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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

( xv ) इस सावधानी के लिए ही गुरु की अत्यन्त आवश्यकता होती है। गुरु वही हो सकता है जो ब्रह्मसाक्षात्कारवान् हो एवं शिक्षा देने में समर्थ हो। उसमें शिष्य के हृदय में शूलवत् चुभने वालो शंकाओं को समझने की व उनका हृदय- ग्राही युक्तियों से निराकरण करने की सामर्थ्य आवश्यक है। जिस गुरु से अपनी शंका निवृत्त न हो वह अपना गुरु नहीं हो सकता। दुःखी के दुःखकी निवृत्ति करने की इच्छा व प्रवृत्ति गुरु में उपस्थित होनी चाहिये । जिसने स्वयं परम्परा से ज्ञान प्राप्त नहीं किया है उसका दूसरे को उपदेश करने का अधिकार नहीं है क्योंकि उसका ज्ञान कभी प्रामाणिक नहीं हो सकेगा। ‘आचार्यश्वोहापोहग्रहण .........दयानुग्रहादिसम्पन्नो लब्धागमो .......ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः’ (उ० सा० शिष्या० ६)। शुकदेव ने साक्षात् वेदव्यास के पुत्र होने से उनसे आगम प्राप्त किया व गौडपाद ने घोर तपस्या व उपासना करके साक्षात् शुक से बद्रिकाश्रम में यह ज्ञान प्राप्त किया। गौडपाद के ही प्रशिष्य शंकर होने से उनकी लब्धागमता निःशंक है। शंकर से आज तक परमहंसों में यह परम्परा अविच्छिन्न चल ही रही है। अतः परमहंस ही अद्वैत वेदान्त के उपदेष्टा रहे हैं व आज भी हैं। स्वयं जो मार्ग पर चल चुका है व लक्ष्य का साक्षात्कार कर चुका है, वही दूसरे को भी ठीक मार्गदर्शन करा सकता है व लक्ष्य पर पहुँचा या नहीं इसे निश्चित बता सकता है। यह लोकसिद्ध भी है। आचार्य शंकर स्वयं इस सम्प्रदाय के प्रति अति विनम्र थे एवं अपने गुरु के प्रति उनकी श्रद्धा अपार थी। ‘यद्वाक्सूर्यां- शुसन्तापप्रणष्टध्वान्तकल्मषः । प्रणम्य तान् गुरून् वक्ष्ये ब्रह्मविद्याविनिश्चयम् (उ० सा० सम्य० ३)। जिनकी वाणी रूप सूर्यकिरणों से अज्ञानान्धकार व उससे जनित शोकमोहादि समूल नष्ट हो गये, उनके सामने विनत रहते हुए ही मैं ब्रह्मज्ञान के परमार्थस्वरूप को निःसन्दिग्ध रूप से प्रतिपादित करूँगा—कहकर वे इसे स्पष्ट करते हैं। अद्वैत दर्शन में ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मरूप ही है अतः वस्तुतः गुरुरूप से साक्षात् परब्रह्म ही जीव की मुक्ति करता है। ज्ञानमार्ग में ईश्वर व गुरु अभिन्न हैं व गुरु की सेवा ही ईश्वरसेवा है तथा गुरु में प्रेम ही ईश्वरप्रेम है। यही निवृत्ति मार्ग का हृदय है। गुरु में श्रद्धा व उसकी आज्ञा का बिना किसी विचार के पालन ही विधिनिषेधों का स्थान ले लेता है। फलोत्पादक कर्मों का सर्वथा त्याग करना आवश्यक है। गुरु का अनुग्रह ही ईश्वरानुग्रह है। आत्मा का अज्ञाननाश ही उपेय है। इसके सिवाय किसी भी अन्य उद्देश्यार्थ उपाय का अवलम्बन ही नहीं, उपाय की संभावना वाले साधनों का त्याग भी आवश्यक है। ‘तच्चैतत्परमार्थदर्शनम्प्रतिपत्तिमिच्छता ............सर्वकर्मणां तत्साधनानाञ्च यज्ञोपवीतादीनां त्यागः कर्त्तव्यः’ (उ० सा० शिष्या० ४४)। यद्यपि ज्ञान तो सभी को हो सकता है परन्तु ब्रह्मनिष्ठा या साक्षात्कार तो सर्वथा सर्वदा सर्वतः लगने पर ही संभव है। एल्डस हक्सली कहते हैं कि ईश्वर को ढूँढ कर पाना सब समय लगकर थकानेवाला काम है*। कई बार प्रश्न उठता है कि ऐसा निवृत्तिमार्गी क्या जीवन को नकार नहीं रहा है ? वस्तुतः जीवन का अर्थ सभी के लिए एक ही नहीं है। जिसको जो सर्वाधिक अर्ह प्रतीत होती है उसके लिए अन्य सभी को छोड़ पूर्णरूपेण उसमें लग जाना ही तो जीवन को सकारना है। अतः सहजता व आनन्दपूर्वक ब्रह्मान्वेषण में लगना ही ब्रह्मान्वेषी का जीवन सकारना है। इससे भिन्न किसी कार्य में रत होना ही उसके लिए जीवन नकारना है। हम प्रायः अपने जीवन में द्वन्द्वों से इसीलिए परेशान रहते हैं कि हममें अपनी इष्ट देवता की प्राप्ति में सभी कुछ झोंकने का साहस नहीं हो पाता। हम कई इष्ट देवताओं को स्वीकार लेते हैं। यह बहुदेवतावाद ही हमारे लक्ष्यप्राप्ति में सर्वाधिक बाधक है। बिना एकदेवतावादी हुए कभी भी सफलता या सन्तोष और शान्ति सम्भव नहीं है। ‘कर्मनाशभयाज्जन्तोरात्मज्ञानाग्रहस्तथा ( उ० सा० बुद्धय० १)। अतः यह झूठा आरोप है कि वेदान्त जीवन को नकारता है। वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति अपनी मान्यतानुसार जो नहीं चलता, उसे जीवन को नकारनेवाला मानता है। चार्वाक ऋण से भी घी पीने को कहता है तो उसे देशभक्त कर्त्तव्यच्युत मानता है, और देशभक्त को चार्वाक मूर्खता से जीवन को नकारनेवाला बताता है, अतः ब्रह्म को साक्षात् जानने में प्रवृत्त अन्य सभी को मानव जीवन के सर्वोत्तम लक्ष्य का परित्याग करके जीवन को नकारनेवाला ही मानता है। योगवासिष्ठ को पढ़ने से ऐसे लोगों का अपनी मूर्खता से अपना व समाज का नाश करना स्पष्ट हो जाता है। करुणामूर्त्ति होने से आचार्य शंकर ऐसी कठोर भाषा का प्रयोग नहीं करते पर अपने प्रसन्न-गम्भीर शब्दों से साधक को सावधान तो करते ही हैं। इस

  • ‘The seeking of God is a tiresome, wholetime job !’—Aldous Huxley in Perennial Philosophy.

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जीवन को सकारने की प्रक्रिया में गुरु का विशेष स्थान है क्योंकि इह वा पारलौकिक फलेच्छा के त्याग से लौकिक व शास्त्रीय विधि-निषेध उसे प्रवृत्त नहीं कर सकते। दृष्ट फल के लिए गुरु ही उसे श्रवणादि सब साधनों को बताकर प्रवृत्त करेगा व प्रत्येक शिष्य के संस्कारानुसार उसके विशेष मार्ग का प्रतिपादन कर सकेगा। शिष्यों के अनन्त संस्कारों के भेद होने से यहाँ नियतता ( Codification ) सम्भव ही नहीं है। अतः गुरुशरण के बिना निवृत्तिमार्ग पेंदी से रहित लोटा हो जायगा। 'यो हि यस्माद् विरक्तः स्यात् नासौ तस्मै प्रवर्तते । लोकत्रयाद्विरक्तत्वान्मुमुक्षुः किमितीहते ( उ० सा० तत्त्वमसि० २३०)। 'स गुरुस्तारयेद्युक्तं शिष्यं शिष्यगुणान्वितम् ब्रह्मविद्याप्लवेनाशु स्वान्तध्वान्त- महोदधिम्' ( उ० सा० सम्यङ्मति० ५३ ) । ब्रह्मज्ञान का वास्तविक फल तो सद्योमुक्ति ही है। 'सद्योमुक्तिकारणमात्मज्ञानम् ( ब्र० सू० भा० १-१-६)। इस अनुभव का स्पष्ट रूप से प्रतिपादन कटे हाथ का दृष्टान्त है। काट कर फेंक दिये हाथ के साथ अपने को हाथवाला जैसे नहीं मानते वैसे ही विवेक की तलवार से सभी अनात्म विशेषणों को त्याग देने पर निर्विशेष ज्ञानी रह जाता है। 'छित्त्वा त्यक्तेन हस्तेन स्वयं नात्मा विशेष्यते…………अनात्मत्वेन तस्माज्ज्ञो मुक्तः सर्वविशेषणैः ( उ० सा० विशेषापोह० १, २)। पर यह ज्ञान आत्मा का है, बुद्धि का नहीं। बुद्धि में ही विद्या व अविद्या हैं, यह साङ्ख्य की मान्यता है। पर अद्वैत ज्ञानी के स्वानुभव में बुद्धि भी स्वरूप से आत्मा से अभिन्न ही है। इसे बड़े सुन्दर रूप से आचार्य ने बुद्धि व आत्मा के संवाद के द्वारा निरूपित किया है। बुद्धि कहती है कि आपके किसी सम्बन्धी का ही शायद मेरे से उपकार हो जाय, तो आत्मा कहती है कि मैं एकाकी हूँ, अतः मेरा न कोई अंश, गुण या सम्बन्धी है और न मैं किसी का अङ्ग या सम्बन्धी हूँ और असङ्ग होने से मुझे तेरा कोई प्रयोजन नहीं। अतः अब तुम निवृत्त ही हो जाओ। पर तुम्हें भी घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि तुम स्वयं भी तो मेरे अज्ञान से ही कल्पित होने से मुझ में अध्यस्त हो। अतएव मैं ही तुम्हारी वास्तविकता या अधिष्ठाता हूँ। 'अहं ममैको न मदन्यदिष्यते तथा न कस्यापि अहमस्म्यसङ्गतः । असङ्गरूपोऽहमतो न मे त्वया कृतेन कार्यं तव चाद्यवत्त्वतः' ( उ० सा० मतिविलापन० ४)। अतः भौतिक रूप से देह को छोड़ना आवश्यक नहीं है। उसकी प्रातिभासिकता से मुक्ति में विघ्न नहीं होता। इसकी दृढ़ता के लिये ही परिसंख्यानप्रकरण है। इसमें 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' न्याय से अपने शत्रु-मित्र या उदासीन का भाव नष्ट हो जाता है। शत्रु आदि इस संघात पर ही क्रिया या चिन्तन करते हैं और संघातारूप न होने से मैं उनकी शत्रुता का विषय नहीं। परम कारण तो अनात्मा की तुच्छता ही है। यह अद्वैत का विश्व को परम शान्ति का सन्देश है। इसको यदि बुद्धि में संस्कार रूप से किञ्चित् भी स्थान मिल जाय तो युद्ध, हिंसा, संघर्ष, प्रतियोगिता आदि को स्थान ही न रह जाय। स्थितप्रज्ञ, गुणातीत, भगवद्भक्त, तुरीयातीत, अतिवर्णाश्रमी आदि शब्दों से ऐसे ज्ञानी के शरीर का व्यवहार निरूपित किया गया है। इसका उद्देश्य ज्ञानी के लिये विधि करना नहीं है परन्तु साधकों को जीवन-प्रणाली बतलाना है। वेदान्त धर्म का यही प्राण है क्योंकि यह ऐसी वास्तविकता है, जो जीवन्मुक्त के बाह्याचरणों से उपलक्षित होती है और यज्ञादि अन्य धर्मों के पारलौकिक फल का स्थान ले लेती है। पर स्वर्गादि फल कभी अपरोक्ष नहीं होते, लेकिन ज्ञान की यह अवस्था ज्ञानियों में अपरोक्ष रूप से प्रकट है। वह मानो खिड़की है, जिससे ईश्वर का प्रत्यक्ष होता है। अप्पर का स्पष्ट कथन है कि शिवभक्त व शिव में कोई भेद नहीं है। ईसा के विषय में भी यही कहा जाता है कि वहाँ आदमियत व देवभाव युगपत् मौजूद है। परन्तु ईसाई धर्म की मान्यता है कि केवल ईसा में ही यह सम्भव है, जब कि वेदान्त मानता है कि प्रत्येक मानव में यह सम्भव है। हिन्दू धर्म का इतिहास इस बात में प्रमाण है कि यह युगलभाव सभी कालों में किसी-किसी में व्यक्त होता ही रहता है। जैसे वर्तमान ईसाई मान्यताओं से ईसा का परीक्षण नहीं हो सकता वैसे ही उन ज्ञानियों के सम्प्रदायविशेषों से उनका परीक्षण नहीं हो सकता। परन्तु उसकी आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि हमें तो अपने युग के प्रत्यक्ष ज्ञानियों से ही मतलब होना चाहिये। विट्- जेन्सटाइन ( Wittgenstein ) अपने दर्शनान्वेषण ( Philosophical Investigation ) नामक ग्रन्थ में कहते हैं कि भाषा एक ऐसा चित्र है जो हमको मोह में डालकर रखता है। इसे ही वेदान्त माया कहता है। नामरूपात्मक सृष्टि में नाम की प्रधानता को मानना ही पड़ता है। वेदान्त का एक पक्ष तो शब्दस्फोट या नाद को ही रूप का कारण स्वीकारता है। पर जब तक मोह रहता है तब तक हम मोहक की अवास्तविकता को नहीं जान सकते। उसे किसी भी नाम से कहा

