उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपदेशसाहस्री यह स्मृति कर्मानुष्ठान के न करने पर प्रत्यवाय बता रही है। इसलिये कर्म करते ही रहना चाहिये। उपर्युक्त “तस्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः” स्मृतिवाक्य केवल ज्ञानप्रशंसा के लिये समझना चाहिये। अन्यथा उदाहृतश्रुति-स्मृतिवाक्यों के साथ विरोध उपस्थित होगा ॥ ९॥ ननु ध्रुवफला विद्या नान्यत्किञ्चिदपेक्षते । नाग्निष्टोमो यथैवान्यद् ध्रुवकार्योऽप्यपेक्षते ॥ १० ॥ तथा ध्रुवफला विद्या कर्म नित्यमपेक्षते । इत्येवं केचिदिच्छन्ति न कर्म प्रतिकूलतः ॥ ११ ॥ नन्विति, तथेति—ब्रह्मविद्या का फल तो निश्चित (ध्रुव) है, उसे अपने फल को प्राप्ति कराने में कर्मादि किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं है। तथापि कुछ लोगों का कहना है कि ब्रह्मविद्या का फल जैसे निश्चित है, वैसे ही अग्निष्टोम- याग का फल भी निश्चित है, फिर भी उसे उद्गीथशास्त्रादि अन्य कर्मों की अपेक्षा रहती है। उसी प्रकार ब्रह्मविद्या का फल निश्चित रहने पर भी उसे नित्यकर्म की अपेक्षा रहती है। किन्तु यह समझना उचित नहीं है, क्योंकि 'कर्म' का ज्ञान के साथ विरोध है, अर्थात् दोनों परस्पर विरोधी हैं ॥ १०-११ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी (ज्ञान-कर्मसमुच्चयवादी) ने ज्ञानवादी सिद्धान्ती पर जो आक्षेप (विद्या अर्थात् ज्ञान को सहकारी कर्म की अपेक्षा रहती है) किया, उस पर सिद्धान्ती (ज्ञानवादी) उत्तर दे रहा है—कि विद्या (ज्ञान) का फल तो निश्चित है। अतः उसे अपनी फलप्राप्ति के लिये किसी अन्य कर्म आदि सहकारिकारण की अपेक्षा नहीं है। पूर्वपक्षी के सामने वह अनुमान प्रयोग करता है—‘ब्रह्मविद्या सहकारिनिरपेक्षा, ध्रुवफलत्वात् घटादिज्ञानवत्’ । तब पूर्वपक्षी (समुच्चयवादी) व्यभिचार प्रदर्शित करते हुए उसका परिहार करता है—उसका कहना है कि ज्ञानवादी के द्वारा उपस्थित किया अनुमान व्यभिचरित है। अग्निष्टोमयाग का फल ध्रुव (निश्चित) है, तथापि उसे उद्गीथशास्त्र एवं तद्गत देवतापरिज्ञान आदि सहकारी कर्म की अपेक्षा रहती है। उसी तरह विद्या (ज्ञान) का फल निश्चित रहने पर भी उसे कर्म की अपेक्षा रहती है। अतः ज्ञान-कर्मसमुच्चय पक्ष को ही स्वीकार करना चाहिये—ऐसा कुछ लोग चाहते हैं। इस पर सिद्धान्ती (ज्ञानवादी) कहता है कि पूर्वपक्षो का कथन उचित नहीं है। विद्या अपना कार्य सम्पन्न करने में कर्म की अपेक्षा नहीं करती, क्योंकि कर्म उसके (विद्या के) प्रतिकूल (विरोधी) है। अपना प्रतिकूल कभी अपना सहायक नहीं होता। तिमिर (अन्धकार) कभी भी प्रकाश का सहायक नहीं होता ॥ १०-११ ॥ विद्यायाः प्रतिकूलं हि कर्म स्यात्साभिमानतः । निर्विकारात्मबुद्धिश्च विद्येतीह प्रकीर्तिता ॥ १२ ॥ अहं कर्त्ता ममेदं स्यादिति कर्म प्रवर्त्तते । वस्तुधीना भवेद्विद्या कर्तृधीनो भवेद्विधिः ॥ १३ ॥ विद्याया इति, अहमिति—ब्राह्मणत्व-क्षत्रियत्व आदि के उचित कर्म का अनुष्ठान अभिमान से किया जाता है, इसलिये वह (कर्म), ‘ज्ञान’ का विरोधी है। इस वेदान्तदर्शन में निर्विकार आत्मबुद्धि (कूटस्थ आत्माकार ज्ञान) को ही ज्ञान (विद्या) शब्द से कहा गया है। मैं कर्त्ता हूँ, यह मेरा कर्तव्य है—ऐसी बुद्धि होने पर ही कर्म प्रवृत्त होता है और विद्या (ज्ञान) वस्तु के अधीन रहती है, व ‘कर्म’, कर्ता के अधीन होता है ॥ १२-१३ ॥