उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घातप्रकरणम् ९ हृदयस्पशिनी ज्ञानवादी का कहना है कि कर्म, विद्या (ज्ञान) का विरोधी होता है। ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्वादि के अभिमान से युक्त मनुष्य के द्वारा कर्म का अनुष्ठान किया जाता है, और विद्या कूटस्थ आत्माकार होने से जाति के अभिमान से रहित मनुष्य में रहती है। अतः विद्या और कर्म में विरोध प्रसिद्ध है। श्लोक में आये हुए 'हि' शब्द से सूचित प्रसिद्धि का उपपादन 'निर्विकारात्मबुद्धिश्च विद्येतीह प्रकीर्तिता' कहकर किया गया है। 'मैं कर्त्ता, भोक्ता नहीं हूँ, किन्तु कूटस्थ ब्रह्म ही हूँ' इस आत्माकार अन्तःकरणवृत्ति को विद्या कहते हैं। 'मैं ब्राह्मण हूँ, इस कर्म का कर्ता मैं हूँ, मेरे इस कर्म से यह फल होगा' इस अभिमान से कर्म का अनुष्ठान प्रारंभ होता है, यह प्रत्यक्ष है। अतः कर्म और ज्ञान दोनों में परस्पर- विरोध स्पष्ट है। एवंच ज्ञान में प्रवृत्ति अन्तर्मुख रहती है और कर्म में बहिर्मुख प्रवृत्ति रहने से दोनों में विरोध है। उसी तरह उन दोनों की उत्पत्ति के देखने से भी विरोध प्रतीत होता है। ज्ञान (विद्या) यथाप्रमाण, यथावस्तु हुआ करता है। अतः प्रमाण और वस्तु के अधीन विद्या (ज्ञान) रहती है। वहाँ पुरुषस्वातन्त्र्य नहीं है और विधि अर्थात् विधेयकर्म कर्त्ता के अधीन होता है, उसके करने, न करने अथवा अन्यथा करने में पुरुष स्वतन्त्र है। निष्कर्ष यह है कि कर्म करने में पुरुष स्वतन्त्र है और ज्ञानप्राप्ति में पुरुष परतन्त्र होता है। अर्थात् कर्म और ज्ञान पुरुषस्वातन्त्र्य तथा अस्वातन्त्र्यरूप विरुद्ध हेतुओं से उत्पन्न होने के कारण कर्म और ज्ञान का समुच्चय नहीं हो सकता ॥ १२-१३॥ कारकाण्युपमृद्नाति विद्या बुद्धिमिवोषरे । इति तत्सत्यमादाय कर्म कर्तुं व्यवस्यति ॥ १४ ॥ कारकाणीति—जैसे मरुस्थल का ज्ञान मरुभूमि में जलज्ञान की निवृत्ति कर देता है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान (विद्या) कर्तृत्वादिकारक बुद्धि को निवृत्त कर देता है, अतः उसे सत्य मानकर आत्मज्ञानी पुरुष कर्म करने में क्यों प्रवृत्त होगा ? ॥ १४ ॥ हृदयस्पशिनी विद्या (ज्ञान) के होने पर कर्म का कोई आश्रय न रहने से कर्म का स्वरूप ही नहीं बन पाता अर्थात् कर्म की सत्ता ही नहीं रह पाती, उस स्थिति में वह (कर्म) ज्ञान का सहायक (सहकारी कारण) कैसे हो सकता है ? ऊषर (ऊसर) भूमि का यथार्थ ज्ञान होनेपर जैसे वहाँ जलभ्रम निवृत्त हो जाता है वैसे ही आत्मा में अविद्या के कारण होने वाली अध्यस्त कारक बुद्धि भी आत्मस्वभावावलम्बिनी विद्या (आत्मज्ञान) के होने पर निवृत्त हो ही जाती है। अतः उस कर्तृत्वादिकारक बुद्धि को सत्य समझकर कर्मानुष्ठान का विचार ज्ञानी पुरुष कैसे कर सकता है ? ॥ १४ ॥ विरुद्धत्वादतः शक्यं कर्म कर्तुं न विद्यया । सहैव विदुषा तस्मात्कर्म हेयं मुमुक्षुणा ॥ १५ ॥ विरुद्धत्वादिति—उपर्युक्त रीति से कर्म और ज्ञान के परस्पर विरुद्ध होने के कारण विद्वान् के द्वारा (ज्ञानी पुरुष के द्वारा) विद्या (ज्ञान) के साथ कर्म का अनुष्ठान नहीं किया जा सकता। इसलिये मुमुक्षु को चाहिये कि वह कर्म को त्याज्य ही समझे, अर्थात् उसके लिये कर्म त्याज्य ही है ॥ १५ ॥ हृदयस्पशिनी परस्परविरुद्धता के कारण कर्म और ज्ञान दोनों का समुच्चय होना सम्भव नहीं है। श्लोक में आये हुए 'विरुद्धत्वात्' और 'अतः' पदों में सामानाधिकरण्य है। दोनों को परस्परविरुद्ध समझने वाले विद्वान् के लिये विद्या के साथ कर्म करना कभी शक्य नहीं है। अतः उसे कर्म का त्याग ही करना चाहिये ॥ १५ ॥ २