( xvii ) जाय, वह वास्तविक ज्ञान का विषय नहीं हो सकता। अतः उसे अज्ञान या माया या अविद्या नाम से कह दिया जाता है। वस्तुतः हम अपने को मोह में पड़ने देते हैं अतः हम ही मोहक हैं पर लगता है कि कोई और हमें भेद में डाल रहा है। इस मोह को भंग करना ही जीवन का लक्ष्य है। विट्जेन्स्टाइन कहता है कि दर्शन हमारे बुद्धि के मोह को भंग करने का युद्ध मात्र है ( a battle against the bewitchment of our intelligence ) । जिनका यह मोह भंग हो गया है, वे ही अद्वैत सिद्धान्त के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि आत्मज्ञानी शोक-मोह से परे हो जाता है। ‘श्रुतिस्तत्त्वमसीत्याह श्रौतुर्मोहापनुत्तये ( उ० सा० तत्त्वमसि० ९९ ) । अद्वैत उस आत्मज्ञान को प्राप्त करना ही मानव-जीवन का लक्ष्य मानता है। कई आचार्य तो समग्र सृष्टि-प्रक्रिया को भी इसी उद्देश्य के लिये ही स्वीकारते हैं। शिव और जीव को अलग करने वाला सकारण प्रपञ्च ही है। प्रपञ्च की सकारण उपशान्ति ( प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतम् ) ही जीव के काल्पनिक भेद को निवृत्त कर उसे शिवस्थिति का बोध करा देती है और यह श्रवण के द्वारा ही सम्भव है। इस प्रकार उपदेशसाहस्री किसी भी मोक्षमार्ग के पथिक के लिए दृढ़ सम्बल है। इस एक ही ग्रन्थ को भली प्रकार विचारपूर्वक समझ कर तदनुकूल साधना करने से साधक निश्चित् ही अपने लक्ष्य पर पहुँच जायगा। वर्त्तमानकाल में संस्कृत का पठन-पाठन विरल होता जा रहा है। यद्यपि यह सत्य है कि संस्कृत में दार्शनिक विषय को स्पष्ट करने की जो सामर्थ्य है, वह अभी हिन्दी में नहीं आ पायी है। परन्तु इतने मात्र से असंस्कृतज्ञ को वेदान्त के प्रवेश से वंचित रखना उपयुक्त न समझ कर गत दो सौ वर्षों से हिन्दी में उत्कृष्ट वेदान्त ग्रन्थों की रचना की परम्परा प्रारम्भ करने में संन्यासी अग्रगामी बने । 'महेश अनुसन्धान' इसी कड़ी में आगे बढ़ रहा है। हम उसके संचालक व प्रबन्धकों को आशीर्वाद देते हैं कि वे स्वयं भी पूर्ण निष्ठा प्राप्त कर सकें व इस प्रकार के ग्रन्थों को अनूदित करके जनसामान्य को इस भीषण काल में वेदान्त की ओर प्रवृत्त कर उन्हें शान्ति देने में समर्थ हो सकें। जनता से भी अनुरोध है कि जीवन में प्रतिदिन न्यूनतम २४ मिनट ( १ घड़ी ) अर्थात् १/६० या षष्ट्यंश वेदान्त-ग्रंथों के स्वाध्याय में लगावें। सर्वज्ञ शङ्कर की भाषा व युक्ति इतनी सरल व जीवन में व्यावहारिक है कि कल्याण हुए बिना रह ही नहीं सकता। उमामहेश्वर से प्रार्थना है कि यह ग्रन्थ भारत के अशान्त वातावरण में सभी को शान्ति पहुँचा कर सफल हो। शङ्कर मठ भगवत्पादीयो अर्बुदाचल महेशानन्दगिरिः

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प्राक्कथन संसार में प्राणिमात्र को सुख और दुःख की अनुभूति हुआ करती है। शीतोष्णादि द्वंद्व व्यक्ति की सहनशक्ति अथवा केवल भावना के अनुरूप अनुकूल या प्रतिकूल संवेदन का रूप धारण करते हैं। अनुकूल संवेदन को सुख कहते हैं और प्रतिकूल संवेदन ही दुःख कहलाता है। लोक और वेद—दोनों में संसारियों के सुख-दुःख का यही स्वरूप प्रसिद्ध है। प्रत्येक विषय अन्तःकरण में अनुकूल या प्रतिकूल संवेदन प्रसारित करता है। इन संवेदनों का केवल प्रकाशक और साक्षी होता हुआ भी अविद्यावशात् आत्मा स्वयं को सुखी या दुःखी मान लेता है। मन्त्र, औषधि अथवा सुषुप्ति के संबंध से प्रसुप्त हुआ पुरुष विषय-संस्पर्श का एवं उनसे होनेवाले सुख-दुःखादि का अनुभव नहीं करता क्योंकि सुखदुःखादि वृत्तियों को उत्पन्न करनेवाली मनोवृत्ति और उन्हें आत्मसात् कर स्वयं को सुखी या दुःखी बनानेवाली अहंवृत्ति उस अवस्था में निष्किय हो जाती है। परन्तु अविद्यावृत्ति से युक्त हुए प्राज्ञ का उस समय भी अभाव नहीं रहता। अतः सुषुप्ति में भी अहंवृत्तिनिरपेक्ष शान्तवृत्तिरूप आनन्दानुभूति सबको मान्य ही है। आनन्द ही आत्मा का स्वरूप है। समस्त चेष्टाओं की निवृत्ति ही उसके प्रकाशित होने का स्थान है। सुखरूप अनुकूल संवेदन में प्राप्त इस आनन्द के आभासमात्र के सम्पादन की प्रवृत्ति सभी पुरुषों में दिखायी देती है। परन्तु यह सुख की अनुभूति विषयसापेक्ष ही होती है। किसी भी सांसारिक वस्तु का संयोग आत्मा के लिये वस्तुतः सुखप्रद हो नहीं सकता क्योंकि आत्मा का स्वरूपभूत आनन्द इतरनिरपेक्ष होता है। अतः यह आनन्द ही जिज्ञास्य है। ईश्वर अथवा ब्रह्म को ही सुखस्वरूप जानकर और स्वयं को उससे पृथक् समझकर उसके संयोग हेतु किया गया प्रयास ही आत्मशुद्धि में हेतु बनता है। आत्मा अपरिच्छिन्न, नित्य और अद्वय है। श्रुतियों ने भी इसी तथ्य का समर्थन किया है। ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व को जानना ही अध्यात्मज्ञान है। इस अद्वितीय आत्मा में कार्य-कारण, द्रष्टा-दृश्य, अधिष्ठान-अध्यस्त, व्याप्य- व्यापक आदि भेद कल्पित ही हैं। असत्, अचित् और असुख का बाध करने के अभिप्राय से ही इस आत्मतत्त्व की 'सच्चिदानन्द' संज्ञा प्रसिद्ध है। आत्मा में जन्म-मरण, काम-क्रोध, संयोग-वियोग आदि का सर्वथैव अभाव है। इस प्रकार सुदृढ़ बोध होने पर आत्मज्ञ पुरुष को किसी से किसी प्रकार का भय और कामक्रोधादि से क्षति नहीं हुआ करती। आत्मतत्त्वज्ञान की इस प्रक्रिया को विषद रूप से स्पष्ट कर अविद्याग्रस्त मनुष्यों का मार्गदर्शन करने हेतु भगवत्पूज्यपाद श्रीमच्छङ्कराचार्य ने इस उपदेशसाहस्त्री की रचना कर मानवमात्र को अनुगृहीत किया है। जब तक मनुष्य अपने को ही विस्मृत किये रहता है, तब तक वह इस जन्म-मरणरूप संघर्षात्मक संसार में फँसा रहता है। परमकारुणिक शंकरावतार आचार्यचरणों ने मानव की इस दुर्दशा को देखकर उनके उद्धारार्थ मानो यह संजीवनी औषधि प्रदान की है, जिससे भाग्यशाली लोगों ने लाभ उठाया और भवरोग से मुक्त भी हुए हैं। आज समय बहुत परिवर्तित हो रहा है। लोग शास्त्रों से तो दूर होते ही जा रहे हैं, यहाँ तक कि संस्कृत भाषा से भी परिचित नहीं रहे हैं। तथापि अपने उद्धार की इच्छा उन्हें भी रहती है और उनको भी तो शास्त्रसम्मत विद्या से वंचित नहीं रखना है। इस दृष्टि से आचार्यचरण के इस अद्भुत ग्रन्थ का हिन्दी रूपान्तर विस्तृत व्याख्या के साथ प्रकाशित करने का 'महेश अनुसंधान संस्थान' का प्रयास स्तुत्य है। प्राचीन विद्या के प्रचार-प्रसार एवं इस

( viii ) प्रकाशन के प्रेरक अनन्तश्रीसमलंकृत दक्षिणामूर्तिपीठाधिप श्रीमत्स्वामी महेशानन्द गिरि जी महाराज एक सत्पुरुष होने के नाते स्वयं ही धन्य हैं। उनकी दिनचर्या एवं व्यक्तित्व को देखकर यह अनुभव हो जाता है कि उन्होंने अपने जीवन को आचार्यचरणों के उपदेशानुसार कृतार्थ कर लिया है। अतः उनके विषय में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान ही होगा, इसलिये सूर्य को अर्घ्य प्रदान करने के समान हम उनके चरणों में अपना प्रणामार्घ्य प्रदान करते हैं। इस ग्रंथ के मुद्रण के समय इसे शीघ्रातिशीघ्र ग्रंथ का आकार प्रदान करने के लिये पुनः पुनः प्रूफ-संशोधन, अर्थानुसन्धानपूर्वक शुद्धाशुद्धि का निर्णय आदि परिश्रम का कार्य श्री स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी ने बड़े ही मनोयोग के साथ किया है। ऐसे यति को धन्यवाद ज्ञापन कैसे करें, वे तो प्रणाम और अभिनन्दन के ही पात्र हैं। तारा प्रिंटिंग वर्क्स के श्री पण्ड्या पिता-पुत्र के सहयोग से ही ग्रंथ का मुद्रणकार्य समयानुसार हो सका, अतः वे धन्यवाद के पात्र हैं। भाषानुवाद एवं विस्तृत व्याख्या के साथ इस ग्रंथ का अध्ययन कर अधिकाधिक लोग लाभान्वित होते रहें, तभी सभी का परिश्रम सार्थक होगा। श्रीमच्छङ्करभगवत्पादैर्मथितः सरित्पतिर्वेदः । तत उद्गता च सहसा साहस्त्री समुपदेशानाम् ॥ सततं चिन्तनमस्याः संसृतिबन्धाद्विमोचकं नूनम् । भवदुःखपीडितानां सत्यं सत्यं विजानीयात् ॥ भवदीय गजाननशास्त्री मुसलगांवकर

