्ञान तो सभी को हो सकता है परन्तु ब्रह्मनिष्ठा या साक्षात्कार तो सर्वथा सर्वदा सर्वतः लगने पर ही संभव है। एल्डस हक्सली कहते हैं कि ईश्वर को ढूँढ कर पाना सब समय लगकर थकानेवाला काम है*। कई बार प्रश्न उठता है कि ऐसा निवृत्तिमार्गी क्या जीवन को नकार नहीं रहा है ? वस्तुतः जीवन का अर्थ सभी के लिए एक ही नहीं है। जिसको जो सर्वाधिक अर्ह प्रतीत होती है उसके लिए अन्य सभी को छोड़ पूर्णरूपेण उसमें लग जाना ही तो जीवन को सकारना है। अतः सहजता व आनन्दपूर्वक ब्रह्मान्वेषण में लगना ही ब्रह्मान्वेषी का जीवन सकारना है। इससे भिन्न किसी कार्य में रत होना ही उसके लिए जीवन नकारना है। हम प्रायः अपने जीवन में द्वन्द्वों से इसीलिए परेशान रहते हैं कि हममें अपनी इष्ट देवता की प्राप्ति में सभी कुछ झोंकने का साहस नहीं हो पाता। हम कई इष्ट देवताओं को स्वीकार लेते हैं। यह बहुदेवतावाद ही हमारे लक्ष्यप्राप्ति में सर्वाधिक बाधक है। बिना एकदेवतावादी हुए कभी भी सफलता या सन्तोष और शान्ति सम्भव नहीं है। ‘कर्मनाशभयाज्जन्तोरात्मज्ञानाग्रहस्तथा ( उ० सा० बुद्धय० १)। अतः यह झूठा आरोप है कि वेदान्त जीवन को नकारता है। वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति अपनी मान्यतानुसार जो नहीं चलता, उसे जीवन को नकारनेवाला मानता है। चार्वाक ऋण से भी घी पीने को कहता है तो उसे देशभक्त कर्त्तव्यच्युत मानता है, और देशभक्त को चार्वाक मूर्खता से जीवन को नकारनेवाला बताता है, अतः ब्रह्म को साक्षात् जानने में प्रवृत्त अन्य सभी को मानव जीवन के सर्वोत्तम लक्ष्य का परित्याग करके जीवन को नकारनेवाला ही मानता है। योगवासिष्ठ को पढ़ने से ऐसे लोगों का अपनी मूर्खता से अपना व समाज का नाश करना स्पष्ट हो जाता है। करुणामूर्त्ति होने से आचार्य शंकर ऐसी कठोर भाषा का प्रयोग नहीं करते पर अपने प्रसन्न-गम्भीर शब्दों से साधक को सावधान तो करते ही हैं। इस
- ‘The seeking of God is a tiresome, wholetime job !’—Aldous Huxley in Perennial Philosophy.