भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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२ उपदेशसाहस्री अतः ब्रह्म में केवल तटस्थ्य कारणता (तटस्थता) की शंका करना उचित नहीं है। एवञ्च 'ब्रह्म' चेतन (चैतन्य) रूप है। किन्तु उस चेतनरूप ब्रह्म के परिमाण के सम्बन्ध में दिगम्बर जैन तथा स्वयूथ्य अर्थात् कतिपय वेदान्ती व्याख्यातागण और आधुनिक मध्व, रामानुज आदि लोग उसका मध्यमपरिमाण, अणुपरिमाण बताते हैं। उन सबके लिये उत्तर रूप में पद्य में—"सर्वगम्" पद है। अर्थात् ब्रह्म (चैतन्य) सर्व व्यापक है। अतः वह केवल तटस्थ नहीं, कार्यरूप में परिणत होने से उपादान कारण भी है। परिणाम विवर्तरूप है यह बात दूसरी है। अतः ब्रह्म की अभिन्न निमित्तोपादान कारणता बताई गई। सांख्यदर्शनकार का कथन है कि चेतन, सर्वगत (सर्वव्यापक) रहने पर भी अनेक है, एक नहीं है। उन्हें उत्तर देने के लिये पद्य में 'सर्वम्' कहा है, अर्थात् ब्रह्म (चैतन्य) सर्वात्मक होने से एक है, अनेक नहीं है। कतिपय एकदेशीय वेदान्ती कहते हैं कि ब्रह्म सर्वात्मक रहने पर भी उसका और जीवात्मा का जल और तरंग या अग्नि और स्फुलिङ्ग की तरह अंशांशिभाव से अभेद है अर्थात् 'ब्रह्म' अंशी है और 'जीवात्मा' अंश है। उन्हें उत्तर देने के लिये पद्य में 'सर्वभूतगुहाशयम्' कहा है, अर्थात् समस्त प्राणियों की बुद्धियों (गुहाओं) में वह (ब्रह्म) साक्षी के रूप में स्थित रहता है। अतः उसमें न्यूनता की प्रतीति करानेवाला अंशांशिभाव जो प्रतीत होता है, वह वास्तविक नहीं है। शंका—'ब्रह्म' यदि सर्वभूतगुहाशय और सर्वात्मक है, तो क्या उसे 'मनोवेद्य' और सप्रपञ्च समझा जाय ? समा०—सर्वभूतों में स्थित तथा सर्वरूप होने पर भी ब्रह्म, अविद्या तथा उसके कार्यरूप समस्त विषयों से परे व्यवस्थित है। अतः उसे मनोवेद्य कैसे कह सकते हैं, क्योंकि वह विषयों से परे होने के कारण स्वयं अर्थात् निर्विशेष रूप से अविषय है। एवं कार्य-कारण भाव से यह स्पष्ट न होने से उसे सप्रपञ्च भी कैसे कहा जायगा ? अर्थात् वह ब्रह्म मनोवेद्य एवं सप्रपञ्च भी नहीं है। प्रस्तुत पद्य में 'चैतन्यं', 'सर्वगं' और 'सर्वम्' ये तीनों विशेषण 'तत् त्वमसि' इस महावाक्य के 'तत्' और 'त्वम्' दोनों पदार्थों के लिये साधारण (तुल्य) हैं। 'सर्वभूतगुहाशयम्' विशेषण के द्वारा 'त्वम्' पद का लक्ष्यार्थ, जो बुद्धि आदि का साक्षी है, उसे बताया गया है। तथा 'सर्ववित्' विशेषण से सगुण, परमेश्वर को बताया गया है, जो 'तत्' पद का वाच्यार्थ है, लक्ष्यार्थ नहीं। 'सर्वविषयातीतम्' विशेषण से 'तत्' पद का लक्ष्यार्थ निर्गुण ब्रह्म बताया गया है। यहाँ पर (यत्) सर्व- भूतगुहाशयं, विषयातीतम्' इस प्रकार 'यत्'—'तत्' पदों का सामानाधिकरण्य अर्थात् दोनों के द्वारा निर्दिष्टों की एकता (एकाधिकरणवृत्तित्व) होने से 'तत्' और 'त्वम्' पदों के द्वारा लक्षित अर्थों की 'एकता' सूचित की गई है, अर्थात् सभी विशेषणों का एक ही पदार्थ में तात्पर्य है। अतः प्रतिपाद्य जो 'तत्त्वम्पदार्थैक्य' है, वही इस ग्रन्थ का 'विषय' है। उस विषय के साथ प्रस्तुत प्रकरण ग्रन्थ का 'विषय-विषयिभाव-सम्बन्ध' ध्वनित होता है अर्थात् ग्रंथ जीव व ईश्वर की एकता बताता है। यह द्वितीय अनुबन्ध हुआ। 'चैतन्यं सर्वविषयातीतम्' पदों से चिदात्मा की सर्वानर्थ रूप विषयों से शून्यता को बताते हुए समस्त अनर्थों की निःशेष निवृत्ति के साथ ही 'निरतिशयानन्दाविर्भावरूप प्रयोजन' की सूचना दी गई है, यह तृतीय अनुबन्ध हुआ। उस प्रयोजन की इच्छा रखनेवाला 'मुमुक्षु' प्रस्तुत प्रकरण ग्रन्थ के अध्ययन का 'अधिकारी' है। इस प्रकार विषय, सम्बन्ध, प्रयोजन और अधिकारी इन चारों अनुबन्धों (अनुबन्धचतुष्टय) को उक्त मंगलाचरण के द्वारा ध्वनित किया गया है ॥ १ ॥ समापय्य क्रियाः सर्वा दारानग्न्याधानपूर्विकाः । ब्रह्मविद्यामथेदानीं वक्तुं वेदः प्रचक्रमे ॥ २ ॥ समापय्येति—पाणिग्रहण (विवाह), अग्नि का आधान जैसे विहित समस्त कर्मों के अनुष्ठान से सम्पन्न हुए व्यक्ति के लिए वेदभगवान् अब ब्रह्मविद्या के प्रतिपादन का आरम्भ करते हैं ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में देवताप्रणामरूप मङ्गलाचरण के व्याज से वेदान्तप्रतिपाद्य देवतातत्त्व का निरूपण संक्षेप में किया गया। अब वेदान्तवाक्यों का तात्पर्य भी उसी (देवतातत्त्व) में है, यह बताने के लिये कर्मकाण्ड प्रतिपादित अर्थ का अनुवाद