पद्यभाग १: उपोद्घातप्रकरणम्

श्रीशङ्करभगवत्-पादाचार्यविरचिता उपदेशसाहस्री उपोद्घातप्रकरणम् चैतन्यं सर्वगं सर्वं सर्वभूतगुहाशयम् । यत्सर्वविषयातीतं तस्मै सर्वविदे नमः ॥ १ ॥ चैतन्यमिति—जो चैतन्य आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त और नित्य है¹, तथा जो समस्त प्रपञ्च का उपादान- कारण होने से सर्वस्वरूप है² और स्थावर जङ्गमादि सकल प्राणियों की बुद्धि में अन्तःसाक्षी होता हुआ निर्विकाररूप में स्थित रहता है³, एवं अविद्या और उसके कार्यों से परे है⁴, तथा त्रैकालिक जगत् को सूर्य के समान अपनी सत्तामात्र से प्रकाशित करता है, उस चित्स्वरूप⁵ (ज्ञानस्वरूप) चैतन्य (ब्रह्म) के लिये (मेरा) प्रणाम है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्'⁶—'जो सर्वज्ञ है और सर्ववित् है'—इस श्रुति, तथा 'सर्वं वेत्तीति सर्ववित्'—जो सब जानता है उसे 'सर्ववित्' कहा जाता है—इस व्युत्पत्ति के बलपर वह सर्वप्रसिद्ध सर्ववित् ब्रह्म है । उसके लिये वाणी, मन तथा शरीर से हम प्रणाम करते हैं । ग्रन्थ के प्रारम्भ में मङ्गलाचरण करना भारतीय शिष्टों की परम्परा है । मंगलाचरण करने से ग्रन्थ की निर्विघ्न परिसमाप्ति होती है, तथा उसके प्रचार-प्रसारात्मक दृष्टफल की प्राप्ति के साथ ही अदृष्टफल (पुण्य) की भी प्राप्ति होती है । अतः अपनी भारतीय-परम्परा के अनुसार प्रस्तुत ग्रन्थ के रचयिता भगवत् पूज्यपाद् शंकर स्वामिचरण भी प्रस्तुत ग्रन्थ के आरम्भ में प्रथम पद्य (श्लोक) के द्वारा अपने विशिष्ट इष्टदेवता (ब्रह्म) का स्मरण करते हुए नमस्कार (अभिवादन) के रूप में मंगल कर रहे हैं । 'एका क्रिया द्व्यर्थकरी प्रसिद्धा' इस अभियुक्तोक्ति के अनुसार जिज्ञासुजनों को, प्रस्तुत ग्रन्थ की ओर प्रवृत्त कराने के लिये, इसी मंगलाचरण रूप पद्य के द्वारा अनुबन्धचतुष्टय की भी सूचना दे रहे हैं । भगवत्पूज्यपाद आचार्य शंकरस्वामिचरण के द्वारा विरचित—ब्रह्मसूत्रभाष्य के जो अनुबन्धचतुष्टय हैं, वे ही इस ग्रन्थ के भी हैं, क्योंकि उसी का यह 'प्रकरणग्रन्थ' है । ब्रह्म में केवल तटस्थकारणता की शंका करनेवाले वैशेषिकों, नैयायिकों, पाशुपतों आदि को उत्तर देने के लिए उपर्युक्त पद्य में "चैतन्यम्" कहा गया है । चेतन ही चैतन्य है । 'चैतन्य' चेतन से भिन्न नहीं है । वह कूटस्थ ज्ञप्तिरूप है । १. 'नित्यं विभुं सर्वगतम्'—[मुं० उ० १-१-६] । २. 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'—[छां० उ० ३-१४-१], तथा 'इदं सर्वं यदयमात्मा'—[बृ० उ० २-४-६, ४-५-७], तथा 'आत्मैवेदं सर्वम्'—[छां० उ० ७-२५-२] । ३. 'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्'—[तै० उ० २-१], तथा 'हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तं हृदयम्'—[छां० उ० ८-३-३] । ४. 'नेति नेति'—[बृ० उ० २-३-६], तथा 'नेह नानास्ति किञ्चन'—[बृ० उ० ४-४-१९], तथा 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह'—[तै० उ० २-४] । ५. 'विज्ञानमानन्दम्ब्रह्म'—[बृ० उ० ३-९-२८], तथा 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्ब्रह्म'—[तै० उ० २-१] । ६. [मुं०—१-९] ।

२ उपदेशसाहस्री अतः ब्रह्म में केवल तटस्थ्य कारणता (तटस्थता) की शंका करना उचित नहीं है। एवञ्च 'ब्रह्म' चेतन (चैतन्य) रूप है। किन्तु उस चेतनरूप ब्रह्म के परिमाण के सम्बन्ध में दिगम्बर जैन तथा स्वयूथ्य अर्थात् कतिपय वेदान्ती व्याख्यातागण और आधुनिक मध्व, रामानुज आदि लोग उसका मध्यमपरिमाण, अणुपरिमाण बताते हैं। उन सबके लिये उत्तर रूप में पद्य में—"सर्वगम्" पद है। अर्थात् ब्रह्म (चैतन्य) सर्व व्यापक है। अतः वह केवल तटस्थ नहीं, कार्यरूप में परिणत होने से उपादान कारण भी है। परिणाम विवर्तरूप है यह बात दूसरी है। अतः ब्रह्म की अभिन्न निमित्तोपादान कारणता बताई गई। सांख्यदर्शनकार का कथन है कि चेतन, सर्वगत (सर्वव्यापक) रहने पर भी अनेक है, एक नहीं है। उन्हें उत्तर देने के लिये पद्य में 'सर्वम्' कहा है, अर्थात् ब्रह्म (चैतन्य) सर्वात्मक होने से एक है, अनेक नहीं है। कतिपय एकदेशीय वेदान्ती कहते हैं कि ब्रह्म सर्वात्मक रहने पर भी उसका और जीवात्मा का जल और तरंग या अग्नि और स्फुलिङ्ग की तरह अंशांशिभाव से अभेद है अर्थात् 'ब्रह्म' अंशी है और 'जीवात्मा' अंश है। उन्हें उत्तर देने के लिये पद्य में 'सर्वभूतगुहाशयम्' कहा है, अर्थात् समस्त प्राणियों की बुद्धियों (गुहाओं) में वह (ब्रह्म) साक्षी के रूप में स्थित रहता है। अतः उसमें न्यूनता की प्रतीति करानेवाला अंशांशिभाव जो प्रतीत होता है, वह वास्तविक नहीं है। शंका—'ब्रह्म' यदि सर्वभूतगुहाशय और सर्वात्मक है, तो क्या उसे 'मनोवेद्य' और सप्रपञ्च समझा जाय ? समा०—सर्वभूतों में स्थित तथा सर्वरूप होने पर भी ब्रह्म, अविद्या तथा उसके कार्यरूप समस्त विषयों से परे व्यवस्थित है। अतः उसे मनोवेद्य कैसे कह सकते हैं, क्योंकि वह विषयों से परे होने के कारण स्वयं अर्थात् निर्विशेष रूप से अविषय है। एवं कार्य-कारण भाव से यह स्पष्ट न होने से उसे सप्रपञ्च भी कैसे कहा जायगा ? अर्थात् वह ब्रह्म मनोवेद्य एवं सप्रपञ्च भी नहीं है। प्रस्तुत पद्य में 'चैतन्यं', 'सर्वगं' और 'सर्वम्' ये तीनों विशेषण 'तत् त्वमसि' इस महावाक्य के 'तत्' और 'त्वम्' दोनों पदार्थों के लिये साधारण (तुल्य) हैं। 'सर्वभूतगुहाशयम्' विशेषण के द्वारा 'त्वम्' पद का लक्ष्यार्थ, जो बुद्धि आदि का साक्षी है, उसे बताया गया है। तथा 'सर्ववित्' विशेषण से सगुण, परमेश्वर को बताया गया है, जो 'तत्' पद का वाच्यार्थ है, लक्ष्यार्थ नहीं। 'सर्वविषयातीतम्' विशेषण से 'तत्' पद का लक्ष्यार्थ निर्गुण ब्रह्म बताया गया है। यहाँ पर (यत्) सर्व- भूतगुहाशयं, विषयातीतम्' इस प्रकार 'यत्'—'तत्' पदों का सामानाधिकरण्य अर्थात् दोनों के द्वारा निर्दिष्टों की एकता (एकाधिकरणवृत्तित्व) होने से 'तत्' और 'त्वम्' पदों के द्वारा लक्षित अर्थों की 'एकता' सूचित की गई है, अर्थात् सभी विशेषणों का एक ही पदार्थ में तात्पर्य है। अतः प्रतिपाद्य जो 'तत्त्वम्पदार्थैक्य' है, वही इस ग्रन्थ का 'विषय' है। उस विषय के साथ प्रस्तुत प्रकरण ग्रन्थ का 'विषय-विषयिभाव-सम्बन्ध' ध्वनित होता है अर्थात् ग्रंथ जीव व ईश्वर की एकता बताता है। यह द्वितीय अनुबन्ध हुआ। 'चैतन्यं सर्वविषयातीतम्' पदों से चिदात्मा की सर्वानर्थ रूप विषयों से शून्यता को बताते हुए समस्त अनर्थों की निःशेष निवृत्ति के साथ ही 'निरतिशयानन्दाविर्भावरूप प्रयोजन' की सूचना दी गई है, यह तृतीय अनुबन्ध हुआ। उस प्रयोजन की इच्छा रखनेवाला 'मुमुक्षु' प्रस्तुत प्रकरण ग्रन्थ के अध्ययन का 'अधिकारी' है। इस प्रकार विषय, सम्बन्ध, प्रयोजन और अधिकारी इन चारों अनुबन्धों (अनुबन्धचतुष्टय) को उक्त मंगलाचरण के द्वारा ध्वनित किया गया है ॥ १ ॥ समापय्य क्रियाः सर्वा दारानग्न्याधानपूर्विकाः । ब्रह्मविद्यामथेदानीं वक्तुं वेदः प्रचक्रमे ॥ २ ॥ समापय्येति—पाणिग्रहण (विवाह), अग्नि का आधान जैसे विहित समस्त कर्मों के अनुष्ठान से सम्पन्न हुए व्यक्ति के लिए वेदभगवान् अब ब्रह्मविद्या के प्रतिपादन का आरम्भ करते हैं ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में देवताप्रणामरूप मङ्गलाचरण के व्याज से वेदान्तप्रतिपाद्य देवतातत्त्व का निरूपण संक्षेप में किया गया। अब वेदान्तवाक्यों का तात्पर्य भी उसी (देवतातत्त्व) में है, यह बताने के लिये कर्मकाण्ड प्रतिपादित अर्थ का अनुवाद

उपोद्घातप्रकरणम् ३ कर उसके साथ वेदान्त वाक्यों ( ज्ञानकाण्ड ) की संगति ( सम्बन्ध ) तथा उनकी ( वेदान्त वाक्यों की ) कर्मकाण्ड वाक्यों से अगतार्थता ( भिन्नार्थप्रतिपादकता ) और अनन्यशेषता ( किसी दूसरे का अंगभूत न होना ) को इस द्वितीय श्लोक के द्वारा प्रस्तुत कर रहे हैं। अभिप्राय यह है कि विवेक-वैराग्य-शमादि साधनों से सम्पन्न मुमुक्षु व्यक्ति के लिये मोक्षप्राप्ति में उपायभूत ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन करने के उद्देश से वेद का ज्ञानकाण्ड प्रवृत्त हो रहा है। उपर्युक्त साधन-सम्पत्ति का लाभ, कर्मकाण्डोक्त कर्मों के अनुष्ठान से बुद्धि [ अन्तःकरण ] की शुद्धि का होना है। नित्य-निरतिशय पुरुषार्थ ( मोक्ष ) प्राप्ति की कामना से उसके उपाय का अन्वेषण सर्वत्र करने पर भी जब साधक को वह नहीं मिलता, तब वेद में उसे ( उस उपाय को ) बताते हैं। वह उपाय समग्र वेद का वास्तविक तात्पर्य आत्मा के प्रतिपादन में ही मिलता है।१ आत्मतत्त्वज्ञान ही मोक्ष का उपाय है।२ उस आत्मतत्त्वज्ञान का उपदेश, अशुद्ध ( अपवित्र ) अन्तःकरण वाले व्यक्ति को करना उचित नहीं है, क्योंकि आत्मतत्त्वज्ञान के ग्रहण करने का सामर्थ्य उसमें नहीं होता।३ अतः ज्ञानोत्पत्ति में प्रतिबन्धक उसके दुरितक्षय के लिये वेद के कर्मकाण्ड भाग में नित्य कर्मों को प्रथमतः बताया गया है। वह ( कर्मकाण्ड भाग ) संयोग ( फल ) रूप ( द्रव्य-देवता ) चोदना और समाख्या ( नाम ) के एकरूप होने के कारण सर्वशाखाप्रत्ययन्यायसे४ इतिकर्तव्यतारूप अंगकलापपरिमाण, अधिकारी, विशेषोक्ति के द्वारा कर्म के अनुष्ठान की सबको शिक्षा देता है।५ धर्म ( कर्म ) नुष्ठान से दुरित क्षय होता है। अतः परम्परया कर्मानुष्ठान का उपयोग परमपुरुषार्थ की प्राप्ति में होता है।६ 'कर्मणा पितृलोकः' इत्यादि श्रुति से प्रतिपादित पितृलोक आदि की प्राप्ति होना कर्म का मुख्य फल नहीं है, वह तो आनुषङ्गिक फल है। पितृलोकादि फल तो कालान्तर से क्षीण हो जाते हैं। अतः क्षय ( क्षीणता ) आदि दोष से दूषित होने के कारण वे हेय हैं। उन्हें मुख्य फल नहीं कह सकते। यदि उन्हें मुख्य फल मानने का आग्रह ही हो तो भी वे चित्तशुद्धि में प्रतिबन्धक नहीं हैं।७ उसी प्रकार काम्यकर्मों का विधान पुरुष को अपनी ओर आकर्षित कर उसे स्वाभाविक कुप्रवृत्ति की ओर से निवृत्त करने के लिये है। एवं च मोक्ष के उपायस्वरूप तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लिये चित्तशुद्धि प्रथम अपेक्षित होती है। अतः चित्तशुद्धि के लिये प्रथमतः कर्म- विधान प्रवृत्त होता है, तब पश्चात् ज्ञानोपदेश किया जाता है। कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड में अर्थ दृष्ट्या ( फल की दृष्टि से ) हेतु-हेतुमद्भाव होने से यह क्रम (पौर्वापर्यसम्बन्ध) बताया गया है। ज्ञानकाण्ड का विषय साक्षात् परमपुरुषार्थरूप फल है। जिसकी प्राप्ति कर्म से नहीं होती। इससे ज्ञानकाण्ड की अगतार्थता व अनन्यशेषता भी स्पष्ट हो जाती है ॥ २ ॥ कर्माणि देहयोगार्थं देहयोगे प्रियाप्रिये । ध्रुवे स्यातां ततो रागो द्वेषश्चैव ततः क्रियाः ॥ ३ ॥ कर्माणीति—देह से सम्बन्ध प्राप्ति में किये हुये कर्म कारण होते हैं, और देह के साथ सम्बन्ध होने पर निश्चय हो प्रिय तथा अप्रिय की अनुभूति होती है। उससे राग और द्वेष होते हैं, तब उनसे प्रवृत्त होकर पुनः क्रियाएँ (कर्म) होतो हैं ॥ ३ ॥ १. 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।'—[ कठ० उ० २।१५ ], 'सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति ...........स मानसीन आत्मा जनानाम् ।'— [ तै० आ० ३।११।१ ], 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः ।'—[ भ० गी० १५।१५ ] । २. 'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।'—[ श्वे० उ० ३।८ ] । ३. 'नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ।'—[ कठ० उ० २।२४ ] । ४. [ जै० सू०-२।४।९ ] । ५. 'धर्मेण पापमपनुदति'—[ महाना० उ० ७९ ], 'न कर्म लिप्यते नरे'—[ ई० उ० २।११ ], वहीं पर 'अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा०' । ६. [ बृ० उ० १।५।१६ ] । ७. 'नित्येषु शुद्धिप्राधान्याद् भोगोऽप्यप्रतिबन्धकः । भोगं भङ्गुरमीक्षन्ते बुद्धिशुद्धिस्तु रोचते ॥' सं० वाति० १।१३१-- [ सुरेश्वराचार्य ]

उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी कर्मकाण्ड प्रतिपादित नानाविद्यकर्मानुष्ठान से होनेवाली बुद्धिशुद्धि के अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासु के प्रति ब्रह्मविद्या का उपदेश देने के लिये वेदान्त की प्रवृत्ति है, यह पूर्वश्लोक के द्वारा बताया गया है। किन्तु मुमुक्षु को उसकी अपेक्षित मोक्षप्राप्ति यदि कर्म से ही हो जाय तो ब्रह्मविद्या की कोई आवश्यकता नहीं, तब तदङ्गत्वेन (मोक्षप्राप्ति के अंगरूप से) वेदान्त की प्रवृत्ति का होना कैसे उपपन्न होगा? शंका करने वाले किसो कर्मजडव्यक्ति का अभिप्राय यह है कि लोक- व्यवहार में हम देखते हैं कि किये गये कर्म ही कर्ता को फल देते हैं। जैसे पिता के द्वारा उपदिष्ट कर्मों से इष्ट फल तथा उसके द्वारा निषिद्ध किये गये कर्मों से अनिष्ट फल, और ऐसे भी कर्म हैं जो न उपदिष्ट हैं और न निषिद्ध ही हैं, केवल दैववशात् हो जाते हैं, उनसे इष्टानिष्ट दोनों प्रकार के फल प्राप्त होते हैं। वैसे ही वेद से विहित कर्मों का इष्टफल और वेद से निषिद्ध किये गये कर्मों का अनिष्ट फल तथा व्यामिश्र (विहित-प्रतिषिद्ध) कर्मों से व्यामिश्र (इष्टानिष्ट) फल होगा। इसी अभिप्राय का शास्त्रवचन भी है—"अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्"—[ भ० गी० १८–१२]। एवं च कर्म से फल होना चाहिये। उस मोक्षरूप फल के लिये विद्या (ज्ञान) की आवश्यकता नहीं और न उनके लिये मुमुक्षु को ज्ञानकाण्ड के विचार करने की आवश्यकता है। किन्तु अक्षयफल के लिये चातुर्मास्यादि किसी कर्म का ही अनुष्ठान करना चाहिये। इस आशंका का निरास इस तृतीय व चतुर्थ श्लोक के द्वारा किया गया है। कर्मानुष्ठान करनेवाले अज्ञ व्यक्ति को कर्म के द्वारा शरीरादि- परम्परया पुनः पुनः संसाररूप अनर्थ की प्राप्ति अवश्यंभावी रहने से कर्मों को मोक्षप्राप्ति का साधन (उपाय) नहीं कहा जा सकता। जाति, आयु और भोग—ये कर्म के फल हैं, इनका होना देहसंबंध के विना संभव नहीं। अतः यह कहना होगा कि कर्म तो देह से सम्बन्ध कराने के लिये ही होते हैं। देह सम्बन्ध होने पर प्रिय अप्रिय, सुख-दुःख आदि संसार का होना अनिवार्य है।१ तदनन्तर उनके साधनों के प्रति वासनाएँ (राग-द्वेष) भी होंगी। उस वासनात्मकनिमित्त से वाचिक, मानसिक, शारीरिक क्रियाएँ होंगी ॥ ३ ॥ धर्माधर्मौ ततोऽज्ञस्य देहयोगस्तथा पुनः । एवं नित्यप्रवृत्तोऽयं संसारश्चक्रवद्भृशम् ॥ ४ ॥ धर्माधर्माविति—उन कर्मों के अनुष्ठान से अज्ञानी व्यक्ति को धर्माधर्म की प्राप्ति होती है, उससे पुनः शरीर की प्राप्ति होती है, इस रीति से यह संसार, चक्र की तरह सतत चल रहा है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्यगात्मतत्त्व ब्रह्म को न जानने के कारण अहंकार के अधीन रहनेवाला अज्ञ व्यक्ति विहितप्रतिषिद्ध कर्मों को करता रहता है। उनसे धर्माधर्म की निष्पत्ति होती है, उनसे पुनः शरीर की प्राप्ति होती है। इस प्रकार जन्म-मरण-कर्मकरण तत्फलभोगलक्षणसंसार, कुलाल के चक्र की तरह अनादिकाल से निरन्तर चल रहा है यह सभी देख रहे हैं। अतः कर्मों के ऐहिकफल अनित्य हुआ करते हैं यह अनुभव सभी को है। उसी तरह पारलौकिकफलसम्पादक कर्म भी, कर्म होने के नाते उनके फल भी नित्य कैसे हो सकते हैं ? अर्थात् उनके फल भी अनित्य हैं। इसके समर्थन में वस्तुबलावलम्बी श्रुति कह रही है—'तद्यथेहकर्मजितो लोकःक्षीयते, एवमेवामुत्र पुण्यजितोलोकःक्षीयते'। अतः २अर्थवादश्रुति का अवलम्ब लेकर कर्मजडव्यक्ति का कर्मफल को नित्य समझ बैठना उचित नहीं हैं ॥ ४ ॥ अज्ञानं तस्य मूलं स्यादिति तद्धानमिष्यते । ब्रह्मविद्याऽत आरब्धा ततो निःश्रेयसं भवेत् ॥ ५ ॥ अज्ञानमिति—अज्ञान ही उस संसार का मूल है, अतः उसका त्याग करना सभी को अभीष्ट है, इसलिए ब्रह्मविद्या का आरम्भ किया जा रहा है, उसीसे वास्तविक कल्याण हो सकता है ॥ ५ ॥ १. ‘न वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति ।’—[छां० उ० ८।१२।१] २. ‘अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतम् ।'— [श० ब्रा० २।६।३।१]

उपोद्घातप्रकरणम् हृदयस्पर्शिनी जिस प्रकार कर्म संसार के कारण हैं उसी प्रकार वे मोक्ष के भी कारण हैं। अतः भोगों का त्याग करनेपर अर्थात् अपने किए हुए कर्म ही संसार की प्राप्ति कराने में निमित्त हैं, उन निमित्तभूत कर्मों के फलों का उपभोग कर चुकने पर उन निमित्तभूत कर्मों का विनाश हो ही जायगा और संसार की निवृत्ति हो जायगी, क्योंकि ‘निमित्ताभावे नैमित्तिकाभावः' यह नियम है। एवंच मोक्ष तो प्रयत्नलभ्य है, उसके लिए ब्रह्मविद्या की कौन आवश्यकता ? किन्तु इस प्रकार की आशंका करना उचित नहीं है। कारण यह है कि कर्म और तत्फलस्वरूप संसारवृक्ष का मूल कारण अज्ञान है। एवंच कर्म अज्ञानकृत है, अतः कर्म के रहते संसार का उपरम नहीं होगा, तब मोक्ष को प्रयत्नलभ्य कैसे कह सकते हैं ? अथवा उक्त शंका का समाधान इस प्रकार भी किया जा सकता है कि अज्ञानी की कर्म करने की प्रवृत्ति कभी न रुक सकने से संसार की समाप्ति (निवृत्ति) तो कभी हो ही नहीं सकती। अपने कृतकर्म के फलभोग के समय में भी कर्मप्रवृत्ति के अवश्य रहने से पुनः फलभोग की धारा निरन्तर चलती ही रहेगी। ऐसी स्थिति में कर्मनिवृत्ति से मोक्ष की सिद्धि अनायास कैसे हो सकती है ? अतः संसार की निवृत्ति (आत्यन्तिक उपरम) के लिए अज्ञान का त्याग करना आवश्यक है, किन्तु उसका (अज्ञान का) त्याग, ब्रह्मज्ञान हुए बिना हो ही नहीं सकता। एवञ्च ब्रह्मज्ञान (ब्रह्मविद्या) से ही अज्ञान की निवृत्ति होने से संसार की निवृत्ति ( निरतिशयानन्दाविर्भावरूप कैवल्य = मोक्ष ) रूप वास्तविक कल्याण का होना सम्भव है ॥ ५ ॥

विद्यैवाऽज्ञानहानाय न कर्माप्रतिकूलतः । नाज्ञानस्याप्रहाणे हि रागद्वेषक्षयो भवेत् ॥ ६ ॥ विद्यैवेति-ज्ञान ही अज्ञान की निवृत्ति कराने में समर्थ है, कर्म नहीं, क्योंकि कर्म का अज्ञान से कोई विरोध नहीं है। और अज्ञान की निवृत्ति (विनाश) के बिना राग-द्वेष का क्षय (अभाव) नहीं हो सकेगा ॥ ६॥ हृदयस्पर्शिनी कतिपय कर्मठ (कर्म में ही नितान्त श्रद्धा रखनेवाले) लोग यह कहते पाये जाते हैं कि कर्मों की अपनी निजी विचित्र शक्ति होती है', उसके बल पर उन कर्मों के द्वारा ही अज्ञान की निवृत्ति भी कर दी जा सकती है, विद्या (ज्ञान) की क्या आवश्यकता ? किन्तु कर्मठों का यह कथन उचित प्रतीत नहीं हो रहा है क्योंकि प्रकाश से अप्रकाश का नष्ट (निवृत्त) होना तो समझ में आता है। विद्या (ज्ञान) प्रकाशात्मक है। अतः वही संसार की मूलभूत अप्रकाशरूप अविद्या और उसके कार्य को नष्ट (निवृत्त) कर सकती है। क्योंकि दोनों में परस्पर विरोध है, किन्तु अज्ञान जैसे अप्रकाशात्मक है वैसे ही कर्म भी अप्रकाशरूप (अप्रकाशात्मक) है, अतः दोनों (अज्ञान और कर्म) में कोई विरोध ही नहीं है, जिससे वह (कर्म) अज्ञान को निवृत्त कर सके। मोक्ष प्राप्ति के लिए विद्या (ब्रह्मविद्या, तत्त्वज्ञान) की आवश्यकता न समझनेवाले लोगों ने अपने पक्ष के समर्थन में जो 'हिरण्यदाः' श्रुति उपस्थित की थी, उसका पर्यवसान (तात्पर्य) आपेक्षिक अमृतत्व में समझना चाहिए। अन्यथा अनुमान २ तथा 'नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय³' इत्यादि श्रुति के साथ विरोध होगा। उसी तरह 'कर्मणैव हि'४ स्मृति का तात्पर्य भी कर्म के द्वारा अज्ञान की निवृत्ति होने में नहीं है। अन्यथा 'न कर्मणा न प्रजया' श्रुति के साथ विरोध होगा।

१. 'हिरण्यदा अमृतत्वं भजन्ते'- [ऋ० सं० ८।६।३।२], 'कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः' - [भ० गी० ३।२०] २. 'रज्ज्वावरणाविद्यातमसो तत्कल्पितसर्पाद्याकारं च रज्जुतत्त्वज्ञान-प्रदीपो निवर्तयतः, स्वभावविरोधात् । कर्म तु नाज्ञानतमोन्निवर्तकं, तदविरोधित्वात्, अप्रकाशात्मकत्वाद्वा, नीहारस्तोमवत् ।' ३. श्वे० उ० ३।८ ४. भ० गी० ३।२

६ उपदेशसाहस्री शंका—विद्या के बिना अज्ञान का क्षय (निवृत्ति) यदि नहीं होता है, तो अज्ञानक्षय के लिए ही विद्या को समझा जाय; प्रपञ्च की निवृत्ति उससे नहीं होगी, क्योंकि अज्ञान के कार्यभूत संसार (प्रपञ्च) की पारमार्थिकता (सत्यता) होने से विद्या के द्वारा उसका नाश होना संभव नहीं है । अतः उसके नाश (निवृत्ति) के लिये किसी अन्य हेतु (कारण) को सोचा जाय । समा—अज्ञान की निवृत्ति (नाश) हुए बिना रागादि दोषों का क्षय (नाश) नहीं हो पायगा, क्योंकि 'अविवेक रहने पर रागादिदोष होते हैं, और अविवेक के न रहने पर रागादिदोष नहीं होते' इस अन्वय—व्यतिरेक के बलपर यह सिद्ध हो जाता है कि रागादिदोष अविवेकपूर्वक हैं, अर्थात् अविवेक ही रागादिदोषों के होने में कारण है। ये रागादि अज्ञानमय हैं, पारमार्थिक (वास्तविक) नहीं हैं। इस कारण इनकी निवृत्ति अज्ञान की निवृत्ति से ही हो सकती है। अतः उनकी निवृत्ति के लिये किसी अन्य हेतु (कारण) के सोचने की आवश्यकता नहीं है ॥ ६ ॥ रागद्वेषक्षयाभावे कर्म दोषोद्भवं ध्रुवम् । तस्मिन्निःश्रेयसार्थाय विद्यैवात्र विधीयते ॥ ७ ॥ रागेति—राग-द्वेष का क्षय (अभाव) न होने पर उन दोषों के कारण पुनः कर्म की उत्पत्ति होना भी सुनिश्चित है। अतः श्रेय प्राप्ति (कल्याण की प्राप्ति) के लिये यहाँ ज्ञान का ही विधान किया जा रहा है ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी कुछ लोगों के मन में यह शंका होती है कि रागादि दोषों की निवृत्ति यदि न हो तो क्या हानि है ? इस शंका के समाधानार्थ श्री आचार्यचरण कहते हैं कि रागादि दोषों की निवृत्ति न होनेपर उन राग, द्वेष, मोहादि दोषों से कर्म की उत्पत्ति का होना सुनिश्चित है, क्योंकि कर्म की उत्पत्ति में रागादि दोष ही कारण (हेतु) होते हैं। तब कर्म के होने पर कर्माधीन इस संसार का होना भी निश्चित ही है, उसे कोई रोक नहीं सकता । एवञ्च कर्म से मोक्ष (मुक्ति) नहीं हो सकता । अतः मोक्षप्राप्त्यर्थ वेदान्त-सिद्धान्त को प्रकाशित किया जा रहा है कि 'निःश्रेयस (मोक्ष) के लिये एक मात्र विद्या (ज्ञान) ही समर्थ है' १ ॥ ७ ॥ ननु कर्म तथा नित्यं कर्तव्यं जीवने सति । विद्यायाः सहकारित्वं मोक्षं प्रति हि तद् व्रजेत् ॥ ८ ॥ 'ज्ञान ही अज्ञान का निवर्तक है, कर्म नहीं'—यह सुनकर ज्ञान-कर्म समुच्चयवादी कह रहा है— नन्विति—ज्ञान के समान कर्म भी यावज्जीवन (सदा-सर्वदा) करते रहना चाहिये, क्योंकि (यद्यपि स्वतन्त्र रूप से कर्म अज्ञान का विरोधी नहीं है, तथापि) वह (कर्म) मोक्षसाधन करने में ज्ञान सहायक (सहकारी) तो बन ही सकता है ॥ ८ ॥ १. नैष्कर्म्यसिद्धि के प्रारम्भ में कहा गया है कि दुःख का एकमात्र कारण देह ही है, और देहप्राप्ति का कारण पूर्वोपचित (पूर्वसञ्चित) धर्माऽधर्म हैं, और धर्माऽधर्म के कारण विहित-प्रतिषिद्ध कर्म हैं, कर्म के कारण राग-द्वेष हैं, राग-द्वेष में कारण शोभन, अशोभन अध्यास है, अध्यास में कारण अविचारित सिद्ध द्वैत वस्तु है, और द्वैत में शुक्ति-रजतादि के तुल्य स्वतः सिद्ध अद्वितीय आत्मा का अज्ञान कारण है । निष्कर्ष यह है कि सम्पूर्ण अनर्थप्राप्ति में हेतु (कारण) आत्मा का अज्ञान ही है । पारमार्थिक सुख आगमाऽपायी नहीं हैं। वह तो परतन्त्र स्वात्मस्वरूप है, उसका अज्ञान ही उसका आवरण है। उस सुख का यदि अत्यन्त उच्छेद (नाश) हो जाय तो अशेष (सम्पूर्ण) पुरुषार्थ की ही समाप्ति हो जायगी । सम्यग्ज्ञान (यथार्थ तत्त्वज्ञान के स्वरूप का लाभ) अज्ञान की निवृत्ति से ही हो सकता है। अतः अज्ञान की निवृत्ति करना अत्यन्त आवश्यक है। अशेष अनर्थ की प्राप्ति में हेतुभूत अज्ञान को निवृत्ति, प्रत्यक्षादि लौकिक प्रमाणों से हो नहीं सकती, उसकी निवृत्ति तो वेदान्तागमप्रतिपादित वाक्यों से होने वाले सम्यग् ज्ञान से ही हो सकती है ।

उपोद्घातप्रकरणम् ७ हृदयस्पर्शिनी छठे श्लोक में यह कहा था कि संसार की उत्पत्ति में कारण अज्ञान है, अतः उसका निवर्तक ज्ञान ही मोक्षप्राप्ति में कारण हो सकता है, कर्म नहीं। उस पर ज्ञान-कर्मसमुच्चयवादी कहता है कि 'वेदान्तवाक्यों के द्वारा विद्या (ज्ञान) को ही मोक्ष का हेतु (कारण) बताया गया है', किन्तु यह कथन उचित नहीं है। क्योंकि जब तक जीवन है, तब तक विद्या (ज्ञान) के समान यावज्जीवश्रुति से विहित नित्य कर्म करने के लिये कहा गया है। यह प्रश्न किया जा सकता है कि मोक्षप्राप्ति में कर्म, स्वतन्त्ररूप से (साक्षात्) कारण नहीं है, इसलिये मोक्ष में कर्म का उपयोग न होने से नित्य कर्म करने की क्या आवश्यकता है ? अर्थात् कोई आवश्यकता नहीं है। मोक्ष में कर्म को तभी कारण कह सकते हैं कि जब ज्ञान के साथ उसका समुच्चय कहा जाय। अतः ज्ञान-कर्मसमुच्चय को मोक्षप्राप्ति में कारण कहना चाहिये, केवल ज्ञान को नहीं। समुच्चयवादी अपने मत के समर्थन में प्रमाण उपस्थित करता है— "न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः १" ॥ यह स्मृति कहती है कि प्रकृति-परतन्त्र जीवित पुरुष को विद्या की तरह कर्म करना ही चाहिये। उसी तरह “यावज्जीव- मग्निहोत्रं जुहुयात्” इस श्रुति ने भी नित्य कर्म अवश्य करते रहने के लिये कहा है। इन श्रुति-स्मृतियों के वाक्यों को देखने से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि मोक्ष के प्रति कारणभूत विद्या के सहकारी के रूप में (इतिकर्तव्यता के रूप में) कर्म भी कारण (सहकारी कारण) है। अतः मुमुक्षु को भी कर्म करते रहना चाहिये, क्योंकि “विद्ययाऽमृतमश्नुते” इसमें ‘विद्यया' इस तृतीया विभक्ति के द्वारा ‘ज्ञान' मोक्ष के प्रति कारण (साधन) है, यह अवगत कराया गया है। ‘कारण' को इतिकर्तव्यता की अपेक्षा (आवश्यकता) हुआ करती है। कर्म के अतिरिक्त कोई अन्य इतिकर्तव्य यहाँ नहीं है। इसलिये फलोपकारी प्रयाजादि अंगों का दर्शादि प्रधान कर्म के साथ समुच्चय जैसे स्वीकार किया जाता है, वैसे ही कर्म के साथ ज्ञान का भी समुच्चय स्वीकार करना चाहिये ॥ ८ ॥ यथा विद्या तथा कर्म चोदितत्वाविशेषतः । प्रत्यवायस्मृतेश्चैव कार्यं कर्म मुमुक्षुभिः ॥ ९ ॥ यथेति—शास्त्रों में कर्म और ज्ञान का विधान समान रूप से किया गया है। अतः ज्ञान के समान कर्म का अनुष्ठान भी करना ही चाहिये। कर्म का अनुष्ठान न करने पर स्मृति ने प्रत्यवाय भी बताया है। इससे भी स्पष्ट होता है कि मुमुक्षुओं को अवश्य ही कर्म करते रहना चाहिये ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि “कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते । तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः” ॥ इस स्मृतिवाक्य को उपस्थित कर कहा जा सकता है कि मुमुक्षु को कर्म नहीं करना चाहिये। तथापि मोक्षफल के प्रति विद्या (ज्ञान) का सहकारी कर्म होने से उसका (कर्म का) अनुष्ठान करना ही होगा। निष्कर्ष यह है कि मुमुक्षु को विद्या (ज्ञान) प्राप्ति की तरह कर्मानुष्ठान भी आवश्यक है, क्योंकि "विद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह" इस समुच्चयविधि के द्वारा अविशेषेण (समान रूप से) दोनों का विधान किया गया है। किञ्च—"अकुर्वन् विहितं कर्म निन्दितं च समाचरन् । प्रसञ्जँश्चेन्द्रियार्थेषु नरः पतनमृच्छति” ॥ १. भ० गी० ३।५

उपदेशसाहस्री यह स्मृति कर्मानुष्ठान के न करने पर प्रत्यवाय बता रही है। इसलिये कर्म करते ही रहना चाहिये। उपर्युक्त “तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः” स्मृतिवाक्य केवल ज्ञानप्रशंसा के लिये समझना चाहिये। अन्यथा उदाहृतश्रुति-स्मृतिवाक्यों के साथ विरोध उपस्थित होगा ॥ ९॥ ननु ध्रुवफला विद्या नान्यत्किञ्चिदपेक्षते । नाग्निष्टोमो यथैवान्यद् ध्रुवकार्योऽप्यपेक्षते ॥ १० ॥ तथा ध्रुवफला विद्या कर्म नित्यमपेक्षते । इत्येवं केचिदिच्छन्ति न कर्म प्रतिकूलतः ॥ ११ ॥ नन्विति, तथेति—ब्रह्मविद्या का फल तो निश्चित (ध्रुव) है, उसे अपने फल को प्राप्ति कराने में कर्मादि किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं है। तथापि कुछ लोगों का कहना है कि ब्रह्मविद्या का फल जैसे निश्चित है, वैसे ही अग्निष्टोम- याग का फल भी निश्चित है, फिर भी उसे उद्गीथशास्त्रादि अन्य कर्मों की अपेक्षा रहती है। उसी प्रकार ब्रह्मविद्या का फल निश्चित रहने पर भी उसे नित्यकर्म की अपेक्षा रहती है। किन्तु यह समझना उचित नहीं है, क्योंकि 'कर्म' का ज्ञान के साथ विरोध है, अर्थात् दोनों परस्पर विरोधी हैं ॥ १०-११ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी (ज्ञान-कर्मसमुच्चयवादी) ने ज्ञानवादी सिद्धान्ती पर जो आक्षेप (विद्या अर्थात् ज्ञान को सहकारी कर्म की अपेक्षा रहती है) किया, उस पर सिद्धान्ती (ज्ञानवादी) उत्तर दे रहा है—कि विद्या (ज्ञान) का फल तो निश्चित है। अतः उसे अपनी फलप्राप्ति के लिये किसी अन्य कर्म आदि सहकारिकारण की अपेक्षा नहीं है। पूर्वपक्षी के सामने वह अनुमान प्रयोग करता है—‘ब्रह्मविद्या सहकारिनिरपेक्षा, ध्रुवफलत्वात् घटादिज्ञानवत्’ । तब पूर्वपक्षी (समुच्चयवादी) व्यभिचार प्रदर्शित करते हुए उसका परिहार करता है—उसका कहना है कि ज्ञानवादी के द्वारा उपस्थित किया अनुमान व्यभिचरित है। अग्निष्टोमयाग का फल ध्रुव (निश्चित) है, तथापि उसे उद्गीथशास्त्र एवं तद्गत देवतापरिज्ञान आदि सहकारी कर्म की अपेक्षा रहती है। उसी तरह विद्या (ज्ञान) का फल निश्चित रहने पर भी उसे कर्म की अपेक्षा रहती है। अतः ज्ञान-कर्मसमुच्चय पक्ष को ही स्वीकार करना चाहिये—ऐसा कुछ लोग चाहते हैं। इस पर सिद्धान्ती (ज्ञानवादी) कहता है कि पूर्वपक्षो का कथन उचित नहीं है। विद्या अपना कार्य सम्पन्न करने में कर्म की अपेक्षा नहीं करती, क्योंकि कर्म उसके (विद्या के) प्रतिकूल (विरोधी) है। अपना प्रतिकूल कभी अपना सहायक नहीं होता। तिमिर (अन्धकार) कभी भी प्रकाश का सहायक नहीं होता ॥ १०-११ ॥ विद्यायाः प्रतिकूलं हि कर्म स्यात्साभिमानतः । निर्विकारात्मबुद्धिश्च विद्येतीह प्रकीर्तिता ॥ १२ ॥ अहं कर्त्ता ममेदं स्यादिति कर्म प्रवर्त्तते । वस्तुधीना भवेद्विद्या कर्तृधीनो भवेद्विधिः ॥ १३ ॥ विद्याया इति, अहमिति—ब्राह्मणत्व-क्षत्रियत्व आदि के उचित कर्म का अनुष्ठान अभिमान से किया जाता है, इसलिये वह (कर्म), ‘ज्ञान’ का विरोधी है। इस वेदान्तदर्शन में निर्विकार आत्मबुद्धि (कूटस्थ आत्माकार ज्ञान) को ही ज्ञान (विद्या) शब्द से कहा गया है। मैं कर्त्ता हूँ, यह मेरा कर्तव्य है—ऐसी बुद्धि होने पर ही कर्म प्रवृत्त होता है और विद्या (ज्ञान) वस्तु के अधीन रहती है, व ‘कर्म’, कर्ता के अधीन होता है ॥ १२-१३ ॥

उपोद्घातप्रकरणम् ९ हृदयस्पशिनी ज्ञानवादी का कहना है कि कर्म, विद्या (ज्ञान) का विरोधी होता है। ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्वादि के अभिमान से युक्त मनुष्य के द्वारा कर्म का अनुष्ठान किया जाता है, और विद्या कूटस्थ आत्माकार होने से जाति के अभिमान से रहित मनुष्य में रहती है। अतः विद्या और कर्म में विरोध प्रसिद्ध है। श्लोक में आये हुए 'हि' शब्द से सूचित प्रसिद्धि का उपपादन 'निर्विकारात्मबुद्धिश्च विद्येतीह प्रकीर्तिता' कहकर किया गया है। 'मैं कर्त्ता, भोक्ता नहीं हूँ, किन्तु कूटस्थ ब्रह्म ही हूँ' इस आत्माकार अन्तःकरणवृत्ति को विद्या कहते हैं। 'मैं ब्राह्मण हूँ, इस कर्म का कर्ता मैं हूँ, मेरे इस कर्म से यह फल होगा' इस अभिमान से कर्म का अनुष्ठान प्रारंभ होता है, यह प्रत्यक्ष है। अतः कर्म और ज्ञान दोनों में परस्पर- विरोध स्पष्ट है। एवंच ज्ञान में प्रवृत्ति अन्तर्मुख रहती है और कर्म में बहिर्मुख प्रवृत्ति रहने से दोनों में विरोध है। उसी तरह उन दोनों की उत्पत्ति के देखने से भी विरोध प्रतीत होता है। ज्ञान (विद्या) यथाप्रमाण, यथावस्तु हुआ करता है। अतः प्रमाण और वस्तु के अधीन विद्या (ज्ञान) रहती है। वहाँ पुरुषस्वातन्त्र्य नहीं है और विधि अर्थात् विधेयकर्म कर्त्ता के अधीन होता है, उसके करने, न करने अथवा अन्यथा करने में पुरुष स्वतन्त्र है। निष्कर्ष यह है कि कर्म करने में पुरुष स्वतन्त्र है और ज्ञानप्राप्ति में पुरुष परतन्त्र होता है। अर्थात् कर्म और ज्ञान पुरुषस्वातन्त्र्य तथा अस्वातन्त्र्यरूप विरुद्ध हेतुओं से उत्पन्न होने के कारण कर्म और ज्ञान का समुच्चय नहीं हो सकता ॥ १२-१३॥ कारकाण्युपमृद्नाति विद्या बुद्धिमिवोषरे । इति तत्सत्यमादाय कर्म कर्तुं व्यवस्यति ॥ १४ ॥ कारकाणीति—जैसे मरुस्थल का ज्ञान मरुभूमि में जलज्ञान की निवृत्ति कर देता है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान (विद्या) कर्तृत्वादिकारक बुद्धि को निवृत्त कर देता है, अतः उसे सत्य मानकर आत्मज्ञानी पुरुष कर्म करने में क्यों प्रवृत्त होगा ? ॥ १४ ॥ हृदयस्पशिनी विद्या (ज्ञान) के होने पर कर्म का कोई आश्रय न रहने से कर्म का स्वरूप ही नहीं बन पाता अर्थात् कर्म की सत्ता ही नहीं रह पाती, उस स्थिति में वह (कर्म) ज्ञान का सहायक (सहकारी कारण) कैसे हो सकता है ? ऊषर (ऊसर) भूमि का यथार्थ ज्ञान होनेपर जैसे वहाँ जलभ्रम निवृत्त हो जाता है वैसे ही आत्मा में अविद्या के कारण होने वाली अध्यस्त कारक बुद्धि भी आत्मस्वभावावलम्बिनी विद्या (आत्मज्ञान) के होने पर निवृत्त हो ही जाती है। अतः उस कर्तृत्वादिकारक बुद्धि को सत्य समझकर कर्मानुष्ठान का विचार ज्ञानी पुरुष कैसे कर सकता है ? ॥ १४ ॥ विरुद्धत्वादतः शक्यं कर्म कर्तुं न विद्यया । सहैव विदुषा तस्मात्कर्म हेयं मुमुक्षुणा ॥ १५ ॥ विरुद्धत्वादिति—उपर्युक्त रीति से कर्म और ज्ञान के परस्पर विरुद्ध होने के कारण विद्वान् के द्वारा (ज्ञानी पुरुष के द्वारा) विद्या (ज्ञान) के साथ कर्म का अनुष्ठान नहीं किया जा सकता। इसलिये मुमुक्षु को चाहिये कि वह कर्म को त्याज्य ही समझे, अर्थात् उसके लिये कर्म त्याज्य ही है ॥ १५ ॥ हृदयस्पशिनी परस्परविरुद्धता के कारण कर्म और ज्ञान दोनों का समुच्चय होना सम्भव नहीं है। श्लोक में आये हुए 'विरुद्धत्वात्' और 'अतः' पदों में सामानाधिकरण्य है। दोनों को परस्परविरुद्ध समझने वाले विद्वान् के लिये विद्या के साथ कर्म करना कभी शक्य नहीं है। अतः उसे कर्म का त्याग ही करना चाहिये ॥ १५ ॥ २

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

१० उपदेशसाहस्री देहाद्यैरविशेषेण देहिनोग्रहणं निजम्। प्राणिनां तदविद्योत्थं यावत्कर्मविधिर्भवेत् ॥ १६ ॥ देहाद्यैरिति—देहधारि प्राणियों को अपने देहादि के साथ आत्मा का अभिन्न रूप से ज्ञान (ग्रहण) हो रहा है, वह अविद्या के कारण हो रहा है। अतः जब तक वह बना हुआ है, तब तक उसके लिये कर्म की भी विधि है। अर्थात् उसे कर्म करते रहना चाहिये ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शिनी कर्मवादी का आक्षेप है कि 'ज्ञात्वा कर्म समाचरेत्', तथा कर्मविधि को न मानने पर स्वर्गकामादि विधि के अनुपपन्न होने से और 'देहादि से भिन्न आत्मा है'—यह ज्ञान जिसे हो उसे ही कर्म करने का अधिकार होने से, सभी को कर्म करते ही रहना चाहिये । ज्ञान और कर्म में विरोध यदि समझा जाय तो कर्माधिकार के प्राप्त न हो सकने से अधिकारी के अभाव में कोई कर्मानुष्ठाता ही न रहने के कारण वेदका कर्मकाण्ड भाग ही अप्रमाण हो जायगा । उक्त आक्षेप का समाधान यह है कि कर्मस्वरूप, कर्मभेद, उनका परस्पर अङ्गाङ्गिभाव, प्रयोज्य-प्रयोजकभाव, क्रम, अधिकार आदि का विशेष ज्ञान रखनेवाले तथा देहातिरिक्त आत्मा है—यह समझने वाले अधिकारी की कर्मविशेष में अपेक्षा रहने पर भी परमात्मतत्त्वज्ञान की कर्म में कोई अपेक्षा नहीं होती, क्योंकि उसका वहाँ कोई उपयोग नहीं है। तथा दोनों (ज्ञान, कर्म) के अधिकारी भी भिन्न-भिन्न होने से दोनों के समुच्चय की कोई बात ही नहीं है। कर्म के अधिकारी के लिये कर्मकाण्ड भाग रहेगा और ज्ञान के अधिकारी के लिये ज्ञानकाण्ड का भाग होगा। अतः कर्मकाण्ड भाग अप्रमाण नहीं है। अथवा यदि औपनिषद ज्ञान, कर्म-कारकभेद का उपमर्दक (बाधक) होता, तो ज्ञानकाण्ड के द्वारा कर्मकाण्ड का विषय अपहृत कर लिया होता, और कर्मकाण्ड के लिये कोई विषय ही न रहता । तब उस स्थिति में विषय बाधित हो जाने से कर्मकाण्ड भाग अप्रमाण कहा जाता । किन्तु स्वाध्यायाध्ययन विधि के साथ विरोध होने से उस भाग को अप्रमाण कहना इष्ट नहीं है । किञ्च—कर्मकाण्ड पर अप्रामाण्यापत्ति देने वाले से हम यह पूछते हैं कि वह आपत्ति आत्मतत्त्वज्ञान से पूर्व होगी या उसके पश्चात् होगी ? प्रथम पक्ष तो ठीक नहीं रहेगा, क्योंकि प्राणियों को अपनी आत्मा का ज्ञान जबतक देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण के रूप में या उनके धर्मों के रूप में अविवेक के कारण होता रहेगा, तद्विशिष्ट होने के कारण ही आत्माभिमानरूप स्वाभाविक—अर्थात् योषित् आदि में अग्निभाव की बुद्धि के समान विधि से न होनेवाले—रूप से प्राणियों को जो आत्मज्ञान होता है, वह अविद्या के कारण होता है, अर्थात् अनादि अज्ञान से होनेवाली भ्रान्ति के संस्कार से होता है, वह तो सर्वसाधारण है । अर्थात् जब तक मैं ब्राह्मण हूँ, मैं गृहस्थ हूँ, समस्त इन्द्रियों से सम्पन्न मैं हूँ, मैं सकाम बलवान् हूँ आदि आदि ज्ञान होता रहता है, तब तक यह कर्मविधि (कर्मकाण्ड भाग) प्रमाण ही है। प्रमिति (बोध) जनक को प्रमाण कहते हैं। और वेद अधिकारी के लिये ही प्रमितिजनक होता है, अनधिकारी के लिये नहीं। अतः कर्मप्रवृत्ति तक प्रमितिजनक कर्मकाण्डभाग (विधिकाण्ड) को अपने अधिकारी (अनुष्ठाता) का लाभ हो जाने से ब्रह्मात्मतत्त्वविद्या के उदय होने से पूर्व अप्रामाण्यापत्ति नहीं हो रही है। अतः अध्ययनविधि के साथ विरोध भी नहीं है। निष्कर्ष यह है कि आत्मा का ज्ञान, देहादिव्यतिरिक्त के रूप में होने पर भी ब्रह्मज्ञान न होने से मूलाज्ञान की सत्ता तो रहती ही है। अतः उससे उत्पन्न होनेवाले अभिमान के कारण कर्मप्रवृत्ति चलती रहती है। एवञ्च आत्मज्ञान से पूर्व होनेवाली कर्मकाण्ड प्रवृत्ति में कोई विरोध नहीं है ॥ १६ ॥ नेति नेतोति देहादीनपोह्यात्माऽवशेषितः । अविशेषात्मबोधार्थं तेनाविद्या निवर्तिता ॥ १७ ॥ नेतीति—आत्मा निर्विशेष है, उसके बोध (ज्ञान) के लिये 'नेति नेति' इत्यादि श्रुति के द्वारा देह, इन्द्रिय आदि का निषेध (बाध) कर शुद्ध आत्मा ही शेष रहता है, उस आत्मा के ज्ञान से अविद्या की निवृत्ति होती है ॥ १७ ॥

उपोद्घातप्रकरणम् ११ हृदयस्पशिनी सोलहवे श्लोक में अप्रामाण्यापत्ति के दो विकल्प निर्दिष्ट किये गये थे। उनमें से प्रथम विकल्प (पक्ष) का तो खण्डन हो चुका। अब द्वितीय विकल्प का भी इष्टापत्ति कहकर खण्डन कर रहे हैं। 'सत्यस्य सत्यम्' इत्यादि श्रुति में 'नेति नेति' इस वीप्सार्थक श्रुति के द्वारा मिथ्यादृष्टि से (आत्माऽऽत्मीयभाव से) गृहीत देहादि अशेष पदार्थों का निषेध करते- करते प्रतिषेधावधिभूत आत्मा ही अवशिष्ट रह जाता है। अर्थात् पराक् अर्थों का निषेध करते करते निषेधावधि के रूप में प्रत्यगर्थ ही बचा रहता है, जिससे प्रत्यक् तत्त्व का बोध हो जाता है। अर्थात् अविशेषात्मबोध के लिये एक अवधि तक निषेध किया गया है। 'अविशेषात्मबोध' का अर्थ है- निर्विशेषचित्सदानन्दस्वभावाविर्भाव। 'अविशेषश्चासौ आत्मा च, तस्य बोधः, तदर्थम् अविशेषात्मबोधार्थम्' । इस प्रकार आत्मज्ञान होने पर कर्मानुष्ठान में अधिकार दिलाने वाला कारणभूत देहाभिमान (देह आदि में आत्माभिमान) जिस अविद्या के कारण होता है, उस अविद्या की निवृत्ति अपने परिकर सहित हो जाती है। अतः 'निमित्ता- भावान्नैमित्तिकाभावः' इस न्याय के अनुसार आत्मज्ञानी के लिये कर्मविधि की प्रतिपत्ति नहीं है। उसकी दृष्टि में कर्मकाण्ड की फलवद्विज्ञानजनकता न होने से कर्मकाण्ड भाग का अप्रामाण्य क्रोधशून्य की दृष्टि में अभिचार विधिशास्त्र के तुल्य उचित ही है। निष्कर्ष यह है कि आत्मज्ञान के पश्चात् मूलाविद्या के न रहने के कारण, तदुत्पन्न अभिमान के न होने से कर्मकाण्ड में प्रवृत्ति ही नहीं होगी, इसलिये उस दशा में कर्मकाण्डविधि के प्रवर्तक न हो पाने से उसका अप्रामाण्य तो इष्ट ही है ॥१७॥ निवृत्ता सा कथं भूयः प्रसूयेत प्रमाणतः । असत्येवाविशेषेऽपि प्रत्यगात्मनि केवले ॥ १८ ॥ निवृत्तेति-अविद्या की निवृत्ति प्रमाण के द्वारा कर देने पर वह पुनः कैसे उत्पन्न हो सकती है? वह तो निर्विशेष विशुद्ध आत्मा में मिथ्या ही है ॥ १८ ॥ हृदयस्पशिनी प्रत्यक् तत्त्वज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति एक बार होने पर भी पुनः कालान्तर में उत्पन्न होकर वह अपना कार्य क्यों नहीं करेगी? एवञ्च कर्माधिकार में हेतुभूत अविद्या के संभव होने से कर्म-प्रवृत्ति बराबर चलती ही रहेगी। लोकव्यवहार में देखा जाता है कि शुक्ति के यथार्थरूप का ज्ञान होने पर अज्ञान की निवृत्ति हो जाने पर भी पुनः कुछ समय के पश्चात् रजतभ्रम होता ही है। इस शंका का समाधान प्रस्तुत अठारहवें श्लोक के द्वारा किया जा रहा है। प्रमाणरूप अग्नि के द्वारा दग्ध हुई वह अविद्या पुनः अपने कार्य को कैसे उत्पन्न करेगी? मृत और दग्ध हुई भार्या पुनः प्रसव नहीं करती। एक अविद्या के नष्ट होने पर भी अन्य (दूसरी) अविद्या उत्पन्न होगी कहें, तो विचार करना होगा कि वह उत्पत्ति बिना किसी निमित्त के होगी या किसी निमित्त से होगी? प्रथम पक्ष तो ठीक नहीं है, क्योंकि अकारणकार्योत्पत्ति कहने पर अतिप्रसङ्ग होगा। द्वितीय पक्ष में क्या आत्मा उसकी उत्पत्ति में निमित्त होगा या अनात्मा? प्रथम पक्ष में विचार करें तो अविशेष (केवल), सर्वान्तर्यामी परमार्थवस्तुभूत प्रत्यगात्मा में उस अविद्या का अस्तित्व ही नहीं रहता। ऐसी स्थिति में असहाय कूटस्थ आत्मा में कर्तृत्व का होना संभव नहीं है। अर्थात् वह अविद्यान्तर का उत्पादक नहीं हो सकता। अविद्यान्तर की सहायता से उसे अविद्योत्पत्ति में निमित्त कहें तो अन्योन्याश्रय होगा तथा अनवस्था भी प्रसक्त होगी। श्लोक में आये हुए 'अविशेषे और केवले' इन दो पदों में व्याख्यान-व्याख्येयभाव समझना चाहिये। अथवा 'अविशेषे' कहने पर मूर्यादि कतिपय विशेषों के न रहने पर भी अन्य विशेषों की आशंका हो सकती है। इसलिये 'केवले' कहा गया है। यदि श्लोक में 'केवले' पद को ही रखते तो आत्मा के एकाकी रहने पर भी उसमें प्रयत्नादि- गुणसम्बन्धित्वविशेष के होने की आशंका हो सकती है। अतः उसके निराकरणार्थ 'अविशेषे' पद दिया गया है, यह समझना

१२ उपदेशसाहस्री चाहिये । ‘अविशेषेऽपि’ यहाँ ‘अपि’ के कहने से द्वितीयपक्ष का निरसन कहा जा रहा है—अनात्मा में भी वह असती (अविद्यमान) अविद्या है, अर्थात् उसका अस्तित्व (सत्ता) नहीं है। अतः अविद्या के कार्यरूप अनात्म पदार्थ भी अविद्यो- त्पत्ति के हेतु कैसे हो सकते हैं? शुक्ति-रजत का जो दृष्टान्त दिया गया है, वह प्रस्तुत स्थल में संगत नहीं है, क्योंकि शुक्ति- रजत आदि में अविद्या के शक्तिविशेष रजतादिविक्षेपशक्तिरूप उपादानांश की ही ज्ञान के द्वारा निवृत्ति मानी गई है। उस जैसी अनन्त शक्तियों से विशिष्ट मूलाज्ञान (मूलाविद्या) तो वहाँ रहता ही है, उस कारण पुनः कालान्तर में शुक्ति-रजत भ्रम होने लगता है ॥ १८ ॥ न चेद् भूयः प्रसूयेत कर्ता भोक्तेति धीः कथम् । सदस्मीति च विज्ञाने तस्माद्विद्याऽसहायिका ॥ १९ ॥ नचेदिति—जब अविद्या पुनः उत्पन्न ही नहीं हो पाती, तब 'मैं कर्ता हूँ, भोक्ता हूँ, यह बुद्धि कैसे हो सकती है ? अतः 'मैं सत् हूँ' इस ज्ञान के होने में विद्या (ज्ञान) को अन्य किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं होती ॥ १९ ॥ हृदयस्पार्शिनी आत्मा या अनात्मा से अविद्या की उत्पत्ति न हो सकने के कारण अर्थात् निरन्तर 'ब्रह्मैव अहमस्मि' इत्याकारक विशिष्ट ज्ञान (अपरोक्षानुभव) के होते रहनेपर कर्माधिकारप्राप्ति में निमित्तभूत 'कर्ता, भोक्ता हूँ' यह ज्ञान उसे कैसे हो सकेगा ? अर्थात् कभी हो ही नहीं सकता। श्लोक में 'च' कार का प्रयोग 'कर्तृत्व-भोक्तृत्वबुद्धि पारमार्थिक (वास्तविक) नहीं है', बताने के लिये किया गया है। कर्तृत्व-भोक्तृत्वबुद्धि (ज्ञान) यदि वास्तविक होती तो विद्या (ज्ञान) से उसकी निवृत्ति न हो पाती, तब तो कभी मोक्ष होगा ही नहीं । निष्कर्ष यह है कि 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान होने पर कर्मप्रवृत्ति के लिये अवकाश ही नहीं रहता। अतः कहना होगा कि विद्वान् (ज्ञानी) को कर्म में अधिकार नहीं है। जबकि विद्या (ज्ञान) के उत्पन्न होने पर कर्म निरवकाश हो जाता है (कर्म का होना संभव नहीं रहता) तब बिना किसी की सहायता के केवल (अकेली) विद्या ही कैवल्य (मोक्ष) की हेतु कही जाती है ॥ १९ ॥ अत्यरेचयदित्युक्तो न्यासः श्रुत्याऽत एव हि । कर्मभ्यो मानसान्तेभ्य एतावदिति वाजिनाम् ॥ २० ॥ अमृतत्त्वं श्रुतं यस्मात् त्याज्यं कर्म मुमुक्षुभिः । अग्निष्टोमवदित्युक्तं तन्नेदमभिधीयते ॥ २१ ॥ अतीति, अमृतत्वमिति—अतएव भगवती श्रुति ने सत्य से लेकर मानस तक सभी कर्मों की अपेक्षा संन्यास को उत्कृष्ट बताया है। 'एतावद्धचवरे खल्वमृतत्वम्' इस बृहदारण्यक श्रुति ने भी अमृतत्व को उत्कृष्ट बताया है। अतः मुमुक्षुजनों को (ज्ञानी मुमुक्षुओं को) कर्म का त्याग ही करना चाहिये। अर्थात् कर्मानुष्ठान में आसक्ति रखकर समय का अपव्यय नहीं करना चाहिये। समुच्चयवादी ने अग्निष्टोम याग के समान ज्ञान को भी कर्म की अपेक्षा का प्रतिपादन जो किया था, उसके विषय में अब कहते हैं ॥ २०-२१ ॥ हृदयस्पार्शिनी विद्या (ज्ञान) की सहकारिनिरपेक्षता को पूर्व श्लोक के द्वारा युक्ति से बताया था । उसी को अब श्रौत (वैदिक) लिङ्ग के द्वारा बता रहे हैं । तैत्तिरीयोपनिषत् में 'सत्यं परं सत्यम्' उपक्रम कर सत्य, तप आदि मानसान्त कर्मों को श्रेयःसाधन बताकर 'तानि वा एतान्यवराणि तपांसि' के द्वारा उनका फल्गु (व्यर्थ) फल है, ऐसी निन्दा की गई है। तदनन्तर 'न्यास इति ब्रह्मा' इस श्रुतिवाक्य के द्वारा बताये गये तत्त्वज्ञानानन्तरङ्गभूत संन्यास की 'न्यास एवात्यरेचयत्' कहकर स्तुति की

उपोद्घातप्रकरणम् १३ गई है। अथवा संन्यास के उपायभूत ज्ञान की स्तुति की गई है। अतः निन्दित की अनुपादेयता (अग्राह्यता) और स्तुत को उपादेयता (ग्राह्यता) होने से तथा मोक्ष को कर्मसापेक्ष मानने पर संन्यासविधि की अनुपपत्ति होने से आत्मज्ञानरूप संन्यास ही मोक्ष का साधन है, यह स्पष्ट हो जाता है। श्लोक में आये हुए 'अतः' शब्द का अर्थ 'ज्ञान की कर्मनिरपेक्षता' है। इस कारण 'अत एव' का अर्थ होगा कि अपनी फलप्राप्ति में ज्ञान की कर्मनिरपेक्षता के कारण ही श्रुति ने ज्ञान (संन्यास) की स्तुति की है। उसी तरह एक अन्य श्रुतिलिङ्ग भी बता रहे हैं—वाजसनेयी शाखा के उपनिषद् में भी 'आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदं सर्वं विदितम्' यह उपक्रम कर अद्वय आत्मतत्त्व का दुन्दुभि आदि के दृष्टान्त द्वारा उपपादन किया है। तदनन्तर 'उक्तानुशासनासि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वम्' वाक्य से ज्ञान में अमृतत्वसाधनता का अवधारण (निश्चय) करना ही उसकी (ज्ञान की) कर्मनिरपेक्षता में लिङ्ग बताया है। अन्यथा 'एतावत्' इस अवधारण वचन की उपपत्ति नहीं हो पायगी। 'अमृतत्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेन' इस वाक्य के द्वारा बताये गये वित्तसाध्य कर्म में अमृतत्व- साधन के न होने में लिङ्ग का अनुसन्धान कर लेना चाहिये। 'विद्यां च अविद्यां च' वाक्य से विहित समुच्चय से विरोध भी नहीं है। क्योंकि यह वचन देवतोपासना में ज्ञान-कर्म के समुच्चय को बता रहा है। अन्यथा 'हिरण्मयेन पात्रेण' 'अग्ने नय सुपथा' इत्यादि वाक्यों से की गई मार्गयाचना आदि की उपपत्ति नहीं हो पायगी। 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः', "त्याग एव हि सर्वेषां मोक्षसाधनमुत्तमम् । त्यजेतैव हि तज्ज्ञेयं त्यक्तुः प्रत्यक् परं पदम् ॥" इत्यादि शास्त्रवाक्यों के द्वारा जब कि त्यागोपलक्षित आत्मज्ञान को ही मुक्ति का साधन बताया गया है, इसलिये साधन- चतुष्टयसम्पन्न तत्त्वजिज्ञासु मुमुक्षुओं को कर्म का त्याग कर देना चाहिये। जबकि विविदिषु को भी कर्म का अवसर नहीं है तब विद्वान् के लिये कर्म के अवसर की कथा का प्रसंग ही कहाँ है ? अतः मोक्ष की अपेक्षा होने पर कर्मसंन्यासपूर्वक ज्ञाननिष्ठ ही होना चाहिये ॥ २० ॥ अब अग्निष्टोम का दृष्टान्त बताकर ज्ञान में कर्म की सापेक्षता को समुच्चयवादी ने बताया था उसका उत्तर अग्रिम श्लोक के द्वारा दिया जा रहा है ॥ २०-२१ ॥ नैककारकसाध्यत्वात् फलान्यत्वाच्च कर्मणः । विद्या तद्विपरीताऽतो दृष्टान्तो विषमो भवेत् ॥ २२ ॥ नैकेति—कोई भी कर्म एक कारक से साध्य नहीं है अर्थात् अनेक कारकों से हो पाता है तथा उस कर्म के फल भी भिन्न हैं, और उसके विपरीत ज्ञान का स्वभाव है। इसलिये अग्निष्टोम का दृष्टान्त देना उचित नहीं है ॥ २२ ॥ हृदयस्पर्शिनी अग्निष्टोमादि कर्मों की निष्पत्ति अनेक कारकों से हो पाती है, अर्थात् तत्तत् कर्मों के द्रव्य, मन्त्र, तन्त्र, प्रयोग नियत रहते हैं; उनसे तत्तत्कर्मों का सम्पादन किया जाता है। उसी तरह विद्या और कर्म के फल में भी भेद है। छान्दोग्य- श्रुति कहती है कि विद्या द्वारा (अर्थज्ञान के साथ) जो कर्म किया जाता है, उससे वीर्यवत्तर फलविशेष की प्राप्ति होती है। इसलिये कर्म को सहकारी की अपेक्षा रहना उचित है। किन्तु विद्या के विषय में ऐसी बात नहीं है। अर्थात् कर्मस्वभाव के विपरीत स्वभाव, विद्या का है। ज्ञान तो वस्तुपरतन्त्र है अर्थात् यथावस्त्वधीन है और प्रमाणनिबन्धन है तथा निरतिशय मोक्ष ही उसका एकमात्र फल है। इसलिये उसे (विद्या को) किसी सहकारी की अपेक्षा नहीं होती। एवञ्च कर्म और विद्या दोनों के स्वभाव में भेद होने से अग्निष्टोम का दृष्टान्त प्रस्तुत दाष्ट्रान्तिक के अनुरूप नहीं है ॥ २२ ॥ कृष्यादिवत् फलार्थत्वादन्यकर्मोपबृंहणम् । अग्निष्टोमस्त्वपेक्षेत विद्यान्यत् किमपेक्षते ॥ २३ ॥

१४ उपदेशसाहस्री कृष्यादिवदिति—अग्निष्टोम का फल सातिशय है, इसलिये उसे कृषि आदि के समान अन्यान्य कर्मों की सहायता की आवश्यकता होती है। किन्तु ज्ञान (विद्या) का फल सातिशय न होने से उसे किस अन्य वस्तु की अपेक्षा हो सकती है ? ॥ २३ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वश्लोक में बताया गया था कि अग्निष्टोम का दृष्टान्त विषम ( अननुरूप ) है, उसी विषमता को इस श्लोक के द्वारा बताया जा रहा है—कृषि, वाणिज्य आदि में सामग्रीबाहुल्य और फलबाहुल्य के कारण उसे सहकारी की अपेक्षा हुआ करती है। तदनुसार अग्निष्टोम कर्म के विषय में भी कह सकते हैं—'अग्निष्टोमः सातिशयः साध्यफलार्थत्वात् कृष्यादिवत्।' कृषि, वाणिज्य आदि में फल के उपचय ( वृद्धि ) के लिये साधनविशेष के उपचय ( वृद्धि ) की आवश्यकता का होना जैसे प्रसिद्ध है, वैसे ही अग्निष्टोम कर्म को भी अन्यकर्मोपबृंहण आवश्यक होता है। अर्थात् अपने अन्य सहकारी विधिविहित उद्गथादि- अंगसंश्रित उपासनादिरूप कर्मों के द्वारा फलाधिक्य के लिये वह अपना उपबृंहण चाहता है। किन्तु विद्या तो निरतिशय- फलवाली है, अतः उसे अन्य किसी सहकारी की अपेक्षा नहीं होती। सहकारियों की न्यूनाधिकता पर फल की न्यूनाधिकता ( फल के अतिशय में न्यूनाधिकता ) निर्भर रहती है किन्तु जहाँ फल निरतिशय ( सातिशय नहीं ) है, वहाँ किसलिये और क्यों कर सहकारी की अपेक्षा होगी ? अर्थात् नहीं ही होगी ॥ २३ ॥ प्रत्यवायस्तु तस्यैव यस्याहङ्कार इष्यते । अहङ्कारफलार्थित्वे विद्येते नात्मवेदिनः ॥ २४ ॥ प्रत्यवाय इति—प्रत्यवाय भी उसी को हो सकता है, जिसे अहंकार हो। आत्मज्ञानी को न अहंकार है और न फल की इच्छा ही है। आत्मज्ञानी में दोनों का अभाव रहता है ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी समुच्चयवादी ने 'अकुर्वन् विहितं कर्म' इस प्रत्यवायस्मृति को उपस्थित किया था, वह स्वाभाविक अहंकारवाले अधिकारी के लिये है, वह यदि विधिविहित कर्म का अनुष्ठान न करे तो उसके लिये वह स्मृति प्रत्यवाय बता रही है। 'इस कर्म का मैं कर्ता हूँ, इस कर्म का अनुष्ठान कर उसके फल को मैं प्राप्त करूंगा' यही अहंकार का स्वरूप है। ऐसे अहंकारी अधिकारी के लिये उपर्युक्त स्मृति, प्रत्यवाय को बता रही है। आत्मतत्त्वज्ञाननिष्ठ पुरुष को न अहंकार है और न फल की इच्छा ही है, क्योंकि विषय रहने पर ही अहंकार होता है। उसकी दृष्टि में कोई विषय ही नहीं रहता। अतः अहंकाररूप निमित्त न होने से उसे प्रत्यवाय कैसे हो सकता है ? इसलिये ज्ञानी तथा अज्ञानी दोनों में समान अहंकार समझ कर नित्य- कर्म के अननुष्ठान ( अकरण ) से उसे भी प्रत्यवाय होगा, ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये ॥ २४ ॥ तस्मादज्ञानहानाय संसारविनिवृत्तये । ब्रह्मविद्याविधानाय प्रारब्धोपनिषत्त्वियम् ॥ २५ ॥ तस्मादिति—अतः अज्ञान की निवृत्ति के लिये तथा संसार का बाध और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिये इस उपनिषद् का प्रारंभ किया जा रहा है ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी काठकोपनिषद् में 'विद्यैवाज्ञानहानाय न कर्मप्रतिकूलतः' ऐसा उपक्रम कर कर्म स्वतन्त्ररूप से अथवा ज्ञान की सहायता से अर्थात् किसी भी प्रकार से मोक्षप्राप्ति कराने में साक्षात् कारण ( हेतु ) नहीं है यह उपपादन किया गया है। तदनन्तर 'ब्रह्मविद्यामथेदानीं वक्तुं वेदः प्रचक्रमे' के द्वारा ब्रह्मविद्या का प्रारंभ बताया गया है। श्लोक में 'तस्मात्' शब्द है, यहाँ 'तत्' शब्द का अर्थ कर्मनिरपेक्षता है। अर्थात् विद्या की कर्मनिरपेक्षता के कारण अनादि अज्ञान के निरास के लिये